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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 558 में से

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पृष्ठ 22

१८ सर्वार्थसिद्धि
सकता है कि 'मोक्ष' । अतएव मोक्षप्राप्तिके साधनोंका जिसमें सम्यक् प्रकारसे ऊहापोह किया गया है वही
शास्त्र सम्यक् श्रुत कहलानेकी पात्रता रखता है ।
इस दृष्टिसे जब हम प्राचीन साहित्यको देखते हैं तो सर्वप्रथम हमारी दृष्टि अङ्गश्रुत पर जाती है ।
इसका सीधा सम्बन्ध भगवान् महावीरकी वाणीसे है । ऐसी मान्यता है कि जितने भी तीर्थङ्कर होते हैं वे
अर्थका उपदेश देते हैं और उनके प्रमुख शिष्य, जिन्हें कि गणधर कहते हैं, ग्रन्थ रूपमें अङ्गश्रुतकी रचना
करते हैं । यह मुख्य रूपसे बारह आरों—विभागोंमें विभक्त होनेके कारण इसे द्वादशार कहते हैं और संघके
मुख्य अधिपति गणधरों—गणियोंके द्वारा इसकी रचना की जानेसे इसका दूसरा नाम गणिपिटक भी है ।
भगवान् महावीरके मोक्ष जानेके बाद तीन अनुबद्ध केवली और पाँच श्रुतकेवली हुए हैं । इनमें
अन्तिम श्रुतकेवली भद्रबाहु थे । इन तक यह अङ्गश्रुत अपने मूलरूपमें आया है । इसके बाद उत्तरोत्तर
बुद्धिबल और धारणाशक्तिके क्षीण होते जानेसे तथा पुस्तकारूढ़ किये जानेकी परिपाटी न होने से क्रमशः वह
विच्छिन्न होता गया है । इस प्रकार एक ओर जहाँ अंगश्रुतका अभाव होता जा रहा था वहाँ दूसरी ओर
श्रुतपरम्पराको अविच्छिन्न बनाये रखनेके लिए और उसका सीधा सम्बन्ध भगवान् महावीरकी वाणीसे बनाये
रखनेके लिए प्रयत्न भी होते रहे हैं । अंगश्रुतके बाद दूसरा स्थान अनंगश्रुतको मिलता है । इसको अंगबाह्य
भी कहते हैं । इसके मूल भेद ये हैं—सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वन्दना, प्रतिक्रमण, वैनयिक, कृतिकर्म,
दशवैकालिक, उत्तराध्ययन, कल्पव्यवहार, कल्प्याकल्प्य, महाकल्प, पुण्डरीक, महापुण्डरीक और निषिद्धिका ।
इनमेंसे सर्वार्थसिद्धिमें उत्तराध्ययन और दशवैकालिक केवल इन दो का ही उल्लेख किया है । श्री धवला टीकाके
आधारसे विदित होता है कि इनकी रचना भी गणधरोंने ही की थी और अंगश्रुतके अस्तित्वकालमें ये उपस्थित
थे । किन्तु धीरे-धीरे अंगश्रुतके समान इनको भी धारण करनेकी शक्तिवाले श्रमणोंके न रहनेसे इनका भी
अभाव होता गया । फल यह हुआ कि एक प्रकारसे हम मूलश्रुतसे सर्वथा वंचित हो गये । श्वेताम्बर
परम्परामें जो आचारांग आदि अंगश्रुत और उत्तराध्ययन आदि अनंगश्रुत उपलब्ध होता है । वह विक्रम पाँचवीं
शताब्दिके बादका संकलन है इसलिए वह मूलश्रुतकी दृष्टिसे विश्वास योग्य नहीं माना जा सकता । इस प्रकार
अंगश्रुत और अंगबाह्यश्रुतके विच्छिन्न होनेमें कुल ६८३ वर्ष लगे हैं ।
किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उत्तरकालमें भगवान् महावीरकी वाणीका कहिए या द्वादशांग वाणीका
कहिए वारसा हमें किसी रूपमें मिला ही नहीं । भद्रबाहु श्रुतकेवलीके कालमें ही जैन परम्परा दो भागोंमें
विभाजित हो गयी थी । पहली परम्परा जो भगवान् महावीर और उनके पूर्ववर्ती तीर्थङ्करोंके आचारंको
बिना किसी प्रकारके संशोधनके ग्राह्य मानती रही वह उस समय दिगम्बर परम्परा या मूल संघके नामसे
प्रसिद्ध हुई और जिसने परिस्थितिवश संशोधन कर उसमें नये आचारका प्रवेश किया वह श्वेताम्बर परम्पराके
नामसे प्रसिद्ध हुई । इस कारण मूल अंगश्रुत और अनंगश्रुतको तो लिपिबद्ध नहीं किया जा सका किन्तु काला-
न्तरमें ऐसे आचार्य हुए हैं जिन्होंने अङ्गश्रुतके आश्रयसे श्रुतकी रक्षा करनेका प्रयत्न किया है । षट्खण्डागम
और कषायप्राभृतकी रचना उन प्रयत्नोंमेंसे सर्वप्रथम है । आचार्य कुन्दकुन्द लगभग उसी समय हुए हैं जिन्होंने
अपनी आध्यात्मिक शैली द्वारा जीवादि तत्त्वोंका और मोक्षमार्गके अनुरूप आचारका विचार करते हुए न
केवल तीर्थङ्करोंके स्वावलम्बी मार्गकी रक्षा करनेका प्रयत्न किया है अपितु उसमें बहुत कुछ अंशमें स्थिरता
भी लायी है । इस तरह आरातीय आचार्यों द्वारा मूल श्रुतके अनुरूप श्रुतका निर्माण कर उसकी रक्षाके
अनेक प्रयत्न हुए हैं । अखिल जैन परम्परामें रचनाकी दृष्टिसे जिस श्रुतकी सर्वप्रथम गणना की जा सकती है
उसका संक्षेपमें विवरण इस प्रकार है—
ग्रन्थ नाम कर्त्ता रचनाकाल
षट्खण्डागम आ० पुष्पदन्त भूतबलि विक्रमकी दूसरी शताब्दि या इसके पूर्व
कषायप्राभृत आ० गुणधर ,, ,, समकालीन