सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ सर्वार्थसिद्धि
द्रव्यके अस्तित्वमें मतभेद स्वीकार करती है। समस्त श्वेताम्बर आगम साहित्यमें काल द्रव्यके स्थानमें
'अद्धासमय' का उल्लेख किया है और इसे प्रदेशात्मक द्रव्य न मान कर पर्याय द्रव्य स्वीकार किया है।
छठवाँ स्थल परिणामका प्रतिपादक सूत्र है। दिगम्बर परम्परा 'तद्भावः परिणामः' केवल इस सूत्रको स्वीकार
करती है किन्तु श्वेताम्बर परम्परा इसके साथ तीन अन्य सूत्र स्वीकार करती है।
छठे अध्यायमें ऐसे दस स्थल हैं। प्रथम स्थल दूसरा सूत्र है। इसे दिगम्बर परम्परा एक और
श्वेताम्बर परम्परा दो सूत्र मानती है। दूसरा स्थल 'इन्द्रियकषायाव्रतक्रियाः' इत्यादि सूत्र है। दिगम्बर
परम्पराने इसे इसी रूपमें स्वीकार किया है किन्तु श्वेताम्बर परम्परा इसके स्थानमें 'अव्रतकषायेन्द्रियक्रियाः'
यह पाठ स्वीकार करती है। तीसरा स्थल सातावेदनीयके आस्रवका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर
परम्परा 'भूतव्रतत्यनुकम्पাদানसरागसंयमादियोगः' इस पाठको स्वीकार करती है। किन्तु श्वेताम्बर परम्परा
इसके स्थानमें 'भूतव्रत्यनुकम्पा दानं सरागसंयमादि योगः' ऐसा पाठ स्वीकार करती है। चौथा स्थल चारित्र-
मोहके आस्रवका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा 'तीव्र' पदके बाद 'आत्म' पदको अधिक स्वीकार
करती है। पाँचवाँ स्थल नरकायुके आस्रवका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा मध्यमें 'च' पदको
अधिक स्वीकार करती है। छठा स्थल मनुष्यायुके आस्रवके प्रतिपादक दो सूत्र हैं। इन्हें दिगम्बर परम्परा
दो सूत्र मानती है। किन्तु श्वेताम्बर परम्परा उन दोनोंको एक मानकर चलती है। इतना ही नहीं किन्तु वह
'स्वभावमार्दवं' के स्थानमें 'स्वभावमार्दवार्जवं' पाठ स्वीकार करती है। सातवाँ स्थल देवायुके आस्रवके प्रति-
पादक सूत्र हैं। इन सूत्रोंमें दिगम्बर परम्पराने 'सम्यक्त्वं च' सूत्रका स्वतन्त्र अस्तित्व स्वीकार किया है किन्तु
श्वेताम्बर परम्परा इसे सूत्र रूपमें स्वीकार करनेसे हिचकिचाती है। आठवाँ स्थल शुभ नामके आस्रवका प्रति-
पादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'तत्' पदको अधिक स्वीकार करती है। नौवाँ स्थल तीर्थङ्कर प्रकृतिके
आस्रवका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा 'साधुसमाधिः'के स्थानमें 'संघसाधुसमाधिः' पाठ
स्वीकार करती है। दसवाँ स्थल उच्चगोत्रके आस्रवका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें 'तद्विपर्ययौ' के स्थानमें
श्वेताम्बर परम्परा 'तद्विपर्ययो' पाठ स्वीकार करती है।
सातवें अध्यायमें ऐसे छह स्थल हैं। प्रथम स्थल पाँच व्रतोंकी पाँच-पाँच भावनाओंके प्रतिपादक पाँच
सूत्र हैं। इन्हें दिगम्बर परम्परा सूत्ररूपमें स्वीकार करती है और श्वेताम्बर परम्परा नहीं। दूसरा स्थल
'हिंसादिष्विहामुत्र' सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा 'अमुत्र' पदके बाद 'च' पदको अधिक स्वीकार करती
है। तीसरा स्थल 'मैत्री-' इत्यादि सूत्र है। इसके मध्यमें दिगम्बर परम्परा 'च' पद अधिक स्वीकार करती
है। चौथा स्थल 'जगत्काय-' इत्यादि सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'वा' पाठको और श्वेताम्बर परम्परा
'च' पाठको स्वीकार करती है। पाँचवाँ स्थल सात शीलोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा
'प्रोषधोपवास' पाठको और श्वेताम्बर परम्परा 'पौषधोपवास' पाठको स्वीकार करती है। छठा स्थल अहिं-
साणुव्रतके पाँच अतीचारोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें 'छेद'के स्थानमें श्वेताम्बर पाठ 'सविच्छेद' है।
आठवें अध्यायमें ऐसे छह स्थल हैं। प्रथम स्थल दूसरा सूत्र है। श्वेताम्बर परम्परा इसे दो सूत्र
मानकर चलती है। दूसरा स्थल ज्ञानावरणके पाँच भेदोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा
ज्ञानके पाँच भेदोंका नाम निर्देश करती है किन्तु श्वेताम्बर परम्परा 'मत्यादीनाम्' इतना कहकर ही छोड़
देती है। तीसरा स्थल दर्शनावरणके नामोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें श्वेताम्बर परम्परा पाँच निद्राओंके
नामोंके साथ 'वेदनीय' पद अधिक जोड़ती है। चौथा स्थल मोहनीयके नामोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें
नामोंके क्रमके प्रतिपादनमें दोनों परम्पराओंने अलग-अलग सरणी स्वीकार की है। पाँचवें अन्तरायके नामों-
का प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा पाँच नामोंका निर्देश करती है और श्वेताम्बर परम्परा
'दानादीनाम्' इतना कहकर छोड़ देती है। छठा स्थल पुण्य और पाप प्रकृतियोंके प्रतिपादक दो सूत्र हैं।
यहाँ श्वेताम्बर परम्पराने एक तो पुण्य प्रकृतियोंमें सम्यक्त्व, हास्य, रति और पुरुषवेद इनकी भी परिगणना
की है। दूसरे पापप्रकृतियोंका प्रतिपादक सूत्र नहीं कहा है।