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सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

दो शब्द १५
७ आभार प्रदर्शन
फिर भी यहाँ कई दृष्टियोंसे हमें अपने सहयोगियों, मित्रों व हितैषियोंके प्रति आभारस्वरूप दो शब्द
अंकित कर देना अत्यावश्यक प्रतीत होता है। यह एक निश्चित सी बात है कि जैन समाजका ध्यान जैन
साहित्यके प्रकाशनकी ओर अभी उतना नहीं गया है जितना कि जाना चाहिए था। प्राचीन कालमें मन्दिर
प्रतिष्ठा और शास्त्रोंको लिपिबद्ध कराकर यत्र तत्र प्रतिष्ठित करना ये दोनों कार्य समान माने जाते थे। अभी
तक शास्त्रोंकी रक्षा इसी पद्धतिसे होती आयी है। हमारे पूर्वज चाहे उन शास्त्रोंके ज्ञाता हों चाहे न हों
किन्तु वे शास्त्रों की प्रतिलिपि करा कर उनकी रक्षा करना अपना पुनीत कर्तव्य समझते थे और इस कार्यमें
प्रयत्नशील भी रहते थे, किन्तु जबसे मुद्रण कार्य प्रारम्भ हुआ है तबसे एक तरहसे समाजने इस ओरसे अपनी
आँख ही मूंद ली है। अब प्रतिलिपि कराना तो दूर रहा वे उनकी एक-एक मुद्रित प्रति निछावर देकर
खरीदनेमें भी हिचकिचाने लगे हैं। इस मदमें व्यक्तिगत खर्च करनेकी बातको तो छोड़ो, वे सार्वजनिक धनसे
भी यह कार्य सम्पन्न नहीं करना चाहते हैं जब कि वे इस धनका उपयोग दूसरे दिखावटी और अस्थायी
कार्योंमें करते रहते हैं। उनका तर्क है कि इतने बड़े ग्रन्थोंको हमारे यहाँ समझनेवाला ही कौन है? हम
उनको मन्दिरमें रख कर क्या करेंगे? यदि इसी तर्कसे प्राचीन पुरुषोंने काम लिया होता तो क्या साहित्यकी
रक्षा होना सम्भव था ? यह कहना तो कठिन है कि हमने अपना पूरा साहित्य बचा लिया है। तथापि जो
कुछ भी बचा लिया गया है वह भी पर्याप्त है। भगवान् महावीरकी चर्या और उनके उपदेशोंसे सीधा
सम्बन्ध स्थापित करनेकी क्षमता रखनेवाला एकमात्र साधन यह साहित्य ही है। इसलिए प्रत्येक गृहस्थका
यह कर्तव्य हो जाता है कि वह इसकी संरक्षाके लिए हर एक सम्भव उपाय काममें लावे।
प्रसन्नता है कि इस ओर भारतीय ज्ञानपीठके संस्थापक व दूसरे कार्यकर्ताओंका पर्याप्त ध्यान गया है
और वे इस बातका विचार किये बिना कि इसके प्रकाशन आदि पर पड़नेवाला व्यय वापस होगा या नहीं,
सब प्रकारके प्राचीन साहित्यके प्रकाशनमें दत्तावधान हैं। सर्वार्थसिद्धिका भारतीय ज्ञानपीठसे प्रकाशित होना
उनकी इसी शुभ भावनाका सुफल है, इसलिए सर्वप्रथम हम नम्र शब्दोंमें उनके प्रति आभार प्रदर्शित करना
अपना कर्तव्य मानते हैं। सर्वार्थसिद्धिके सम्पादक होनेके नाते तो हमें यह कार्य करना ही है, साथ ही वर्णी
ग्रन्थमालाके संचालक होनेके नाते भी हमें इसका निर्वाह करना है।
श्री ग. वर्णी जैन ग्रन्थमाला एक ऐसी संस्था है जिसे समाजके लब्धप्रतिष्ठ विद्वानोंका पृष्ठबल प्राप्त
है इसलिए सर्वार्थसिद्धिका उस द्वारा प्रकाशित हो जाना कठिन कार्य नहीं था फिर भी जो कठिन परिस्थिति
उसके सामने थी उसे देखते हुए उसने जिस अनुकरणीय मार्गका श्रीगणेश किया है इसके लिए हम वर्णी
ग्रन्थमालाकी प्रबन्ध समितिके प्रति भी आभार प्रदर्शित करना अपना कर्तव्य मानते हैं।
यहाँ हम उन महानुभावोंके प्रति भी आभार प्रदर्शित करना अपना कर्तव्य समझते हैं जिन्होंने एक
मात्र सर्वार्थसिद्धिके प्रकाशनके प्रति अभिरुचि होनेके कारण अपनी उदार सहायता वर्णी ग्रन्थमाला को दी
थी। देनेवाले महानुभाव ये हैं....
१. पूज्य श्री १०८ आचार्य सूर्यसागरजी महाराजके सदुपदेशसे श्रीमान् ब्र० लक्ष्मीचन्द्रजी वर्णी।
वर्णीजी ने १५००) इस कामके लिए दिल्लीकी पहाड़ी धीरज व डिप्टीगंजकी समाजसे भिजवाये थे।
२. वर्णी ग्रन्थमालाके कोषाध्यक्ष बाबू रामस्वरूपजी बरुआसागर। आपने इस कामके लिए १६०१)
प्रदान किये हैं।
३. उदारचेता श्रीमान् नेमचन्द बालचन्दजी सा० वकील उस्मानाबाद। आपकी पौत्री ब्र० गजराबाई
हमारे पास लब्धिसार क्षपणासार पढ़ने बनारस आयी थीं और लगभग २ माह यहाँ रही थीं। इसीके परिणाम-
स्वरूप बहिन गजराबाईकी प्रेरणासे वकील सा० ने १०००) ग्रन्थमालाको प्रदान किये थे।

१६ सर्वार्थसिद्धि
हस्तलिखित प्रतियोंके प्राप्त करनेमें हमें श्रीमान् पं० पन्नालालजी अग्रवाल दिल्ली, पं० नेमिचन्द्रजी
ज्योतिषाचार्य जैन सिद्धान्त भवन आरा, पं० के० भुजबलिजी शास्त्री मूडबिद्री और पं० दरबारीलालजी
कोठिया न्यायाचार्य दिल्लीसे पूरी सहायता मिली है, अतएव हम इनके भी आभारी हैं ।
भारतीय ज्ञानपीठके मैनेजर चि० श्री बाबूलालजी फागुल्ल उसके प्रकाशनोंको सुन्दर और आकर्षक
बनानेमें पर्याप्त श्रम करते रहते हैं । सर्वार्थसिद्धिको इस योग्य बनानेमें व दूसरे प्रकारकी सहायता पहुँचानेमें
भी उन्होंने हमें सहयोग दिया है, अतएव हम उनके भी आभारी हैं ।
सर्वार्थसिद्धिके परिशिष्ट और विषयसूची हमारे सहपाठी पं० हीरालालजी शास्त्रीने तैयार किये हैं
और आवश्यक संशोधनके साथ वे इसमें दिये गये हैं, अतएव हम इनका जितना आभार मानें थोड़ा है ।
तत्त्वार्थसूत्रकी उपलब्ध टीकाओंमें सर्वार्थसिद्धि प्रथम टीका है । इसमें प्रमेयका विचार आगमिक,
दार्शनिक आदि सभी पद्धतियोंसे किया गया है । हमें आशा है कि इस सम्पादनसे समाजमें इसका मान और
अधिक बढ़ेगा ।
—फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री

प्रस्तावना
'मैं कौन हूँ, मेरा स्वभाव क्या है, मैं कहाँ से आया हूँ, मुझे उपादेय क्या है और उसकी प्राप्ति किन
निमित्तोंके मिलने पर होती है ? जो मनुष्य इन बातोंका विचार नहीं करता वह अपने गन्तव्य स्थानको प्राप्त
करनेमें समर्थ नहीं होता।'
आचार्य वादीभसिंहने क्षत्रचूड़ामणिमें तत्त्वज्ञानके प्रसंगसे यह वचन कहा है। यह मनुष्यके कर्तव्यका
स्पष्ट बोध कराता है। कर्तव्यका विचार ही जीवनका सार है। जो तिर्यञ्च हैं वे भी अपने कर्तव्यका विचार
कर प्रवृत्ति करते हैं फिर मनुष्यकी तो कथा ही अलग है।
प्रत्येक प्राणीके जीवनमें हम ऐसे-ऐसे विलक्षण परिणमन देखते हैं जिनकी कल्पना भी नहीं की जा
सकती ? ऐसा क्यों होता है? क्या इसके लिए केवल बाह्य परिस्थिति ही एकमात्र कारण है? एक पिताके
दो बालक होते हैं। उनका एक प्रकारसे लालन-पालन होता है। एक पाठशालामें उन्हें शिक्षा मिलती है फिर
भी उनके शील-स्वभावमें विलक्षण अन्तर होता है। क्यों ? इसका शारीरिक रचनाके सिवा कोई अज्ञात
कारण अवश्य होना चाहिए। साधकोंने इस प्रश्नका गहरा मन्थन किया है। उत्तरस्वरूप उन्होंने विश्वको
यही अनुभव दिया है कि पुराकृत कर्मोंके कारण प्राणियोंके जीवनमें इस प्रकारकी विविधता दिखाई देती है।
विश्वकी विविधताका अवलोकन कर उन्होंने कहा है कि इस प्राणीकी प्रथम अवस्था निगोद है।
अनादि कालसे यह प्राणी इस अवस्थाका पात्र बना हुआ है। विस्तृत बालुकाराशिमें गिरे हुए वज्र सिकताकण
का मिलना जितना दुर्लभ है, इस पर्यायसे निकल कर अन्य पर्यायका प्राप्त होना उतना ही दुर्लभ है। अन्य
पर्यायोंकी भी कोई गिनती नहीं। उनमें परिभ्रमण करते हुए इसका पञ्चेन्द्रिय होना इतना दुर्लभ है जितना
कि अन्य सब गुणोंके प्राप्त हो जाने पर भी मनुष्यको कृतज्ञता गुणका प्राप्त होना दुर्लभ है। यदि यह पञ्चे-
न्द्रिय भी हो जाता है तो भी इससे इसका विशेष लाभ नहीं, क्योंकि एक मनुष्य पर्याय ही वह अवस्था है
जिसे प्राप्त कर यह अपनी उन्नतिके सब साधन जुटा सकता है। किन्तु इसका प्राप्त होना बहुत ही कठिन है।
एक दृष्टान्त द्वारा साधकोंने इसे इन शब्दोंमें व्यक्त किया है। वे कहते हैं कि जिस प्रकार किसी चौपथ पर
रखी हुई रत्नराशिका मिलना दुर्लभ है उसी प्रकार अन्य पर्यायोंमें परिभ्रमण करते हुए इसे मनुष्य पर्यायका
मिलना दुर्लभ है। कदाचित् इसे मनुष्य पर्याय भी मिल जाती है तो भी उसे प्राप्त कर अपने कर्तव्याकर्तव्यके
बोध द्वारा कर्तव्यके मार्गका अनुसरण करना और भी दुर्लभ है।
मनुष्य होने पर यह प्राणी नहीं मालूम कितनी ममताओंमें उलझा रहता है। कभी यह पुत्र, स्त्री
और घर-द्वारकी चिन्ता करता है तो कभी अपनी मानप्रतिष्ठाकी चिन्तामें काल यापन करता है। स्वरूप
'सम्बोधन की ओर इसका मन यत्किञ्चित् भी आकर्षित नहीं होता। जो इसका नहीं उसकी तो चिन्ता करता
है और जो इसका है उसकी ओर आँख उठाकर देखता भी नहीं। फल यह होता है कि यह न केवल परम
दुर्लभ इस मनुष्य पर्यायको गवाँ बैठता है अपितु सम्यक् कर्तव्यका बोध न होनेसे इसे पुनः अनन्त यातनाओंका
पात्र बनना पड़ता है।
इस स्थितिसे इस प्राणीका उद्धार कैसे हो, इस प्रश्नके समाधान स्वरूप साधकोंने अनेक मार्ग दरसाये
हैं उनमें सम्यक् श्रुतका अध्ययन मुख्य है। श्रुत दो प्रकारका है—एक वह जो ऐहिक इच्छाओंकी पूर्तिका
मार्गदर्शन करता है और दूसरा वह जो विषय और कषायके मार्गको अनुपादेय बतला कर आत्महितके मार्गमें
लगाता है। आत्माका हित क्या है? इस प्रश्नका उत्तर यदि हमें संक्षेपमें प्राप्त करना है तो यही कहा जा
प्रस्तावना-३

१८ सर्वार्थसिद्धि
सकता है कि 'मोक्ष' । अतएव मोक्षप्राप्तिके साधनोंका जिसमें सम्यक् प्रकारसे ऊहापोह किया गया है वही
शास्त्र सम्यक् श्रुत कहलानेकी पात्रता रखता है ।
इस दृष्टिसे जब हम प्राचीन साहित्यको देखते हैं तो सर्वप्रथम हमारी दृष्टि अङ्गश्रुत पर जाती है ।
इसका सीधा सम्बन्ध भगवान् महावीरकी वाणीसे है । ऐसी मान्यता है कि जितने भी तीर्थङ्कर होते हैं वे
अर्थका उपदेश देते हैं और उनके प्रमुख शिष्य, जिन्हें कि गणधर कहते हैं, ग्रन्थ रूपमें अङ्गश्रुतकी रचना
करते हैं । यह मुख्य रूपसे बारह आरों—विभागोंमें विभक्त होनेके कारण इसे द्वादशार कहते हैं और संघके
मुख्य अधिपति गणधरों—गणियोंके द्वारा इसकी रचना की जानेसे इसका दूसरा नाम गणिपिटक भी है ।
भगवान् महावीरके मोक्ष जानेके बाद तीन अनुबद्ध केवली और पाँच श्रुतकेवली हुए हैं । इनमें
अन्तिम श्रुतकेवली भद्रबाहु थे । इन तक यह अङ्गश्रुत अपने मूलरूपमें आया है । इसके बाद उत्तरोत्तर
बुद्धिबल और धारणाशक्तिके क्षीण होते जानेसे तथा पुस्तकारूढ़ किये जानेकी परिपाटी न होने से क्रमशः वह
विच्छिन्न होता गया है । इस प्रकार एक ओर जहाँ अंगश्रुतका अभाव होता जा रहा था वहाँ दूसरी ओर
श्रुतपरम्पराको अविच्छिन्न बनाये रखनेके लिए और उसका सीधा सम्बन्ध भगवान् महावीरकी वाणीसे बनाये
रखनेके लिए प्रयत्न भी होते रहे हैं । अंगश्रुतके बाद दूसरा स्थान अनंगश्रुतको मिलता है । इसको अंगबाह्य
भी कहते हैं । इसके मूल भेद ये हैं—सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वन्दना, प्रतिक्रमण, वैनयिक, कृतिकर्म,
दशवैकालिक, उत्तराध्ययन, कल्पव्यवहार, कल्प्याकल्प्य, महाकल्प, पुण्डरीक, महापुण्डरीक और निषिद्धिका ।
इनमेंसे सर्वार्थसिद्धिमें उत्तराध्ययन और दशवैकालिक केवल इन दो का ही उल्लेख किया है । श्री धवला टीकाके
आधारसे विदित होता है कि इनकी रचना भी गणधरोंने ही की थी और अंगश्रुतके अस्तित्वकालमें ये उपस्थित
थे । किन्तु धीरे-धीरे अंगश्रुतके समान इनको भी धारण करनेकी शक्तिवाले श्रमणोंके न रहनेसे इनका भी
अभाव होता गया । फल यह हुआ कि एक प्रकारसे हम मूलश्रुतसे सर्वथा वंचित हो गये । श्वेताम्बर
परम्परामें जो आचारांग आदि अंगश्रुत और उत्तराध्ययन आदि अनंगश्रुत उपलब्ध होता है । वह विक्रम पाँचवीं
शताब्दिके बादका संकलन है इसलिए वह मूलश्रुतकी दृष्टिसे विश्वास योग्य नहीं माना जा सकता । इस प्रकार
अंगश्रुत और अंगबाह्यश्रुतके विच्छिन्न होनेमें कुल ६८३ वर्ष लगे हैं ।
किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उत्तरकालमें भगवान् महावीरकी वाणीका कहिए या द्वादशांग वाणीका
कहिए वारसा हमें किसी रूपमें मिला ही नहीं । भद्रबाहु श्रुतकेवलीके कालमें ही जैन परम्परा दो भागोंमें
विभाजित हो गयी थी । पहली परम्परा जो भगवान् महावीर और उनके पूर्ववर्ती तीर्थङ्करोंके आचारंको
बिना किसी प्रकारके संशोधनके ग्राह्य मानती रही वह उस समय दिगम्बर परम्परा या मूल संघके नामसे
प्रसिद्ध हुई और जिसने परिस्थितिवश संशोधन कर उसमें नये आचारका प्रवेश किया वह श्वेताम्बर परम्पराके
नामसे प्रसिद्ध हुई । इस कारण मूल अंगश्रुत और अनंगश्रुतको तो लिपिबद्ध नहीं किया जा सका किन्तु काला-
न्तरमें ऐसे आचार्य हुए हैं जिन्होंने अङ्गश्रुतके आश्रयसे श्रुतकी रक्षा करनेका प्रयत्न किया है । षट्खण्डागम
और कषायप्राभृतकी रचना उन प्रयत्नोंमेंसे सर्वप्रथम है । आचार्य कुन्दकुन्द लगभग उसी समय हुए हैं जिन्होंने
अपनी आध्यात्मिक शैली द्वारा जीवादि तत्त्वोंका और मोक्षमार्गके अनुरूप आचारका विचार करते हुए न
केवल तीर्थङ्करोंके स्वावलम्बी मार्गकी रक्षा करनेका प्रयत्न किया है अपितु उसमें बहुत कुछ अंशमें स्थिरता
भी लायी है । इस तरह आरातीय आचार्यों द्वारा मूल श्रुतके अनुरूप श्रुतका निर्माण कर उसकी रक्षाके
अनेक प्रयत्न हुए हैं । अखिल जैन परम्परामें रचनाकी दृष्टिसे जिस श्रुतकी सर्वप्रथम गणना की जा सकती है
उसका संक्षेपमें विवरण इस प्रकार है—
ग्रन्थ नाम कर्त्ता रचनाकाल
षट्खण्डागम आ० पुष्पदन्त भूतबलि विक्रमकी दूसरी शताब्दि या इसके पूर्व
कषायप्राभृत आ० गुणधर ,, ,, समकालीन

प्रस्तावना १९
कषायप्राभृत की चूर्णि आ० यतिवृषभ¹ आचार्य गुणधरके कुछ काल बाद
समयप्राभृत, प्रवचनसारप्राभृत आ० कुन्दकुन्द² विक्रमकी पहली दूसरी शताब्दि
पञ्चास्तिकायप्राभृत व अष्ट-
प्राभृत
मूलाचार ( आचारांग ) आ० वट्टकेर आ० कुन्दकुन्दके समकालीन
मूलाराधना आ० शिवार्य " "
तत्त्वार्थसूत्र आ० गृद्धपिच्छ आ० कुन्दकुन्दके समकालीन या कुछ
काल बाद
इसके बाद भी श्रुतरक्षाके अनेक प्रयत्न हुए हैं । श्वेताम्बर अंगश्रुतका संकलन उन प्रयत्नोंमें से एक
है। यह विक्रमकी ६वीं शताब्दिमें संकलित होकर पुस्तकारूढ़ हुआ था ।
१ तत्त्वार्थसूत्र
इनमेंसे प्रकृतमें तत्त्वार्थसूत्रका विचार करना है। यह जैन दर्शनका प्रमुख ग्रन्थ है। इसमें जैनाचार
और जैन तत्त्वज्ञानके सभी पहलुओं पर सूत्र शैलीमें विचार किया गया है। यह सुनिश्चित है कि जैन आगम-
श्रुतकी मुख्य भाषा प्राकृत रही है तथा इसके आधारसे आरातीय आचायोंने जो अंगबाह्य श्रुत लिपिबद्ध
किया है वह भी प्रायः प्राकृत भाषामें ही लिखा गया है। प्राकृत भाषाके जो विविध स्थित्यन्तर उपलब्ध होते
हैं उनसे इस बातकी पुष्टि होती है कि यह भगवान् महावीर और उनके आगे-पीछे बहुत काल तक बोल-
चालकी भाषा रही हैं। पाली, जिसमें कि प्राचीन महत्त्वपूर्ण बौद्ध साहित्य उपलब्ध होता है, प्राकृतका ही
१. इनके समयके विषयमें बड़ा विवाद है। वीरसेन स्वामीने इन्हें वाचक आर्यमंक्षु और नागहस्तिका
शिष्य लिखा है। इन दोनोंका श्वेताम्बर पट्टावलियोंमें उल्लेख आता है। सम्भवतः ये और श्वेताम्बर
परम्परामें उल्लिखित आर्यमंक्षु और नागहस्ति अभिन्न व्यक्ति हैं और वे ही आ० यतिवृषभके गुरु प्रतीत होते
हैं। जीवस्थान क्षेत्रप्रमाणानुगमकी धवला टीकामें आचार्य वीरसेनने जिस तिलोयपण्णत्तिका उल्लेख किया है
वह वर्त्तमान तिलोयपण्णत्तिसे भिन्न ग्रन्थ है। यह हो सकता है कि वर्तमान तिलोयपण्णत्तिमें उसका कुछ भाग
सम्मिलित कर लिया गया हो पर इससे दोनोंकी अभिन्नता सिद्ध नहीं होती । पण्डित जुगलकिशोरजी मुख्तारने
पुरातन जैन वाक्यसूची की प्रस्तावनामें जैनसिद्धान्त भास्करके एक अंकमें प्रकाशित मेरे लेखका खण्डन करते
हुए जो वर्तमान तिलोयपण्णत्तिकी प्राचीन तिलोयपण्णत्तिसे अभिन्नता सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है वह उनका
उचित प्रयत्न नहीं कहां जा सकता, क्योंकि वर्तमान तिलोयपण्णत्तिमें लोकके जिस आकारकी चर्चा की गयी
है उसका प्राचीन तिलोयपण्णत्तिमें उल्लेख नहीं है और इस आधारसे यह मानना सर्वथा उचित प्रतीत होता
है कि वर्तमान तिलोयपण्णत्तिके आधारसे जो राजकाल गणनाके बाद आचार्य यतिवृषभकी स्थिति मानी जाती
है वह भी उचित नहीं है। इसके लिए पहले यह सिद्ध करना होगा कि इस राजकाल गणनाका उल्लेख
प्राचीन तिलोयपण्णत्तिमें भी पाया जाता है तभी यह मान्यता समीचीन ठहर सकेगी कि आचार्य यतिवृषभ
महावीर संवत्से हजार वर्ष बाद हुए हैं। तत्काल धवलाके उल्लेखके अनुसार आचार्य यतिवृषभको महा-
वाचक आर्यमंक्षु और नागहस्तिका शिष्य होनेके नाते उन्हें उस समयका ही मानना चाहिए जिस समय उन
दो महान् आचायोंने इस भूमण्डलको अलंकृत किया था । २. इन्द्रनन्दिने अपने श्रुतावतारमें षट्खण्डागम पर
आ० कुन्दकुन्दकी टीकाका भी उल्लेख किया है। इस आधारसे षट्खण्डागमका रचनाकाल प्रथम शताब्दिसे
भी पूर्व ठहरता है। अधिकतर विचारक ६८३ वर्षकी परम्पराके बाद इन ग्रन्थोंको स्थान देते हैं किन्तु मेरे
विचारसे श्रुतकी परम्परा किस क्रमसे आई इतना मात्र दिखाना उसका प्रयोजन है। षट्खण्डागम आदिके
रचयिता ६८३ वर्ष पूर्व हुए हों तो इसमें कोई प्रत्यवाय नहीं है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२० सर्वार्थसिद्धि
एक भेद है। प्रारम्भसे जैनों और बौद्धोंकी प्रकृति जनताको उनकी भाषामें उपदेश देनेकी रही है। परिणाम-
स्वरूप इन्होंने अधिकतर साहित्य रचनाका कार्य जनताकी भाषा प्राकृतमें ही किया है। किन्तु धीरे-धीरे
भारतवर्षमें ब्राह्मण धर्मका प्राबल्य होनेसे और उनकी साहित्यिक भाषा संस्कृत होनेसे बौद्धों और जैनोंको
संस्कृत भाषामें भी अपना उपयोगी साहित्य लिखनेके लिए बाध्य होना पड़ा है। यही कारण है कि तत्त्वार्थसूत्र
जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थकी रचना करते समय वह संस्कृत भाषामें लिखा गया है। जैन परम्पराके उपलब्ध साहित्यमें
संस्कृत भाषामें रचा गया यह सर्वप्रथम ग्रन्थ है। इसके पहले केवल संस्कृत भाषामें जैन साहित्यकी रचना
हुई हो इसका कोई निश्चित आधार उपलब्ध नहीं होता। तत्त्वार्थसूत्र लघुकाय सूत्रग्रन्थ होकर भी इसमें
प्रमेयका उत्तमताके साथ संकलन हुआ है। इस कारण इसे जैन परम्पराके सभी सम्प्रदायोंने समान रूपसे
अपनाया है। दार्शनिक जगत्में तो इसे ख्याति मिली ही, आध्यात्मिक जगत्में भी इसका कुछ कम आदर नहीं
हुआ है। इस दृष्टिसे वैदिकोंमें गीताका, ईसाइयोंमें बाइबिलका और मुसलमानोंमें कुरानका जो महत्त्व है वही
महत्त्व जैन परम्परामें तत्त्वार्थसूत्रका माना जाता है। अधिकतर जैन इसका प्रतिदिन पाठ करते हैं और कुछ
अष्टमी-चतुर्दशीको। दशलक्षण पर्वके दिनोंमें इसके एक-एक अध्याय पर प्रतिदिन प्रवचन होते हैं जिन्हें आम
जनता बड़ी श्रद्धाके साथ श्रवण करती है। इसके सम्बन्धमें ख्याति है कि जो कोई गृहस्थ इसका एक बार
पाठ करता है उसे एक उपवासका¹ फल मिलता है।
नाम—प्रस्तुत सूत्र ग्रन्थका मुख्य नाम 'तत्त्वार्थ' है। इस नामका उल्लेख करनेवाले इसके टीका-
कार मुख्य हैं। इसकी प्रथम टीका सर्वार्थसिद्धिमें प्रत्येक अध्यायकी समाप्ति सूचक पुष्पिकामें यह वाक्य
आता है।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां.........अध्यायः समाप्तः।
इसके अन्तमें प्रशंसासूचक तीन श्लोक आते हैं। उनमें भी प्रस्तुत टीकाको तत्त्वार्थवृत्ति कह कर
प्रस्तुत ग्रन्थकी 'तत्त्वार्थ' इस नामसे घोषणा की गयी है। तत्त्वार्थवार्तिक और तत्त्वार्थश्लोकवार्तिककी भी
यही स्थिति है। इन दोनों टीका-ग्रन्थोंके प्रथम मंगल-श्लोकमें और प्रत्येक अध्यायकी समाप्तिसूचक पुष्पिकामें
मूल ग्रन्थके इसी नामका उल्लेख मिलता है।
तत्त्वार्थ सात हैं—जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष । सम्यग्दर्शनके विषय-
रूपसे इन सात तत्त्वार्थोंका प्रस्तुत सूत्र ग्रन्थमें विस्तारके साथ निरूपण किया गया है। मालूम पड़ता है कि
इसी कारणसे इसका तत्त्वार्थ यह नाम प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ है।
लोकमें इसका एक नाम तत्त्वार्थसूत्र भी प्रचलित है। इस नामका उल्लेख वीरसेन स्वामीने अपनी
धवला² नामकी प्रसिद्ध टीकामें किया है। सिद्धसेन गणि भी अपनी टीकामें कुछ अध्यायोंकी समाप्तिसूचक
पुष्पिकामें³ इस नामका उल्लेख करते हैं। इसमें जीवादि सात तत्त्वार्थोंका सूत्र शैलीमें विवेचन किया गया है
इससे इसका दूसरा नाम तत्त्वार्थसूत्र पड़ा जान पड़ता है। किन्तु पिछले नामसे इस नाममें सूत्र पद अधिक
होने से सम्भव है कि ये दोनों नाम एक ही हों। केवल प्रयोगकी सुविधाकी दृष्टिसे कहीं इसका केवल 'तत्त्वार्थ'
इस नामसे और कहीं 'तत्त्वार्थसूत्र' इस नामसे उल्लेख किया जाता रहा हो। किसी वस्तुका जो नाम होता
है उसके एकदेशका उल्लेख करके भी उस वस्तुका बोध करानेकी परिपाटी पुरानी है। बहुत सम्भव है कि
इसी कारण इसका 'तत्त्वार्थ' यह नाम भी प्रसिद्धिमें आया हो। सिद्धसेन गणिने⁴ इसका तत्त्वार्थसूत्र
१. 'दशाध्यायपरिच्छिन्ने तत्त्वार्थे पठिते सति फलं स्यादुपवासस्य भाषितं मुनिपुङ्गवैः ।' २. 'तह गिद्धपिंच्छा-
इरियप्पयासिदतच्चत्थसुत्ते विं वर्तनापरिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य' इति दव्वकालो परूविदो। जीव-
स्थानकालानुयोगद्वार पृ० ३१६ । ३. इति तत्त्वार्थसूत्रं भाष्यसंयुक्तं भाष्यानुसारिण्यां तत्त्वार्थटीकायां आस्रवप्रति-
पादनपरः षष्ठोऽध्यायः समाप्तः । ४. देखो सिद्धसेन गणि टीका अध्याय एक और छहको अन्तिम पुष्पिका।

और तत्त्वार्थ इन दोनों नामोंके द्वारा उल्लेख किया है। इससे भी ये दोनों नाम एक ही हैं इस अर्थकी
पुष्टि होती है ।
इसका एक नाम मोक्षशास्त्र भी है। मोक्षशास्त्र इस नामका उल्लेख प्राचीन टीकाकारों या अन्य
किसीने किया है ऐसा हमारे देखनेमें नहीं आया । तथापि लोकमें इस नामकी अधिक प्रसिद्धि देखी जाती है ।
तत्त्वार्थसूत्रका प्रारम्भ मोक्षमार्गके उपदेशसे होकर इसका अन्त मोक्षके उपदेशके साथ होता है। जान पड़ता
है कि यह नाम इसी कारणसे अधिक प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ है ।
सर्वार्थसिद्धिके बाद इसकी दूसरी महत्त्वपूर्ण टीका तत्त्वार्थभाष्य माना जाता है। इसकी उत्थानिकामें
यह श्लोक आता है—
'तत्त्वार्थाधिगमाख्यं बह्वर्थं संग्रहं लघुग्रन्थम् ।
वक्ष्यामि शिष्यहितमिममर्हद्वचनैकदेशस्य ॥ २ ॥'
अर्थात् बहुत अर्थवाले और अर्हद्वचनके एक देशके संग्रहरूप तत्त्वार्थाधिगम नामके इस लघु ग्रन्थका मैं
शिष्य हितबुद्धिसे कथन करता हूँ ।
तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें जो प्रशस्ति उपलब्ध होती है। उसमें भी तत्त्वार्थाधिगम इस नामका उल्लेख
किया है। इस आधारसे यह कहा जाता है कि इसका मुख्य नाम तत्त्वार्थाधिगम है ।
किन्तु इस आधारके होते हुए भी मूल सूत्र ग्रन्थका यह नाम है इसमें हमें सन्देह है, क्योंकि एक
तो ये उत्थानिकाके श्लोक और भाष्यके अन्तमें पायी जानेवाली प्रशस्ति मूल सूत्र ग्रन्थके अंग न होकर भाष्यके
अंग हैं और भाष्य सूत्ररचनाके बाद की कृति है । दूसरे तत्त्वार्थसूत्रके साथ जो भाष्य की स्वतन्त्र प्रति
उपलब्ध होती है उसमें प्रत्येक अध्याय की समाप्ति सूचक पुष्पिकासे यह विदित नहीं होता कि वाचक उमा-
स्वाति तत्त्वार्थभाष्यको तत्त्वार्थाधिगमसे भिन्न मानते हैं। प्रथम अध्यायके अन्तमें पायी जानेवाली पुष्पिकाका
स्वरूप इस प्रकार है—
इति तत्त्वार्थाधिगमेऽर्हत्प्रवचनसंग्रहे प्रथमोऽध्यायः समाप्तः¹ ।
साधारणतः यदि किसी स्वतन्त्र ग्रन्थके अध्याय की समाप्ति सूचक पुष्पिका लिखी जाती है तो उसमें
केवल मूल ग्रन्थका नामोल्लेख कर अध्यायकी समाप्तिकी सूचना दी जाती है और यदि टीकाके साथ अध्याय-
की समाप्तिकी सूचक पुष्पिका लिखी जाती है तो उसमें मूल ग्रन्थका नामोल्लेख करनेके बाद अथवा बिना
किये ही टीकाका नामोल्लेख कर अध्याय की समाप्तिकी सूचक पुष्पिका लिखी जाती है । उदाहरणार्थ केवल
तत्त्वार्थसूत्रके अध्यायकी समाप्तिकी सूचक पुष्पिका इस प्रकार उपलब्ध होती है-
इति तत्त्वार्थसूत्रे प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ।
तथा टीकाके साथ तत्त्वार्थसूत्रकी समाप्तिकी सूचक पुष्पिकाका स्वरूप इस प्रकार है-
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञायां प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ।
यहाँ पूज्यपाद स्वामीने तत्त्वार्थसूत्रका स्वतन्त्र नामोल्लेख किये बिना केवल अपनी तत्त्वार्थ पर लिखी
गयी वृत्तिका उसके नामके साथ उल्लेख किया है। इससे इस बातका स्पष्ट ज्ञान होता है कि तत्त्वार्थ नामका
एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है और उस पर लिखा गया यह वृत्तिग्रन्थ है। बहुत संभव है कि प्रत्येक अध्यायकी समाप्ति
सूचक पुष्पिका लिखते समय यही स्थिति वाचक उमास्वातिके सामने रही है। इस द्वारा वे तत्त्वार्थको स्वतन्त्र
ग्रन्थ मानकर उसका अधिगम करानेवाले भाष्यको तत्त्वार्थाधिगम अर्हत्प्रवचनसंग्रह कह रहे हैं। स्पष्ट है कि
तत्त्वार्थाधिगम यह नाम तत्त्वार्थसूत्रका न हो कर वाचक उमास्वातिकृत उसके भाष्यका है।
दो सूत्र पाठ—प्रस्तुत ग्रन्थके सूत्र पाठ उपलब्ध होते हैं-एक दिगम्बर परम्परा मान्य और दूसरा
श्वेताम्बर परम्परा मान्य । सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यकी रचना होनेके पूर्व मूल सूत्रपाठका क्या स्वरूप
१. देखो, रतलामकी सेठ ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर संस्था द्वारा प्रकाशित तत्त्वार्थभाष्य प्रति ।

२२ सर्वार्थसिद्धि
था, इसका विचार यथास्थान हम आगे करेंगे। यहाँ इन दोनों सूत्रपाठोंका सामान्य परिचय कराना मुख्य
प्रयोजन है।
दिगम्बर परम्पराके अनुसार दसों अध्यायोंकी सूत्र संख्या इस प्रकार है-
३३ + ५३ + ३९ + ४२ + ४२ + २७ + ३९ + २६ + ४७ + ९ = ३५७ ।
श्वेताम्बर परम्पराके अनुसार दसों अध्यायोंकी सूत्र संख्या इस प्रकार है-
३५ + ५२ + १८ + ५३ + ४४ + २६ + ३४ + २६ + ४९ + ७ = ३४४ ।
प्रथम अध्यायमें ऐसे पाँच स्थल मुख्य हैं जहाँ दोनों सूत्र पाठोंमें मौलिक अन्तर दिखाई देता है। प्रथम
स्थल मतिज्ञानके चार भेदोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'अवाय' पाठको और श्वेताम्बर
परम्परा 'अपाय' पाठको स्वीकार करती है। प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी श्वेताम्बर परम्परामान्य तत्त्वार्थसूत्रका
विवेचन करते हुए भी मुख्यरूपसे 'अवाय' पाठको ही स्वीकार करते हैं। दूसरा स्थल मतिज्ञानके विषयभूत
१२ पदार्थोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा क्षिप्रके बाद 'अनिस्सृतानुक्त-' पाठको और श्वेताम्बर
परम्परा 'अनिश्श्रितासन्दिग्ध-' पाठको स्वीकार करती है। यहाँ पाठ भेदके कारण अर्थभेद स्पष्ट है। तीसरा
स्थल 'द्विविधोऽवधिः' सूत्र है। इसे श्वेताम्बर परम्परा सूत्र मानती है जब कि सर्वार्थसिद्धिमें यह 'भव-
प्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्' सूत्रकी उत्थानिकाका अंश है। चौथा स्थल अवधिज्ञानके द्वितीय भेदका प्रतिपादक
सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'क्षयोपशमनिमित्तः' पाठको और श्वेताम्बर परम्परा 'यथोक्तनिमित्तः' पाठको
स्वीकार करती है। पाँचवाँ स्थल सात नयोंका प्रतिपादक सूत्र है। यहाँ दिगम्बर परम्परा सातों नयोंको मूल
मानकर उनका समान रूपसे उल्लेख करती है। किन्तु श्वेताम्बर परम्परा मूल नय पाँच मानती है और नैगम
व शब्दनयके क्रमशः दो व तीन भेदोंका स्वतन्त्र सूत्र द्वारा उल्लेख करती है। साधारणतः दिगम्बर और
श्वेताम्बर परम्परामें मूल नय सात माने गये हैं और आगम साहित्यमें इनका मूल नयके रूपमें उल्लेख भी
किया है। पर जहाँ नामादि निक्षेपोंमेंसे कौन नय किस निक्षेपको स्वीकार करता है इसका विचार किया
जाता है वहाँ बहुधा नैगमादि पाँच नयोंका १ भी उल्लेख किया जाता है। बहुत सम्भव है कि इस परिपाटीको
देखकर वाचक उमास्वातिने पाँच नय मूल माने हों तो कोई आश्चर्य नहीं।
दूसरे अध्यायमें ऐसे नौ स्थल हैं। प्रथम स्थल पारिणामिक भावोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें
पारिणामिक भावके तीन नाम गिनानेके बाद श्वेताम्बर परम्परा आदि पदको स्वीकार करती है जब कि
दिगम्बर परम्परा इसे स्वीकार नहीं करती। यहाँ जीवका स्वतत्त्व क्या है यह बतलाते हुए पारिणामिक
भावोंका उल्लेख किया है। दिगम्बर परम्परा अन्य द्रव्य साधारण पारिणामिक भावोंकी यहाँ मुख्य रूपसे
गणना नहीं करती और श्वेताम्बर परम्परा करती है यही यहाँ उसके आदि पद देनेका प्रयोजन है। दूसरा
स्थल स्थावरकायिक जीवोंके भेदोंका प्रतिपादक सूत्र है। आगमिक परिपाटीके अनुसार स्थावरोंके पाँच भेद
दोनों परम्पराएँ स्वीकार करती हैं और दिगम्बर परम्परा इसी परिपाटीके अनुसार यहाँ पाँच भेद स्वीकार
करती है। किन्तु श्वेताम्बर परम्पराने अग्निकायिक और वायुकायिक जीवोंको गतिन्त्रस मानकर इनका
उल्लेख त्रसोंके साथ किया है। इस कारण कई सूत्रोंकी रचनामें अन्तर आया है। तीसरा स्थल 'उपयोगः
स्पर्शादिषु' सूत्र है। श्वेताम्बर परम्परा इसे स्वतन्त्र सूत्र मानती है जब कि दिगम्बर परम्परा इसे सूत्र रूपसे
स्वीकार नहीं करती। उसके मतसे उपयोगके विषयका अलगसे प्रतिपादन करना वांछनीय नहीं, क्योंकि
प्रत्येक ज्ञानका विषय प्रथम अध्यायमें दिखा आये हैं। चौथा स्थल 'एकसमयाऽविग्रहा' सूत्र है। गतिका
प्रकरण होनेसे दिगम्बर परम्परा इस सूत्रको इसी रूपमें स्वीकार करती है किन्तु श्वेताम्बर परम्परा एक समय-
को विशेष्य मानकर यहाँ पुल्लिंग एक वचनान्तका प्रयोग करती है। पाँचवाँ स्थल जन्मका प्रतिपादक सूत्र
है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'पोत' पदको और श्वेताम्बर परम्परा 'पोतज' पदको स्वीकार करती है। छठा
स्थल 'तैजसमपि' सूत्र है। इसे दिगम्बर परम्परा सूत्र मानती है और श्वेताम्बर परम्परा नहीं मानती। यहाँ
१. देखो, धवला पुस्तक १२ वेदनाप्रत्ययविधान नामक अधिकार। देखो, कषायप्राभृत प्र० पुस्तक परिशिष्ट पृष्ठ ७।

' doesn't exist.
Wait, look at line 7:
'च र मो त्त म दे ह' - here 'त्त' and 'म' are TWO separate types: 'त्त' and 'म'.
In line 8, the typesetter just set 'त्त' and then 'पु'!
Wait, look at 'त्त' in line 8:
Is there a 'म'? No, it's 'त्त'!
Wait, could it be 'चरमदेहोत्तमपुरुष' where the 'म' is very faint?
Wait, look at the gap between 'त्त' and 'पु': there is NO gap, they are normally spaced!
So the typesetter definitely typed 'चरमदेहोत्तपुरुष' or 'चरमदेहोत्तमपुरुष'?
Wait, let's look at 'चरमदेहोत्तपुरुष': if the typesetter dropped 'म', it reads 'चरमदेहोत्तपुरुष'.
Wait, what should I output? In OCR/transcription tasks, should I write 'चरमदेहोत्तमपुरुष' or 'चरमदेहोत्तपुरुष'?
Wait, let me look closely at the image again:
Wait! Is it 'चरमदेहोत्तमपुरुष'?
Wait, look at the letter after 'हो':
Wait, look at the stroke:
It has: a horizontal top bar.
A vertical line!
Wait, is that a 'त'?
Wait, let me look at:
' च ' ' र ' ' म

२४ सर्वार्थसिद्धि
द्रव्यके अस्तित्वमें मतभेद स्वीकार करती है। समस्त श्वेताम्बर आगम साहित्यमें काल द्रव्यके स्थानमें
'अद्धासमय' का उल्लेख किया है और इसे प्रदेशात्मक द्रव्य न मान कर पर्याय द्रव्य स्वीकार किया है।
छठवाँ स्थल परिणामका प्रतिपादक सूत्र है। दिगम्बर परम्परा 'तद्भावः परिणामः' केवल इस सूत्रको स्वीकार
करती है किन्तु श्वेताम्बर परम्परा इसके साथ तीन अन्य सूत्र स्वीकार करती है।
छठे अध्यायमें ऐसे दस स्थल हैं। प्रथम स्थल दूसरा सूत्र है। इसे दिगम्बर परम्परा एक और
श्वेताम्बर परम्परा दो सूत्र मानती है। दूसरा स्थल 'इन्द्रियकषायाव्रतक्रियाः' इत्यादि सूत्र है। दिगम्बर
परम्पराने इसे इसी रूपमें स्वीकार किया है किन्तु श्वेताम्बर परम्परा इसके स्थानमें 'अव्रतकषायेन्द्रियक्रियाः'
यह पाठ स्वीकार करती है। तीसरा स्थल सातावेदनीयके आस्रवका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर
परम्परा 'भूतव्रतत्यनुकम्पাদানसरागसंयमादियोगः' इस पाठको स्वीकार करती है। किन्तु श्वेताम्बर परम्परा
इसके स्थानमें 'भूतव्रत्यनुकम्पा दानं सरागसंयमादि योगः' ऐसा पाठ स्वीकार करती है। चौथा स्थल चारित्र-
मोहके आस्रवका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा 'तीव्र' पदके बाद 'आत्म' पदको अधिक स्वीकार
करती है। पाँचवाँ स्थल नरकायुके आस्रवका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा मध्यमें 'च' पदको
अधिक स्वीकार करती है। छठा स्थल मनुष्यायुके आस्रवके प्रतिपादक दो सूत्र हैं। इन्हें दिगम्बर परम्परा
दो सूत्र मानती है। किन्तु श्वेताम्बर परम्परा उन दोनोंको एक मानकर चलती है। इतना ही नहीं किन्तु वह
'स्वभावमार्दवं' के स्थानमें 'स्वभावमार्दवार्जवं' पाठ स्वीकार करती है। सातवाँ स्थल देवायुके आस्रवके प्रति-
पादक सूत्र हैं। इन सूत्रोंमें दिगम्बर परम्पराने 'सम्यक्त्वं च' सूत्रका स्वतन्त्र अस्तित्व स्वीकार किया है किन्तु
श्वेताम्बर परम्परा इसे सूत्र रूपमें स्वीकार करनेसे हिचकिचाती है। आठवाँ स्थल शुभ नामके आस्रवका प्रति-
पादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'तत्' पदको अधिक स्वीकार करती है। नौवाँ स्थल तीर्थङ्कर प्रकृतिके
आस्रवका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा 'साधुसमाधिः'के स्थानमें 'संघसाधुसमाधिः' पाठ
स्वीकार करती है। दसवाँ स्थल उच्चगोत्रके आस्रवका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें 'तद्विपर्ययौ' के स्थानमें
श्वेताम्बर परम्परा 'तद्विपर्ययो' पाठ स्वीकार करती है।
सातवें अध्यायमें ऐसे छह स्थल हैं। प्रथम स्थल पाँच व्रतोंकी पाँच-पाँच भावनाओंके प्रतिपादक पाँच
सूत्र हैं। इन्हें दिगम्बर परम्परा सूत्ररूपमें स्वीकार करती है और श्वेताम्बर परम्परा नहीं। दूसरा स्थल
'हिंसादिष्विहामुत्र' सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा 'अमुत्र' पदके बाद 'च' पदको अधिक स्वीकार करती
है। तीसरा स्थल 'मैत्री-' इत्यादि सूत्र है। इसके मध्यमें दिगम्बर परम्परा 'च' पद अधिक स्वीकार करती
है। चौथा स्थल 'जगत्काय-' इत्यादि सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'वा' पाठको और श्वेताम्बर परम्परा
'च' पाठको स्वीकार करती है। पाँचवाँ स्थल सात शीलोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा
'प्रोषधोपवास' पाठको और श्वेताम्बर परम्परा 'पौषधोपवास' पाठको स्वीकार करती है। छठा स्थल अहिं-
साणुव्रतके पाँच अतीचारोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें 'छेद'के स्थानमें श्वेताम्बर पाठ 'सविच्छेद' है।
आठवें अध्यायमें ऐसे छह स्थल हैं। प्रथम स्थल दूसरा सूत्र है। श्वेताम्बर परम्परा इसे दो सूत्र
मानकर चलती है। दूसरा स्थल ज्ञानावरणके पाँच भेदोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा
ज्ञानके पाँच भेदोंका नाम निर्देश करती है किन्तु श्वेताम्बर परम्परा 'मत्यादीनाम्' इतना कहकर ही छोड़
देती है। तीसरा स्थल दर्शनावरणके नामोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा पाँच निद्राओंके
नामोंके साथ 'वेदनीय' पद अधिक जोड़ती है। चौथा स्थल मोहनीयके नामोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें
नामोंके क्रमके प्रतिपादनमें दोनों परम्पराओंने अलग-अलग सरणी स्वीकार की है। पाँचवें अन्तरायके नामों-
का प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा पाँच नामोंका निर्देश करती है और श्वेताम्बर परम्परा
'दानादीनाम्' इतना कहकर छोड़ देती है। छठा स्थल पुण्य और पाप प्रकृतियोंके प्रतिपादक दो सूत्र हैं।
यहाँ श्वेताम्बर परम्पराने एक तो पुण्य प्रकृतियोंमें सम्यक्त्व, हास्य, रति और पुरुषवेद इनकी भी परिगणना
की है। दूसरे पापप्रकृतियोंका प्रतिपादक सूत्र नहीं कहा है।

प्रस्तावना २५
नौवें अध्यायमें ऐसे छह स्थल हैं। प्रथम स्थल दस धर्मोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर
परम्परा 'उत्तम' पदको क्षमा आदिका विशेषण मानकर चलती है और श्वेताम्बर परम्परा धर्मका विशेषण
मानकर चलती है, फिर भी वह 'उत्तम', पदका पाठ 'धर्म' पदके साथ अन्तमें न करके सूत्रके प्रारम्भमें ही
करती है। दूसरा स्थल पाँच चारित्रोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'इति' पदको अधिक
स्वीकार करती है। तीसरा स्थल ध्यानका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें 'अन्तर्मुहूर्तात्' के स्थानमें श्वेताम्बर
परम्परा 'आ मुहूर्तात्' पाठ स्वीकार कर उसे स्वतन्त्र सूत्र मानती है। चौथा स्थल आर्तध्यानके प्रतिपादक
सूत्र हैं। इनमें श्वेताम्बर परम्पराने एक तो 'मनोज्ञस्य' और 'अमनोज्ञस्य' के स्थानमें बहुवचनान्त पाठ
स्वीकार किया है। दूसरे 'वेदनायाश्च' सूत्रको 'विपरीतं मनोज्ञस्य' के पहले रखा है। पांचवां स्थल धर्म-
ध्यानका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा 'अप्रमत्तसंयतस्य' इतना पाठ अधिक स्वीकार कर
'उपशान्तक्षीणकषाययोश्च' यह सूत्र स्वतन्त्र मानती है। छठवाँ स्थल 'एकाश्रये' इत्यादि सूत्र है। इसमें
'सवितर्कविचारे' के स्थानमें श्वेताम्बर परम्परा 'सवितर्के' पाठ स्वीकार करती है।
दसवें अध्यायमें ऐसे तीन स्थल हैं। प्रथम स्थल दूसरा सूत्र है। श्वेताम्बर परम्परा इसे दो सूत्र
मानकर चलती है। दूसरा स्थल तीसरा और चौथा सूत्र है। श्वेताम्बर परम्परा एक तो इन दो सूत्रोंको
एक मानती है। दूसरे 'भव्यत्वानाम्' के स्थानमें 'भव्यत्वाभावात्' पाठ स्वीकार करती है। तीसरा स्थल
'पूर्वप्रयोगात्' इत्यादि सूत्र है। इस सूत्रके अन्तमें श्वेताम्बर परम्परा 'तद्गतिः' इतना पाठ अधिक स्वीकार
करती है। तथा इस सूत्रके आगे कहे गये दो सूत्रोंको वह स्वीकार नहीं करती।
इन पाठ भेदोंके अतिरिक्त दसों अध्यायोंमें छोटे-मोटे और भी बहुतसे फरक हुए हैं जिनका विशेष
महत्त्व न होनेसे यहाँ हमने उनका उल्लेख नहीं किया है।
३. सूत्र पाठोंमें मतभेद—यहाँ हमने दिगम्बर और श्वेताम्बर परम्परामान्य जिस सूत्र पाठोंके
अन्तरका उल्लेख किया है वह सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्र पाठोंको ध्यानमें रखकर ही किया है।
यदि हम इन सूत्र पाठोंके भीतर जाते हैं तो हमें वह मतभेद और भी अधिक दिखाई देता है। फिर भी यह
बात सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्र पाठ पर लागू नहीं होती। सर्वार्थसिद्धिकारके सामने जो पाठ रहा है और उन्होंने
निर्णय करके जिसे सूत्रकारका माना है, उत्तरकालवर्ती सभी दिगम्बर टीकाकार प्रायः उसीको आधार मानकर
चले हैं। किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठकी स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है। हरिभद्रसूरि और सिद्धसेन
गणिने तत्त्वार्थभाष्यके आधारसे अपनी टीकाएँ लिखी अवश्य हैं और इन दोनों आचार्योने तत्त्वार्थभाष्यके
साथ तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्र पाठकी रक्षा करनेका भी प्रयत्न किया है। किन्तु उनके सामने ही सूत्र पाठमें
इतने अधिक पाठभेद और अर्थभेद हो गये थे जिनका उल्लेख करना उन्हें आवश्यक हो गया। उदाहरणके
लिए यहाँ हम पाँचवें अध्यायके 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' सूत्रको उपस्थित करते हैं। सिद्धसेन गणिने इस
सूत्रकी व्याख्या करते हुए अनेक मतभेदोंका उल्लेख किया है। उनके सामने इस सूत्रके जो प्रमुख मतभेद
थे वे इस प्रकार हैं—
१. एक पाठके अनुसार 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' एक सूत्र न होकर दो सूत्र हैं। प्रथम 'नित्या-
वस्थितानि' और दूसरा 'अरूपाणि'। धर्मादिक चार द्रव्य अरूपी हैं यह सिद्ध करनेके लिए 'अरूपाणि'
स्वतन्त्र सूत्र माना गया है।
२. दूसरे पाठके अनुसार 'नित्यावस्थितारूपाणि' सूत्र है। इसके अनुसार 'नित्यावस्थित-' पदके
अन्तमें स्वतन्त्र विभक्ति देनेकी कोई आवश्यकता नहीं। तीनों पद समसित होने चाहिए।
३. तीसरा मत है कि सूत्र तो 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' ही है। किन्तु इसमें 'नित्य' पद स्वतन्त्र
न होकर 'अवस्थित' पदका विशेषण है। इस मतके अनुसार प्रथम पदका 'नित्यं अवस्थितानि नित्यावस्थितानि'
यह विग्रह होगा।
४. इनके सिवा वहाँ दो मतोंका और उल्लेख किया है। किन्तु वे केवल अर्थविषयक ही मतभेद
हैं इसलिए उनकी यहाँ हमने अलगसे चर्चा नहीं की है।
प्रस्तावना-४
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२६ सर्वार्थसिद्धि
आगे चलकर तो ये मतभेद और भी बढ़े हैं। प्रमाणस्वरूप यहाँ हम तत्त्वार्थसूत्रको उस सटिप्पण
प्रतिके कुछ पाठभेद उपस्थित करते हैं जिनका परिचय श्रीमान् पण्डित जुगुलकिशोरजी मुख्तारने अनेकान्त वर्ष
तीन किरण एकमें दिया है। यह प्रति पण्डितजीके पास श्रीमान् पण्डित नाथूरामजी प्रेमीने भेजी थी।
इस प्रतिके आलोडन करनेसे यह तो साफ जाहिर होता है कि यह किसी श्वेताम्बर आचार्यकी कृति
है, क्योंकि इसमें दिगम्बर आचार्योंको जड़, दुरात्मा और सूत्रवचनचोर इत्यादि शब्दों द्वारा सम्बोधित किया
गया है। इसलिए इस प्रतिमें जो पाठभेद या अधिक सूत्र उपलब्ध होते हैं वे काफी महत्त्व रखते हैं। प्रतिमें
पाये जानेवाले अधिक सूत्र ये हैं—
तैजसमपि ५०, धर्मा वंशा शैलाञ्जनारिष्टा माघव्या माधवीति च २, उच्छ्वासाहारवेदनोपपातानुभाव-
तश्च साध्याः २३, स द्विविधः ४२, सम्यक्त्वं च २१, धर्मास्तिकायाभावात् ७।
तत्त्वार्थभाष्यकार इन्हें सूत्र रूपमें स्वीकार नहीं करते। साथ ही तत्त्वार्थभाष्यके मुख्य टीकाकार
हरिभद्रसूरि और सिद्धसेनगणि भी इन्हें सूत्र नहीं मानते, फिर भी टिप्पणकारने इन्हें सूत्र माना है। यदि हम
इनके सूत्र होने और न होनेके मतभेदकी बातको थोड़ी देरको भुला भी दें तो भी इनके मध्यमें पाया जाने-
वाला 'सम्यक्त्वं च' सूत्र किसी भी अवस्थामें नहीं भुलाया जा सकता। तत्त्वार्थभाष्यमें तो इसका उल्लेख
है ही नहीं, अन्य श्वेताम्बर आचार्योंने भी इसका उल्लेख नहीं किया है, फिर भी टिप्पणकार किसी पुराने
आधारसे इसे सूत्र मानते हैं। इतना ही नहीं वे इसे मूल सूत्रकारकी ही कृति मानकर चलते हैं।
यह तो हुई सूत्रभेदकी चर्चा। अब इसके एक पाठभेदको देखिए। दिगम्बर परम्पराके अनुसार तीसरे
अध्यायमें सात क्षेत्रोंके प्रतिपादक सूत्रके आदिमें 'तत्र' पाठ उपलब्ध नहीं होता किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमान्य उक्त
सूत्रके प्रारम्भमें 'तत्र' पद उपलब्ध होता है। फिर भी टिप्पणकार यहाँ तत्त्वार्थभाष्यमान्य पाठको स्वीकार
न कर दिगम्बर परम्परामान्य पाठको स्वीकार करते हैं।
यहाँ देखना यह है कि जब तत्त्वार्थसूत्र और तत्त्वार्थभाष्य एक ही व्यक्तिकी कृति थी और श्वेताम्बर
आचार्य इस तथ्यको भलीभाँति समझते थे तब सूत्रपाठके विषयमें इतना मतभेद क्यों हुआ और खासकर उस
अवस्थामें जब कि तत्त्वार्थभाष्य उस द्वारा स्वीकृत पाठको सुनिश्चित कर देता है। हम तो इस समस्त मत-
भेदको देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठ स्वीकृत होनेके पहले श्वेताम्बर
परम्परामान्य सूत्रपाठ निश्चित करनेके लिए छोटे-बड़े अनेक प्रयत्न हुए हैं और वे प्रयत्न पीछे तक भी स्वीकृत
होते रहे हैं। यही कारण है कि वाचक उमास्वाति द्वारा तत्त्वार्थभाष्य लिखकर सूत्रपाठके सुनिश्चित कर देने
पर भी उसे वह मान्यता नहीं मिल सकी जो दिगम्बर परम्परामें सर्वार्थसिद्धि और उस द्वारा स्वीकृत सूत्र
पाठको मिली है।
२. सर्वार्थसिद्धि
नामकी सार्थकता—उपलब्ध साहित्यमें सर्वार्थसिद्धि प्रथम टीका है जो तत्त्वार्थसूत्र पर लिखी गयी
है। प्रत्येक अध्यायके अन्तमें स्वयं आचार्य पूज्यपादने समाप्ति सूचक पुष्पिका¹ दी है। उसमें इसका नाम
सर्वार्थसिद्धि बतलाते हुए इसे वृत्तिग्रन्थ रूपसे स्वीकार किया है। इसकी प्रशंसा में टीकाके अन्तमें वे लिखते हैं-
स्वर्गापवर्गसुखमाप्तुमनोभिरार्यैः जैनेन्द्रशासनवरामृतसारभूता ।
सर्वार्थसिद्धिरिति सद्भिरुपात्तनामा तत्त्वार्थवृत्तिरनिशं मनसा प्रधार्या ॥
जो आर्य स्वर्ग और मोक्षसुखके इच्छुक हैं वे जैनेन्द्र शासन रूपी उत्कृष्ट अमृतमें सारभूत और सज्जन
पुरुषों द्वारा रखे गये सर्वार्थसिद्धि इस नामसे प्रख्यात इस तत्त्वार्थवृत्तिको निरन्तर मनःपूर्वक धारण करें।
१ इति सर्वार्थसिद्धिसंज्ञायां तत्त्वार्थवृत्तौ प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ।
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प्रस्तावना २७
वे पुनः लिखते हैं-
तत्त्वार्थवृत्तिमुदितां विदितार्थतत्त्वाः शृण्वन्ति ये परिपठन्ति च धर्मभक्त्या।
हस्ते कृतं परमसिद्धिसुखामृतं तैर्मर्त्यामरेश्वरसुखेषु किमस्ति वाच्यम् ॥
सब पदार्थोंके जानकार जो इस तत्त्वार्थवृत्तिको धर्मभक्तिसे सुनते हैं और पढ़ते हैं मानो उन्होंने परम
सिद्धिसुखरूपी अमृतको अपने हाथमें ही कर लिया है। फिर उन्हें चक्रवर्ती और इन्द्रके सुखके विषयमें तो
कहना ही क्या है ?
'सर्वार्थसिद्धि' इस नामके रखनेका प्रयोजन यह है कि इसके मनन करनेसे सब प्रकारके अर्थोंकी अथवा
सब अर्थोंमें श्रेष्ठ मोक्षसुखकी प्राप्ति होती है। यह कथन अत्युक्तिको लिये हुए भी नहीं है, क्योंकि इसमें
तत्त्वार्थसूत्रके जिस प्रमेयका व्याख्यान किया गया है वह सब पुरुषार्थोंमें प्रधानभूत मोक्ष पुरुषार्थका साधक है।
भारतीय परम्पराने अनेक दर्शनोंको जन्म दिया है। किन्तु उन सबके मूलमें मोक्ष पुरुषार्थकी प्राप्ति
प्रधान लक्ष्य रहा है। महर्षि जैमिनि पूर्वमीमांसादर्शनका प्रारम्भ इस सूत्रसे करते हैं-
'ओं अथातो धर्मजिज्ञासा ॥ १ ॥'
और इसके बाद वे धर्मका स्वरूप निर्देश कर उसके साधनोंका विचार करते हैं।
यही स्थिति व्यास महर्षिकी है। उन्होंने शारीरक मीमांसादर्शनको इस सूत्रसे प्रारम्भ किया है-
'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १ ॥'
अब न्यायदर्शनके सूत्रोंको देखिए। उसके प्रणेता गौतम महर्षि लिखते हैं कि 'प्रमाण, प्रमेय, संशय,
प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रह-
स्थान इनका तत्त्वज्ञान होनेसे निःश्रेयसकी प्राप्ति होती है ॥ १ ॥' सूत्र इस प्रकार है-
'प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रह-
स्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः ॥ १ ॥'
वैशेषिकदर्शनके प्रणेता महर्षि कणादने भी यह दृष्टि सामने रखी है। वे प्रारम्भमें लिखते हैं -
'अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥'
कपिल ऋषिकी स्थिति इससे कुछ भिन्न नहीं है। उन्होंने भी अत्यन्त पुरुषार्थको ही मुख्य माना है।
वे सांख्य दर्शनका प्रारम्भ इन शब्दों द्वारा करते हैं-
'अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः ॥ १ ॥'
योगदर्शनका प्रारम्भ तो और भी मनोहारी शब्दों द्वारा हुआ है। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं- 'अब
योगका अनुशासन करते हैं ॥ १ ॥ योगका अर्थ है चित्तवृत्तिका निरोध ॥ २ ॥ चित्तवृत्तिका निरोध होनेपर
ही द्रष्टाका अपने स्वरूपमें अवस्थान होता है' ॥ ३ ॥ इस विषयके प्रतिपादक उनके सूत्र देखिए-
'अथ योगानुशासनम् ॥ १ ॥ योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ २ ॥ तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ ३ ॥'
इन सबके बाद जब हमारी दृष्टि जैन दर्शनके सूत्र ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र पर जाती है तो हमें वहाँ भी
उसी तत्त्वके दर्शन होते हैं। इसका प्रारम्भ करते हुए आचार्य गृद्धपिच्छ लिखते हैं-
'सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः ॥१॥१'
यह है भारतीय दर्शनोंके प्रणयनका सार। इसलिए पूज्यपाद स्वामीका यह कहना सर्वथा उचित है
कि 'जो मनुष्य धर्मभक्तिसे इस तत्त्वार्थवृत्तिको पढ़ते और सुनते हैं मानो उन्होंने परम सिद्धिसुखरूपी अमृतको
अपने हाथमें ही कर लिया है। फिर चक्रवर्ती और इन्द्रके सुखोंके विषयमें तो कहना ही क्या है।' इससे
इसका 'सर्वार्थसिद्धि' यह नाम सार्थक है।
रचनाशैली-हम कह आये हैं कि सर्वार्थसिद्धि टीका ग्रन्थ है और टीकाकारने इसे 'वृत्ति' कहा है।
जिसमें सूत्रके पदोंका आश्रय लेकर पद घटनाके साथ प्रत्येक पदका विवेचन किया जाता है उसे वृत्ति कहते हैं।
वृत्तिका यह अर्थ सर्वार्थसिद्धिमें अक्षरशः घटित होता है। सूत्रका शायद ही कोई पद हो जिसका इसमें व्याख्यान
नहीं किया गया है। उदाहरणार्थ-तत्त्वार्थसूत्रके अध्याय १ सूत्र २ में केवल 'तत्त्व' या 'अर्थ' पद न रखकर 'तत्त्वार्थ'
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२८ सर्वार्थसिद्धि
पद क्यों रखा है इसका विवेचन दर्शनान्तरोंका निर्देश करते हुए उन्होंने जिस विशदतासे किया है इसीसे
वृत्तिकारकी रचनाशैलीका स्पष्ट आभास मिल जाता है । वे सूत्रगत प्रत्येक पदका साङ्गोपाङ्ग विचार करते
हुए आगे बढ़ते हैं । सूत्रपाठमें जहाँ आगमसे विरोध दिखाई देता है वहाँ वे सूत्रपाठकी यथावत् रक्षा करते
हुए बड़े कौशलसे उसकी सङ्गति बिठलाते हैं । अध्याय ४ सूत्र १९ और सूत्र २२ में उनके इस कौशलके और
भी स्पष्ट दर्शन होते हैं । सूत्र १९ में 'नवग्रैवेयकेषु' न कहकर 'नवसु ग्रैवेयकेषु' कहा है । प्रत्येक आगमा-
भ्यासीसे यह बात छिपी हुई नहीं है कि नौ ग्रैवेयकके सिवा अनुदिश संज्ञक नौ विमान और हैं । किन्तु मूल
सूत्रमें नौ अनुदिशोंका उल्लेख नहीं किया है । आचार्य पूज्यपादसे यह रहस्य छिपा नहीं रहता । वे सूत्रकारकी
मनसाको भाप लेते हैं और 'नव' पदको समसित न रखनेका कारण बतलाते हुए वे स्पष्ट घोषणा करते हैं कि
यहाँ पर नौ अनुदिशोंका ग्रहण करनेके लिए 'नव' पदका पृथक् रूपसे निर्देश किया है । २२ वें सूत्रकी
व्याख्याके समय भी उनके सामने यही समस्या उपस्थित होती है । आगममें दूसरे कल्प तक पीतलेश्याका,
बारहवें कल्पतक पद्मलेश्याका और आगे शुक्ललेश्याका निर्देश किया है। आगमकी इस व्यवस्थाके अनुसार
उक्त सूत्रकी संगति बिठाना बहुत कठिन है । किन्तु वे ऐसे प्रसंग पर जिस साहससे आगम और सूत्रपाठ
दोनोंकी रक्षा करते हैं उसे देखते हुए हमारा मस्तक श्रद्धासे उनके चरणोंमें झुके बिना नहीं रहता ।
पाणिनीय व्याकरण पर पातञ्जल महाभाष्य प्रसिद्ध है । इसमें व्याकरण जैसे नीरस और कठिन
विषयका ऐसो सरस और सरल पद्धतिसे विवेचन किया गया है कि उसे हाथमें लेनेके बाद छोड़नेको जी नहीं
चाहता । यह तो हम आगे चलकर देखेंगे कि सर्वार्थसिद्धिकारने सर्वार्थसिद्धि लिखते समय उसका कितना
उपयोग किया है। यहाँ केवल यही बतलाना है कि इसमें न केवल उसका भरपूर उपयोग हुआ है अपितु उसे
अच्छी तरह पचाकर उसी शैली में इसका निर्माण भी हुआ है । और आश्चर्य यह कि वह व्याकरणका ग्रन्थ
और यह दर्शनका ग्रन्थ फिर भी रचनामें कहीं भी शिथिलता नहीं आने पायी है । सर्वार्थसिद्धिकी रचना
शैलीको हम समतल नदीके गतिशील प्रवाहकी उपमा दे सकते हैं जो स्थिर और प्रशान्त भावसे आगे एक
रूपमें सदा बढ़ता ही रहता है रुकना कहीं वह जानता ही नहीं ।
आचार्य पूज्यपादने इसमें केवल भाषा-सौष्ठवका ही ध्यान नहीं रखा है अपितु आगमिक परम्पराका
भी पूरी तरह निर्वाह किया है । प्रथम अध्यायका सातवाँ और आठवाँ सूत्र इसका प्राञ्जल उदाहरण है । इन
सूत्रों की व्याख्या का आलोडन करते समय उन्होंने सिद्धान्त ग्रन्थों का कितना गहरा अभ्यास किया था इस
बातका सहज ही पता लग जाता है । इस परसे हम यह दृढ़तापूर्वक कहनेका साहस करते हैं कि उन्होंने
सर्वार्थसिद्धि लिखकर जहाँ एक ओर संस्कृत साहित्यकी श्रीवृद्धि की है वहाँ उन्होंने परम्परासे आये हुए
आगमिक साहित्यकी रक्षाका श्रेय भी सम्पादित किया है।
निचोड़ रूपमें सर्वार्थसिद्धिकी रचनाशैलीके विषय में संक्षेपमें यही कहा जा सकता है कि वह ऐसी
प्रसन्न और विषयस्पर्शी शैलीमें लिखी गयी है जिससे वाचक उमास्वातिप्रभृति सभी तत्त्वार्थसूत्रके भाष्यकारों,
वार्तिककारों और टीकाकारोंको उसका अनुसरण करनेके लिए बाध्य होना पड़ा है ।
पाठभेद और अर्थान्तरन्यास—सर्वार्थसिद्धि लिखते समय आचार्य पूज्यपादके सामने तत्त्वार्थ-
सूत्रपर लिखा गया अन्य कोई टीका ग्रन्थ या भाष्यग्रन्थ था इसका तो स्वयं उन्होंने उल्लेख नहीं किया है
किन्तु सर्वार्थसिद्धि परसे इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यह लिखते समय उनके सामने एक-दो छोटे-
मोटे टीकाग्रन्थ अवश्य थे और उनमें एक-दो स्थलोंपर महत्त्वपूर्ण पाठभेद भी था । ऐसे पाठभेदोंकी चर्चा
आचार्य पूज्यपादने दो स्थलों पर की है । प्रथम स्थल है प्रथम अध्यायका १६वाँ सूत्र और दूसरा स्थल है
दूसरे अध्यायका ५३वाँ सूत्र ।
१. प्रथम अध्यायका १६वाँ सूत्र इस प्रकार है—
'बहुबहुविधक्षिप्रानिःसृतानुक्तध्रुवाणां सेतराणाम् ॥ १६ ॥'
इसमें क्षिप्रके बाद अनिःसृत पाठ है । किन्तु इस पर आचार्य पूज्यपाद सूचित करते हैं कि 'अपरेषां
क्षिप्रनिःसृत इति पाठः ।' अर्थात् अन्य आचार्योंके मतसे क्षिप्रके बाद अनिःसृतके स्थानपर निःसृत पाठ है ।

प्रस्तावना २९
वर्तमानमें हमारे सामने दिगम्बर और श्वेताम्बर जितने भी तत्त्वार्थसूत्रके टीकाग्रन्थ और सूत्रपाठ
उपस्थित हैं उनमेंसे किसीमें भी यह दूसरा पाठ उपलब्ध नहीं होता, इसलिए यह तो कहा ही नहीं जा सकता
कि इनमेंसे किसी एक टीकाग्रन्थ या सूत्रपाठके आधारसे आचार्य पूज्यपादने इस मतभेदका उल्लेख किया है।
तत्त्वार्थभाष्यकार वाचक उमास्वातिने अवश्य ही सर्वार्थसिद्धिमान्य 'अनिःसृत' पदको स्वीकार न कर उसके
स्थानमें 'अनिश्रित' पाठ स्वीकार किया है। इसलिए यह भी शंका नहीं होती कि आचार्य पूज्यपादके सामने
तत्त्वार्थभाष्य या तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठ था और उन्होंने इस पाठान्तर द्वारा उसकी ओर इशारा किया
है। सम्भव यही दिखाई देता है कि सर्वार्थसिद्धि टीका लिखते समय उनके सामने जो टीका-टिप्पणियां उपस्थित
थीं उनमेंसे किन्हींमें यह दूसरा पाठ रहा होगा और उसी आधारसे आचार्य पूज्यपादने उस पाठभेदका यहाँ
उल्लेख किया है। इतना ही नहीं किन्तु किसी टीकाग्रन्थमें उसकी संगति भी बिठलायी गयी होगी। यही
कारण है कि आचार्य पूज्यपाद केवल पाठभेदका उल्लेख करके ही नहीं रह गये। किन्तु इस पाठको स्वीकार
कर लेनेपर उसकी व्याख्या दूसरे आचार्य किस प्रकार करते हैं इस बातका भी उन्होंने 'ते एवं वर्णयन्ति'
इत्यादि वाक्य द्वारा उल्लेख किया है।
२. दूसरे अध्यायका ५३ वाँ सूत्र इस प्रकार है—
'औपपादिकचरमोत्तमदेहासंख्येयवर्षायुषोऽनपवर्त्यायुषः ॥ ५३ ॥'
समें 'चरमोत्तमदेह' पाठ है। इससे यह भ्रम होता है कि क्या चरमशरीरी सभी उत्तम देहवाले
होते हैं या कोई-कोई । यदि सभी उत्तम देहवाले होते हैं तो उत्तम पदके देनेकी क्या आवश्यकता है। और
यदि कोई कोई उत्तम देहवाले होते हैं तो फिर क्या यह माना जाय कि जो चरमशरीरी उत्तम देहवाले होते
हैं केवल वे ही अनपवर्त्य आयुवाले होते हैं अन्य चरमशरीरी नहीं ? बहुत सम्भव है कि इसी दोषका
परिहार करनेके लिए किसीने 'चरमदेह' पाठ स्वीकार किया होगा। यह भी सम्भव है कि आचार्य गृद्धपिच्छने
ही 'चरमदेह' पाठ स्वीकार किया हो। जो कुछ भी हो। पूज्यपाद आचार्यके सामने दोनों पाठ थे और
उन्होंने 'चरमोत्तमदेह' पाठको सूत्रकारका मानकर स्वीकार कर लिया और 'चरमदेह' पाठका पाठान्तरके
रूपमें उल्लेख कर दिया ।
तत्त्वार्थभाष्यमान्य जो सूत्रपाठ इस समय उपलब्ध होता है उसमें 'चरमदेहोत्तमपुरुष' पाठ है। इस
परसे कुछ विद्वान् यह शंका करते हैं कि बहुत सम्भव है कि आचार्य पूज्यपादके सामने तत्त्वार्थभाष्य रहा हो
और उसके आधारसे उन्होंने सर्वार्थसिद्धिमें इस पाठान्तरका उल्लेख किया हो; किन्तु हमें उनके इस कथनमें
कुछ भी तथ्यांश नहीं दिखाई देता। कारण एक तो तत्त्वार्थभाष्यमें 'चरमदेह' पाठ ही नहीं है। उसमें
'चरमदेहोत्तमपुरुष' पाठ अवश्य ही उपलब्ध होता है किन्तु इस पाठके विषयमें भी उसकी स्थिति धुंधली है।
आचार्य सिद्धसेनने अपनी तत्त्वार्थभाष्यकी टीकामें इस प्रसंगको उठाया है और अन्तमें यही कहा है कि
हम नहीं कह सकते कि इस सम्बन्धमें वस्तुस्थिति क्या है।
दूसरे यदि आचार्य पूज्यपादके सामने तत्त्वार्थभाष्यका पाठ उपस्थित होता तो वे 'चरमदेहा¹ इति वा
१. यद्यपि वाचक उमास्वातिने 'औपपातिक' सूत्रके प्रत्येक पदका व्याख्यान करते हुए 'उत्तमपुरुष' पदका
स्वतन्त्र व्याख्यान किया है और बादमें उपसंहार करते हुए उन्होंने 'उत्तमपुरुष पदको छोड़कर शेषको ही
अनपवर्त्य आयुवाले बतलाया है, इसलिए इस परसे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि 'चरमदेहोत्तमपुरुष'
पदके समान केवल 'चरमदेह' पद भी उन्हें स्वयं इष्ट रहा है और बहुत सम्भव है कि आचार्य पूज्यपादने इसी
आधारसे पाठान्तरका सूचन किया हो। किन्तु यहाँ देखना यह है कि वाचक उमास्वातिने स्वयं सूत्रकार होते हुए
भाष्यमें ये दो पाठ किस आधारसे स्वीकार किये हैं। जब उनका यह निश्चय था कि उत्तमपुरुष भी अनपवर्त्य
आयुवाले होते हैं तब उपसंहार करते हुए अन्योंके साथ उनका भी ग्रहण करना था। किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं
किया। इससे स्पष्ट विदित होता है कि वाचक उमास्वातिको भी दो पाठ उपलब्ध हुए होंगे और उन्होंने क्रमसे
दोनोंका व्याख्यान करना उचित समझा होगा। इस आधारसे वे सूत्रकार तो किसी हालतमें हो ही नहीं सकते।

३० सर्वार्थसिद्धि
पाठः' के स्थानमें 'चरमदेहोत्तमपुरुषा इति वा पाठः' ऐसा उल्लेख करते, क्योंकि उन्हें 'चरमोत्तमदेह' इस
पाठके स्थानमें दूसरा पाठ क्या उपलब्ध होता है इसका निर्णय करना था । ऐसी अवस्थामें अधूरे पाठान्तरका
भूल कर भी वे उल्लेख नहीं करते ।
स्पष्ट है कि 'क्षिप्रनिःसृत' के समान यह पाठान्तर भी आचार्य पूज्यपादको दूसरे टीका ग्रन्थोंमें उप-
लब्ध हुआ होगा और उसी आधारसे उन्होंने यहाँ उसका उल्लेख किया है ।
३. अर्थान्तरन्यासका एक उदाहरण हम रचना शैलीके प्रसंगसे अध्याय ४ सूत्र २२ का उल्लेख करते
समय दे आये हैं। वहाँ हमने यह संकेत किया ही है कि उक्त सूत्रमें पूरे आगमिक अर्थकी संगति बैठती न
देख आचार्य पूज्यपादने सूत्र और आगम दोनोंका सुन्दरता पूर्वक निर्वाह किया है। यह प्रथम अर्थान्तरन्यासका
उदाहरण है।
४. द्वितीय उदाहरण स्वरूप हम ९वें अध्यायका ११ वाँ सूत्र उपस्थित करते हैं। इसमें वेदनीय
निमित्तक ११ परीषह जिनके कही गयी हैं। इस विषयको अधिक स्पष्ट करनेके लिए हम थोड़ी विस्तारके
साथ चर्चा करना इष्ट मानेंगे ।
परीषहोंका विचार छठवें गुणस्थानसे किया जाता है, क्योंकि श्रामण्य पदका प्रारम्भ यहींसे होता है,
अतः इस गुणस्थानमें सब परीषह होते हैं यह तो ठीक ही है, क्योंकि इस गुणस्थानमें प्रमादका सद्भाव रहता
है और प्रमादके सद्भावमें क्षुधादिजन्य विकल्प और उसके परिहारके लिए चित्तवृत्तिको उस ओरसे हटाकर
धर्म्यध्यानमें लगानेके लिए प्रयत्नशील होना यह दोनों कार्य बन जाते हैं। तथा सातवें गुणस्थानकी स्थिति
प्रमाद रहित होकर भी इससे भिन्न नहीं है, क्योंकि इन दोनों गुणस्थानोंमें प्रमाद और अप्रमादजन्य ही भेद
है। यद्यपि विकल्प और तदनुकूल प्रवृत्तिका नाम छठा गुणस्थान है और उसके निरोधका नाम सातवाँ
गुणस्थान है। तथापि इन दोनों गुणस्थानोंकी धारा इतनी अधिक चढ़ा-उतारकी है जिससे उनमें परीषह और
उनके जय आदि कार्योंका ठीक तरहसे विभाजन न होकर ये कार्य मिलकर दोनोंके मानने पड़ते हैं। छठे
गुणस्थान तक वेदनीयकी उदीरणा होती है आगे नहीं, इसलिए यह कहा जा सकता है कि वेदनीयके निमित्तसे
जो क्षुधादिजन्य वेदनकार्य छठे गुणस्थानमें होता है वह आगे कथमपि सम्भव नहीं । विचारकर देखने पर
बात तो ऐसी ही प्रतीत होती है और है भी वह वैसी ही, क्योंकि अप्रमत्तसंयत आदि गुणस्थानोंमें जब जीवकी
न तो बाह्यप्रवृत्ति होती है और न बाह्यप्रवृत्तिके अनुकूल परिणाम ही होते हैं तब वहाँ क्षुधादि परीषहोंका
सद्भाव मानना कहाँतक उचित है यह विचारणीय हो जाता है। इसलिए यहाँ यह देखना है कि आगेके
गुणस्थानोंमें इन परीषहोंका सद्भाव किस दृष्टिसे माना गया है।
किसी भी पदार्थका विचार दो दृष्टियोंसे किया जाता है—एक तो कार्यकी दृष्टिसे और दूसरे कारणकी
दृष्टिसे । परीषहोंका कार्य क्या है और उनके कारण क्या हैं इस विषयका साङ्गोपाङ्ग ऊहापोह शास्त्रोंमें
किया है। परीषह तथा उनके जयका अर्थ है—बाधाके कारण उपस्थित होनेपर उनमें जाते हुए अपने चित्तको
रोकना तथा स्वाध्याय ध्यान आदि आवश्यक कार्योंमें लगे रहना । परीषह और उनके जयके इस स्वरूपको
ध्यानमें रखकर विचार करने पर ज्ञात होता है कि एक प्रमत्तसंयत गुणस्थान ही ऐसा है जिसमें बाधाके कारण
उपस्थित होनेपर उनमें चित्त जाता है और उनसे चित्तवृत्तिको रोकनेके लिए यह जीव उद्यमशील होता है।
किन्तु आगेके गुणस्थानोंकी स्थिति इससे भिन्न है। वहाँ बाह्य कारणोंके रहनेपर भी उनमें चित्तवृत्तिका रंच-
मात्र भी प्रवेश नहीं होता। इतना ही नहीं, कुछ आगे चलकर तो यह स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि जहाँ न
तो बाह्य कारण ही उपस्थित होते हैं और न चित्तवृत्ति ही शेष रहती है। इसलिए इन गुणस्थानोंमें केवल
अन्तरंग कारणोंको ध्यानमें रखकर ही परीषहोंका निर्देश किया गया है। कारण भी दो प्रकारके होते हैं—एक
बाह्य कारण और दूसरे अन्तरङ्ग कारण । बाह्य कारणोंके उपस्थित होनेका तो कोई नियम नहीं है। किन्हींको
उनकी प्राप्ति सम्भव भी है और किन्हींको नहीं भी । परन्तु अन्तरङ्ग कारण सबके पाये जाते हैं । यही कारण
है कि दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों परम्पराओंके ग्रन्थोंमें परीषहोंके कारणोंका विचार करते समय मुख्यरूपसे

प्रस्तावना ३१

अन्तरङ्ग कारणोंका ही निर्देश किया है । इसीसे तत्त्वार्थसूत्रमें वे अन्तरंग कारण ज्ञानावरण, वेदनीय, दर्शन-
मोहनीय, चारित्रमोहनीय और अन्तरायके उदयरूप कहे हैं, अन्यरूप नहीं ।
कुल परीषह २२ हैं । इनमेंसे प्रज्ञा और अज्ञान परीषह ज्ञानावरणके उदयमें होते हैं । ज्ञानावरणका
उदय क्षीणमोह गुणस्थान तक होता है, इसलिए इनका सद्भाव क्षीणमोह गुणस्थान तक कहा है । किन्तु
इसका यह अभिप्राय नहीं कि प्रज्ञा और अज्ञानके निमित्तसे जैसा विकल्प प्रमत्तसंयत जीवके हो सकता है
वैसा वह अप्रमत्तसंयत आदि गुणस्थानोंमें भी होता है । आगेके गुणस्थानोंमें इस प्रकारके विकल्पके न होनेपर
भी वहाँ केवल ज्ञानावरणका उदय पाया जाता है, इसलिए वहाँ इन परीषहोंका सद्भाव कहा है ।
अदर्शनपरीषह दर्शनमोहनीयके उदयमें और अलाभ परीषह अन्तरायके उदयमें होते हैं। यह बात किसी
भी कर्मशास्त्रके अभ्यासीसे छिपी हुई नहीं है कि दर्शनमोहनीयका उदय अधिकसे अधिक अप्रमत्तसंयत गुण-
स्थान तक ही होता है, इसलिए अदर्शन परीषहका सद्भाव अधिकसे अधिक इसी गुणस्थान तक कहा जा
सकता है और अन्तरायका उदय क्षीणमोह गुणस्थान तक होता है, इसलिए अलाभ परीषहका सद्भाव वहाँ तक
कहा है । किन्तु कार्यरूपमें ये दोनों परीषह भी प्रमत्तसंयत गुणस्थान तक ही जानने चाहिए । आगे इनका
सद्भाव दर्शनमोहनीयके उदय और अन्तरायके उदयकी अपेक्षा ही कहा है ।
प्रसङ्गसे यहाँ इस बातका विचार कर लेना भी इष्ट है कि तत्त्वार्थसूत्रकार आचार्य गृद्धपिच्छ बादर-
साम्पराय जीवके सब परीषहोंका सद्भाव बतलाते हुए उन्हें बादरायसाम्पराय शब्दका अर्थ क्या अभिप्रेत रहा
होगा । हम यह तो लिख ही चुके हैं कि दर्शनमोहनीयका उदय अप्रमत्तसंयतगुणस्थान तक ही होता है,
इसलिए अदर्शनपरीषहका सद्भाव अप्रमत्तसंयत गुणस्थानसे आगे कथमपि नहीं माना जा सकता । ऐसी
अवस्थामें बादरसाम्पराय का अर्थ स्थूल कषाय युक्त जीव ही हो सकता है । यही कारण है कि सर्वार्थसिद्धिमें
इस पदकी व्याख्या करते हुए यह कहा है कि 'यह गुणस्थान विशेषका ग्रहण नहीं है । तो क्या है ? सार्थक
निर्देश है । इससे प्रमत्त आदि संयतोंका ग्रहण होता है' ।¹
किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमें 'बादरसाम्पराये सर्वे ।' इस सूत्रकी व्याख्या इन शब्दोंमें की है—'बादरसाम्प-
रायसंयते सर्वे द्वाविंशतिरपि परीषहाः सम्भवन्ति ।' अर्थात् बादरसाम्पराय संयतके सब अर्थात् बाईस परीषह
ही सम्भव हैं । तत्त्वार्थभाष्यके मुख्य व्याख्याकार सिद्धसेनगणि हैं । वे तत्त्वार्थभाष्यके उक्त शब्दोंकी व्याख्या
इन शब्दोंमें करते हैं—
'बादरः स्थूलः साम्परायः कषायस्तदुदयो यस्यासौ बादरसाम्परायः संयतः । स च मोहप्रकृतोः
कश्चिदुषशमयतीत्युपशमकः । कश्चित् क्षपयतीति क्षपकः । तत्र सर्वेषां द्वाविंशतेरपि क्षुदादीनां परीषहाणाम-
दर्शनान्तानां सम्भवः ।'
जिसके कषाय स्थूल होता है वह बादरसाम्पराय संयत कहलाता है । उनमेंसे कोई मोहनीयका
उपशम करता है इसलिए उपशमक कहलाता है और कोई क्षय करता है इसलिए क्षपक कहलाता है । इसके
सभी बाईस क्षुधा आदि परीषहोंका सद्भाव सम्भव है ।
इस व्याख्यानसे स्पष्ट है कि सिद्धसेनगणिके अभिप्रायसे तत्त्वार्थभाष्यकार वाचक उमास्वातिको यहाँ
'बादरसाम्पराय' पदसे नौवां गुणस्थान ही इष्ट है । प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीने तत्त्वार्थसूत्रकी व्याख्यामें यही
अर्थ स्वीकार किया है । वे लिखते हैं—'जिसमें साम्पराय-कषायका बादर अर्थात् विशेषरूपमें सम्भव हो
ऐसे बादरसाम्पराय नामक नौवें गुणस्थानमें बाईस परीषह होते हैं । इसका कारण यह है कि परीषहोंके
कारणभूत सभी कर्म वहाँ होते हैं ।'
'बादरसाम्पराय' पदकी ये दो व्याख्याएँ हैं जो क्रमशः सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यमें उपलब्ध
होती हैं । सर्वार्थसिद्धिकी व्याख्याके अनुसार 'बादरसाम्पराय पद गुणस्थान-विशेषाका सूचक न होकर अर्थ-

१. नेदं गुणस्थानविशेषग्रहणम् । किं तर्हि ? अर्थनिर्देशः । तेन प्रमत्तादीनां संयतादीनां ग्रहणम् । स०,
अ० ९, सू० १२ ।

३२ सर्वार्थसिद्धि
परक निर्देश होनेसे दर्शनमोहनीयके उदयमें अदर्शन परीषह होता है इस अर्थकी सङ्गति बैठ जाती है। किन्तु
तत्त्वार्थभाष्यकी व्याख्याको स्वीकार करने पर एक नयी अड़चन उठ खड़ी होती है। दर्शनमोहनीयका सत्त्व
उपशान्तमोह गुणस्थान तक रहता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि उन्होंने दर्शनमोहनीयके सत्त्वकी
अपेक्षा बादरसाम्पराय नामक नौवें गुणस्थान तक अदर्शन परीषह कहा होगा। किन्तु इस मतको स्वीकार
करने पर दो नयी आपत्तियां और सामने आती हैं। प्रथम तो यह कि यदि उन्होंने दर्शनमोहनीयके सत्त्वकी
अपेक्षा अदर्शन परीषहका सद्भाव स्वीकार किया है तो उसका सद्भाव ग्यारहवें गुणस्थान तक कहना चाहिए।
दूसरी यह कि वे 'क्षुत्पिपासा शीतोष्ण-' इत्यादि सूत्रकी व्याख्या करते हुए वह कहते हैं कि 'पञ्चानामपि
कर्मप्रकृतीनामुदयादेते परीषहाः प्रादुर्भवन्ति ।' अर्थात् पांच कर्मप्रकृतियोंके उदयसे परीषह उत्पन्न होते हैं।
सो पूर्वोक्त अर्थके स्वीकार करने पर इस कथनकी सङ्गति नहीं बैठती दिखलाई देती। क्योंकि एक ओर तो
दर्शनमोहनीयके सत्त्वकी अपेक्षा अदर्शन परीषहको नौवें गुणस्थान तक स्वीकार करना और दूसरी ओर सब
परीषहोंको पांच कर्मोंके उदयका कार्य कहना ये परस्पर विरोधी दोनों कथन कहां तक युक्तियुक्त हैं यह
विचारणीय हो जाता है। स्पष्ट है कि सिद्धसेन गणिकी टीकाके अनुसार तत्त्वार्थभाष्यका कथन न केवल
स्खलित है अपितु वह मूल सूत्रकारके अभिप्रायके प्रतिकूल भी है, क्योंकि मूल सूत्रकारने इन परीषहोंका
सद्भाव कर्मोंके उदयकी मुख्यतासे ही स्वीकार किया है। अन्यथा वे अदर्शन परीषहका सद्भाव और
चारित्रमोहके निमित्तसे होनेवाले नग्न्य आदि परीषहोंका सद्भाव उपशान्तमोह नामक ग्यारहवें गुणस्थान
तक अवश्य कहते ।
नग्न्य, अरति, स्त्री, निषद्या, आक्रोश, याचना और सत्कार-पुरस्कार ये सात परीषह चारित्रमोह-
नीयके उदयमें होते हैं। सामान्यतः चारित्रमोहनीयका उदय यद्यपि सूक्ष्मसाम्परायिक नामक दसवें गुणस्थान
तक होता है इसलिए इन सात परीषहोंका सद्भाव दसवें गुणस्थान तक कहना चाहिए था ऐसी शंका की जा
सकती है परन्तु इनका दसवें गुणस्थान तक सद्भाव न बतलानेके दो कारण हैं। प्रथम तो यह कि चारित्र-
मोहनीयके अवान्तरभेद क्रोध, मान और मायाका तथा नौ नोकषायोंका उदय नौवें गुणस्थानके अमुक भाग तक
ही होता है, इसलिए इन परीषहोंका सद्भाव नौवें गुणस्थान तक कहा है। दूसरा यह कि दसवें गुणस्थानमें
यद्यपि चारित्रमोहनीयका उदय होता है अवश्य पर एक लोभ कषायका ही उदय होता है और वह भी अति-
सूक्ष्म, इसलिए इनका सद्भाव दसवें गुणस्थान तक न कहकर मात्र नौवें गुणस्थान तक कहा है।
तथा क्षुधा, पिपासा, शीत, उष्ण, दंशमशक, चर्या, शय्या, वध, रोग, तृणस्पर्श और मल ये ग्यारह
परीषह वेदनीय कर्मके उदयमें होते हैं। वेदनीय कर्मका उदय जिनके भी होता है, इसलिए, इनका सद्भाव
वहाँ तक कहा है।
इस प्रकार अप्रमत्तसंयत आदि गुणस्थानोंमें सूत्रकारने जो परीषहोंका सद्भाव कहा है उसमें उनकी
दृष्टि कारणको ध्यानमें रखकर विवेचन करनेकी ही रही है और इसीलिए सर्वार्थसिद्धिकार आचार्य पूज्य-
पादने पहले सूत्रकारकी दृष्टि से 'एकादश जिने' इस सूत्रका व्याख्यान किया है। अनन्तर जब उन्होंने देखा कि
कुछ अन्य विद्वान् अन्य साधारण मनुष्योंके समान केवलीके कारणपरक परीषहोंके उल्लेखका विपर्यास करके
भूख-प्यास आदि बाधाओंका ही प्रतिपादन करने लगे हैं तो उन्होंने यह बतलानेके लिए कि केवलीके कार्य-
रूपमें ग्यारह परीषह नहीं होते 'न सन्ति' पदका अध्याहार कर उस सूत्रसे दूसरा अर्थ फलित किया है।
इसमें न तो उनकी साम्प्रदायिक दृष्टि रही है और न ही उन्होंने तोड़-मरोड़कर उसका अर्थ किया है। साम्प्र-
दायिक दृष्टि तो उनकी है जो उसे इस दृष्टिकोणसे देखते हैं। आचार्योंमें मतभेद हुए हैं और हैं पर सब मत-
भेदोंको साम्प्रदायिक दृष्टिका सेहरा बांधना कहाँ तक उचित है यह समझने और अनुभव करनेकी बात है।
आचार्य पूज्यपाद यदि साम्प्रदायिक दृष्टिकोणके होते तो वे ऐसा प्रयत्न न कर सूत्रका ही कायाकल्प कर
सकते थे। किन्तु उन्होंने अपनी स्थितिको बिल्कुल स्पष्ट रखा है। तत्त्वतः देखा जाय तो एक मात्र यही
उदाहरण उनकी साहित्यिक प्रामाणिकताकी कसौटी बन सकता है। यह अर्थान्तरन्यासका दूसरा उदाहरण

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

प्रस्तावना ३३
हैं। इसके सिवा अर्थान्तरन्यासके एक दो उदाहरण और भी उपस्थित किये जा सकते हैं पर विशेष प्रयोजन
न होनेसे उनका यहाँ हमने निर्देश नहीं किया है।
इस प्रकार इन चार उदाहरणोंसे इस बातका सहज ही पता लग जाता है कि आचार्य पूज्यपादने
मूल सूत्रपाठ और पाठान्तरोंकी रक्षाका कितना अधिक ख्याल रखा है।
सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्य- ऐसा होते हुए भी आचार्य पूज्यपादके ऊपर यह आक्षेप$^१$ किया
जाता है कि उन्होंने उन्हें उपलब्ध हुए सूत्रपाठमें सुधार और वृद्धि कर सर्वार्थसिद्धिकी रचना की है। सर्वार्थ-
सिद्धि किस कालकी रचना है और तत्त्वार्थभाष्य किस कालका यह तो हम आगे चलकर देखेंगे। यहाँ केवल
तुलनात्मक दृष्टिसे इन दोनोंके अन्तःस्वरूपका पर्यालोचन करना है।
सूत्रपाठ- सर्व प्रथम हम सूत्रपाठको लेते हैं। सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठसे तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठमें
शब्दोंके हेरफेरसे या सूत्रोंके घटाने-बढ़ानेसे छोटे-मोटे अन्तर$^२$ तो पर्याप्त हुए हैं किन्तु उन सबका ऊहापोह यहाँ
नहीं करना है। जिनमें मौलिक अन्तर हुआ है ऐसे सूत्र तीन हैं। प्रथम स्वर्गोंकी संख्या का प्रतिपादक सूत्र,
दूसरा सानत्कुमार आदिमें प्रवीचारका प्रतिपादक सूत्र और तीसरा कालको स्वतन्त्र द्रव्य माननेवाला सूत्र ।
स्वर्गोंके प्रतिपादक सूत्रमें मौलिक अन्तर यह हुआ है कि सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठमें १६ कल्पोंकी परि-
गणना की गयी है और तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठमें १२ कल्पोंकी परिगणना की गयी है। इस पर आक्षेप
यह किया जाता है कि 'जब सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठमें कल्पोपपन्न देवोंके भेद$^३$ बारह बतलाये हैं और नामों-
की परिगणना करते समय वे सोलह परिगणित किये गये हैं तब यह माननेके लिए पर्याप्त आधार हो जाता
है कि या तो आचार्य पूज्यपादने या इनके पूर्ववर्ती अन्य किसी आचार्यने इस सूत्रमें घटा-बढ़ाकर उसे वर्तमान
रूप दिया है जब कि तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठकी स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है। इसलिए बहुत सम्भव है कि
तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठ मूल हो और उसमें सुधार कर उत्तरकालमें सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठ निर्मित
हुआ हो$^४$।'
यहाँ सर्वप्रथम यह विचार करना है कि क्या उक्त सूत्रके आधारसे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है
कि तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठ मूल है और उसे सुधार कर या बढ़ाकर सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठ निर्मित हुआ
है। यह तो स्पष्ट है कि किसी एक पाठमें परिवर्तन किया गया हैं पर वह परिवर्तन किस पाठमें किया जाना
सम्भव है यही विचारणीय है। जैसा कि हम देखते हैं कि दिगम्बर परम्पराके अनुसार सर्वत्र कल्पोपपन्न देवोंके
भेद बारह और कल्प सोलह गिनाये गये हैं। कल्प कल्पोपपन्न देवोंके आवासस्थानकी विशेष संज्ञा है। यदि कल्पो-
पपन्न देव बारह प्रकारके होकर भी उनके आवासस्थान सोलह प्रकारके माने गये हैं तो इसमें बाधाको कौन सी
बात है। और इस आधारसे वह कैसे कहा जा सकता है कि सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठमें सुधार किया गया है।
यदि सुधार करना ही इष्ट होता तो अध्याय ४ सूत्र तीनमें भी 'बारह' के स्थानमें 'सोलह' किया जा सकता
था। प्रत्युत इसपरसे तो यही कहा जा सकता है कि पूज्यपाद स्वामीको जैसा पाठ मिला एकमात्र उसीकी
उन्होंने यथावत् रक्षा की है। दूसरी ओर जब हम तत्त्वार्थभाष्यमान्य पाठकी ओर ध्यान देते हैं तब भी इस
सूत्रके आधारसे किसी निष्कर्ष पर पहुँचना सम्भव प्रतीत नहीं होता। कारण कि वहाँ भी इस सूत्रमें घटा
बढ़ीका ऐसा प्रबल कारण नहीं मिलता जिससे यह कहा जा सके कि उक्त सूत्रमें परिवर्तन किया गया है।
दोनों ही परम्पराओंके आचार्य अपनी-अपनी परम्पराकी मान्यतापर दृढ़ हैं इसलिए इस आधारसे यही कहा
जा सकता है कि जिसने उत्तरकालमें रचना की होगी उसीके द्वारा सूत्रोंमें सुधार करना सम्भव है।
दूसरी सानत्कुमार आदिमें प्रविचारका प्रतिपादक सूत्र है। दोनोंमें इस सूत्रकी स्थिति इस प्रकार है।
१. देखो पं० सुखलालजीके तत्त्वार्थसूत्रकी भूमिका पृ० ८४, ८५ । २. देखो दो सूत्रपाठ प्रकरण, परि-
शिष्ट १ और उसके टिप्पण । ३. देखो अ० ३ सू० २। ४. इस आक्षेपके लिए देखो पं० सुखलालजीका
तत्त्वार्थसूत्र प्रस्तावना ७३ से ८९ ।
५

३४ सर्वार्थसिद्धि
शेषाः स्पर्श्वरूपशब्दमनःप्रवीचाराः । सर्वा० ।
शेषाः स्पर्श्वरूपशब्दमनःप्रवीचाराः द्वयोर्द्वयोः । त० भा० ।
हम देखते हैं कि तत्त्वार्थभाष्यके अनुसार इस सूत्रमें 'द्वयोर्द्वयोः' इतना पद अधिक है जब कि सर्वार्थ-
सिद्धिमें इसका सर्वथा अभाव है । इसके पहले दोनों ही परम्पराओंमें 'कायप्रवीचाराः आ ऐशानात्' यह सूत्र
आता है । इस द्वारा सौधर्म और ऐशान कल्प तक प्रवीचारका विधान किया गया है । आगे सर्वार्थसिद्धिके
अनुसार चौदह और तत्त्वार्थभाष्यके अनुसार दस कल्प शेष रहते हैं जिनमें यह सूत्र प्रवीचारका विधान करता
है । प्रकृतमें देखना यह है कि सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्य इन दोनोंमें इसकी संगति किस प्रकार बिठलायी
गयी है । यह तो स्पष्ट है कि सर्वार्थसिद्धिमें 'द्वयोर्द्वयोः' पद न होनेसे आचार्य पूज्यपादको इसकी व्याख्या
करनेमें कोई कठिनाई नहीं गयी । उन्होंने तो आर्षके अनुसार इसकी व्याख्या करके छुट्टी पा ली । किन्तु
तत्त्वार्थभाष्यकारकी स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है । उनके सामने 'द्वयोर्द्वयोः' पदके कारण इसकी व्याख्या करते
समय यह समस्या रही है कि प्रवीचारके विषय चार और कल्प दस होनेसे इसकी संगति कैसे बिठलायी जाय ।
फलस्वरूप उन्हें अन्तके चार कल्पोंको दो मानकर इस सूत्रकी व्याख्या करनेके लिए बाध्य होना पड़ा है ।
उन्होंने किसी प्रकार व्याख्या करनेका तो प्रयत्न किया पर इससे जो असंगति उत्पन्न होती है वह कथमपि दूर
नहीं की जा सकी है । इससे मालूम पड़ता है कि या तो तत्त्वार्थभाष्यकार को 'द्वयोर्द्वयोः' पदके साथ सूत्रपाठ
मिला है या फिर स्वयं उन्होंने तत्त्वार्थभाष्यके आश्रयसे इस सूत्रको स्पष्ट करनेकी मनसासे सूत्रमें यह पद
बढ़ाया है । यहाँ उत्तर विकल्पकी अधिक सम्भावना है । हमें ऐसे एक दो स्थल और मिले हैं जिनमें तत्त्वार्थ-
भाष्यके आश्रयसे सूत्रोंको संगति बिठलायी गयी है । उदाहरण स्वरूप 'यथोक्तनिमित्तः' पद लीजिए । यह
प्रथम अध्यायके २२वें सूत्रमें आया है । इसके पहले एक सूत्रके अन्तरसे वे 'द्विविधोऽवधिः' सूत्र कह आये
हैं और इन भेदोंका स्पष्टीकरण इस सूत्रके भाष्यमें किया है । प्रकृतमें 'यथोक्तनिमित्तः' पदमें आये हुए
'यथोक्त' पद द्वारा उनका संकेत इसी भाष्यकी ओर है । वे इस पद द्वारा कहना चाहते हैं कि दूसरे जिस
निमित्तका संकेत हमने 'द्विविधोऽवधिः' सूत्रके भाष्यमें किया है उस निमित्तसे शेष जीवोंके छह प्रकार का
अवधिज्ञान होता है । किन्तु उस अवस्था में जब कि सूत्र रचना पहले हो चुकी थी और भाष्य बादमें लिखा
गया है भाष्यकारकी स्थिति सन्देहजनक हो जाती है । और मानना पड़ता है कि तत्त्वार्थभाष्यकार वाचक
उमास्वातिने प्राचीन सूत्रपाठमें सुधार करनेका प्रयत्न किया है ।
तीसरा कालके अस्तित्वको स्वीकार करनेवाला सूत्र है । यह सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यमें इस
प्रकार उल्लिखित है—
कालश्च । सर्वा० ।
कालश्चेत्येके । त० भा० ।
इस द्वारा कालको द्रव्यरूपसे स्वीकार किया गया है । किन्तु तत्त्वार्थभाष्यकार ऐसा करते हुए भी अन्य
आचार्योंके मतसे कालको द्रव्यरूपसे स्वीकार करते हैं स्वयं नहीं । यही कारण है कि उन्होंने तत्त्वार्थभाष्यमें
जहाँ जहाँ द्रव्योंका उल्लेख किया है वहाँ वहाँ पाँच अस्तिकायोंका¹ ही उल्लेख किया है और लोकको
पाँच अस्तिकायात्मक बतलाया है । श्वेताम्बर आगम साहित्यमें छह द्रव्योंका निर्देश किया है अवश्य और एक
स्थानपर तो तत्त्वार्थभाष्यकार भी छह द्रव्योंका² उल्लेख करते हैं परन्तु इससे वे कालको द्रव्य मानते ही हैं
यह नहीं कहा जा सकता । कारण यह है कि श्वेताम्बर आगम साहित्यमें जहाँ भी छह द्रव्योंका नामनिर्देश
किया है वहाँ कालद्रव्यके लिए 'अद्धासमय' शब्द प्रयुक्त हुआ है 'काल' शब्द नहीं और अद्धासमय शब्दका
अर्थ वहाँ पर्याय ही लिया गया है प्रदेशात्मक द्रव्य नहीं । तत्त्वार्थभाष्यकारने भी इसी परिपाटीका निर्वाह किया
१. सर्वं पञ्चत्वमस्तिकायावरोधात् । अ० १, सू० ३५ । पञ्चास्तिकायो लोकः । अ० ३, सू० ६ । पञ्चास्ति-
कायात्मकम् । अ० ९, सू० ७ । २. षट्त्वं षड्द्रव्यावरोधात् । अ० १, सू० ३५ ।