सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः ३
विवक्षित नहीं है। किन्तु आचार्यको इच्छा संसारसागरमें निमग्न प्राणियोंके उद्धार करनेको
हुई। परन्तु मोक्षमार्गके उपदेशके बिना उनके हितका उपदेश नहीं दिया जा सकता, अतः मोक्ष-
मार्गके व्याख्यानकी इच्छासे यह सूत्र कहा।' मालूम होता है कि इस उल्लेख-द्वारा राजवार्तिक-
कारने तत्त्वार्थाधिगमभाष्यकी उत्थानिकाका निर्देश किया है। तत्त्वार्थाधिगमभाष्यमें इसी आशयकी
उत्थानिका पायी जाती है। श्रुतसागरसूरिने भी अपनी श्रुतसागरीमें यही बतलाया है किसी ५
शिष्यके प्रश्नके अनुरोधसे आचार्यवर्यने तत्त्वार्थसूत्रकी रचना की। यहाँ शिष्यका नाम द्वैयाक
दिया है। इससे मालूम होता है कि सर्वार्थसिद्धिकी यह मान्यता मुख्य है कि शिष्यके प्रश्नके
निमित्तसे तत्त्वार्थसूत्रकी रचना हुई है। आगे उत्थानिकामें मोक्षकी चर्चा आ जाने से थोड़ेमें
मोक्षतत्त्वकी मीमांसा की गयी है। जैनमान्यता तो यह है कि कर्म और आत्माके संयोगसे संसार
होता है। अतः कर्म, भावकर्म और नोकर्मके आत्मासे अलग हो जाने पर जो आत्माकी अपने १०
ज्ञानादि गुणरूप स्वाभाविक अवस्था प्राप्त होती है उसे मोक्ष कहते हैं। किन्तु अन्य प्रवादी लोग
इस प्रकारसे मोक्षतत्त्वका विश्लेषण करनेमें असमर्थ रहे। पूज्यपाद स्वामीने तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता
गृद्धपिच्छ आचार्यके मुखसे ऐसे तीन उदाहरण उपस्थित कराये हैं जिनके द्वारा मोक्षतत्त्वका
गलत तरीकेसे स्वरूप उपस्थित किया गया है। इनकी मीमांसा करते हुए सर्व प्रथम सांख्यमतकी
मीमांसा की गयी है। यद्यपि सांख्योंने आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक इन तीन १५
प्रकारके दुःखोंका सदाके लिए दूर हो जाना मोक्ष माना है, तथापि वे आत्माके स्वरूपको चैतन्य
मानते हुए भी उसे ज्ञानरहित मानते हैं। उनकी मान्यता है कि ज्ञानधर्म प्रकृतिका है तो भी
संसर्गसे पुरुष अपनेको ज्ञानवान् अनुभव करता है और प्रकृति अपनेको चेतन अनुभव करती है।
इसीसे यहाँ सांख्योंके मोक्ष तत्त्वकी आलोचना न करके पुरुष तत्त्वकी आलोचना की गयी है और
उसे असत् बतलाया गया है। दूसरा मत वैशेषिकोंका है। वैशेषिकोंने ज्ञानादि विशेष गुणोंका २०
आधार यद्यपि आत्माको माना है तथापि वे आत्मासे उनके अलग हो जानेको उसकी मुक्ति मानते
हैं। उनके यहाँ बतलाया है कि बुद्धि आदि विशेष गुणोंकी उत्पत्ति आत्मा और मनके संयोग रूप
असमवायी कारणसे होती है। मोक्ष अवस्थामें चूंकि आत्मा और मनका संयोग नहीं रहता अतः
वहाँ विशेष गुणोंका सर्वथा अभाव हो जाता है। उनके यहाँ सभी व्यापक द्रव्योंके विशेष गुण
क्षणिक माने गये हैं, इसलिए वे मोक्षमें ज्ञानादि विशेष गुणोंका अभाव होनेमें आपत्ति नहीं २५
समझते। अब यदि राग-द्वेष आदिकी तरह मुक्तावस्थामें आत्माको ज्ञानादि गुणोंसे भी रहित मान
लिया जाय तो आत्मा स्वतन्त्र पदार्थ नहीं ठहरता क्योंकि जिसका किसी भी प्रकारका विशेष
लक्षण नहीं पाया जाता वह वस्तु ही नहीं। यही कारण है कि इनकी मान्यताको भी असत् बतलाया
गया है। तीसरा मत बौद्धोंका है। बौद्धोंके यहाँ सोपधिशेष और निरुपधिशेष ये दो प्रकारके
निर्वाण माने गये हैं। सोपधिशेष निर्वाणमें केवल अविद्या, तृष्णा आदि रूप आस्रवोंका ही नाश ३०
होता है, शुद्ध चित्सन्तति शेष रह जाती है। किन्तु निरुपधिशेष निर्वाणमें चित्सन्तति भी नष्ट
हो जाती है। यहाँ मोक्षके इस दूसरे भेदको ध्यानमें रखकर उसको मीमांसा की गयी है। इस
सम्बन्धमें बौद्धोंका कहना है कि दीपकके बुझ देनेपर जिस प्रकार वह ऊपर नीचे दायें बायें आगे
पीछे कहीं नहीं जाता किन्तु वहीं शान्त हो जाता है। उसी प्रकार आत्माकी सन्तानका अन्त हो
जाना ही उसका मोक्ष है। इसके बाद आत्माकी सन्तान नहीं चलती, वह वहीं शान्त हो जाता ३५
है। बौद्धोंके इस तत्त्वकी मीमांसा करते हुए आचार्यने बतलाया है कि उनकी यह कल्पना असत्
ही है। इस प्रकार थोड़ेमें मोक्ष तत्त्वकी मीमांसा करके आचार्यने अन्तमें उसके कारण तत्त्वकी
मीमांसा की है। इस सिलसिले में केवल इतना ही लिखना है कि अधिकतर विविध मतवाले लोग
ज्ञान, दर्शन और चारित्र इनमें से एक-एकके द्वारा ही मोक्षकी सिद्धि मानते हैं। क्या सांख्य, क्या