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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 558 में से

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पृष्ठ 218

१०६ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ सर्वार्थसिद्धौ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ [ २।२ § २५४ –
मिश्रौदयिकपारिणामिका इति । तथा सति हिः 'च'शब्दो न कर्तव्यो भवति । नैवं शङ्क्यम्;
अन्यगुणापेक्षया मिश्र इति प्रतीयेत । वाक्ये पुनः सति 'च'शब्देन प्रकृतोभयानुकर्षः कृतो भवति ।
तर्हि क्षायोपशमिकग्रहणमेव कर्तव्यमिति चेत् । न; गौरवात् । मिश्रग्रहणं मध्ये क्रियते उभया-
पेक्षार्थम् । भव्यस्य औपशमिकक्षायिकौ भावौ । मिश्रः पुनरभव्यस्यापि भवति औदयिकपारिणामि-
काभ्यां सह भव्यस्यापीति । भावापेक्षया तल्लिङ्गसंख्याप्रसङ्गः स्वतत्त्वस्येति चेत् । न; उपात्त-
लिङ्गसंख्यत्वात्$^१$ । तद्भावस्तत्त्वम् । स्वं तत्त्वं स्वतत्त्वमिति ।
§ २५४. अत्राह तस्यैकस्यात्मनो ये भावा औपशमिकादयस्ते किं भेदवन्त उताभेदा इति ।
अत्रोच्यते, भेदवन्तः । यद्येवं, भेदा उच्यन्तामित्यत आह—
द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्रमम् ॥२॥
§ २५५. द्वयादीनां संख्याशब्दानां कृतद्वन्द्वानां भेदशब्देन सह स्वपदार्थेऽन्यपदार्थे वा वृत्ति-
र्वेदितव्या । द्वौ च नव च अष्टादश च एकविंशतिश्च त्रयश्च द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रयः$^२$ । ते च
कपारिणामिकाः' इस प्रकार द्वन्द्व समास करना चाहिए । ऐसा करनेसे सूत्रमें दो 'च' शब्द नहीं
रखने पड़ते हैं ? समाधान—ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि सूत्रमें यदि 'च' शब्द न रखकर
द्वन्द्व समास करते तो मिश्रकी प्रतीति अन्य गुणकी अपेक्षा होती । किन्तु वाक्यमें 'च' शब्दके
रहनेपर उससे प्रकरणमें आये हुए औपशमिक और क्षायिक भावका अनुकर्षण हो जाता है ।
शंका—तो फिर सूत्रमें 'क्षायोपशमिक' पदका ही ग्रहण करना चाहिए ? समाधान—नहीं, क्योंकि
क्षायोपशमिक पदके ग्रहण करनेमें गौरव है; अतः इस दोषको दूर करनेके लिए क्षायोपशमिक पदका
ग्रहण न करके मिश्र पद रखा है । दोनोंकी अपेक्षासे मिश्र पद मध्यमें रखा है । औपशमिक और
क्षायिकभाव भव्यके ही होते हैं। किन्तु मिश्रभाव अभव्यके भी होता है । तथा औदयिक और
पारिणामिक भावोंके साथ भव्यके भी होता है। शंका—भावोंकी अपेक्षा स्वतत्त्वपदका वही लिंग
और संख्या प्राप्त होती है ? समाधान—नहीं, क्योंकि जिस पदको जो लिंग और संख्या प्राप्त हो
गयी है उसका वही लिंग और वही संख्या बनी रहती है । स्वतत्त्वका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—स्वं
तत्त्वं स्वतत्त्वम् = जिस वस्तुका जो भाव है वह तत्त्व है और स्व तत्त्व स्वतत्त्व है।
विशेषार्थ—पांच भावोंमें प्रारम्भके चार भाव निमित्तकी प्रधानतासे कहे गये हैं और
अन्तिम भाव योग्यताकी प्रधानतासे । जगमें जितने कार्य होते हैं उनका विभागीकरण इसी
हिसाबसे किया जाता है । कहीं निमित्तको प्रमुखता दी जाती है और कहीं योग्यताको । पर इससे
अन्य वस्तुका कर्तृत्व अन्यमें मानना उचित नहीं। ऐसे विभागीकरणके दिखलानेका इतना ही
प्रयोजन है कि जहाँ जिस कार्यका जो सुनिश्चित निमित्त हो उसका परिज्ञान हो जावे । यों तो
कार्य अपनी योग्यतासे होता है किन्तु जिसके बिना जो कार्य नहीं होता वह उसका सुनिश्चित
निमित्त कहा जाता है। इस हिसाबसे विचार करनेपर औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक और
औदयिक ये चार नैमित्तिक भाव ठहरते हैं ।
§ २५४. एक आत्माके जो औपशमिक आदि भाव कहे हैं, उनके कोई भेद हैं या नहीं ?
भेद हैं । यदि ऐसा है तो इनके भेदोंका कथन करना चाहिए, इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उक्त पाँच भावोंके क्रमसे दो, नौ, अठारह, इक्कीस और तीन भेद हैं ॥२॥
§ २५५. संख्यावाची दो आदि शब्दोंका द्वन्द्व समास करके पश्चात् उनका भेद शब्दके
साथ स्वपदार्थमें या अन्यपदार्थमें समास जानना चाहिए । स्वपदार्थ प्रधान समास यथा—द्वौ च
नव च अष्टादश च एकविंशतिश्च त्रयश्च इति द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रयः, ते एव भेदाः इति
१. संख्यात्वात् मु० । २. त्रयः । त एव भेदाः मु० ।