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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 558 में से

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पृष्ठ 214

१०२ सर्वार्थसिद्धौ [ १।३३ § २४९ –

§ २४९. उक्ता नैगमादयो नयाः । उत्तरोत्तरसूक्ष्मविषयत्वादेषां क्रमः पूर्वपूर्वहेतुकत्वाच्च ।
एवमेते नयाः पूर्वपूर्वविरुद्धमहाविषया उत्तरोत्तरानुकूलाल्पविषया द्रव्यस्यानन्तशक्तेः प्रतिशक्ति
विभिद्यमाना बहुविकल्पा जायन्ते । त एते गुणप्रधानतया परस्परतन्त्राः सम्यग्दर्शनहेतवः पुरुषार्थ-
क्रियासाधनसामर्थ्यात्तन्तवादय इव यथोपायं विनिवेश्यमानाः पटादिसंज्ञाः स्वतन्त्राश्चासमर्थाः ।
§ २५०. १तन्त्वादय इवेति विषम उपन्यासः । तन्त्वादयो निरपेक्षा अपि कांचिदर्थमात्रां
जनयन्ति । भवति हि कश्चित्प्रत्येकं २तन्तुस्त्वक्त्राणे समर्थः । एकश्च बल्वजो बन्धने समर्थः । इमे
पुनर्नया निरपेक्षाः सन्तो न कांचिदपि सम्यग्दर्शनमात्रां प्रादुर्भावयन्तीति । नैष दोषः, अभिहिता-
नवबोधात् । अभिहितमर्थमनवबुध्य परेणेदमुपालभ्यते । एतदुक्तं, निरपेक्षेषु तन्त्वादिषु पटादिकार्यं
नास्तीति । यत्तु तेनोपदर्शितं न तत्पटादिकार्यम् । किं तर्हि । केवलं तन्त्वादिकार्यम्३ । तन्त्वादि-
कार्यमपि तन्त्वाद्यवयवेषु निरपेक्षेषु नास्त्येव इत्यस्मत्पक्षसिद्धिरव । अथ तन्त्वादिषु पटादिकार्यं
शक्त्यपेक्षया अस्तीत्युच्यते । नयेष्वपि निरपेक्षेषु बुद्धयभिधानरूपेषु कारणवशात्सम्यग्दर्शनहेतु-
त्वविपरिणतिसद्भावात् शक्त्यात्मनास्तित्वमिति साम्यमेवोपन्यासस्य४ ।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञायां प्रथमोऽध्यायः ।
उसका निश्चय करानेवाला नय एवंभूत नय है। यथा—इन्द्ररूप ज्ञानसे परिणत आत्मा इन्द्र है और
अग्निरूप ज्ञानसे परिणत आत्मा अग्नि है।
२४९. ये नैगमादिक नय कहे । उत्तरोत्तर सूक्ष्म विषयवाले होनेके कारण इनका यह क्रम
कहा है । पूर्व-पूर्व नय आगे-आगेके नयका हेतु है इसलिए भी यह क्रम कहा है । इस प्रकार ये नय
पूर्व-पूर्व विरुद्ध महाविषयवाले और उत्तरोत्तर अनुकूल अल्प विषयवाले हैं। द्रव्यकी अनन्त शक्ति
है इसलिए प्रत्येक शक्तिकी अपेक्षा भेदको प्राप्त होकर ये अनेक विकल्पवाले हो जाते हैं। ये सब
नय गौण मुख्यरूपसे एक दूसरेकी अपेक्षा करके ही सम्यग्दर्शनके हेतु हैं। जिस प्रकार पुरुषकी
अर्थक्रिया और साधनोंकी सामर्थ्यवश यथायोग्य निवेशित किये गये तन्तु आदिक पट आदिक
संज्ञाको प्राप्त होते हैं और स्वतन्त्र रहनेपर कार्यकारी नहीं होते उसी प्रकार ये नय समझने चाहिए।
§ २५०. शंका—प्रकृतमें 'तन्त्वादय इव' विषम दृष्टान्त है; क्योंकि तन्तु आदिक निरपेक्ष
रहकर भी किसी-न-किसी कार्यको जन्म देते ही हैं। देखते हैं कि कोई एक तन्तु त्वचाकी रक्षा
करनेमें समर्थ है और एक वल्कल किसी वस्तुको बाँधनेमें समर्थ है। किन्तु ये नय निरपेक्ष रहते
हुए थोड़ा भी सम्यग्दर्शनरूप कार्यको नहीं पैदा कर सकते हैं? समाधान—यह कोई दोष नहीं
है, क्योंकि जो कुछ कहा गया है उसे समझे नहीं। कहे गये अर्थको समझे बिना दूसरेने यह उपालम्भ
दिया है। हमने यह कहा है कि निरपेक्ष तन्तु आदिमें पटादि कार्य नहीं पाया जाता। किन्तु
शंकाकारने जिसका निर्देश किया है वह पटादिका कार्य नहीं है। शंका—तो वह क्या है?
समाधान—केवल तन्तु आदिका कार्य है। तन्तु आदिका कार्य भी सर्वथा निरपेक्ष तन्तु
आदिके अवयवोंमें नहीं पाया जाता, इसलिए इससे हमारे पक्षका ही समर्थन होता है। यदि
यह कहा जाय कि तन्तु आदिमें पटादि कार्य शक्तिकी अपेक्षा है हो तो यह बात बुद्धि और
अभिधान—शब्दरूप निरपेक्ष नयोंके विषयमें भी जानना चाहिए। उनमें भी ऐसी शक्ति पायी
१. तन्त्वादिवदेष विष–आ०, दि० १, दि० २, ता० ना० । २. 'एकस्तन्तुस्त्वक्त्राणेऽसमर्थस्तत्समुदायश्च
कम्बलः समर्थः × ×एकश्च बल्वजो बन्धनेऽसमर्थस्तत्समुदायश्च रज्जु समर्था भवति । विषम उपन्यासः ।
भवति हि तत्र या च यावती चार्थमात्रा । भवति हि कश्चित्प्रत्येकस्तन्तुस्त्वक्त्राणे समर्थः । × ×एकश्च
बल्वजो बन्धने समर्थः ।' पा० म० भा० १।२।२।४५। ३. कार्यम् । तर्हि तन्त्वा–ता०, ना० । ४. न्यायस्य ।
ज्ञानदर्शनयोस्तत्त्वं नयानां चैव लक्षणम् । ज्ञानस्य च प्रमाणत्वमध्यायेऽस्मिन्निरूपितम् ।। इति' प्रतिष्वेवं पाठः ।