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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 558 में से

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पृष्ठ 204

§ २२२. विशुद्धिः प्रसादः। क्षेत्रं यत्रस्थान्भावान्प्रतिपद्यते। स्वामी प्रयोक्ता। विषयो ज्ञेयः।
तत्रावधेर्मनःपर्ययो विशुद्धतरः। कुतः सूक्ष्मविषयत्वात्। क्षेत्रमुक्तम्¹। विषयो वक्ष्यते। स्वामित्वं
प्रत्युच्यते। प्रकृष्टचारित्रगुणोपेतेषु वर्तते² प्रमत्तादिषु क्षीणकषायान्तेषु। तत्र चोत्पद्यमानः प्रवर्द्ध-
मानचारित्रेषु न हीयमानचारित्रेषु। प्रवर्द्धमानचारित्रेषु चोत्पद्यमानः सप्तविधान्यतमर्द्धिप्राप्तेषूप-
जायते नेतरेषु। ऋद्धिप्राप्तेषु केषुचिन्न सर्वेषु। ³इत्यस्यायं स्वामिविशेषो विशिष्टसंयमग्रहणं वा
वाक्ये प्रकृतम्। अवधिः पुनश्चातुर्गतिकेष्विति स्वामिभेदादप्यनयोर्विशेषः।
§ २२३. इदानीं केवलज्ञानलक्षणाभिधानं प्राप्तकालम्। तदुल्लङ्घ्य ज्ञानानां विषयनिबन्धः
परीक्ष्यते। कुतः। तस्य 'मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम्' इत्यत्र वक्ष्यमाणत्वात्।
यद्येवमाद्ययोरेव तावन्मतिश्रुतयोर्विषयनिबन्ध उच्यतामित्यत आह—
मतिश्रुतयोर्निबन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ॥२६॥
§ २२४. निबन्धनं निबन्धः। कस्य। विषयस्य। तद्विषयग्रहणं कर्तव्यम्। न कर्तव्यम्।
प्रकृतं विषयग्रहणम्। क्व प्रकृतम्। 'विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्यः' ४इत्यत्र। अतस्तस्यार्थवशादिह-
§ २२२. विशुद्धिका अर्थ निर्मलता है। जितने स्थानमें स्थित भावोंको जानता है वह क्षेत्र
है। स्वामीका अर्थ प्रयोक्ता है। विषय ज्ञेयको कहते हैं। सो इन दोनों ज्ञानोंमें अवधिज्ञानसे मनः-
पर्ययज्ञान विशुद्धतर है क्योंकि मनःपर्ययज्ञानका विषय सूक्ष्म है। क्षेत्रका कथन पहले कर आये हैं।
विषयका कथन आगे करेंगे। यहाँ स्वामीका विचार करते हैं—मनःपर्ययज्ञान प्रमत्तसंयतसे लेकर
क्षीणकषाय गुणस्थान तकके उत्कृष्ट चारित्रगुणसे युक्त जीवोंके ही पाया जाता है। वहाँ उत्पन्न
होता हुआ भी वह वर्द्धमान चारित्रवाले जीवोंके ही उत्पन्न होता है घटते हुए चारित्रवाले जीवोंके
नहीं। वर्धमान चारित्रवाले जीवोंमें उत्पन्न होता हुआ भी सात प्रकारकी ऋद्धियोंमें-से किसी एक
ऋद्धिको प्राप्त हुए जीवोंके ही उत्पन्न होता है अन्यके नहीं। ऋद्धिप्राप्त जीवोंमें भी किन्हींके ही
उत्पन्न होता है सबके नहीं, इस प्रकार सूत्रमें इसका स्वामीविशेष या विशिष्ट संयमका ग्रहण
प्रकृत है। परन्तु अवधिज्ञान चारों गतिके जीवोंके होता है, इसलिए स्वामियोंके भेदसे भी इनमें
अन्तर है।
विशेषार्थ—यों तो अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञानमें मौलिक अन्तर है। अवधिज्ञान सीधे
तौरसे पदार्थोंको जानता है और मनःपर्ययज्ञान मनकी पर्यायरूपसे। फिर भी यहाँ अन्य आधारोंसे
इन दोनों ज्ञानोंमें अन्तर दिखलाया गया है। वे आधार चार हैं—द्रव्य, क्षेत्र, स्वामी और विषय।
§ २२३. अब केवलज्ञानका लक्षण कहनेका अवसर है किन्तु उसका कथन न कर पहले
ज्ञानोंके विषयका विचार करते हैं, क्योंकि केवलज्ञानका लक्षण 'मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्त-
रायक्षयाच्च केवलम्' यहाँ कहेंगे। यदि ऐसा है तो सर्वप्रथम आदिमें आये हुए मतिज्ञान और
श्रुतज्ञानके विषयका कथन करना चाहिए। इसी बातको ध्यान में रखकर आगेका सूत्र कहते हैं—
मतिज्ञान और श्रुतज्ञानकी प्रवृत्ति कुछ पर्यायोंसे युक्त सब द्रव्योंमें होती है ॥२६॥
§ २२४. निबन्ध शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—निबन्धनं निबन्धः = जोड़ना, सम्बन्ध
करना। शंका—किसका सम्बन्ध ? समाधान—विषयका। शंका—तो सूत्रमें विषय पदका ग्रहण
करना चाहिए ? समाधान—नहीं करना चाहिए, क्योंकि विषय पदका ग्रहण प्रकरण प्राप्त है।
शंका—कहाँ प्रकरणमें आया है ? समाधान—'विषयक्षेत्रस्वामिविषयेभ्यः' इस सूत्रमें आया है।


१. मुक्तं विशेषो ब-मु० । २. -तेऽप्रम- मु०, दि० १, २ । ३. इत्यस्य स्वामिविशेषविशिष्टसंयमग्रहणं वाक्ये
कृतम् । अव-मु० ता०, ना० । ४. -येभ्य इत्यतस्त-दि० १, दि० २, आ०, मु० ।