सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 215

जाती है जिससे वे कारणवश सम्यग्दर्शनके हेतु रूपसे परिणमन करनेमें समर्थ हैं। इसलिए दृष्टान्त
का दार्ष्टान्तसे साम्य ही है।
विशेषार्थ—प्रमाणके भेद-प्रभेदोंका कथन करनेके बाद यहाँ नयोंका निर्देश किया गया है।
नय श्रुतज्ञानका एक भेद है यह पहले ही बतला आये हैं। यहाँ आलम्बनकी प्रधानतासे उसके
सात भेद किये गये हैं। मुख्यतः आलम्बनको तीन भागोंमें विभक्त किया जा सकता है, उपचार, ५
अर्थ और शब्द। पहला नैगमनय उपचारनय है। संग्रह, व्यवहार और ऋजुसूत्र अर्थनय हैं और
शेष तीन शब्दनय हैं। आशय यह है कि नैगम नयकी प्रवृत्ति उपचारकी प्रधानतासे होती है
इसलिए इसे उपचार नय कहा है। वैसे तो इसकी परिगणना अर्थनयमें की गयी है। संग्रह,
व्यवहार और ऋजुसूत्रकी प्रवृत्ति अर्थकी प्रधानतासे होती है इसलिए इन्हें अर्थनय कहा है और
शब्द, समभिरूढ़ तथा एवंभूत नयकी प्रवृत्ति शब्दकी प्रधानतासे होती है इसलिए इन्हें शब्द नय १०
कहा है। जैसा कि हमने संकेत किया है कि नैगमनयका समावेश अर्थनयोंमें किया जाता है किन्तु
शेष अर्थनयोंसे नैगमनयको अर्थनय माननेमें मौलिक भेद है। बात यह है कि उपचारकी प्रधानतासे
वस्तुको स्वीकार करना यह नैगमनयका काम है शेष अर्थनयोंका नहीं इसलिए इसे उपचार नय
कहा है। शेष अर्थनय तो भेदाभेद या सामान्य विशेषकी प्रधानतासे सीधा ही वस्तुको विषय करते
हैं वहाँ उपचारको विशेषस्थान नहीं इसलिए हमने अर्थनयोसे नैगमनयको पृथक् बतलाया है। १५
माना कि नैगमनय भी गौण मुख्यभावसे भेदाभेद या सामान्यविशेषको विषय करता है पर इन
सबकी जड़में उपचार काम करता है इसलिए नैगमनय मुख्यतः उपचारनय ही है। सिद्धसेन
दिवाकरने नैगमनयको नय ही नहीं माना है इसका कारण यह उपचार ही है। सम्यग्ज्ञानके
प्रकरणमें उपचारको कहाँ तक स्थान दिया जाय यह एक प्रश्न तो है ही। वस्तुस्पर्शी विकल्प और
वस्तुमें आरोपित विकल्प इनमें बड़ा अन्तर है। वस्तुस्पर्शी विकल्पोंको सम्यग्ज्ञानकी कोटिमें स्थान २०
देना तो अनिवार्य है, किन्तु यदि वस्तुमें आरोपित विकल्पोंको सम्यग्ज्ञानकी कोटिमें स्थान दिया
जाय तो अनवस्थाकी सीमा ही न रहे यह एक भय था जिसके कारण आचार्य सिद्धसेन दिवाकरने
नय प्रकरणमें नैगमका नामोल्लेख तक न किया। किन्तु ऐसा उपचार, जो परम्परासे ही सही मूल
कार्यका ज्ञान करानेमें सहायक हो और जिससे अवास्तविक भ्रम फैलनेका भय न हो या जो
वस्तुका विपरीतरूपसे बोध न कराकर वस्तुके गूढ़तम तत्त्वकी ओर इशारा करता हो, ग्राह्य है २५
ऐसा मानकर उपचार प्रधान नैगमनयको नयप्रकरणमें स्थान दिया गया है। इससे विचार करने-
की परिधि बढ़ जाती है और सम्यग्ज्ञानके जनक समग्र विचारोंका वर्गीकरण करनेमें सहायता
मिलती है। यदि नैगमनयकी श्रेणीमें जो विचार आते हैं उन्हें मिथ्या मानकर सर्वथा छोड़ दिया
जाता है—सम्यग्ज्ञानकी श्रेणीमें स्थान नहीं दिया जाता है तो अभेदकी ओर ले जानेवाले जितने
विचार हैं उनकी भी यही गति होनी चाहिए। यदि उनसे वस्तुके स्वरूपका विश्लेषण करनेमें ३०
सहायता मिलती है इसलिए उनकी नयोंकी श्रेणीमें परिगणना की जाती है तो यही बात नैगमनयके
ऊपर भी लागू करनी चाहिए। इन नयोंका सामान्य और विशेष स्वरूप टीकामें दिया ही है
इसलिए यहाँ इस विषयमें विशेष नहीं लिखा गया है। ऋजुसूत्र नय वर्तमान पर्याय-द्वारा वस्तुको
ग्रहण करता है और शब्दादिक नय शब्दों-द्वारा वर्तमान पर्यायमुखेन वस्तुको ग्रहण करते हैं,
इसलिए इन नयोंका विषय द्वित्व नहीं हो सकता। यही कारण है कि शब्दनयके विषयका निरूपण ३५
करते समय एक साथ प्रयुक्त किये गये एकवचनान्त और द्विवचनान्त आदि शब्दके वाच्य आदि
इसके अविषय बतलाये हैं और समभिरूढ़के विषयका निरूपण करते समय एक शब्दके अनेक अर्थ
या एक अर्थमें अनेक शब्दोंका प्रयोग करना इसका अविषय बतलाया है, क्योंकि एकवचनान्त
शब्दका वाच्य अन्यार्थ है और द्विवचनान्त शब्दका वाच्य अन्यार्थ है, इसलिए शब्द नय इनको