सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० सर्वार्थसिद्धि
एक भेद है। प्रारम्भसे जैनों और बौद्धोंकी प्रकृति जनताको उनकी भाषामें उपदेश देनेकी रही है। परिणाम-
स्वरूप इन्होंने अधिकतर साहित्य रचनाका कार्य जनताकी भाषा प्राकृतमें ही किया है। किन्तु धीरे-धीरे
भारतवर्षमें ब्राह्मण धर्मका प्राबल्य होनेसे और उनकी साहित्यिक भाषा संस्कृत होनेसे बौद्धों और जैनोंको
संस्कृत भाषामें भी अपना उपयोगी साहित्य लिखनेके लिए बाध्य होना पड़ा है। यही कारण है कि तत्त्वार्थसूत्र
जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थकी रचना करते समय वह संस्कृत भाषामें लिखा गया है। जैन परम्पराके उपलब्ध साहित्यमें
संस्कृत भाषामें रचा गया यह सर्वप्रथम ग्रन्थ है। इसके पहले केवल संस्कृत भाषामें जैन साहित्यकी रचना
हुई हो इसका कोई निश्चित आधार उपलब्ध नहीं होता। तत्त्वार्थसूत्र लघुकाय सूत्रग्रन्थ होकर भी इसमें
प्रमेयका उत्तमताके साथ संकलन हुआ है। इस कारण इसे जैन परम्पराके सभी सम्प्रदायोंने समान रूपसे
अपनाया है। दार्शनिक जगत्में तो इसे ख्याति मिली ही, आध्यात्मिक जगत्में भी इसका कुछ कम आदर नहीं
हुआ है। इस दृष्टिसे वैदिकोंमें गीताका, ईसाइयोंमें बाइबिलका और मुसलमानोंमें कुरानका जो महत्त्व है वही
महत्त्व जैन परम्परामें तत्त्वार्थसूत्रका माना जाता है। अधिकतर जैन इसका प्रतिदिन पाठ करते हैं और कुछ
अष्टमी-चतुर्दशीको। दशलक्षण पर्वके दिनोंमें इसके एक-एक अध्याय पर प्रतिदिन प्रवचन होते हैं जिन्हें आम
जनता बड़ी श्रद्धाके साथ श्रवण करती है। इसके सम्बन्धमें ख्याति है कि जो कोई गृहस्थ इसका एक बार
पाठ करता है उसे एक उपवासका¹ फल मिलता है।
नाम—प्रस्तुत सूत्र ग्रन्थका मुख्य नाम 'तत्त्वार्थ' है। इस नामका उल्लेख करनेवाले इसके टीका-
कार मुख्य हैं। इसकी प्रथम टीका सर्वार्थसिद्धिमें प्रत्येक अध्यायकी समाप्ति सूचक पुष्पिकामें यह वाक्य
आता है।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां.........अध्यायः समाप्तः।
इसके अन्तमें प्रशंसासूचक तीन श्लोक आते हैं। उनमें भी प्रस्तुत टीकाको तत्त्वार्थवृत्ति कह कर
प्रस्तुत ग्रन्थकी 'तत्त्वार्थ' इस नामसे घोषणा की गयी है। तत्त्वार्थवार्तिक और तत्त्वार्थश्लोकवार्तिककी भी
यही स्थिति है। इन दोनों टीका-ग्रन्थोंके प्रथम मंगल-श्लोकमें और प्रत्येक अध्यायकी समाप्तिसूचक पुष्पिकामें
मूल ग्रन्थके इसी नामका उल्लेख मिलता है।
तत्त्वार्थ सात हैं—जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष । सम्यग्दर्शनके विषय-
रूपसे इन सात तत्त्वार्थोंका प्रस्तुत सूत्र ग्रन्थमें विस्तारके साथ निरूपण किया गया है। मालूम पड़ता है कि
इसी कारणसे इसका तत्त्वार्थ यह नाम प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ है।
लोकमें इसका एक नाम तत्त्वार्थसूत्र भी प्रचलित है। इस नामका उल्लेख वीरसेन स्वामीने अपनी
धवला² नामकी प्रसिद्ध टीकामें किया है। सिद्धसेन गणि भी अपनी टीकामें कुछ अध्यायोंकी समाप्तिसूचक
पुष्पिकामें³ इस नामका उल्लेख करते हैं। इसमें जीवादि सात तत्त्वार्थोंका सूत्र शैलीमें विवेचन किया गया है
इससे इसका दूसरा नाम तत्त्वार्थसूत्र पड़ा जान पड़ता है। किन्तु पिछले नामसे इस नाममें सूत्र पद अधिक
होने से सम्भव है कि ये दोनों नाम एक ही हों। केवल प्रयोगकी सुविधाकी दृष्टिसे कहीं इसका केवल 'तत्त्वार्थ'
इस नामसे और कहीं 'तत्त्वार्थसूत्र' इस नामसे उल्लेख किया जाता रहा हो। किसी वस्तुका जो नाम होता
है उसके एकदेशका उल्लेख करके भी उस वस्तुका बोध करानेकी परिपाटी पुरानी है। बहुत सम्भव है कि
इसी कारण इसका 'तत्त्वार्थ' यह नाम भी प्रसिद्धिमें आया हो। सिद्धसेन गणिने⁴ इसका तत्त्वार्थसूत्र
१. 'दशाध्यायपरिच्छिन्ने तत्त्वार्थे पठिते सति फलं स्यादुपवासस्य भाषितं मुनिपुङ्गवैः ।' २. 'तह गिद्धपिंच्छा-
इरियप्पयासिदतच्चत्थसुत्ते विं वर्तनापरिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य' इति दव्वकालो परूविदो। जीव-
स्थानकालानुयोगद्वार पृ० ३१६ । ३. इति तत्त्वार्थसूत्रं भाष्यसंयुक्तं भाष्यानुसारिण्यां तत्त्वार्थटीकायां आस्रवप्रति-
पादनपरः षष्ठोऽध्यायः समाप्तः । ४. देखो सिद्धसेन गणि टीका अध्याय एक और छहको अन्तिम पुष्पिका।