सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 21

प्रस्तावना
'मैं कौन हूँ, मेरा स्वभाव क्या है, मैं कहाँ से आया हूँ, मुझे उपादेय क्या है और उसकी प्राप्ति किन
निमित्तोंके मिलने पर होती है ? जो मनुष्य इन बातोंका विचार नहीं करता वह अपने गन्तव्य स्थानको प्राप्त
करनेमें समर्थ नहीं होता।'
आचार्य वादीभसिंहने क्षत्रचूड़ामणिमें तत्त्वज्ञानके प्रसंगसे यह वचन कहा है। यह मनुष्यके कर्तव्यका
स्पष्ट बोध कराता है। कर्तव्यका विचार ही जीवनका सार है। जो तिर्यञ्च हैं वे भी अपने कर्तव्यका विचार
कर प्रवृत्ति करते हैं फिर मनुष्यकी तो कथा ही अलग है।
प्रत्येक प्राणीके जीवनमें हम ऐसे-ऐसे विलक्षण परिणमन देखते हैं जिनकी कल्पना भी नहीं की जा
सकती ? ऐसा क्यों होता है? क्या इसके लिए केवल बाह्य परिस्थिति ही एकमात्र कारण है? एक पिताके
दो बालक होते हैं। उनका एक प्रकारसे लालन-पालन होता है। एक पाठशालामें उन्हें शिक्षा मिलती है फिर
भी उनके शील-स्वभावमें विलक्षण अन्तर होता है। क्यों ? इसका शारीरिक रचनाके सिवा कोई अज्ञात
कारण अवश्य होना चाहिए। साधकोंने इस प्रश्नका गहरा मन्थन किया है। उत्तरस्वरूप उन्होंने विश्वको
यही अनुभव दिया है कि पुराकृत कर्मोंके कारण प्राणियोंके जीवनमें इस प्रकारकी विविधता दिखाई देती है।
विश्वकी विविधताका अवलोकन कर उन्होंने कहा है कि इस प्राणीकी प्रथम अवस्था निगोद है।
अनादि कालसे यह प्राणी इस अवस्थाका पात्र बना हुआ है। विस्तृत बालुकाराशिमें गिरे हुए वज्र सिकताकण
का मिलना जितना दुर्लभ है, इस पर्यायसे निकल कर अन्य पर्यायका प्राप्त होना उतना ही दुर्लभ है। अन्य
पर्यायोंकी भी कोई गिनती नहीं। उनमें परिभ्रमण करते हुए इसका पञ्चेन्द्रिय होना इतना दुर्लभ है जितना
कि अन्य सब गुणोंके प्राप्त हो जाने पर भी मनुष्यको कृतज्ञता गुणका प्राप्त होना दुर्लभ है। यदि यह पञ्चे-
न्द्रिय भी हो जाता है तो भी इससे इसका विशेष लाभ नहीं, क्योंकि एक मनुष्य पर्याय ही वह अवस्था है
जिसे प्राप्त कर यह अपनी उन्नतिके सब साधन जुटा सकता है। किन्तु इसका प्राप्त होना बहुत ही कठिन है।
एक दृष्टान्त द्वारा साधकोंने इसे इन शब्दोंमें व्यक्त किया है। वे कहते हैं कि जिस प्रकार किसी चौपथ पर
रखी हुई रत्नराशिका मिलना दुर्लभ है उसी प्रकार अन्य पर्यायोंमें परिभ्रमण करते हुए इसे मनुष्य पर्यायका
मिलना दुर्लभ है। कदाचित् इसे मनुष्य पर्याय भी मिल जाती है तो भी उसे प्राप्त कर अपने कर्तव्याकर्तव्यके
बोध द्वारा कर्तव्यके मार्गका अनुसरण करना और भी दुर्लभ है।
मनुष्य होने पर यह प्राणी नहीं मालूम कितनी ममताओंमें उलझा रहता है। कभी यह पुत्र, स्त्री
और घर-द्वारकी चिन्ता करता है तो कभी अपनी मानप्रतिष्ठाकी चिन्तामें काल यापन करता है। स्वरूप
'सम्बोधन की ओर इसका मन यत्किञ्चित् भी आकर्षित नहीं होता। जो इसका नहीं उसकी तो चिन्ता करता
है और जो इसका है उसकी ओर आँख उठाकर देखता भी नहीं। फल यह होता है कि यह न केवल परम
दुर्लभ इस मनुष्य पर्यायको गवाँ बैठता है अपितु सम्यक् कर्तव्यका बोध न होनेसे इसे पुनः अनन्त यातनाओंका
पात्र बनना पड़ता है।
इस स्थितिसे इस प्राणीका उद्धार कैसे हो, इस प्रश्नके समाधान स्वरूप साधकोंने अनेक मार्ग दरसाये
हैं उनमें सम्यक् श्रुतका अध्ययन मुख्य है। श्रुत दो प्रकारका है—एक वह जो ऐहिक इच्छाओंकी पूर्तिका
मार्गदर्शन करता है और दूसरा वह जो विषय और कषायके मार्गको अनुपादेय बतला कर आत्महितके मार्गमें
लगाता है। आत्माका हित क्या है? इस प्रश्नका उत्तर यदि हमें संक्षेपमें प्राप्त करना है तो यही कहा जा
प्रस्तावना-३