सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 120

विशेषार्थ—इस सूत्रमें सम्यग्दर्शनके लक्षणका निर्देश करते हुए बतलाया है कि जीवादि
पदार्थोंके श्रद्धानको सम्यग्दर्शन कहते हैं। इस सूत्रकी व्याख्या करते हुए टीकामें मुख्यतया
चार बातोंको स्पष्ट किया है। वे चार बातें ये हैं—(१) तत्त्व और अर्थ शब्दके निरुक्त्यर्थका
निर्देश करके तत्त्वार्थ शब्द कैसे निष्पन्न हुआ है? (२) 'दृशि' धातुका अर्थ श्रद्धान करना
क्यों लिया गया है? (३) तत्त्व और अर्थ इन दोनों पदोंको स्वीकार करनेसे क्या लाभ है?
(४) सम्यग्दर्शनके कितने भेद हैं और उनका क्या स्वरूप है? प्रकृतमें यद्यपि 'तत्' सर्वनाम
पद है और 'त्व' प्रत्यय भाव अर्थमें होता है अतः 'तत्त्व' शब्द भाव सामान्यका वाचक है
और अर्थपद द्रव्यवाची है। तथापि अर्थ शब्दके धन, प्रयोजन, अभिधेय, निवृत्ति, विषय,
प्रकार और वस्तु आदि अनेक अर्थ पाये जाते हैं अतः इन सबका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन
न कहलावे, इसलिए तो सूत्रकारने सूत्रमें केवल अर्थपद नहीं रखा है। और इसी प्रकार
विभिन्न मतोंमें तत्त्व शब्दके भी अनेक अर्थ प्रसिद्ध हैं। वैशेषिक लोग 'तत्त्व' पदसे सत्ता,
द्रव्यत्व, गुणत्व और कर्मत्वका ग्रहण करते हैं। उनके यहाँ सामान्य और विशेष ये दोनों
स्वतन्त्र पदार्थ माने गये हैं। अब यदि सूत्रमें केवल 'तत्त्व' पद रखा जाता है तो सत्ता, द्रव्यत्व,
गुणत्व और कर्मत्व इनका श्रद्धान करना भी सम्यग्दर्शन समझा जा सकता है जो युक्त नहीं है
इसलिए सूत्रकारने सूत्रमें केवल तत्त्वपद नहीं रखा है। इसी प्रकार परमब्रह्मवादियोंने नाना
तत्त्वोंको न मानकर एक ही तत्त्व माना है। उनके मतसे यह जग एक पुरुषरूप ही है इसलिए इस
हिसाबसे विचार करनेपर 'तत्त्व' पद एक तत्त्ववाची प्राप्त होता है जो युक्त नहीं है, इसलिए भी
सूत्रकारने सूत्रमें केवल तत्त्वपद नहीं रखा है। यहाँ तत्त्वार्थसे जीवादिक वे सब पदार्थ लिये गये
हैं जिनका आगे चौथे सूत्रमें वर्णन किया है। इनका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है यह इस सूत्रका
तात्पर्य है। यद्यपि सम्यग्दर्शनमें दर्शन शब्द है जिसका अर्थ आलोक होता है तथापि यहाँ इसका
श्रद्धान अर्थ लिया गया है क्योंकि दर्शनका आलोक अर्थ लेनेपर चक्षु आदिके निमित्तसे होनेके
कारण वह साधारणतः सब संसारी जीवोंके पाया जाता है, अतः प्रकृतमें वह उपयोगी नहीं ठहरता ।
किन्तु तत्त्वार्थ विषयक श्रद्धान भव्योमें भी किसी-किसी आसन्नभव्यके ही पाया जाता है जो
प्रकृतमें उपयोगी है अतः यहाँ दर्शनका अर्थ आलोक न करके श्रद्धान किया है। आशय यह है
कि छद्मस्थ जीव आत्माका साक्षात्कार नहीं कर सकते, क्योंकि इन्द्रिय और मनको सहायतासे
होनेवाला जितना भी क्षायोपशमिक ज्ञान है सावरण होनेसे रूपी पदार्थोंको ही जान सकता है।
यतः आत्मा अरूपी है अतः उसका क्षायोपशमिक ज्ञानके द्वारा साक्षात्कार नहीं हो सकता। किन्तु
छद्मस्थ जीव आगमानुसार आत्माका श्रद्धान करते हैं। उनका अमूर्त पदार्थविषयक समस्त
अनुभव आगमाश्रित है प्रत्यक्ष ज्ञानाश्रित नहीं। यही कारण है कि प्रकृतमें दर्शनका अर्थ श्रद्धान
किया है। सम्यग्दर्शनके सराग और वीतराग ऐसे दो भेद हैं। ये भेद पात्रकी अपेक्षासे किये गये
हैं। सरागी जीवके जो सम्यग्दर्शन होता है वह सराग सम्यग्दर्शन कहलाता है और वीतरागी
जीवके जो सम्यग्दर्शन होता है वह वीतराग सम्यग्दर्शन कहलाता है। किन्तु इससे सम्यग्दर्शनको
सराग और वीतराग मानना उचित नहीं है। क्योंकि सम्यग्दर्शन स्वयं न तो सराग ही होता है
और न वीतराग ही। सरागता और वीतरागताका सम्बन्ध तो कषायके सद्भाव और असद्भावसे
है। तथापि जिसके राग और द्वेषरूप प्रवृत्ति पायी जाती है उसके सम्यग्दर्शनजन्य आत्मविशुद्धि
प्रकट तो हो जाती है पर वह स्पष्टतः लक्षित नहीं होती। बाह्य प्रवृत्तिमें रागांश या द्वेषांशको
प्रधानता बनी रहती है। अतः सरागी जीवके सम्यग्दर्शनको सराग सम्यग्दर्शन कहा है
और वीतरागी जीवके सम्यग्दर्शनको वीतराग सम्यग्दर्शन कहा है। उपशम आदिके भेदसे
सम्यग्दर्शनके तीन भेद बतलाये हैं। इनमें-से वेदक सम्यग्दर्शन तो सराग अवस्थामें ही पाया