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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 558 में से

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पृष्ठ 209

Here is the line-by-line transcription of the Sanskrit text, Hindi translation/commentary, and footnotes from the image:

– १३२ § २३९ ] प्रथमोऽध्यायः ९७
यदृच्छया$^१$ यदापि मातरं मातैवेति भार्यामपि भार्यैवेति च तदापि न तत्सम्यग्ज्ञानम् । एवं
मत्यादीनामपि रूपादिषु विपर्ययो वेदितव्यः। तथा हि, कश्चिन्मिथ्यादर्शनपरिणाम आत्मन्यवस्थितो
रूपाद्युपलब्धौ सत्यामपि कारणविपर्यास भेदाभेदविपर्यास स्वरूपविपर्यास च जनयति ।
§ २३७. कारणविपर्यासस्तावद्—रूपादीनामेकं कारणममूर्त्तं नित्यमिति केचित्प्रकल्पयन्ति ।$^३$
अपरे पृथिव्यादिजातिभिन्नाः परमाणवश्चतुस्त्रिद्व्येकगुणास्तुल्यजातीयानां कार्याणामारम्भका ५
इति । $^४$अन्ये वर्णयन्ति—पृथिव्यादीनि चत्वारि भूतानि, भौतिकधर्मा वर्णगन्धरसस्पर्शाः, एतेषां
समुदायो रूपपरमाणुरष्टक इत्यादि । $^५$इतरे $^६$वर्णयन्ति—पृथिव्यप्तेजोवायवः काठिन्यादिद्रवत्वा-
द्युष्णत्वादीरणत्वादिगुणा$^७$ जातिभिन्नाः परमाणवः कार्यस्यारम्भकाः ।
§ २३८. भेदाभेदविपर्यासः 'कारणात्कार्यमर्थान्तरभूतमेवेति $^८$अनर्थान्तरभूतमेवेति च १०
परिकल्पना ।
§ २३९. स्वरूपविपर्यासौ रूपादयो निर्विकल्पाः$^१$$^०$ सन्ति न सन्त्येव$^१$$^१$ वा। तदाकारपरिणतं
विज्ञानमेव$^१$$^२$। न च तदालम्बनं वस्तु बाह्यमिति । एवमन्यानपि परिकल्पनाभेदान् दृष्टेष्टविरुद्धा-
भी उन्हें अविद्यमान मानता है। और कदाचित् अविद्यमान वस्तुको भी विद्यमान कहता है। कदा-
चित् सत्को सत् और असत्को असत् ही मानता है। यह सब निश्चय मिथ्यादर्शनके उदयसे होता
है। जैसे पित्तके उदयसे आकुलित बुद्धिवाला मनुष्य माताको भार्या और भार्याको माता मानता १५
है। जब अपनी इच्छाकी लहरके अनुसार माताको माता और भार्या भार्याको ही मानता है
तब भी वह ज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं है। इसी प्रकार मत्यादिकका भी रूपादिकमें विपर्यय जानना
चाहिए। खुलासा इस प्रकार है- आत्मामें स्थित कोई मिथ्यादर्शनरूप परिणाम रूपादिककी
उपलब्धि होनेपर भी कारणविपर्यास, भेदाभेदविपर्यास और स्वरूपविपर्यासको उत्पन्न करता
रहता है। २०
§ २३७. कारणविपर्यास यथा-कोई मानते हैं कि रूपादिकका एक कारण है जो अमूर्त्त
और नित्य है। कोई मानते हैं कि पृथिवी जातिके परमाणु अलग हैं जो चार गुणवाले हैं। जल
जातिके परमाणु अलग हैं जो तीन गुणवाले हैं। अग्नि जातिके परमाणु अलग हैं जो दो गुणवाले हैं
और वायु जातिके परमाणु अलग हैं जो एक गुणवाले हैं। तथा ये परमाणु अपने समान जातीय
कार्यको ही उत्पन्न करते हैं। कोई कहते हैं कि पृथिवी आदि चार भूत हैं और इन भूतोंके वर्ण, २५
गन्ध, रस और स्पर्श ये भौतिक धर्म हैं। इन सबके समुदायको एक रूप परमाणु या अष्टक कहते
हैं। कोई कहते हैं कि पृथिवी, जल, अग्नि और वायु ये क्रमसे काठिन्यादि, द्रवत्वादि, उष्णत्वादि
और ईरणत्वादि गुणवाले अलग-अलग जातिके परमाणु होकर कार्यको उत्पन्न करते हैं।
§ २३८. भेदाभेदविपर्यास यथा - कारणसे कार्यको सर्वथा भिन्न या सर्वथा अभिन्न मानना।
§ २३९. स्वरूपविपर्यास यथा-रूपादिक निर्विकल्प हैं, या रूपादिक हैं ही नहीं, या ३०
रूपादिकके आकाररूपसे परिणत हुआ विज्ञान ही है उसका आलम्बनभूत और कोई बाह्य पदार्थ
नहीं है। इसी प्रकार मिथ्यादर्शनके उदयसे ये जीव प्रत्यक्ष और अनुमानके विरुद्ध नाना प्रकारकी
कल्पनाएँ करते हैं और उनमें श्रद्धान उत्पन्न करते हैं। इसलिए इनका यह ज्ञान मत्यज्ञान,
श्रुताज्ञान या विभंग ज्ञान होता है। किन्तु सम्यग्दर्शन तत्त्वार्थ के ज्ञानमें श्रद्धान उत्पन्न करता है
अतः इस प्रकारका ज्ञान मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और और अवधिज्ञान होता है। ३५
१. -च्छया मातरं मु०, ता०, ना० । २. सांख्याः । ३. नैयायिकाः । ४. बौद्धाः । ५. लौकायतिकः ।
६. -तरे कल्पयन्ति पथि- आ०, दि० १ । ७. -णत्त्वादिगमनादिगुणा आ०, दि० १, दि० २ । ८. नैयायिकाः ।
९. सांख्याः । १०. बौद्धाः । ११. नैयायिकाः । १२. योगाचाराः ।
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