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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 558 में से

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पृष्ठ 219
  • २।३ § २५८ ] द्वितीयोऽध्यायः १०७
    ते भेदाश्च, त एव भेदा येषामिति वा वृत्तिर्द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा इति । यदा स्वपदार्थे
    वृत्तिस्तदा औपशमिकादीनां¹ भावानां द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रयो भेदा इत्यभिसंबन्धः क्रियते;
    अर्थवशाद्विभक्तिपरिणाम इति । यदान्यपदार्थे वृत्तिस्तदा निर्दिष्टविभक्त्यन्ता एवाभिसंबध्यन्ते,
    औपशमिकादयो भावा द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा इति । 'यथाक्रम'वचनं यथासंख्यप्रति-
    पत्त्यर्थम् । औपशमिको द्विभेदः। क्षायिको नवभेदः। मिश्रोऽष्टादशभेदः। औदयिक एकविंशतिभेदः। ५
    पारिणामिकस्त्रिभेद इति ।
    § २५६. यद्येवमौपशमिकस्य कौ द्वौ भेदावित्यत आह—
    सम्यक्त्वचारित्रे ॥३॥
    § २५७. व्याख्यातलक्षणे सम्यक्त्वचारित्रे । औपशमिकत्वं कथमिति चेदुच्यते । चारित्र-
    मोहो द्विविधः कषायवेदनीयो नोकषायवेदनीयश्चेति । तत्र कषायवेदनीयस्य भेदा अनन्तानुबन्धिनः १०
    क्रोधमानमायालोभाश्चत्वारः । दर्शनमोहस्य त्रयो भेदाः सम्यक्त्वं मिथ्यात्वं सम्यग्मिथ्यात्वमिति ।
    आसां सप्तानां प्रकृतीनामुपशमादौपशमिकं सम्यक्त्वम् ।
    § २५८. अनादिमिथ्यादृष्टेर्भव्यस्य कर्मोदयापादितकालुष्ये सति कुतस्तदुपशमः । काल-
    लब्ध्यादिनिमित्तत्वात् । तत्र काललब्धिस्तावत्-कर्माविष्ट आत्मा भव्यः कालेऽर्द्धपुद्गलपरिवर्त्त-
    नाख्येऽवशिष्टे प्रथमसम्यक्त्वग्रहणस्य योग्यो भवति नाधिके इति । इयमेका काललब्धिः । अपरा १५
    द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदाः । अन्यपदार्थप्रधान समास यथा—द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रयो भेदा
    येषां ते द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदाः । जब स्वपदार्थमें समास करते हैं तब औपशमिक आदि
    भावोंके दो, नौ, अठारह, इक्कीस और तीन भेद हैं ऐसा सम्बन्ध कर लेते हैं । यद्यपि पूर्व सूत्रमें
    औपशमिक आदि पदकी षष्ठी विभक्ति नहीं है तो भी अर्थवश विभक्ति बदल जाती है । और जब
    अन्य पदार्थमें समास करते हैं तब विभक्ति बदलनेका कोई कारण नहीं रहता । सूत्रमें इनकी २०
    विभक्तिका जिस प्रकार निर्देश किया है तदनुसार सम्बन्ध हो जाता है । सूत्रमें 'यथाक्रम' वचन
    यथासंख्यके ज्ञान करानेके लिए दिया है । यथा—औपशमिक भावके दो भेद हैं, क्षायिकके नौ भेद हैं,
    मिश्रके अठारह भेद हैं, औदयिकके इक्कीस भेद हैं और पारिणामिकके तीन भेद हैं ।
    § २५६. यदि ऐसा है तो औपशमिकके दो भेद कौन-से हैं ? इस बातका ज्ञान करानेके लिए
    आगेका सूत्र कहते हैं— २५
    औपशमिक भावके दो भेद हैं—औपशमिक सम्यक्त्व और औपशमिक चारित्र ॥३॥
    § २५७. सम्यक्त्व और चारित्रके लक्षणका व्याख्यान पहले कर आये हैं । शंका—इनके
    औपशमिकपना किस कारणसे है ? समाधान—चारित्रमोहनीयके दो भेद हैं—कषायवेदनीय और
    नोकषायवेदनीय । इनमें-से कषायवेदनीयके अनन्तानुबन्धी, क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार
    भेद और दर्शनमोहनीयके सम्यक्त्व, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व ये तीन भेद इन सातके उपशमसे ३०
    औपशमिक सम्यक्त्व होता है ।
    § २५८. शंका—अनादि मिथ्यादृष्टि भव्यके कर्मोंके उदयसे प्राप्त कलुषताके रहते हुए इनका
    उपशम कैसे होता है । समाधान—काललब्धि आदिके निमित्तसे इनका उपशम होता है। अब यहाँ
    काललब्धिको बतलाते हैं—कर्मयुक्त कोई भी भव्य आत्मा अर्धपुद्गल परिवर्तन नामके कालके
    शेष रहनेपर प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहण करनेके योग्य होता है इनसे अधिक कालके शेष रहनेपर नहीं ३५
    होता यह एक काललब्धि है । दूसरी काललब्धिका सम्बन्ध कर्म स्थितिसे है । उत्कृष्ट स्थितिवाले
    १. -दीनां द्वि-मु०