सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- २४ § २६१ ] द्वितीयोऽध्यायः १०९
क्षायिकं तथा केवलदर्शनम् । दानान्तरायस्यात्यन्तक्षयादनन्तप्राणिगणानुग्रहकरं क्षायिकमभयदानम् ।
लाभान्तरायस्याशेषस्य निरासात् परित्यक्तकवलाहारक्रियाणां केवलिनां यतः शरीरबलाधानहेतवो-
ऽन्यमनुजासाधारणाः परमशुभाः सूक्ष्माः अनन्ताः प्रतिसमयं पुद्गलाः संबन्धमुपयान्ति स क्षायिको
लाभः । कृत्स्नस्य भोगान्तरायस्य १ तिरोभावादाविर्भूतोऽतिशयवाननन्तो भोगः क्षायिकः । यतः
कुसुमवृष्ट्यादयो विशेषाः प्रादुर्भवन्ति । निरवशेषस्योपभोगान्तरायस्य प्रलयात्प्रादुर्भूतोऽनन्त
उपभोगः क्षायिकः । यतः सिंहासनचामरच्छत्रत्रयादयो विभूतयः । वीर्यान्तरायस्य कर्मणोऽत्यन्त-
क्षयादाविर्भूतमनन्तवीर्यं क्षायिकम् । पूर्वोक्तानां सप्तानां प्रकृतीनामत्यन्तक्षयात्क्षायिकं सम्यक्त्वम् ।
चारित्रमपि तथा । यदि क्षायिकदानादिभावकृतमभयदानादि, सिद्धेष्वपि तत्प्रसङ्गः । नैष दोषः;
शरीरनामतीर्थंकरनामकर्मोदयाद्यपेक्षत्वात् । तेषां तदभावे तदप्रसङ्गः । कथं तर्हि तेषां सिद्धेषु
वृत्तिः । २परमानन्दाव्याबाधरूपेणैव तेषां तत्र वृत्तिः । केवलज्ञानरूपेणानन्तवीर्यवृत्तिवत् ।
कर्मके अत्यन्त क्षयसे क्षायिक केवलज्ञान होता है । इसी प्रकार केवलदर्शन भी होता है । दानान्त-
राय कर्मके अत्यन्त क्षयसे अनन्त प्राणियोंके समुदायका उपकार करनेवाला क्षायिक अभयदान
होता है । समस्त लाभान्तराय कर्मके क्षयसे कवलाहार क्रियासे रहित केवलियोंके क्षायिक लाभ
होता है जिससे उनके शरीरको बल प्रदान करनेमें कारणभूत, दूसरे मनुष्योंको असाधारण अर्थात्
कभी न प्राप्त होनेवाले, परम शुभ और सूक्ष्म ऐसे अनन्त परमाणु प्रति समय सम्बन्धको प्राप्त
होते हैं । समस्त भोगान्तराय कर्मके क्षयसे अतिशयवाले क्षायिक अनन्त भोगका प्रादुर्भाव होता
है । जिससे कुसुमवृष्टि आदि आश्चर्य विशेष होते हैं । समस्त उपभोगान्तरायके नष्ट हो जानेसे
अनन्त क्षायिक उपभोग होता है । जिससे सिंहासन, चामर और तीन छत्र आदि विभूतियां होती
हैं । वीर्यान्तराय कर्मके अत्यन्त क्षयसे क्षायिक अनन्त वीर्य प्रकट होता है । पूर्वोक्त सात प्रकृतियोंके
अत्यन्त विनाशसे क्षायिक सम्यक्त्व होता है । इसो प्रकार क्षायिक चारित्रका स्वरूप समझना
चाहिए । शंका—यदि क्षायिक दान आदि भावोंके निमित्तसे अभयदान आदि कार्य होते हैं तो
सिद्धोंमें भी उनका प्रसंग प्राप्त होता है ? समाधान—यह कोई दोष नहीं, क्योंकि इन अभयदान
आदिके होनेमें शरीर नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्मके उदयकी अपेक्षा रहती है । परन्तु सिद्धोंके
शरीर नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्म नहीं होते अतः उनके अभयदान आदि नहीं प्राप्त होते ।
शंका—तो सिद्धोंके क्षायिक दान आदि भावोंका सद्भाव कैसे माना जाय ? समाधान—जिस प्रकार
सिद्धोंके केवलज्ञान रूपसे अनन्तवीर्यका सद्भाव माना गया है उसी प्रकार परमानन्दके अव्याबाध
रूपसे ही उनका सिद्धोंके सद्भाव है ।
विशेषार्थ-घातिकर्मोके चार भेद हैं-ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय । इनमें-
से ज्ञानावरणके अभावसे क्षायिक ज्ञान, दर्शनावरणके अभावसे क्षायिक दर्शन, मोहनीयके अभावसे
क्षायिक सम्यक्त्व और क्षायिक चारित्र तथा अन्तरायके अभावसे क्षायिक दानादि पाँच लब्धियां
होती हैं । इसीसे क्षायिक भावके नौ भेद किये हैं । यद्यपि अघाति कर्मोंके अभावसे जीवके क्षायिक
अगुरुलघु आदि गुण प्रकट होते हैं पर वे अनुजीवी न होनेसे उनका यहाँ ग्रहण नहीं किया है ।
प्रश्न यह है कि टीकामें जो अभयदान आदिको शरीर नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्मकी अपेक्षा
रखनेवाले क्षायिक दान आदिके कार्य बतलाये हैं सो ऐसा बतलाना कहां तक उचित है ? बात यह
है कि ऐसा निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध है कि तीर्थंकरके गर्भमें आनेपर छह महीना पहलेसे भक्तिवश
देव आकर जिस नगरीमें तीर्थंकर जन्म लेते हैं वहाँ रत्न वर्षा करते हैं । छप्पन कुमारिकाएँ
१. –यस्यात्यन्ताभा-मुं० । २. –मानन्तवीर्याव्याबाधसुखरूपे-मु० । —मानन्ताव्याबाधसुखरूप-आ०, दि० १,
दि० २ ।