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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 208, कुल 558 में से

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पृष्ठ 208

९६ सर्वार्थसिद्धौ [ १।३१ § २३३ -
§ २३३. अथ यथोक्तानि मत्यादीनि ज्ञानव्यपदेशमेव लभन्ते उतान्यथापीत्यत आह—
मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च१ ॥ ३१ ॥
§ २३४. विपर्ययो मिथ्येत्यर्थः । कुतः । सम्यगधिकारात् । 'च'शब्दः समुच्चयार्थः ।
विपर्ययश्च सम्यक्चेति । कुतः पुनरेषां विपर्ययः । मिथ्यादर्शनेन सहैकार्थसमवायात् सरजस्क-
कटुकालाबुगतदुग्धवत् । ननु च तत्राधारदोषाद् दुग्धस्य रसविपर्ययो भवति । न च तथा मत्यज्ञा-
नादीनां विषयग्रहणे विपर्ययः । तथा हि, सम्यग्दृष्टिर्यथा चक्षुरादिभी रूपादीनुपलभते तथा
मिथ्यादृष्टिरपि२ मत्यज्ञानेन । यथा च सम्यग्दृष्टिः श्रुतेन रूपादीन् जानाति निरूपयति च तथा
मिथ्यादृष्टिरपि श्रुताज्ञानेन । यथा चावधिज्ञानेन सम्यग्दृष्टिः रूपिणोऽर्थानवगच्छति तथा मिथ्या-
दृष्टिर्विभङ्गज्ञानेनेति ।
§ २३५. अत्रोच्यते—
३सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् ॥ ३२ ॥
§ २३६. सद्दिद्यमानमसदविद्यमानमित्यर्थः । तयोरविशेषेण यदृच्छया उपलब्धेर्विपर्ययो
भवति । कदाचिद्रूपादि संदप्यसदिति प्रतिपद्यते, असदपि सदिति, कदाचित्सत्सदेव, असदप्यसदेवेति
मिथ्यादर्शनोदयादध्यवस्यति । यथा पित्तोदयाकुलितबुद्धिर्मातरं भार्येति, भार्यामपि मातेति मन्यते ।
§ २३३. अब यथोक्त मत्यादिक ज्ञान व्यपदेशको ही प्राप्त होते हैं या अन्यथा भी होते हैं इस
बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मति, श्रुत और अवधि ये तीन विपर्यय भी हैं ॥ ३१ ॥
§ २३४. विपर्ययका अर्थ मिथ्या है, क्योंकि सम्यग्दर्शनका अधिकार है । 'च' शब्द समु-
च्चयरूप अर्थमें आया है । इससे यह अर्थ होता है कि मति, श्रुत और अवधि विपर्यय भी हैं और
समीचीन भी । शंका—ये विपर्यय क्यों हैं ? —समाधान—क्योंकि मिथ्यादर्शनके साथ एक आत्मामें
इनका समवाय पाया जाता है । जिस प्रकार रज सहित कड़वी तूंबड़ीमें रखा हुआ दूध कड़वा हो
जाता है उसी प्रकार मिथ्यादर्शनके निमित्तसे ये विपर्यय होते हैं । कड़वी तूंबड़ीमें आधारके दोषसे
दूधका रस मीठेसे कड़वा हो जाता है, यह स्पष्ट है किन्तु उस प्रकार मत्यादि ज्ञानोंकी विषयके
ग्रहण करनेमें विपरीतता नहीं मालूम होती । खुलासा इस प्रकार है—जिस प्रकार सम्यग्दृष्टि चक्षु
आदिके द्वारा रूपादिक पदार्थोंको ग्रहण करता है उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि भी । जिस प्रकार
सम्यग्दृष्टि श्रुतके द्वारा रूपादि पदार्थोंको जानता है और उनका निरूपण करता है उसी प्रकार
मिथ्यादृष्टि भो श्रुतज्ञानके द्वारा रूपादिक पदार्थोंको जानता है और उनका निरूपण करता है ।
जिस प्रकार सम्यग्दृष्टि अवधिज्ञानके द्वारा रूपी पदार्थोंको जानता है उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि भी
विभंग ज्ञानके द्वारा रूपी पदार्थोंको जानता है ।
§ २३५. यह एक प्रश्न है जिसका समाधान करनेके लिए अगला सूत्र कहते हैं ।
वास्तविक और अवास्तविकके अन्तरके बिना यदृच्छोपलब्धि ( जब जैसा जी में आया
उस रूप ग्रहण होने ) के कारण उन्मत्तकी तरह ज्ञान भी अज्ञान ही है ॥ ३२ ॥
§ २३६. प्रकृतमें 'सत्' का अर्थ विद्यमान और 'असत्' का अर्थ अविद्यमान है । इनकी
विशेषता न करके इच्छानुसार ग्रहण करनेसे विपर्यय होता है । कदाचित् रूपादिक विद्यमान हैं तो
१. विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् । पा० यो० सू० १, ८ । २. -रपि । यथा दि० १, दि० २, आ० ।
३. 'सदसदविसेसणाओ भवहेजउदिच्छिओवलम्भाओ । नाणफलाभावाओ मिच्छदिट्ठिस्स अण्णाणं ।'-वि० भा०
गा० ११५ ।