सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० सर्वार्थसिद्धौ [ १।३ § १६ -
§ १६. तद्ग्रहणं किमर्थम् । अनन्तरनिर्देशार्थम् । अनन्तरं सम्यग्दर्शनं तदित्यनेन निर्दिश्यते ।
इतरथा मोक्षमार्गोऽपि प्रकृतस्तस्याभिसंबन्धः स्यात् । ननु च 'अनन्तरस्य¹ विधिर्वा भवति प्रतिषेधो
वा' इत्यनन्तरस्य सम्यग्दर्शनस्य ग्रहणं सिद्धमिति² चेन्न, 'प्रत्यासत्तेः प्रधानं बलीयः' इति मोक्षमार्ग
एव संबध्येत । तस्मात्तद्वचनं क्रियते ।
§ १७. तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनमित्युक्तम् । अथ किं तत्त्वमित्यत इदमाह—
जीवादि पदार्थोंके ज्ञानके निमित्तसे होता है वह अधिगमज सम्यग्दर्शन है। यही इन दोनोंमें भेद है।
§ १६. शंका—सूत्रमें 'तत्' पदका ग्रहण किसलिए किया है ? समाधान—इस सूत्रसे पूर्व
सूत्रमें जिसका ग्रहण किया है उसका निर्देश करनेके लिए यहाँ 'तत्' पदका ग्रहण किया है।
अनन्तरवर्ती सूत्रमें सम्यग्दर्शनका ही उल्लेख किया है जो यहाँ 'तत्' इस पद-द्वारा निर्दिष्ट किया
गया है। यदि 'तत्' पद न देते तो मोक्षमार्गका प्रकरण होनेसे उसका यहाँ ग्रहण हो जाता ।
शंका—'अगले सूत्रमें जो विधि-निषेध किया जाता है वह अव्यवहित पूर्वका ही समझा जाता है'
इस नियमके अनुसार अनन्तरवर्ती सूत्रमें कहे गये सम्यग्दर्शनका ग्रहण स्वतः सिद्ध है, अतः सूत्रमें
'तत्' पद देनेकी आवश्यकता नहीं है ? समाधान—नहीं, क्योंकि 'समीपवर्तीसे प्रधान बलवान्
होता है' इस नियमके अनुसार यहाँ मोक्षमार्गका ही ग्रहण होता । किन्तु यह बात इष्ट नहीं है
अतः सूत्रमें 'तत्' पद दिया है।
विशेषार्थ—इस सूत्रमें सम्यग्दर्शनकी उत्पत्तिके निमित्तोंपर विचार किया गया है।
आगममें पांच लब्धियोंमें एक देशना लब्धि बतलायी है। जिस जीवको वर्त्तमान पर्यायमें या
पूर्व पर्यायमें कभी भी जीवादि पदार्थविषयक उपदेश नहीं मिला है उसे सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति
नहीं हो सकती। किन्तु जिस जीवको इस प्रकारके उपदेशका निमित्त मिल गया है उसे तत्काल
या कालान्तरमें सम्यग्दर्शन प्राप्त हो सकता है। यहाँ इसी अपेक्षासे सम्यग्दर्शनके दो भेद किये
गये हैं। जो सम्यग्दर्शन उपदेशके निमित्तसे होता है वह अधिगमज सम्यग्दर्शन है और जो बिना
उपदेशके होता है वह निसर्गज सम्यग्दर्शन है यह इस सूत्रका भाव है। यद्यपि अधिगम शब्दका
अर्थ ज्ञान है तथापि प्रकृतमें इसका अर्थ परोपदेशपूर्वक होनेवाला ज्ञान लेना चाहिए। इसीसे
निसर्ग शब्दका अर्थ परोपदेशके बिना फलित हो जाता है। यद्यपि इन दोनों सम्यग्दर्शनोंका
दर्शनमोहनीयका उपशम, क्षय और क्षयोपशमरूप अन्तरंग कारण समान है तथापि बाह्य उप-
देश और अनुपदेशकी अपेक्षा इन दोनोंमें भेद है। यहाँ यह शंका उत्पन्न होती है कि क्षायिक
सम्यग्दर्शन जब कि केवली और श्रुतकेवलीके पादमूलमें ही होता है तब उसमें सम्यग्दर्शनका
निसर्गज भेद न घटकर केवल अधिगमज यही भेद घट सकता है, फिर क्या कारण है कि
टीकामें अन्तरंग कारणोंका निर्देश करते समय उपशम और क्षयोपशमके साथ क्षयका भी
निर्देश किया है। सो इस शंकाका यह समाधान है कि दूसरे और तीसरे नरकसे आकर जो जीव
तीर्थंकर होते हैं उनके लिए क्षायिक सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिमें परोपदेशकी आवश्यकता नहीं होती,
किन्तु परोपदेशके बिना ही उनके क्षायिक सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति होती हुई देखी जाती है अतः क्षायिक
सम्यग्दर्शनमें भी निसर्गज और अधिगमज ये दो भेद घट जाते हैं। यही कारण है कि प्रकृतमें
तीनों प्रकारके सम्यग्दर्शनोंको निसर्गज और अधिगमजके भेदसे दो-दो प्रकारका बतलाया है।
§ १७. जीवादि पदार्थोंका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है यह पहले कह आये हैं। अब तत्त्व
कौन-कौन हैं इस बातके बतलाने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
१. 'अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वेति ।'–पा० म० भा० पृ० ३३५। परि० शे० पृ० ३६० ।
२. सिद्धं प्रत्या-दि० १, दि० २, आ०, अ० ।