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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 558 में से

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पृष्ठ 26

२२ सर्वार्थसिद्धि
था, इसका विचार यथास्थान हम आगे करेंगे। यहाँ इन दोनों सूत्रपाठोंका सामान्य परिचय कराना मुख्य
प्रयोजन है।
दिगम्बर परम्पराके अनुसार दसों अध्यायोंकी सूत्र संख्या इस प्रकार है-
३३ + ५३ + ३९ + ४२ + ४२ + २७ + ३९ + २६ + ४७ + ९ = ३५७ ।
श्वेताम्बर परम्पराके अनुसार दसों अध्यायोंकी सूत्र संख्या इस प्रकार है-
३५ + ५२ + १८ + ५३ + ४४ + २६ + ३४ + २६ + ४९ + ७ = ३४४ ।
प्रथम अध्यायमें ऐसे पाँच स्थल मुख्य हैं जहाँ दोनों सूत्र पाठोंमें मौलिक अन्तर दिखाई देता है। प्रथम
स्थल मतिज्ञानके चार भेदोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'अवाय' पाठको और श्वेताम्बर
परम्परा 'अपाय' पाठको स्वीकार करती है। प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी श्वेताम्बर परम्परामान्य तत्त्वार्थसूत्रका
विवेचन करते हुए भी मुख्यरूपसे 'अवाय' पाठको ही स्वीकार करते हैं। दूसरा स्थल मतिज्ञानके विषयभूत
१२ पदार्थोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा क्षिप्रके बाद 'अनिस्सृतानुक्त-' पाठको और श्वेताम्बर
परम्परा 'अनिश्श्रितासन्दिग्ध-' पाठको स्वीकार करती है। यहाँ पाठ भेदके कारण अर्थभेद स्पष्ट है। तीसरा
स्थल 'द्विविधोऽवधिः' सूत्र है। इसे श्वेताम्बर परम्परा सूत्र मानती है जब कि सर्वार्थसिद्धिमें यह 'भव-
प्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्' सूत्रकी उत्थानिकाका अंश है। चौथा स्थल अवधिज्ञानके द्वितीय भेदका प्रतिपादक
सूत्र है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'क्षयोपशमनिमित्तः' पाठको और श्वेताम्बर परम्परा 'यथोक्तनिमित्तः' पाठको
स्वीकार करती है। पाँचवाँ स्थल सात नयोंका प्रतिपादक सूत्र है। यहाँ दिगम्बर परम्परा सातों नयोंको मूल
मानकर उनका समान रूपसे उल्लेख करती है। किन्तु श्वेताम्बर परम्परा मूल नय पाँच मानती है और नैगम
व शब्दनयके क्रमशः दो व तीन भेदोंका स्वतन्त्र सूत्र द्वारा उल्लेख करती है। साधारणतः दिगम्बर और
श्वेताम्बर परम्परामें मूल नय सात माने गये हैं और आगम साहित्यमें इनका मूल नयके रूपमें उल्लेख भी
किया है। पर जहाँ नामादि निक्षेपोंमेंसे कौन नय किस निक्षेपको स्वीकार करता है इसका विचार किया
जाता है वहाँ बहुधा नैगमादि पाँच नयोंका १ भी उल्लेख किया जाता है। बहुत सम्भव है कि इस परिपाटीको
देखकर वाचक उमास्वातिने पाँच नय मूल माने हों तो कोई आश्चर्य नहीं।
दूसरे अध्यायमें ऐसे नौ स्थल हैं। प्रथम स्थल पारिणामिक भावोंका प्रतिपादक सूत्र है। इसमें
पारिणामिक भावके तीन नाम गिनानेके बाद श्वेताम्बर परम्परा आदि पदको स्वीकार करती है जब कि
दिगम्बर परम्परा इसे स्वीकार नहीं करती। यहाँ जीवका स्वतत्त्व क्या है यह बतलाते हुए पारिणामिक
भावोंका उल्लेख किया है। दिगम्बर परम्परा अन्य द्रव्य साधारण पारिणामिक भावोंकी यहाँ मुख्य रूपसे
गणना नहीं करती और श्वेताम्बर परम्परा करती है यही यहाँ उसके आदि पद देनेका प्रयोजन है। दूसरा
स्थल स्थावरकायिक जीवोंके भेदोंका प्रतिपादक सूत्र है। आगमिक परिपाटीके अनुसार स्थावरोंके पाँच भेद
दोनों परम्पराएँ स्वीकार करती हैं और दिगम्बर परम्परा इसी परिपाटीके अनुसार यहाँ पाँच भेद स्वीकार
करती है। किन्तु श्वेताम्बर परम्पराने अग्निकायिक और वायुकायिक जीवोंको गतिन्त्रस मानकर इनका
उल्लेख त्रसोंके साथ किया है। इस कारण कई सूत्रोंकी रचनामें अन्तर आया है। तीसरा स्थल 'उपयोगः
स्पर्शादिषु' सूत्र है। श्वेताम्बर परम्परा इसे स्वतन्त्र सूत्र मानती है जब कि दिगम्बर परम्परा इसे सूत्र रूपसे
स्वीकार नहीं करती। उसके मतसे उपयोगके विषयका अलगसे प्रतिपादन करना वांछनीय नहीं, क्योंकि
प्रत्येक ज्ञानका विषय प्रथम अध्यायमें दिखा आये हैं। चौथा स्थल 'एकसमयाऽविग्रहा' सूत्र है। गतिका
प्रकरण होनेसे दिगम्बर परम्परा इस सूत्रको इसी रूपमें स्वीकार करती है किन्तु श्वेताम्बर परम्परा एक समय-
को विशेष्य मानकर यहाँ पुल्लिंग एक वचनान्तका प्रयोग करती है। पाँचवाँ स्थल जन्मका प्रतिपादक सूत्र
है। इसमें दिगम्बर परम्परा 'पोत' पदको और श्वेताम्बर परम्परा 'पोतज' पदको स्वीकार करती है। छठा
स्थल 'तैजसमपि' सूत्र है। इसे दिगम्बर परम्परा सूत्र मानती है और श्वेताम्बर परम्परा नहीं मानती। यहाँ
१. देखो, धवला पुस्तक १२ वेदनाप्रत्ययविधान नामक अधिकार। देखो, कषायप्राभृत प्र० पुस्तक परिशिष्ट पृष्ठ ७।