सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- १२ § १२ ] प्रथमोऽध्यायः ७
इत्यर्थो निश्चीयत इति यावत् । तत्त्वेनार्थस्तत्त्वार्थः । अथवा भावेन भाववतोऽभिधाम्, तदव्य-
तिरेकात् । तत्त्वमेवार्थस्तत्त्वार्थः । तत्त्वार्थस्य श्रद्धानं तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनं प्रत्येत्तव्यम् ।
तत्त्वार्थश्च वक्ष्यमाणो जीवादिः ।
§ ११. दृशेरालोकार्थत्वात् श्रद्धानार्थगतिर्नोपपद्यते । धातूनामनेकार्थत्वाददोषः । प्रसिद्धार्थ- ५
त्यागः कुत इति चेन्मोक्षमार्गप्रकरणात् । तत्त्वार्थश्रद्धानं ह्यात्मपरिणामो मोक्षसाधनं युज्यते,
भव्यजीवविषयत्वात् । आलोकस्तु चक्षुरादिनिमित्तः सर्वसंसारिजीवसाधारणत्वान्न मोक्षमार्गो
युक्तः ।
§ १२. अर्थश्रद्धानमिति चेत्सर्वार्थप्रसङ्गः । तत्त्वश्रद्धानमिति चेद्भावमात्रप्रसङ्गः । 'सत्ता-
द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादि तत्त्वम्' इति कैश्चित्कल्यत इति । तत्त्वमेकत्वमिति वा सर्वैक्यग्रहण-
प्रसङ्गः । 'पुरुष एवेदं सर्वम्' इत्यादि कैश्चित्कल्यत इति । एवं सति दृष्टेष्टविरोधः । तस्माद्व्य- १०
भिचारार्थमुभयोपादानम् । तद् द्विविधं, सरागवीतरागविषयभेदात् प्रशमसंवेगानुकम्पास्तिक्याद्य-
भिव्यक्तिलक्षणं प्रथमम् । आत्मविशुद्धिमात्रमितरत् ।
यही यहाँ तत्त्व शब्दका अर्थ है । अर्थ शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है-अर्थते निश्चीयते इत्यर्थः =
जो निश्चय किया जाता है । यहाँ तत्त्व और अर्थ इन दोनों शब्दोंके संयोगसे तत्त्वार्थ शब्द बना
है जो 'तत्त्वेन अर्थस्तत्त्वार्थः' ऐसा समास करने पर प्राप्त होता है । अथवा भाव-द्वारा भाववाले १५
पदार्थका कथन किया जाता है, क्योंकि भाव भाववाले से अलग नहीं पाया जाता । ऐसी हालतमें
इसका समास होगा 'तत्त्वमेव अर्थः तत्त्वार्थः' ।
§ ११. शंका-दर्शन शब्द 'दृशि' धातुसे बना है जिसका अर्थ आलोक है, अतः इससे
श्रद्धानरूप अर्थका ज्ञान नहीं हो सकता है ? समाधान-धातुओंके अनेक अर्थ होते हैं, अतः 'दृशि'
धातुका श्रद्धान रूप अर्थ करने में कोई दोष नहीं है । शंका-यहाँ 'दृशि' धातुका प्रसिद्ध अर्थ २०
क्यों छोड़ दिया है ? समाधान-मोक्षमार्गका प्रकरण होने से । तत्त्वार्थोंका श्रद्धानरूप जो आत्मा-
का परिणाम होता है वह तो मोक्षका साधन बन जाता है, क्योंकि वह भव्योंके ही पाया जाता
है, किन्तु आलोक चक्षु आदिके निमित्तसे होता है जो साधारण रूपसे सब संसारी जीवोंके
पाया जाता है अतः उसे मोक्षमार्ग मानना युक्त नहीं ।
§ १२. शंका-सूत्रमें 'तत्त्वार्थश्रद्धानम्' के स्थानमें 'अर्थश्रद्धानम्' इतना कहना पर्याप्त है ? २५
समाधान-इससे अर्थ शब्दके धन, प्रयोजन और अभिधेय आदि जितने भी अर्थ हैं उन सबके
ग्रहणका प्रसंग आता है जो युक्त नहीं है, अतः 'अर्थश्रद्धानम्' केवल इतना नहीं कहा है । शंका-
तब 'तत्त्वश्रद्धानम्' इतना ही ग्रहण करना चाहिए ? समाधान - इससे केवल भाव मात्रके ग्रहणका
प्रसंग प्राप्त होता है । कितने ही लोग ( वैशेषिक ) तत्त्व पदसे सत्ता, द्रव्यत्व, गुणत्व और कर्मत्व
इत्यादिका ग्रहण करते हैं । अब यदि सूत्रमें 'तत्त्वश्रद्धानम्' इतना ही रहने दिया जाता है तो ३०
इससे इन सबका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है जो युक्त नहीं है । अथवा तत्त्व शब्द
एकत्ववाची है इसलिए सूत्रमें केवल तत्त्व पदके रखने से 'सब एक हैं' इस प्रकार स्वीकार करनेका
प्रसंग प्राप्त होता है । 'यह सब दृश्य व अदृश्य जग पुरुषस्वरूप ही है' ऐसा किन्हींने माना भी है ।
इस तरह इस प्रकार भी सूत्रमें केवल 'तत्त्वश्रद्धानम्' रखना युक्त प्रतीत नहीं होता । किन्तु ऐसा
मानने पर प्रत्यक्ष और अनुमानसे विरोध आता है, अतः इन सब दोषोंके दूर करने के लिए सूत्रमें ३५
'तत्त्व' और 'अर्थ' इन दोनों पदोंका ग्रहण किया है । सम्यग्दर्शन दो प्रकार का है-सराग
सम्यग्दर्शन और वीतराग सम्यग्दर्शन । प्रशम, संवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य आदि की
अभिव्यक्ति लक्षणवाला सराग सम्यग्दर्शन है और आत्माकी विशुद्धिमात्र वीतराग सम्यग्दर्शन है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri