सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 117, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 117
- १।१ § ८ ] प्रथमोऽध्यायः ५
ज्ञानम् । चरति चर्यतेऽनेन चरणमात्रं वा चारित्रम् । नन्वेवं स एव कर्ता स एव करणमित्यायातम् ।
तच्च विरुद्धम् । सत्यं, स्वपरिणामपरिणामिनोर्भेदविवक्षायां तथाभिधानात् । यथाग्निर्दहतीन्धनं
दाहपरिणामेन । उक्तः कर्त्रादिसाधनभावः पर्यायपर्यायिणोरेकत्वानेकत्वं प्रत्यनेकान्तोपपत्तौ
स्वातन्त्र्यपारतन्त्र्यविवक्षोपपत्तेरेकस्मिन्नप्यर्थे न विरुध्यते । अग्नौ दहनादिक्रियायाः कर्त्रादिसाधन-
भाववत् । ५
§ ७. ज्ञानग्रहणमादौ न्याय्यं, दर्शनस्य तत्पूर्वकत्वात् अल्पाच्तरत्वाच्च । नैतद्युक्तं, युग-
पदुत्पत्तेः । यदास्य दर्शनमोहस्योपशमात्क्षयात्क्षयोपशमाद्वा आत्मा सम्यग्दर्शनपर्यायेणाविर्भवति
तदैव तस्य मत्यज्ञानश्रुताज्ञाननिवृत्तिपूर्वकं मतिज्ञानं श्रुतज्ञानं चाविर्भवति घनपटलबिगमे सवितुः
प्रतापप्रकाशाभिव्यक्तिवत् । अल्पाच्तरादभ्यर्हितं पूर्वं निपतति । कथमभ्यर्हितत्वम् । ज्ञानस्य
सम्यग्व्यपदेशहेतुत्वात् । चारित्रात्पूर्वं ज्ञानं प्रयुक्तं, तत्पूर्वकत्वाच्चारित्रस्य । १०
§ ८. सर्वकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः । तत्प्राप्त्युपायो मार्गः । मार्ग इति चैकवचननिर्देशः
ज्ञान शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—जानाति ज्ञायते अनेन ज्ञप्तिमात्रं वा ज्ञानम् = जो जानता है,
जिसके द्वारा जाना जाय या जानना मात्र । चारित्र शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—चरति चर्यतेऽ-
नेन चरणमात्रं वा चारित्रम् = जो आचरण करता है, जिसके द्वारा आचरण किया जाय या
आचरण करना मात्र । शंका—दर्शन आदि शब्दोंकी इस प्रकार व्युत्पत्ति करने पर कर्त्ता और १५
करण एक हो जाता है किन्तु यह बात विरुद्ध है ? समाधान—यद्यपि यह कहना सही है तथापि
स्वपरिणाम और परिणामीमें भेदकी विवक्षा होनेपर उक्त प्रकारसे कथन किया गया है। जैसे
'अग्नि दाह परिणामके द्वारा ईंधनको जलाती है, यह कथनभेद विवक्षाके होनेपर ही बनता है।
यहाँ चूँकि पर्याय और पर्यायीमें एकत्व और अनेकत्वके प्रति अनेकान्त है, अतः स्वातन्त्र्य और
पारतन्त्र्य विवक्षाके होनेसे एक ही पदार्थमें पूर्वोक्त कर्त्ता आदि साधनभाव विरोधको प्राप्त नहीं २०
होता । जैसे कि अग्निमें दहन आदि क्रियाकी अपेक्षा कर्त्ता आदि साधनभाव बन जाता है, वैसे ही
प्रकृतमें जानना चाहिए।
§ ७. शंका—सूत्रमें पहले ज्ञानका ग्रहण करना उचित है, क्योंकि एक तो दर्शन ज्ञानपूर्वक
होता है और दूसरे ज्ञानमें दर्शन शब्दकी अपेक्षा कम अक्षर हैं ? समाधान—यह कहना युक्त नहीं
कि दर्शन ज्ञानपूर्वक होता है इसलिए सूत्रमें ज्ञानको पहले ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि दर्शन २५
और ज्ञान एक साथ उत्पन्न होते हैं। जैसे मेघ-पटलके दूर हो जाने पर सूर्यके प्रताप और
प्रकाश एक साथ व्यक्त होते हैं, उसी प्रकार जिस समय दर्शनमोहनीयका उपशम, क्षय और
क्षयोपशम होनेसे आत्माकी सम्यग्दर्शन पर्याय व्यक्त होती है उसी समय उसके मत्यज्ञान और
श्रुताज्ञानका निराकरण होकर मतिज्ञान और श्रुतज्ञान प्रकट होते हैं। अब जो यह कहा गया
है कि दर्शनकी अपेक्षा ज्ञानमें कम अक्षर हैं अतः उसे सूत्रमें सर्वप्रथम ग्रहण करना चाहिए ३०
सो यह कहना भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा नियम है कि सूत्रमें अल्प अक्षरवाले शब्दसे पूज्य
शब्द पहले रखा जाता है, अतः पहले ज्ञान शब्दको न रखकर दर्शन शब्दको रखा है।
शंका—सम्यग्दर्शन पूज्य क्यों है ? समाधान—क्योंकि सम्यग्दर्शनसे ज्ञानमें समीचीनता आती है ।
चारित्रके पहले ज्ञानका प्रयोग किया है, क्योंकि चारित्र ज्ञानपूर्वक होता है।
§ ८. सब कर्मोंका जुदा होना मोक्ष है और उसकी प्राप्तिका उपाय मार्ग है। सूत्रमें 'मार्गः' ३५
१. -रित्रम् । उक्तः कर्त्रा-आ०, ता० न० । २. कर्त्रादिभिः सा मु० । ३. 'अल्पाच्तरम् ।' -पा० २।२।३४ ।
४. -टलविरामे स-आ०, अ०, दि० १, दि० २ । ५. 'अभ्यर्हितं च पूर्वं निपततीति ।'-पा० म० सा०
२।२।२।३४ ।