सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 29

प्रस्तावना २५
नौवें अध्यायमें ऐसे छह स्थल हैं। प्रथम स्थल दस धर्मोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर
परम्परा 'उत्तम' पदको क्षमा आदिका विशेषण मानकर चलती है और श्वेताम्बर परम्परा धर्मका विशेषण
मानकर चलती है, फिर भी वह 'उत्तम', पदका पाठ 'धर्म' पदके साथ अन्तमें न करके सूत्रके प्रारम्भमें ही
करती है। दूसरा स्थल पाँच चारित्रोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'इति' पदको अधिक
स्वीकार करती है। तीसरा स्थल ध्यानका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें 'अन्तर्मुहूर्तात्' के स्थानमें श्वेताम्बर
परम्परा 'आ मुहूर्तात्' पाठ स्वीकार कर उसे स्वतन्त्र सूत्र मानती है। चौथा स्थल आर्तध्यानके प्रतिपादक
सूत्र हैं। इनमें श्वेताम्बर परम्पराने एक तो 'मनोज्ञस्य' और 'अमनोज्ञस्य' के स्थानमें बहुवचनान्त पाठ
स्वीकार किया है। दूसरे 'वेदनायाश्च' सूत्रको 'विपरीतं मनोज्ञस्य' के पहले रखा है। पांचवां स्थल धर्म-
ध्यानका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा 'अप्रमत्तसंयतस्य' इतना पाठ अधिक स्वीकार कर
'उपशान्तक्षीणकषाययोश्च' यह सूत्र स्वतन्त्र मानती है। छठवाँ स्थल 'एकाश्रये' इत्यादि सूत्र है। इसमें
'सवितर्कविचारे' के स्थानमें श्वेताम्बर परम्परा 'सवितर्के' पाठ स्वीकार करती है।
दसवें अध्यायमें ऐसे तीन स्थल हैं। प्रथम स्थल दूसरा सूत्र है। श्वेताम्बर परम्परा इसे दो सूत्र
मानकर चलती है। दूसरा स्थल तीसरा और चौथा सूत्र है। श्वेताम्बर परम्परा एक तो इन दो सूत्रोंको
एक मानती है। दूसरे 'भव्यत्वानाम्' के स्थानमें 'भव्यत्वाभावात्' पाठ स्वीकार करती है। तीसरा स्थल
'पूर्वप्रयोगात्' इत्यादि सूत्र है। इस सूत्रके अन्तमें श्वेताम्बर परम्परा 'तद्गतिः' इतना पाठ अधिक स्वीकार
करती है। तथा इस सूत्रके आगे कहे गये दो सूत्रोंको वह स्वीकार नहीं करती।
इन पाठ भेदोंके अतिरिक्त दसों अध्यायोंमें छोटे-मोटे और भी बहुतसे फरक हुए हैं जिनका विशेष
महत्त्व न होनेसे यहाँ हमने उनका उल्लेख नहीं किया है।
३. सूत्र पाठोंमें मतभेद—यहाँ हमने दिगम्बर और श्वेताम्बर परम्परामान्य जिस सूत्र पाठोंके
अन्तरका उल्लेख किया है वह सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्र पाठोंको ध्यानमें रखकर ही किया है।
यदि हम इन सूत्र पाठोंके भीतर जाते हैं तो हमें वह मतभेद और भी अधिक दिखाई देता है। फिर भी यह
बात सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्र पाठ पर लागू नहीं होती। सर्वार्थसिद्धिकारके सामने जो पाठ रहा है और उन्होंने
निर्णय करके जिसे सूत्रकारका माना है, उत्तरकालवर्ती सभी दिगम्बर टीकाकार प्रायः उसीको आधार मानकर
चले हैं। किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठकी स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है। हरिभद्रसूरि और सिद्धसेन
गणिने तत्त्वार्थभाष्यके आधारसे अपनी टीकाएँ लिखी अवश्य हैं और इन दोनों आचार्योने तत्त्वार्थभाष्यके
साथ तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्र पाठकी रक्षा करनेका भी प्रयत्न किया है। किन्तु उनके सामने ही सूत्र पाठमें
इतने अधिक पाठभेद और अर्थभेद हो गये थे जिनका उल्लेख करना उन्हें आवश्यक हो गया। उदाहरणके
लिए यहाँ हम पाँचवें अध्यायके 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' सूत्रको उपस्थित करते हैं। सिद्धसेन गणिने इस
सूत्रकी व्याख्या करते हुए अनेक मतभेदोंका उल्लेख किया है। उनके सामने इस सूत्रके जो प्रमुख मतभेद
थे वे इस प्रकार हैं—
१. एक पाठके अनुसार 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' एक सूत्र न होकर दो सूत्र हैं। प्रथम 'नित्या-
वस्थितानि' और दूसरा 'अरूपाणि'। धर्मादिक चार द्रव्य अरूपी हैं यह सिद्ध करनेके लिए 'अरूपाणि'
स्वतन्त्र सूत्र माना गया है।
२. दूसरे पाठके अनुसार 'नित्यावस्थितारूपाणि' सूत्र है। इसके अनुसार 'नित्यावस्थित-' पदके
अन्तमें स्वतन्त्र विभक्ति देनेकी कोई आवश्यकता नहीं। तीनों पद समसित होने चाहिए।
३. तीसरा मत है कि सूत्र तो 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' ही है। किन्तु इसमें 'नित्य' पद स्वतन्त्र
न होकर 'अवस्थित' पदका विशेषण है। इस मतके अनुसार प्रथम पदका 'नित्यं अवस्थितानि नित्यावस्थितानि'
यह विग्रह होगा।
४. इनके सिवा वहाँ दो मतोंका और उल्लेख किया है। किन्तु वे केवल अर्थविषयक ही मतभेद
हैं इसलिए उनकी यहाँ हमने अलगसे चर्चा नहीं की है।
प्रस्तावना-४
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri