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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 216

१०४ सर्वार्थसिद्धौ [ १।३३ § २५० -
एक वाच्य रूपसे ग्रहण नहीं कर सकता । इसी प्रकार गो शब्दका गाय अर्थ अन्यार्थ है और वाणी
अर्थ अन्यार्थ है, इसलिए समभिरूढ़ नय इन अर्थोंको एक साथ ग्रहण नहीं कर सकता । इसी प्रकार
सभी नयोंके विषयको समझना चाहिए । नय अंश-द्वारा वस्तुको स्पर्श करनेवाला एक विकल्प है ।
प्रमाण ज्ञानके समान यह समग्र वस्तुको स्पर्श नहीं करता, इसलिए ही निरपेक्ष नयको मिथ्या और
५ सापेखनयको सम्यक् कहा गया है । इस विषयका विशेष खुलासा और सब नयोंकी उत्तरोत्तर
सूक्ष्मताका विचार मूलमें किया ही है। इस प्रकार नय सात हैं और वे द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक
इन दो भागोंमें बटे हुए हैं यह निश्चित होता है ।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामवाली तत्त्वार्थवृत्तिमें प्रथम अध्याय समाप्त हुआ ।