सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- १३३ § २४८ ] प्रथमोऽध्यायः १०१
मन्यते; अन्यार्थस्यान्यार्थेन संबन्धाभावात्। लोकसमयविरोध इति चेत् । विरुध्यताम्। १तत्त्वमिह
मीमांस्यते, न२ भेषज्यमातुरેચ્છानुवर्ति ।
§ २४७. नानार्थसमभिरोहणात्समभिरूढः। यतो नानार्थान्समतीत्यैकमर्थमाभिमुख्येन रूढः
समभिरूढः । गौरित्ययं शब्दो वागादिष्वर्थेषु३ वर्तमानः पशावभिरूढः। अथवा ४अर्थगत्यर्थः
शब्दप्रयोगः । तत्रैकस्यार्थस्यैकेन गतार्थत्वात्पर्यायशब्दप्रयोगोऽनर्थकः । शब्दभेदश्चेदस्ति ५
अर्थभेदेनाप्यवश्यं भवितव्यमिति । नानार्थसमभिरोहणात्समभिरूढः। इन्दनादिन्द्रः शकनाच्छक्रः
पूर्दारणात् पुरंदर इत्येवं सर्वत्र । अथवा यो यत्राभिरूढः स तत्र समेत्याभिमुख्येनारोहणात्समभि-
रूढः । यथा क्व भवानास्ते । आत्मनीति । कुतः । वस्त्वन्तरे वृत्त्यभावात् । ५यद्यन्यस्यान्यत्र वृत्तिः
स्यात्, ज्ञानादीनां रूपादीनां चाकाशे वृत्तिः स्यात् ।
§ २४८. येनात्मना भूतस्तेनैवाध्यवसाययतीति एवंभूतः । स्वाभिप्रेतक्रियापरिणतिक्षणे एव १०
स शब्दो युक्तो नान्यदेति । यदैवेन्दति तदैवेन्द्रो नाभिषेचको न पूजक इति । यदैव गच्छति तदैव
गौर्न स्थितो न शयित इति । अथवा येनात्मना येन ज्ञानेन भूततः परिणतस्तेनैवाध्यवसाययति ।
यथेन्द्राग्निज्ञानपरिणत आत्मैवेन्द्रोऽग्निश्चेति ।
अन्य अर्थके साथ सम्बन्ध नहीं बन सकता । शंका—इससे लोकसमयका (व्याकरण शास्त्रका)
विरोध होता है । समाधान—यदि विरोध होता है तो होने दो, इससे हानि नहीं, क्योकि यहाँ १५
तत्त्वकी मीमांसा की जा रही है । दवाई कुछ पीड़ित पुरुषकी इच्छाका अनुकरण करनेवाली
नहीं होती ।
§ २४७. नाना अर्थोंका समभिरोहण करनेवाला होनेसे समभिरूढ़ नय कहलाता है । चूंकि
जो नाना अर्थोंको 'सम्' अर्थात् छोड़कर प्रधानतासे एक अर्थमें रूढ़ होता है वह समभिरूढ़ नय है ।
उदाहरणार्थ-'गो' इस शब्दके वचन आदि अनेक अर्थ पाये जाते हैं तो भी वह 'पशु' इस अर्थमें २०
रूढ़ है । अथवा अर्थका ज्ञान करानेके लिए शब्दोंका प्रयोग किया जाता है। ऐसी हालतमें एक
अर्थका एक शब्दसे ज्ञान हो जाता है इसलिए पर्यायवाची शब्दोंका प्रयोग करना निष्फल है ।
यदि शब्दोंमें भेद है तो अर्थभेद अवश्य होना चाहिए । इस प्रकार नाना अर्थोंका समभिरोहण
करनेवाला होनेसे समभिरूढ़ नय कहलाता है । जैसे इन्द्र, शक्र और पुरन्दर ये तीन शब्द होनेसे
इनके अर्थ भी तीन हैं। इन्द्रका अर्थ आज्ञा ऐश्वर्यवान् है, शक्रका अर्थ समर्थ है और पुरन्दरका २५
अर्थ नगरका दारण करनेवाला है । इसी प्रकार सर्वत्र जानना चाहिए । अथवा जो जहाँ अभिरूढ़
है वह वहाँ 'सम्' अर्थात् प्राप्त होकर प्रमुखतासे रूढ़ होनेके कारण समभिरूढ़ नय कहलाता है ।
यथा—आप कहाँ रहते हैं ? अपनेमें, क्योंकि अन्य वस्तुकी अन्य वस्तुमें वृत्ति नहीं हो सकती ।
यदि अन्यकी अन्यमें वृत्ति होती है ऐसा माना जाय तो ज्ञानादिककी और रूपादिककी आकाशमें
वृत्ति होने लगे । ३०
§ २४८. जो वस्तु जिस पर्यायको प्राप्त हुई है उसी रूप निश्चय करानेवाले नयको एवंभूत
नय कहते हैं। आशय यह है कि जिस शब्दका जो वाच्य है उस रूप क्रियाके परिणमनके समय ही
उस शब्दका प्रयोग करना युक्त है अन्य समयमें नहीं । जबी आज्ञा ऐश्वर्यवाला हो तभी इन्द्र है
अभिषेक करनेवाला नहीं और न पूजा करनेवाला ही । जब गमन करती हो तभी गाय है बैठी हुई
नहीं और न सोती हुई ही । अथवा जिस रूपसे अर्थात् जिस ज्ञानसे आत्मा परिणत हो उसी रूपसे ३५
१. तत्त्वं मीमां- आ०, दि० १, दि० २ । २. न तु भैष-आ०, ता०, दि० १ । ३. -गादिषु वर्त-ता०,
ना० । ४. 'अर्थगत्यर्थः शब्दप्रयोगः । अर्थं संप्रत्याययिष्यामीति शब्दः प्रयुज्यते । तत्रैकेनोक्तत्वात्तस्यार्थस्य
द्वितीयस्य च तृतीयस्य च प्रयोगेण न भवितव्यम् 'उक्तार्थानामप्रयोगः' इति' पा० म० भा० २।१।१।१ ।
५. यद्यस्यान्यत्र आ० ।