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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 558 में से

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पृष्ठ 211
  • १३३ § २४४ ] प्रथमोऽध्यायः ९९
    एधोदकाद्याहरणे व्यापिप्रमाणं कश्चित्पृच्छति किं करोति भवानिति । स आह ओदनं पचामीति ।
    न तदौदनपर्यायः संनिहितः, तदर्थे व्यापारे स प्रयुज्यते । एवं प्रकारो लोकसंव्यवहारः अनभिनि-
    वृत्ताऽर्थसंकल्पमात्रविषयो नैगमस्य गोचरः ।
    § २४३. स्वजात्यविरोघेनैकध्यमुपानीय पर्यायानाक्रान्तभेदानविशेषेण समस्तग्रहणात्संग्रहः ।
    सत्, द्रव्यं, घट इत्यादि । सदित्युक्ते सदिति वाग्विज्ञानानुवृत्तिलिङ्गाऽनुमितसत्ताधारभूतानाम- ५
    विशेषेण सर्वेषां संग्रहः । द्रव्यमित्युक्तेऽपि द्रवति गच्छति तांस्तान्पर्यायानित्युपलक्षितानां जीवाजीव-
    तद्भेदप्रभेदानां संग्रहः । तथा घट इत्युक्तेऽपि घटबुद्ध्यभिधानानुगमलिङ्गाऽनुमितसकलार्थसंग्रहः ।
    एवं प्रकारोऽन्योऽपि संग्रहनयस्य १विषयः ।
    § २४४. संग्रहनयाक्षिप्तानामर्थानां विधिपूर्वक्रमवहरणं व्यवहारः । को विधिः । यः संग्रह-
    गृहीतोऽर्थस्तदानुपूर्येणैव व्यवहारः प्रवर्तत इत्ययं विधिः । तद्यथा—सर्वसंग्रहेण २यत्तत्त्वं गृहीतं १०
    तच्चानपेक्षितविशेषं नालं संव्यवहारायेति व्यवहारनय आश्रीयते । यत्सत्तद् द्रव्यं गुणो वेति ।
    द्रव्येणापि संग्रहाक्षिप्तेन जीवाजीवविशेषानपेक्षेण न शक्यः संव्यवहार इति जीवद्रव्यममजीवद्रव्य-
    मिति वा व्यवहार आश्रीयते । जीवाजीवावपि ३ च संग्रहाक्षिप्तौ नालं संव्यवहारायेति प्रत्येकं
    देवनारकादिर्घटादिश्च व्यवहारेणाश्रीयते । एवमयं नयस्तावद्वर्तते यावत्पुनर्नास्ति विभागः ।
    किया गया है। तथा ईंधन और जल आदिके लानेमें लगे हुए किसी पुरुषसे कोई पूछता है कि १५
    आप क्या कर रहे हैं। उसने कहा भात पका रहा हूँ। उस समय भात पर्याय सन्निहित नहीं है,
    केवल भातके लिए किये गये व्यापारमें भातका प्रयोग किया गया है। इस प्रकारका जितना लोक-
    व्यवहार अनिष्पन्न अर्थके आलम्बनसे संकल्पमात्रको विषय करता है वह सब नैगम नयका
    विषय है।
    § २४३. भेदसहित सब पर्यायोंको अपनी जातिके अविरोध-द्वारा एक मानकर सामान्यसे २०
    सबको ग्रहण करनेवाला नय संग्रहनय है। यथा- सत्, द्रव्य और घट आदि। 'सत्' ऐसा कहनेपर
    सत् इस प्रकारके वचन और विज्ञानकी अनुवृत्तिरूप लिंगसे अनुमित सत्ताके आधारभूत सब पदार्थों
    का सामान्य रूपसे संग्रह हो जाता है। 'द्रव्य' ऐसा कहनेपर भी 'उन-उन पर्यायोंको द्रवता है
    अर्थात् प्राप्त होता है' इस प्रकार इस व्युत्पत्तिसे युक्त जीव, अजीव और उनके सब भेद-प्रभेदोंका
    संग्रह हो जाता है। तथा 'घट' ऐसा कहनेपर भी घट इस प्रकारकी बुद्धि और घट इस प्रकारके २५
    शब्दकी अनुवृत्तिरूप लिंगसे अनुमित सब घट पदार्थोंका संग्रह हो जाता है। इस प्रकार अन्य भी
    संग्रह नयका विषय है।
    § २४४. संग्रह नयके द्वारा ग्रहण किये गये पदार्थोंका विधिपूर्वक अवहरण अर्थात् भेद करना
    व्यवहार नय है। शंका--विधि क्या है ? समाधान--जो संग्रह नयके द्वारा गृहीत अर्थ है उसीके
    आनुपूर्वी क्रमसे व्यवहार प्रवृत्त होता है, यह विधि है। यथा--सर्वसंग्रह नयके द्वारा जो वस्तु ३०
    ग्रहण की गयी है वह अपने उत्तर भेदोंके बिना व्यवहार करानेमें असमर्थ है, इसलिए व्यवहार
    नयका आश्रय लिया जाता है। यथा--जो सत् है वह या तो द्रव्य है या गुण । इसी प्रकार संग्रह
    नयका विषय जो द्रव्य है वह जीव अजीवकी अपेक्षा किये बिना व्यवहार करानेमें असमर्थ है
    इसलिए जीव द्रव्य है और अजीव द्रव्य है इस प्रकारके व्यवहारका आश्रय लिया जाता है। जीव
    द्रव्य और अजीव द्रव्य भी जब तक संग्रह नयके विषय रहते हैं तब तक वे व्यवहार करानेमें ३५
    असमर्थ हैं इसलिए व्यवहारसे जीव द्रव्यके देव, नारकी आदि रूप और अजीव द्रव्यके घटादिरूप
    भेदोंका आश्रय लिया जाता है। इस प्रकार इस नयकी प्रवृत्ति वहीं तक होती है जहाँ तक वस्तुमें
    फिर कोई विभाग करना सम्भव नहीं रहता।
    १. संग्रहनयः ॥२॥ संग्र-मु० । २. यत्संग्र-मु०, दि० १; दि०२, आ० । ३. जीवावपि संग्र-मु० ।
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri