सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९८ सर्वार्थसिद्धौ [ १।३३ § २४० -
न्मिथ्यादर्शनोदयात्कल्पयन्ति तत्र च श्रद्धानमुत्पादयन्ति । ततस्तन्मत्यज्ञानं श्रुताज्ञानं १विभङ्गज्ञानं
च भवति । सम्यग्दर्शनं पुनस्तत्त्वार्थाधिगमे श्रद्धानमुत्पादयति । ततस्तन्मतिज्ञानं श्रुतज्ञान-
मवधिज्ञानं च भवति ।
§ २४०. आह प्रमाणं द्विप्रकारं वर्णितम् । प्रमाणैकदेशाश्च नयास्तदनन्तरोद्देशभाजो निर्दे-
ष्टव्या इत्यत आह—
नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दसमभिरूढैवंभूता नयाः ॥ ३३ ॥
§ २४१. एतेषां सामान्यविशेषलक्षणं वक्तव्यम् । सामान्यलक्षणं तावद्वस्तुन्यनेकान्तात्मन्य-
विरोधेन हेत्वर्पणात्साध्यविशेषस्य याथात्म्यप्रापणप्रवणः२ प्रयोगो नयः । स द्वेधा द्रव्यार्थिकः
पर्यायार्थिकश्चेति । द्रव्यं सामान्यमुत्सर्गः अनुवृत्तिरित्यर्थः । तद्विषयो द्रव्यार्थिकः । पर्यायो विशेषो-
ऽपवादो व्यावृत्तिरित्यर्थः । तद्विषयः पर्यायार्थिकः । तयोर्भेदा नैगमादयः ।
§ २४२. तेषां विशेषलक्षणमुच्यते—अनभिनिर्वृत्तार्थसंकल्पमात्रग्राही नैगमः । कंचित्पुरुषं
परिगृहीतपरशुं गच्छन्तमवलोक्य कश्चित्पृच्छति किमर्थं भवान्गच्छतीति । स आह प्रस्थमानेतु-
मिति । नासौ तदा प्रस्थपर्यायः संनिहितः । तदभिनिर्वृत्तये संकल्पमात्रे प्रस्थव्यवहारः । तथा
विशेषार्थ—यहाँपर प्रारम्भके तीन ज्ञान विपर्यय होते हैं यह बतलाकर वे विपर्यय क्यों होते
हैं यह बतलाया गया है । संसारी जीवकी श्रद्धा विपरीत और समीचीनके भेदसे दो प्रकारकी होती
है । विपरीत श्रद्धावाले जीवको विश्वका यथार्थ ज्ञान नहीं होता । वह जगत्में कितने पदार्थ हैं
उनका स्वरूप क्या है यह नहीं जानता । आत्मा और परमात्माके स्वरूप बोधसे तो वह सर्वथा
वंचित रहता है । वह घटको घट और पटको पट ही कहता है पर जिन तत्त्वोंसे इनका निर्माण
होता है उनका इसे यथार्थ बोध नहीं होने पाता । यही कारण है कि जीवकी श्रद्धाके अनुसार ज्ञान
भी समीचीन ज्ञान और मिथ्या ज्ञान इन दो भागोंमें विभक्त हो जाता है । यथार्थ श्रद्धाके होनेपर
जो ज्ञान होते हैं उन्हें समीचीन ज्ञान कहते हैं और यथार्थ श्रद्धाके अभावमें होनेवाले ज्ञानोंका नाम
ही मिथ्या ज्ञान है । ऐसे मिथ्या ज्ञान तीन माने गये हैं—कुमति ज्ञान, कुश्रुत ज्ञान और विभंग
ज्ञान । ये ही तीन ज्ञान मिथ्या होते हैं अन्य नहीं, क्योंकि ये ज्ञान विपरीत श्रद्धावालेके भी पाये
जाते हैं । विपरीत श्रद्धा क्यों होती है इसका निर्देश मूल टीकामें किया ही है ।
§ २४०. दो प्रकारके प्रमाणका वर्णन किया । प्रमाणके एकदेशको नय कहते हैं । इनका
कथन प्रमाणके अनन्तर करना चाहिए, अतः आगेका सूत्र कहते हैं—
नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ और एवंभूत ये सात नय हैं ॥३३॥
२४१. इनका सामान्य और विशेष लक्षण कहना चाहिए । सामान्य लक्षण—अनेकान्तात्मक
वस्तुमें विरोधके बिना हेतुकी मुख्यतासे साध्यविशेषकी यथार्थताके प्राप्त करानेमें समर्थ प्रयोगको
नय कहते हैं । इसके दो भेद हैं-द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक । द्रव्यका अर्थ सामान्य, उत्सर्ग और
अनुवृत्ति है और इसको विषय करनेवाला नय द्रव्यार्थिक नय कहलाता है । तथा पर्यायका अर्थ
विशेष, अपवाद और व्यावृत्ति है और इसको विषय करनेवाला नय पर्यायार्थिक नय कहलाता है ।
इन दोनों नयोंके उत्तर भेद नैगमादिक हैं ।
§ २४२. अब इनका विशेष लक्षण कहते हैं—अनिष्पन्न अर्थमें संकल्पमात्रको ग्रहण करने-
वाला नय नैगम है । यथा–हाथमें फरसा लेकर जाते हुए किसी पुरुषको देखकर कोई अन्य पुरुष
पूछता है आप किस कामके लिए जा रहे हैं । वह कहता है प्रस्थ लानेके लिए जा रहा हूँ । उस
समय वह प्रस्थ पर्याय संनिहित नहीं है, केवल उसके बनानेका संकल्प होनेसे उसमें प्रस्थ व्यवहार
१. -ज्ञानमवध्यज्ञा-मु० । २. -वणप्रयो-मु० ।
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