सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- १३ § १९ ] प्रथमोऽध्यायः ९
§ १३. अथैतत्सम्यग्दर्शनं जीवादिपदार्थविषयं१ कथमुत्पद्यत इत्यत आह—
तन्निसर्गादधिगमाद्वा ॥३॥
§ १४. निसर्गः स्वभाव इत्यर्थः । अधिगमोऽर्थावबोधः । तयोर्हेतुत्वेन निर्देशः । कस्याः ।
क्रियायाः । का च क्रिया । उत्पद्यत इत्यध्याह्रियते, सोपस्कारत्वात् सूत्राणाम् । २तदेतत्सम्यग्दर्शनं
निसर्गादधिगमाद्वोत्पद्यत इति । ५
§ १५. अत्राह-निसर्गजे सम्यग्दर्शनेऽर्थाधिगमः स्याद्वा न वा । यद्यस्ति, तदपि अधिगमजमेव
नार्थान्तरम् । अथ नास्ति, कथमनवबुद्धतत्त्वस्यार्थश्रद्धानमिति । नैष दोषः । उभयत्र सम्यग्दर्शने,
अन्तरङ्गे हेतुस्तुल्यो दर्शनमोहस्योपशमः क्षयः क्षयोपशमो वा । तस्मिन्सति यद्बाह्योपदेशादृते
प्रादुर्भवति तन्नैसर्गिकम् । यत्परोपदेशपूर्वकं जीवाद्यधिगमनिमित्तं३ तदुत्तरम् । इत्यनयोर्यं भेदः ।
जाता है, किन्तु शेष दो सम्यग्दर्शन सराग और वीतराग दोनों अवस्थाओंमें पाये जाते हैं । १०
राजवार्तिकमें एक क्षायिक सम्यग्दर्शनको ही वीतराग सम्यग्दर्शन बतलाया है । सो यह आपेक्षिक
कथन है । चारित्र-मोहनीयके क्षयसे होनेवाली वीतरागता क्षायिक सम्यग्दर्शनके सद्भावमें
ही होती है, अन्यत्र नहीं । यही कारण है कि राजवार्तिकमें क्षायिक सम्यग्दर्शनको ही वीतराग
सम्यग्दर्शन लिखा है । किन्तु कषायोंकी उपशमजन्य वीतरागता उपशम सम्यग्दर्शनके सद्भावमें
भी प्रकट होती हुई देखी जाती है । इससे अन्यत्र इसे भी वीतराग सम्यग्दर्शन बतलाया है । १५
प्रशम, संवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य ये चार ऐसे चिह्न हैं जो सरागताके रहते हुए भी
सम्यग्दर्शनके सद्भावके ज्ञापक हैं, अतः यहाँ सराग सम्यग्दर्शनके लक्षणमें इन धर्मोंको प्रमुखता
दी गयी है । किन्तु वीतराग सम्यग्दर्शनमें आत्माकी परिणतिमें निर्मलता पायी जाती है।
वहाँ रागांशका सर्वथा अभाव हो जाता है, अतः यहाँ वीतराग सम्यग्दर्शनको आत्माकी विशुद्धि-
रूपसे लक्षित किया गया है । रागादिको तीव्रताका न होना प्रशमभाव है । संसारसे भीतरूप २०
परिणामका होना संवेगभाव है । सब जीवोंमें दयाभाव रखना अनुकम्पा है और 'जीवादि पदार्थ
हैं' ऐसी बुद्धिका होना आस्तिक्य.है ।
§ १३. जीवादि पदार्थोंको विषय करनेवाला यह सम्यग्दर्शन किस प्रकार उत्पन्न होता
है । अब इस बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
वह ( सम्यग्दर्शन ) निसर्गसे और अधिगमसे उत्पन्न होता है ॥३॥ २५
§ १४. निसर्गका अर्थ स्वभाव है और अधिगमका अर्थ पदार्थका ज्ञान है । सूत्रमें इन
दोनोंका हेतुरूपसे निर्देश किया है। शंका-इन दोनोंका किसके हेतुरूपसे निर्देश किया है ?
समाधान—क्रियाके । शंका-वह कौन सी क्रिया है ? समाधान—'उत्पन्न होता है' यह क्रिया
है । यद्यपि इसका उल्लेख सूत्रमें नहीं किया है तथापि इसका अध्याहार कर लेना चाहिए, क्योंकि
सूत्र उपस्कार सहित होते हैं। यह सम्यग्दर्शन निसर्गसे और अधिगमसे उत्पन्न होता है यह इस ३०
सूत्रका तात्पर्य है।
§ १५. शंका-निसर्गज सम्यग्दर्शनमें पदार्थोंका ज्ञान होता है या नहीं। यदि होता है तो
वह भी अधिगमज ही हुआ उससे भिन्न नहीं । यदि नहीं होता है तो जिसने पदार्थोंको नहीं जाना
है उसे उनका श्रद्धान कैसे हो सकता है ? समाधान—यह कोई दोष नहीं, क्योंकि दोनों सम्य-
ग्दर्शनोंमें दर्शनमोहनीयका उपशम, क्षय या क्षयोपशमरूप अन्तरंग कारण समान है। इसके रहते ३५
हुए जो बाह्य उपदेशके बिना होता है वह नैसर्गिक सम्यग्दर्शन है और जो बाह्य उपदेशपूर्वक
१. -षयं तत् कथं-आ०, दि० १, दि० २ । २. तदेव सम्य-आ०, दि० १, दि० २, अ० । ३. -मित्तं
स्यात् तदु-मु० ।
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CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri