सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ सर्वार्थसिद्धौ [ २।४ § २५९ -
कर्मस्थितिका काललब्धिः । उत्कृष्टस्थितिकेषु कर्मसु जघन्यस्थितिकेषु च प्रथमसम्यक्त्वलाभो न
भवति । क्व र्तिह भवति । अन्तःकोटीकोटीसागरोपमस्थितिकेषु कर्मसु बन्धमापद्यमानेषु विशुद्ध-
परिणामवशात्सत्कर्मसु च ततः संख्येयसागरोपमसहस्रोनायामन्तःकोटीकोटीसागरोपमस्थितौ
स्थापितेषु प्रथमसम्यक्त्वयोग्यो भवति । अपरा काललब्धिर्भवोपेक्षया । भव्यः पञ्चेन्द्रियः संज्ञी
पर्याप्तकः सर्वविशुद्धः प्रथमसम्यक्त्वमुत्पादयेति । 'आदि'शब्देन जातिस्मरणादिः परिगृह्यते ।
§ २५९. कृत्स्नस्य मोहनीयस्योपशमादौपशमिकं चारित्रम् । तत्र सम्यक्त्वस्यादौ वचनं;
तत्पूर्वकत्वाच्चारित्रस्य ।
§ २६०. यः क्षायिको भावो नवविध उद्दिष्टस्तस्य भेदस्वरूपप्रतिपादनार्थमाह—
ज्ञानदर्शनदानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च ॥४॥
§ २६१. 'च'शब्दः सम्यक्त्वचारित्रानुकर्षणार्थः । ज्ञानावरणस्यात्यन्तक्षयात्केवलज्ञानं
कर्मोंके शेष रहनेपर या जघन्य स्थितिवाले कर्मोंके शेष रहनेपर प्रथम सम्यक्त्वका लाभ नहीं
होता । शंका - तो फिर किस अवस्था में होता है ? समाधान - जब बँधनेवाले कर्मोंकी स्थिति अन्तः-
कोड़ाकोड़ी सागर पड़ती है और विशुद्ध परिणामोंके वशसे सत्तामें स्थित कर्मोंकी स्थिति संख्यात
हजारसागर कम अन्तःकोड़ाकोड़ी सागर प्राप्त होती है तब यह जीव प्रथम सम्यक्त्वके योग्य होता
है। एक काललब्धि भवकी अपेक्षा होती है - जो भव्य है, संज्ञी है, पर्याप्तक है और सर्वविशुद्ध है
वह प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करता है। 'आदि' शब्दसे जातिस्मरण आदिका ग्रहण करना चाहिए ।
§ २५९. समस्त मोहनीय कर्मके उपशमसे औपशमिक चारित्र होता है। इनमेंसे 'सम्यक्त्व'
पदको आदिमें रखा है क्योंकि चारित्र सम्यक्त्व पूर्वक होता है।
विशेषार्थ - उपशम दो प्रकारका है- करणोपशम और अकरणोपशम । कर्मोंका अन्तरकरण
होकर जो उपशम होता है वह करणोपशम कहलाता है। ऐसा उपशम दर्शनमोहनीय और चारित्र-
मोहनीय इन दोका ही होता है इसलिए उपशम भावके दो ही भेद बतलाये हैं। किन्तु इतनी
विशेषता है कि अनन्तानुबन्धी चतुष्कका अन्तरकरण उपशम नहीं होता, इसलिए जहाँ भी
इसके उपशमका विधान किया गया है वहाँ इसका अकरणोपशम ही लेना चाहिए । औपशमिक
सम्यग्दृष्टिके दर्शनमोहनीयका तो अन्तरकरण उपशम होता है और अनन्तानुबन्धी चतुष्कका
अनुदयरूप उपशम-यह उक्त कथनका भाव है। यद्यपि उपशम सम्यग्दृष्टिके अनन्तानुबन्धी चतुष्क-
का अन्तरकरण उपशम होता है इस मतका उल्लेख सप्ततिकामें देखा जाता है पर मुख्य मत वही
है जिसका यहाँ हमने निर्देश किया है। प्रकृतमें जिस जीवके औपशमिक सम्यक्त्वकी प्राप्ति होती
है उसकी योग्यताका निर्देश करते हुए ऐसी चार योग्यताएँ बतलायी हैं। विशेष इस प्रकार हैं-
पहली योग्यता अर्धपुद्गल परिवर्तन प्रमाण कालकी है जिस जीवके संसारमें रहनेका इतना काल
शेष रहा है उसे ही सर्वप्रथम सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति हो सकती है। पर इतने कालके शेष रहनेपर
सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति होनी ही चाहिए ऐसा कोई नियम नहीं है। इसके पहले सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति
नहीं होती इतना सुनिश्चित है। शेष कथन सुगम है।
§ २६०. जो क्षायिकभाव नौ प्रकारका कहा है उसके भेदोंके स्वरूपका कथन करनेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं-
क्षायिक भावके नौ भेद हैं-क्षायिक ज्ञान, क्षायिक दर्शन, क्षायिक दान, क्षायिक लाभ,
क्षायिक भोग, क्षायिक उपभोग, क्षायिक वीर्य, क्षायिक सम्यक्त्व और क्षायिक चारित्र ॥४॥
§ २६१. सूत्रमें 'च' शब्द सम्यक्त्व और चारित्रके ग्रहण करनेके लिए आया है। ज्ञानावरण