सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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- १३० ६ २३२ ] प्रथमोऽध्यायः ९५
एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्ना चतुर्भ्यः ॥३०॥
§ २३२. एकशब्दः संख्यावाची, आदिशब्दोऽवयववचनः । एक आदिर्येषां तानि इमान्येका-
दीनि । भाज्यानि विभक्तव्यानि । यौगपद्येनैकस्मिन्नात्मनि । आ कुतः । आ चतुर्भ्यः । तद्यथा-
एकं तावत्केवलज्ञानं, न तेन सहान्यानि क्षायोपशमिकानि युगपदवतिष्ठन्ते । द्वे मतिश्रुते । त्रीणि
मतिश्रुतावधिज्ञानानि, मतिश्रुतमनःपर्ययज्ञानानि वा । चत्वारि मतिश्रुतावधिमनःपर्ययज्ञानानि । ५
न पञ्च सन्ति, केवलस्यासहायत्वात् ।
आत्मामें एक साथ अपने-अपने निमित्तोंके मिलनेपर कितने ज्ञान उत्पन्न हो सकते हैं, इसी बातका
ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
एक आत्मामें एक साथ एकसे लेकर चार तक ज्ञान भजनासे होते हैं ॥ ३० ॥
§ २३२. 'एक' शब्द संख्यावाची है और 'आदि' शब्द अवयववाची है । जिनका आदि एक १०
है वे एकादि कहलाते हैं। 'भाज्यानि' का अर्थ 'विभाग करना चाहिए' होता है। तात्पर्य यह है
कि एक आत्मामें एक साथ एक ज्ञानसे लेकर चार ज्ञान तक हो सकते हैं। यथा-यदि एक ज्ञान
होता है तो केवलज्ञान होता है। उसके साथ दूसरे क्षायोपशमिक ज्ञान एक साथ नहीं रह सकते ।
दो होते हैं तो मतिज्ञान और श्रुतज्ञान होते हैं। तीन होते हैं तो मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधि-
ज्ञान या मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और मनःपर्ययज्ञान होते हैं। तथा चार होते हैं तो मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, १५
अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान होते हैं। एक साथ पाँच ज्ञान नहीं होते, क्योंकि केवलज्ञान
असहाय है।
विशेषार्थ-यहाँ एक साथ एक आत्मामें कमसे कम कितने और अधिकसे अधिक कितने
ज्ञान हो सकते हैं इस बातका निर्देश किया है। यह तो स्पष्ट है कि ज्ञान एक है अतः उसकी पर्याय
भी एक कालमें एक ही हो सकती है फिर भी यहाँ एक आत्मामें एक साथ कई ज्ञान होनेका निर्देश २०
किया है सो उसका कारण अन्य है। बात यह है कि जब ज्ञान निरावरण होता है तब तो उसमें
किसी प्रकारका भेद नहीं किया जा सकता है, अतएव ऐसो अवस्थामें एक केवलज्ञान पर्यायका ही
प्रकाश माना गया है। किन्तु संसार अवस्थामें जब ज्ञान सावरण होता है तब निमित्त भेदसे उसी
ज्ञानको कई भागोंमें विभक्त कर दिया जाता है। सावरण अवस्थामें जितने भो ज्ञान प्रकट होते हैं
वे सब क्षायोपशमिक ही होते हैं और क्षयोपशम एक साथ कई प्रकारका हो सकता है, इसलिए २५
सावरण अवस्थामें दो, तीन या चार ज्ञानकी सत्ता युगपत् मानो गयी है। पर इसका यह अर्थ
नहीं कि जब दो, तीन या चार ज्ञानकी सत्ता रहती है तब वे सब ज्ञान एक साथ उपयोगरूप हो
सकते हैं। उपयोग तो एक कालमें एक ही ज्ञानका होता है अन्य ज्ञान उस समय लब्धिरूपसे रहते
हैं। आशय यह है कि ऐसा कोई क्षण नहीं जब ज्ञानको कोई पर्याय प्रकट न हो। मतिज्ञान,
श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये सब ज्ञानकी पर्यायें हैं इसलिए इनमेंसे ३०
एक कालमें एक ही पर्यायका उदय रहता है। निरावरण अवस्थामें मात्र केवलज्ञान पर्यायका उदय
रहता है और सावरण अवस्थामें प्रारम्भकी चार पर्यायोंमेंसे एक कालमें किसी एक पर्यायका
उदय रहता है फिर भी तब युगपत् दो, तीन और चार ज्ञानोंकी सत्ताके माननेका कारण एकमात्र
निमित्तभेद है। जब मति और श्रुत इन दो पर्यायोंके प्रकट होनेका निमित्त उपस्थित रहता है तब
युगपत् दो ज्ञानोंका सद्भाव कहा जाता है। जब मति, श्रुत और अवधि या मति, श्रुत और ३५
मनःपर्यय इन तीन पर्यायोंके प्रकट होनेका निमित्त उपस्थित रहता है तब युगपत् तीन ज्ञानोंका
सद्भाव कहा जाता है और जब मति आदि चार पर्यायोंके प्रकट होनेका निमित्त उपस्थित रहता
है तब युगपत् चार ज्ञानोंका सद्भाव माना जाता है। यही कारण है कि प्रकृत सूत्रमें एक साथ
एक आत्माके एक, दो, तीन या चार ज्ञान हो सकते हैं यह कहा है।