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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 558 में से

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पृष्ठ 23

प्रस्तावना १९
कषायप्राभृत की चूर्णि आ० यतिवृषभ¹ आचार्य गुणधरके कुछ काल बाद
समयप्राभृत, प्रवचनसारप्राभृत आ० कुन्दकुन्द² विक्रमकी पहली दूसरी शताब्दि
पञ्चास्तिकायप्राभृत व अष्ट-
प्राभृत
मूलाचार ( आचारांग ) आ० वट्टकेर आ० कुन्दकुन्दके समकालीन
मूलाराधना आ० शिवार्य " "
तत्त्वार्थसूत्र आ० गृद्धपिच्छ आ० कुन्दकुन्दके समकालीन या कुछ
काल बाद
इसके बाद भी श्रुतरक्षाके अनेक प्रयत्न हुए हैं । श्वेताम्बर अंगश्रुतका संकलन उन प्रयत्नोंमें से एक
है। यह विक्रमकी ६वीं शताब्दिमें संकलित होकर पुस्तकारूढ़ हुआ था ।
१ तत्त्वार्थसूत्र
इनमेंसे प्रकृतमें तत्त्वार्थसूत्रका विचार करना है। यह जैन दर्शनका प्रमुख ग्रन्थ है। इसमें जैनाचार
और जैन तत्त्वज्ञानके सभी पहलुओं पर सूत्र शैलीमें विचार किया गया है। यह सुनिश्चित है कि जैन आगम-
श्रुतकी मुख्य भाषा प्राकृत रही है तथा इसके आधारसे आरातीय आचायोंने जो अंगबाह्य श्रुत लिपिबद्ध
किया है वह भी प्रायः प्राकृत भाषामें ही लिखा गया है। प्राकृत भाषाके जो विविध स्थित्यन्तर उपलब्ध होते
हैं उनसे इस बातकी पुष्टि होती है कि यह भगवान् महावीर और उनके आगे-पीछे बहुत काल तक बोल-
चालकी भाषा रही हैं। पाली, जिसमें कि प्राचीन महत्त्वपूर्ण बौद्ध साहित्य उपलब्ध होता है, प्राकृतका ही
१. इनके समयके विषयमें बड़ा विवाद है। वीरसेन स्वामीने इन्हें वाचक आर्यमंक्षु और नागहस्तिका
शिष्य लिखा है। इन दोनोंका श्वेताम्बर पट्टावलियोंमें उल्लेख आता है। सम्भवतः ये और श्वेताम्बर
परम्परामें उल्लिखित आर्यमंक्षु और नागहस्ति अभिन्न व्यक्ति हैं और वे ही आ० यतिवृषभके गुरु प्रतीत होते
हैं। जीवस्थान क्षेत्रप्रमाणानुगमकी धवला टीकामें आचार्य वीरसेनने जिस तिलोयपण्णत्तिका उल्लेख किया है
वह वर्त्तमान तिलोयपण्णत्तिसे भिन्न ग्रन्थ है। यह हो सकता है कि वर्तमान तिलोयपण्णत्तिमें उसका कुछ भाग
सम्मिलित कर लिया गया हो पर इससे दोनोंकी अभिन्नता सिद्ध नहीं होती । पण्डित जुगलकिशोरजी मुख्तारने
पुरातन जैन वाक्यसूची की प्रस्तावनामें जैनसिद्धान्त भास्करके एक अंकमें प्रकाशित मेरे लेखका खण्डन करते
हुए जो वर्तमान तिलोयपण्णत्तिकी प्राचीन तिलोयपण्णत्तिसे अभिन्नता सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है वह उनका
उचित प्रयत्न नहीं कहां जा सकता, क्योंकि वर्तमान तिलोयपण्णत्तिमें लोकके जिस आकारकी चर्चा की गयी
है उसका प्राचीन तिलोयपण्णत्तिमें उल्लेख नहीं है और इस आधारसे यह मानना सर्वथा उचित प्रतीत होता
है कि वर्तमान तिलोयपण्णत्तिके आधारसे जो राजकाल गणनाके बाद आचार्य यतिवृषभकी स्थिति मानी जाती
है वह भी उचित नहीं है। इसके लिए पहले यह सिद्ध करना होगा कि इस राजकाल गणनाका उल्लेख
प्राचीन तिलोयपण्णत्तिमें भी पाया जाता है तभी यह मान्यता समीचीन ठहर सकेगी कि आचार्य यतिवृषभ
महावीर संवत्से हजार वर्ष बाद हुए हैं। तत्काल धवलाके उल्लेखके अनुसार आचार्य यतिवृषभको महा-
वाचक आर्यमंक्षु और नागहस्तिका शिष्य होनेके नाते उन्हें उस समयका ही मानना चाहिए जिस समय उन
दो महान् आचायोंने इस भूमण्डलको अलंकृत किया था । २. इन्द्रनन्दिने अपने श्रुतावतारमें षट्खण्डागम पर
आ० कुन्दकुन्दकी टीकाका भी उल्लेख किया है। इस आधारसे षट्खण्डागमका रचनाकाल प्रथम शताब्दिसे
भी पूर्व ठहरता है। अधिकतर विचारक ६८३ वर्षकी परम्पराके बाद इन ग्रन्थोंको स्थान देते हैं किन्तु मेरे
विचारसे श्रुतकी परम्परा किस क्रमसे आई इतना मात्र दिखाना उसका प्रयोजन है। षट्खण्डागम आदिके
रचयिता ६८३ वर्ष पूर्व हुए हों तो इसमें कोई प्रत्यवाय नहीं है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri