सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऔर तत्त्वार्थ इन दोनों नामोंके द्वारा उल्लेख किया है। इससे भी ये दोनों नाम एक ही हैं इस अर्थकी
पुष्टि होती है ।
इसका एक नाम मोक्षशास्त्र भी है। मोक्षशास्त्र इस नामका उल्लेख प्राचीन टीकाकारों या अन्य
किसीने किया है ऐसा हमारे देखनेमें नहीं आया । तथापि लोकमें इस नामकी अधिक प्रसिद्धि देखी जाती है ।
तत्त्वार्थसूत्रका प्रारम्भ मोक्षमार्गके उपदेशसे होकर इसका अन्त मोक्षके उपदेशके साथ होता है। जान पड़ता
है कि यह नाम इसी कारणसे अधिक प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ है ।
सर्वार्थसिद्धिके बाद इसकी दूसरी महत्त्वपूर्ण टीका तत्त्वार्थभाष्य माना जाता है। इसकी उत्थानिकामें
यह श्लोक आता है—
'तत्त्वार्थाधिगमाख्यं बह्वर्थं संग्रहं लघुग्रन्थम् ।
वक्ष्यामि शिष्यहितमिममर्हद्वचनैकदेशस्य ॥ २ ॥'
अर्थात् बहुत अर्थवाले और अर्हद्वचनके एक देशके संग्रहरूप तत्त्वार्थाधिगम नामके इस लघु ग्रन्थका मैं
शिष्य हितबुद्धिसे कथन करता हूँ ।
तत्त्वार्थभाष्यके अन्तमें जो प्रशस्ति उपलब्ध होती है। उसमें भी तत्त्वार्थाधिगम इस नामका उल्लेख
किया है। इस आधारसे यह कहा जाता है कि इसका मुख्य नाम तत्त्वार्थाधिगम है ।
किन्तु इस आधारके होते हुए भी मूल सूत्र ग्रन्थका यह नाम है इसमें हमें सन्देह है, क्योंकि एक
तो ये उत्थानिकाके श्लोक और भाष्यके अन्तमें पायी जानेवाली प्रशस्ति मूल सूत्र ग्रन्थके अंग न होकर भाष्यके
अंग हैं और भाष्य सूत्ररचनाके बाद की कृति है । दूसरे तत्त्वार्थसूत्रके साथ जो भाष्य की स्वतन्त्र प्रति
उपलब्ध होती है उसमें प्रत्येक अध्याय की समाप्ति सूचक पुष्पिकासे यह विदित नहीं होता कि वाचक उमा-
स्वाति तत्त्वार्थभाष्यको तत्त्वार्थाधिगमसे भिन्न मानते हैं। प्रथम अध्यायके अन्तमें पायी जानेवाली पुष्पिकाका
स्वरूप इस प्रकार है—
इति तत्त्वार्थाधिगमेऽर्हत्प्रवचनसंग्रहे प्रथमोऽध्यायः समाप्तः¹ ।
साधारणतः यदि किसी स्वतन्त्र ग्रन्थके अध्याय की समाप्ति सूचक पुष्पिका लिखी जाती है तो उसमें
केवल मूल ग्रन्थका नामोल्लेख कर अध्यायकी समाप्तिकी सूचना दी जाती है और यदि टीकाके साथ अध्याय-
की समाप्तिकी सूचक पुष्पिका लिखी जाती है तो उसमें मूल ग्रन्थका नामोल्लेख करनेके बाद अथवा बिना
किये ही टीकाका नामोल्लेख कर अध्याय की समाप्तिकी सूचक पुष्पिका लिखी जाती है । उदाहरणार्थ केवल
तत्त्वार्थसूत्रके अध्यायकी समाप्तिकी सूचक पुष्पिका इस प्रकार उपलब्ध होती है-
इति तत्त्वार्थसूत्रे प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ।
तथा टीकाके साथ तत्त्वार्थसूत्रकी समाप्तिकी सूचक पुष्पिकाका स्वरूप इस प्रकार है-
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञायां प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ।
यहाँ पूज्यपाद स्वामीने तत्त्वार्थसूत्रका स्वतन्त्र नामोल्लेख किये बिना केवल अपनी तत्त्वार्थ पर लिखी
गयी वृत्तिका उसके नामके साथ उल्लेख किया है। इससे इस बातका स्पष्ट ज्ञान होता है कि तत्त्वार्थ नामका
एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है और उस पर लिखा गया यह वृत्तिग्रन्थ है। बहुत संभव है कि प्रत्येक अध्यायकी समाप्ति
सूचक पुष्पिका लिखते समय यही स्थिति वाचक उमास्वातिके सामने रही है। इस द्वारा वे तत्त्वार्थको स्वतन्त्र
ग्रन्थ मानकर उसका अधिगम करानेवाले भाष्यको तत्त्वार्थाधिगम अर्हत्प्रवचनसंग्रह कह रहे हैं। स्पष्ट है कि
तत्त्वार्थाधिगम यह नाम तत्त्वार्थसूत्रका न हो कर वाचक उमास्वातिकृत उसके भाष्यका है।
दो सूत्र पाठ—प्रस्तुत ग्रन्थके सूत्र पाठ उपलब्ध होते हैं-एक दिगम्बर परम्परा मान्य और दूसरा
श्वेताम्बर परम्परा मान्य । सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यकी रचना होनेके पूर्व मूल सूत्रपाठका क्या स्वरूप
१. देखो, रतलामकी सेठ ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर संस्था द्वारा प्रकाशित तत्त्वार्थभाष्य प्रति ।