सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

भीखा साहिब २११
॥ समरथ ॥
ए हरि मीत बड़े तुम राजा ।
व्यापक जहाँ तहाँ लगु तुम्हरे हुकुम बिना कहुँ सरै न काजा ॥टेक
तिरगुन सूबा मौज बनाया, भिन्न भिन्न तहँ फौज रखाया ।
हय¹ गय² रथ सुखपाल बहूता, माया बढ़ी करै को कूता ।
कहत बनै नहिँ अनघड़ साजा, ए हरि मीत० ॥ १ ॥
चारो दिसा कनात गड़ा है, असमान तंबू बिन चोब खड़ा है।
पानी अगिनि पवनहै पायक, जो कछु काम सो करिबे लायक
अनहद ढोल दमामा बाजा, ए हरि मीत ० ॥ २ ॥
तारागन पैदल समुदाई, अज्ञा ले तहँ तहँ चलि जाई ।
चाँद सूर निसवासर आई, आवत जात मसाल दिखाई ।
ध्रुव कियो थीर अचल मन धाजा³, ए हरि मीत ० ॥३॥
सहजादा है मन बुधिकाला, कीन्हेव सकल जगत पैमाला।
काल बड़ा उमराव है भारी, डरे सकल जहँ लग तन धारी ।
तुम्हरे दंड सकल सिर ताजा, ए हरि मीत ० ॥ ४ ॥
सत्त सतोगुन मंत्र दृढ़ावा, ज्ञान आदि दे पुत्र बुलावा ।
अमल करहु तुम जग मैं जाई, फेरहु केवल राम दुहाई ।
नाम प्रताप प्रकास को छाजा, ए हरि मीत ० ॥ ५ ॥
चतुरंगिनि उज्ज्वल दल देखा, जोग बिराग बिचार को लेखा।
छिमा सील संतोष को भाऊ, परमारथ स्वारथ नहिँ चाऊ।
स्वारथ-रत पर पारहु गाजा⁴, ए हरि मीत ० ॥ ६ ॥
रज गुन तम गुन कीन्ह्यो मेला, सबहौँ भयो सतोगुन चेला।
हम तुम आड़ कछू नहिँ कीन्हा, अज्ञाईस सीस पर लीन्हा।
मरत बहुत डेर आपु की लाजा, ए हरि मीत ० ॥ ७ ॥
(१) घोड़ा। (२) हाथी । (३) ध्वजा, फरहरा । (४) जो स्वार्थी है उस पर
बिजली गिराते हैं।

२१२ शब्द संग्रह
पठयौ काम क्रोध मद लोभा, जा तैं कीन्ह सकल तन छोभा ।
केवल नाम भजै सो बाचै, नहिं तौ और सकल मनकाचै ।
भीखा तुम बिन कौन निवाजा१, ए हरि मीत बड़े तुम राजा८
॥ बिनती ॥
(१)
प्रभु जी करहु अपनो चेर ।
मैं तौ सदां जनम को रिनिया२, लेहु लिखि मोहिं केर ॥१॥
काम क्रोध मद लोभ मोह यह, करत सबहिन जेर ।
सुर नर मुनि सब पचि पचि हारे, परे करम के फेर ॥२॥
सिव सनकादि आदि ब्रह्मादिक, ऐसे ऐसे ढेर ।
खोजत सहज समाधि लगाये, प्रभु को नाम न नेर ॥३॥
अपरंपार अपार है साहिब, ह्वै अधीन तन हेर ।
गुरु परताप साध की संगति, छुटे सो काल अहेर३ ॥४॥
त्राहि त्राहि सरनागत आयो, प्रभु दरवो४ यहि बेर ।
जन भीखा को उरिन कीजिये, अब कागद जिनि हेर ॥५॥
(२)
अस करिये साहिब दाया ॥ टेक ॥
कृपा कटाच्छ होइ जेहि तैं प्रभु, छूटि जाय मन माया ॥१॥
सोवत मोह निसा निस बासर, तुम्हीं मोहिं जगाया ॥२॥
जनमत मरत अनेक बार, तुम सतगुरु होय लखाया ॥३॥
भीखा केवल एक रूप हरि, ब्यापक त्रिभुवन राया ॥४॥
(३)
यार हे! हँसि बोलहु मो सौं, भरम गाँठि छूटै प्रभु तो सौं ॥१॥
पालन करि आये मो कहँ तुम, खाय जियाय कियो घर पोसे।२
(१) दया या परवरिश करना । (२) क़रज़दार । (३) शिकार । (४) दया कीजिये ।

बचन मेटि मैं कहौँ गरज वसि, दरदवंदप्रभुकुरैनगोसो१॥३
हो करता करमनके दाता, आगे बुधि आवत नहिँ होसो॥४
तुम अंतरजामी सब जानो, भीखा कहा करहि अपसोसो॥५
(४)
मोहिँ राखो जी अपनी सरन ॥ टेक ॥
अपरम्पार पार नहिँ तेरो, काह कहौँ का करन ॥१॥
मन क्रम बचन आस इक तेरी, होउ जनम या मरन ॥२॥
अबिरल भक्ति के कारन तुम पर, ह्वै ब्राम्हन देउँ धरन२ ॥३॥
जन भीखा अभिलाख इहो, नहिँ चहौँ मुक्ति गति तरन ॥४॥
॥ अद्वैत ॥
कवित
खुद एक भुम्मि३ आहि, बासन४ अनेक ताहि,
रचना विचित्र रंग, गढ़ेउ कुम्हार है ।
नाम एक सोन आस५, गहना ह्वै द्वैत भास,
कहूँ खरा खौँट रूप, हेमहिँ६ अधार है ॥
फेन बुदबुद अरु लहरि तरंग बहु,
एक जल जानि लीजै, मीठा कहूँ खार है ।
आतमा त्यौँ एक जाते७, भीखा कहै याहि मते,
ठग सरकार के, बटोही८ सरकार के ॥
॥ साध महिमा ॥
भजन तैँ उत्तम नाम फकीर ।
छिमा सील संतोष सरल चित, दरदवंद पर-पीर ॥टेक॥
कोमल गदगद गिरा६ सुहावन, प्रेम सुधा रस छीर ।
अनहद नाद सदा फल पायो, भोग खाँड़ घृत खीर ॥१॥
(१) गुस्सा । (२) धरना । (३) मिट्टी । (४) बरतन । (५) असल । (६) सोना ।
(७) एक ही जाति की । (८) मुसाफ़िर । (६) वानी ।

२१४ शब्द संग्रह
ब्रह्म प्रकास को भेष बनायो, नाम मेखला चीर ।
चमकत नूर जहूर जगामग, ढाँके सकल सरीर ॥ २ ॥
रहनि अचल इस्थिर कर आसन, ज्ञान बुद्धि मति धीर ।
देखत आतम राम उघारे, ज्योँ दरपन मधि हीर ॥३॥
मोह नदी भ्रम भँवर कठिन है, पाप पुन्य दोउ तीर ।
हरि जन सहजे उतरि गये ज्योँ, सूखे ताल को भीर¹ ॥४
जग परपंच करम बहतो है, जैसे पवन रु नीर ।
गुरु गम सबद समुद्रहिँ जावे, परत भयो जल थीर ॥५॥
केलि करत जिय लहरि पिया सँग, मति बड़ गहिर गंभीर ।
ताहि काहि.पटतरो² दीजिये, जिन तन मन दियो सीर³ ॥६
मन मतंग मतवार बड़ो है, सब ऊपर बल बीर ।
भीखा हीन मलीन ताहि को, छीन भयो जस जीर ॥७॥
॥ उपदेश ॥
(१)
मन तूँ राम से लौ लाव ।
त्यागि के परपंच माया, सकल जगहिँ नचाव ॥ १ ॥
साच की तू चाल गहि ले, झूठ कपट बहाव ।
रहनि सोँ लौ लीन है, गुरु-ज्ञान ध्यान जगाव ॥ २ ॥
जोग की यह सहज जुक्ति बिचार कै ठहराव ।
प्रेम प्रीति सोँ लागि के घट, सहजहीँ सुख पाव ॥ ३ ॥
दृष्टि तैँ आकृष्ट देखो, सुरति निरति बसाव ।
आतमा निर्धार निर्मी, बानि⁴ अनुभव गाव ॥ ४ ॥
अचल इस्थिर ब्रह्म सेवो, भाव चित अरुभाव ।
भीखा फिर नहिँ कबहुँ पैहौ, बहुरि ऐसो दाव ॥ ५ ॥
(१) छिछला पानी । (२) उपमा । (३) सिर अर्थात अहं । (४) वाणी ।

भीखा साहिब २१५
॥ रेख़्ता ॥
(२)
करो विचार निर्धार¹ अवराधिये²,
सहज समाधि मन लाव भाई ।
जब जक्त की आस तैं होहु नीरास,
तब मोच्छ दरबार की खबरि पाई ॥
न तो भर्म अरु कर्म विच भोग भटकन लग्यो,
जरा अरु मरन तन वृथा जाई ।
भीखा मानै नहीं कोटि उपदेस सठ,
थक्यौ वेदांत जुग चारि गाई ॥
॥ मिश्रित ॥
(१)
अगह तुम्हरा न गहना है । अकह तुम कहा कहना है ॥१॥
सबद अरु ब्रह्म अधिकारी । चेतन तुम रूप तन धारी ॥२॥
अविगति तुम्हरी न गति पावै । कहाँ अस ज्ञान बुधि आवै ३
तुम्हरा कहि वार नहिँ पारा । केतो अनुमान करि हारा ॥४॥
अगम का गम कवन पावै । जहाँ नहिँ चित्त मन जावै ॥५॥
प्रगट तुम गुप्त सब माहीं । व्यापक तुम कहाँ नाहीं ॥६॥
सुनहु सब को कहहु सब से । देखहु सब को मिले तन से ॥७॥
जहाँ लगि सकल है तुम्हीं । धोख यह बीच हम हमहीं ॥८॥
छुटै जब तैं व मैं मेरा । तहाँ ठाकुर न कोउ चेरा ॥९॥
केवल सोइ आपु आपै है। दुइत सोइ जाय जा पै है। ॥१०॥
उभै³ हम एक है। तुम हीं । हमैं तुम्हैं भेद कम कमहीं ॥११॥
भीखा तजो भरम के ताईं । चीन्हो निज आपनो साईं ॥१२॥
(१) निरंतर । (२) आराधना करो । (३) दो ।

२१६ शब्द संग्रह
(२)
कुंडलिया
जीव कहा सुख पावई बेमुख बहु घर माहिँ ॥
बेमुख बहु घर माहिँ एक तैं एक अपर्बल ।
तेहू तैं हैं अधिक अधिक तैं अधिक महाबल ॥
तेहि मैं मन अरु पवन त्रिगुन कै डोरि लगाई ।
बाँधे सब जग जाल छुटै कोऊ नहिँ पाई ॥
जौ भीखा सुमिरै राम को तौ सकल अर्थ होइ जाहि।
जीव कहा सुख पावई बेमुख बहु घर माहिँ ॥
पलटू साहिब
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतवानी संग्रह भाग १ पृष्ठ २१३]
॥ नाम ॥
अरिल
जो कोइ चाहै नाम तो नाम अनाम है ।
लिखन पढ़न मैं नाहिँ निअच्छर काम है ॥
रूप कहौँ अनरूप पवन अनरेख ते ।
अरे हाँ पलटू गैब दृष्टि से संत नाम वह देखते ॥
॥ शब्द ॥
फूटि गया असमान सबद की धमक मैं ।
लगी गगन मैं आग सुरति की चमक मैं ॥
सेसनाग औ कमठ लगे सब काँपने ।
अरे हाँ पलटू सहज समाधि कि दसा खबर नहिँ आपने ॥
॥ चितावनी ॥
(१)
कहवाँ से जिव आये, कहवाँ समाने हो साधो ।
का देखि रहेउ भुलाय, कहाँ लिपटाने हो साधो ॥१॥

शब्द कबीर २१७
निर्गुन से जिब आये, सगुन समाने हो साधो।
भूलि गये हरि नाम, माया लिपटाने हो साधो ॥२॥
जैसे तुरकी घोड़ खैँचि, लट बागा हो साधो।
ऊँच सीस भये नीच, चुगन लागे कागा हो साधो ॥३॥
आठ काठ के पिंजरा, दस दरवाजा हो साधो।
छनिक निकसा प्रान, कौन दिसि भागा हो साधो ॥४॥
रोवन घर की नारि, केस लट खोले हो साधो।
आज मंदिर भयो सून, कहाँ गये राजा हो साधो ॥५॥
आलहि¹ बाँस कटाइनि, डँड़िया फँदाइनि हो साधो।
पाँच पचीस घराती, लेइ सब धाये हो साधो ॥६॥
तीरे दिहिन उतारि, सकल नहवावैँ हो साधो।
करि लोरहो सिंगार, सकल जुरि आये हो साधो ॥७॥
आलहि चंदन कटाइनि, घेरि घर छाइनि हो साधो।
लोग कुटुम परिवार, दिहिनि पहुढ़ाई² हो साधो ॥८॥
लाइ दिहिनि मुख आग, काठ करि झारा हो साधो।
पुत्र लिये कर बाँस सीस गहि मारा हो साधो ॥६॥
चहुँ दिसि पवन झकोरै, तरवर डोलै हो साधो।
सूझत वार न पार, कौन दिसि जाना हो साधो ॥१०॥
इहवाँ नहिँ कोइ आपन, जे से मैं बोलौं हो साधो।
जस पुरइनि³ कर पात, अकेला मैं डोलाँ हो साधो ॥११॥
बिष बोयाँ संसार अमृत, कस पावौँ हो साधो।
पूरब जनम करि पाप, दोस केहि लावौँ हो साधो ॥१२॥
भौसागर की नदिया, पार कस जावौँ हो साधो।
गुरु बैठे मुख मोड़ि, मैं केहि गोहरावौँ हो साधो ॥१३॥
(१) जल्दी। (२) लेटाया। (३) कोई।

२१६ शब्द संग्रह
जेहि बैरिन कर मूल, ताहि हित मान्योँ हो साधो।
पलटुदास गुरु ज्ञान सुनत, अलगान्योँ हो साधो ॥१४॥
(२)
कुंडलिया
खेलु सिताबी फाग तू बीती जात बहार ॥
बीती जात बहार सम्बत लगने पर आया।
लीजै डफ्फ बजाय सुभग मानुष तन पाया ॥
खेलो घूँघट खोलि लाज फागुन मैं नाहीं।
जे कोउ करिहै लाज काज ना सपनेहुँ माँहीं ॥
प्रेम की माट भराय सुरति की करु पिचुकारी।
ज्ञान अबीर बनाय नाम की दीजै गारी ॥
पलटू रहना है नहीं सुपना यह संसार।
खेलु सिताबी फाग तू बीती जात बहार ॥
(३)
कुंडलिया
क्या सोवै तू बावरी चाला जात बसंत ॥
चाला जात बसंत कंत ना घर मैं आये।
धृग जीवन है तोर कंत बिन दिवस गँवाये ॥
गर्ब गुमानी नारि फिरै जोबन की माती।
खसम रहा है रूठि नहीं तू पठवै पाती ॥
लगै न तेरो चित्त कंत को नाहिं मनावै।
का पर करै सिंगार फूल की सेज बिछावै ॥
पलटू ऋतु भरि खेलि ले फिर पछितैहै अंत।
क्या सोवै तू बावरी चाला जात बसंत ॥

पलटू साहिब
(४)
कुंडलिया
माया की चक्की चलै पीसि गया संसार ॥
पीसि गया संसार बचै ना लाख बचावै ।
दोऊ पट के बीच कोऊ ना साबित जावै ॥
काम क्रोध मद लोभ चक्की के पीसनहारे ।
निरगुन डारै झींक¹ पकरि कै सबै निकारे ॥
दुरमति बड़ी सयानि सानि कै रोटी पोवै ।
करम तवा मैं धरि सैँकि कै साबित होवै ॥
तृस्ना बड़ी छिनारि जाइ उन सब घर घाला।
काल बड़ा बरियार किया उन एक निवाला ॥
पलटू हरि के भजन बिनु कोऊ न उतरै पार ।
माया की चक्की चलै पीसि गया संसार ॥
॥ ध्यान ॥
कुंडलिया
कमठ दृष्टि जो लावई सो ध्यानी परमान ॥
सो ध्यानी परमान सुरत से अंडा सेवै ।
आपु रहै जल माहिँ सूखे मैं अंडा देवै ॥
जस पनिहारी कलस भरे मारग मैं आवै ।
कर छोड़े मुख वचन चित्त कलसा मैं लावै ॥
फनि मनि धरै उतारि आप चरने को जावै ।
वह गाफिल ना पड़े सुरत मनि माहिँ रहावै ॥
पलटू सब कारज करै सुरत रहै अलगान ।
कमठ दृष्टि जो लावई सो ध्यानी परमान ॥
(१) मुट्ठी मुट्ठी अनाज जो चक्की में डालते हैं ।

२२० शब्द संग्रह
॥ बिरह ॥
जेकरे अँगने नौरँगिया, सो कैसे सोवै हो ।
लहर लहर बहु होय, सबद सुनि रोवै हो ॥ १ ॥
जेकर पिय परदेस, नींद नहिं आवै हो ।
चौँकि चौँकि उठै जागि, सेज नहिं भावै हो ॥ २ ॥
रैन दिवस मारै बान, पपीहा बोलै हो ।
पिय पिय लावै सोर, सवति होइ डोलै हो ॥ ३ ॥
बिरहिनि रहै अकेल, सो कैसे कै जीवै हो ।
जेकरे अमी कै चाह, जहर कस पीवै हो ॥ ४ ॥
अभरन देहु बहाय, बसन धै फारौ हो ।
पिय बिनु कौन सिंगार, सीस दै मारौ हो ॥ ५ ॥
भूख न लागै नींद, बिरह हिये करकै हो ।
माँग सेंदुर मसि पोछ१, नैन जल ढरकै हो ॥ ६ ॥
का पर२ करै सिंगार, सो काहि दिखावै हो ।
जेकर पिय परदेस, सो काहि रिझावै हो ॥ ७ ॥
रहै चरन चित लाइ, सोई धन आगर हो ।
पलटुदास कै सबद, बिरह कै सागर हो ॥ ८ ॥
॥ प्रेम ॥
(१)
गाँठि परी पिय बोले न हम से ॥ टेक ॥
निस दिन जागौं मैं पिया की सेजिया ।
नैना अलसाने निकरि गे घर से ॥ १ ॥
जो मैं जनतिउँ पिय रिसियैहैं ।
काहे को प्रीति लगातिउँ अस ठग से ॥ २ ॥
(१) माँग का सेंदुर और आँख का काजल दोनों पोछ डाले जायें । (२) किस
के लिये ।

पलटू साहिब २२१
अपने पिया को मैं बेगि मनैहौँ ।
सौ तक़सीर होत प्रभु जन से ॥ ३ ॥
सुनि मृदु बचन पिया मुसुकाने ।
पलटूदास पिय मिले बड़े तप से ॥ ४ ॥
(२)
प्रेम बान जोगी मारल हो, कसकै हिया मोर ॥ टेक ॥
जोगिया कै लालि लालि अँखियाँ हो, जस कँवल कै फूल ।
हमरी सुरख़ चुनरिया हो, दूनौँ भये तूल¹ ॥ १ ॥
जोगिया कै लेउँ मिर्गछलवा हो, आपन पट चीर ।
दूनौँ कै सियब गुदरिया हो, होइ जाबै फ़कीर ॥ २ ॥
अगना मैं सिँगिया बजाइन्हि हो, ताकिन्हि मोरी ओर ।
चितवन मैं मन हरि लियो हो, जोगिया बड़ चोर ॥ ३ ॥
गंग जमून के बिचवाँ हो, बहै झिरहिर नीर ।
तेहि ठैयाँ जोरल सनेहिया हो, हरि लै गयो पीर ॥ ४ ॥
जोगिया अमर मरै नहिँ हो, पुजवल मोरी आस ।
करम लिखा बर पावल हो, गावै पलटूदास ॥ ५ ॥
(३)
कुंडलिया
जहाँ तनिक जल बीछुड़ै छोड़ि देत है प्रान ॥
छोड़ि देत है प्रान जहाँ जल से बिलगावै ।
देइ दूध मैं डारि रहै ना प्रान गँवावै ॥
जा को वही अहार ताहि को का लै दीजै ।
रहै ना कोटि उपाय और सुख नाना कीजै ॥
(१) तुल्य = बराबर ।

२२२ शब्द संग्रह
यह लीजै दृष्टान्त सकै सो लेइ बिचारी ।
ऐसा करै सनेह ताहि की मैं बलिहारी ॥
पलटू ऐसी प्रीति करु जल औ मीन समान ।
जहाँ तनिक जल बीछुड़ै छोड़ि देत है प्रान ॥
(४)
कुंडलिया
मेरे तन तन लग गई पिय की मीठी बोल ॥
पिय की मीठी बोल सुनत मैं भई दिवानी ।
भँवर गुफा के बीच उठत है सोहं बानी ॥
देखा पिय का रूप रूप मैं जाय समानी ।
जब से भया मिलाप मिले पर ना अलगानी ॥
प्रीति पुरानी रही लिया हमने पहिचानी ।
मिली जोति मैं जोति सुहागिन सुरति समानी ॥
पलटू सबद के सुनत ही घूँघट डारा खोल ।
मेरे तन तन लग गई पिय की मीठो बोल ॥
(५)
कुंडलिया
मगन भई मेरी माइजी जब से पाया कन्थ ॥
जब से पाया कन्थ पन्थ सतगुरु बतलाया ।
सतगुरु बड़े दयाल करी उन मो पर दाया ॥
स्वस्ता१ मन मैं आइ छुटी मेरी दुचिताइ ।
सोऊँ कन्थ के साथ अंग से अंग लगाई ॥
अभ्यन्तर२ जागी प्रीत निरन्तर कन्थ से लागी ।
दरस परस के करत जगत की भ्रमना भागी ॥
पलटू सतगुरु सब्द सुनि हृदय खुला है ग्रन्थ ।
मगन भई मेरी माइजी जब से पाया कन्थ ॥
(१) शान्ति । (२) अंतर में।

पलटू साहिब २२३
(६)
कुंडलिया
सोई सती सराहिये जरै पिया के साथ ॥
जरै पिया के साथ सोई है नारि सयानी ।
रहै चरन चित लाय एक से और न जानी ॥
जगत करै उपहास पिया का संग न छोड़ै ।
प्रेम की सेज बिछाय मेहर की चादर ओढ़ै ॥
ऐसी रहनी रहै तजै जो भोग बिलासा ।
मारै भूख पियास याद सँग चलती स्वासा ॥
रैन दिवस बेहोस पिया के रँग मैं राती ।
तन की सुधि है नहीं पिया सँग बोलत जाती ॥
पलटू गुरु परसाद तैं किया पिया को हाथ¹ ।
सोई सती सराहिये जरै पिया के साथ ॥
(७)
कुंडलिया
आठ पहर निरखत रहै जैसे चन्द चकोर ॥
जैसे चन्द चकोर पलक से टारत नाहीं ।
चुगै बिरह से आग रहै मन चन्दै माहीं ॥
फिरै जेही दिसि चन्द तेही दिसि को मुख फेरै ।
चन्दा जाय छिपाय आग के भीतर हेरै ॥
मधुकर तजै न पदम² जान से जाय बँधावै ।
दीपक मैं ज्योँ पतँग प्रेम से प्रान गँवावै ॥
पलटू ऐसी प्रीति कर परधन चाहै चोर ।
आठ पहर निरखत रहै जैसे चन्द चकोर ॥
(१) बस मैं। (२) कँवल ।

२४४ शब्द संग्रह
(८)
कुंडलिया
सीस उतारै हाथ से सहज आसिकी नाहीं ॥
सहज आसिकी नाहीं खाँड़ खाने की नाहीं ।
झूठ आसिकी करै मुलूक मैं जूती खाही ॥
जीते जी मरि जाय करै ना तन की आसा ।
आसिक को दिन राति रहै सूली पर बासा ॥
मान बड़ाई खोय नींद भरि नाहीं सोना ।
तिल भरि रक्त न माँस नहीं आसिक को रोना ॥
पलटू बड़े बेकूफ वे आसिक होने जाहिँ ।
सीस उतारै हाथ से सहज आसिकी नाहीं ॥
(९)
झूलना
साहिब के दास कहाय यारो,
जगत की आस न राखिये जी ।
समरथ स्वामी को जब पाया,
जगत से दीन न भाखिये जी ॥
साहिब के घर मैं कौन कमी,
किस बात को अंतै आखिये जी ।
पलटू जो दुख सुख लाख परै,
वहि नाम सुधा रस चाखिये जी ॥
(१०)
झूलना
पहिले संसार से तोरि आवै,
तब बात पिया की पूछिये जी ।

पलटू साहिब ३२५
तरवार दोय है म्यान एकै,
किस भाँति से वा मैं कीजिये जी ॥
मीठे प्याले को दूर करौ,
कडु प्रेम पियाला पीजिये जी ।
पलटू जब सीस उतारि धरै,
तब राह पिया की लीजिये जी ॥
॥ सूरमा ॥
समुझि बूझि रन चढ़ना साधो, खूब लड़ाई लड़ना है ॥टेक॥
दम दम कदम परै आगे को, पीछे नाहिं पछरना है ।
तिल तिल घाव लगै जो तन मैं, खेत सेती क्या टरना है ॥१॥
सबद खैँचि समसेर¹ जेर करि, उन पाँचो को धरना है ।
काम क्रोध मद लोभ कैद करि, मन कर ठौरै मरना है ॥२॥
खड़ा रहै मैदान के ऊपर, उनकी चोट सँभरना है ।
आठ पहर असवार सुरत पर, गाफिल नाहीं परना है ॥३॥
सीस दिहा साहिब के ऊपर, किसकी डेर अब डेरना है ।
पलटू बाना रुंड² के ऊपर, अब क्या दूसर करना है ॥४॥
॥ पतिब्रता ॥
कुंडलिया
पतिबरता को लच्छन सब से रहै अधीन ॥
सब से रहै अधीन टहल वह सब की करती ।
सास ससुर औ भसुर ननद देवर से डरती ॥
सब को पोषन करै सभन की सेज बिछावै ।
सब को लेइ सुताय, पास तब पिय के जावै ॥
सूतै पिय के पास सभन को राखै राजी ।
ऐसा भक्त जो होय ताहि की जीती बाजी ॥
(१) शब्द रूपी तलवार । (२) धड़ ।
२६

२२६ शब्द संग्रह
पलटू बोलै मीठे बचन भजन मैं है लौलीन।
पतिबरता को लच्छन सब से रहै अधीन ॥
॥ साधु ॥
(१)
कुंडलिया
बड़ा होय तेहि पूजिये सन्तन किया बिचार ॥
सन्तन किया बिचार ज्ञान का दीपक लीन्हा।
देवता तैंतिस कोटि नजर मैं सब को चीन्हा ॥
सब का खंडन किहा खोजि के तीन निकारा।
तीनौं मैं दुइ सही मुक्ति का एकै द्वारा ॥
हरि को लिहा निकारि बहुर तिन मंत्र बिचारा।
हरि हैं गुन के बीच सन्त हैं गुन से न्यारा ॥
पलटू प्रथमै सन्त जन दूजे हैं करतार।
बड़ा होय तेहि पूजिये सन्तन किया बिचार ॥
(२)
कुंडलिया
सीतल चन्दन चन्द्रमा तैसे सीतल सन्त ॥
तैसे सीतल सन्त जगत की ताप बुझावैं।
जो कोइ आवै जरत मधुर मुख बचन सुनावैं ॥
धीरज सील सुभाव छिमा ना जात बखानी।
कोमल अति मृदु बैन बज्र को करते पानी ॥
रहन चलन मुसकान ज्ञान कौ सुगंधि लगावैं।
तीन ताप मिटि जाय संत के दरसन पावै ॥
पलटू ज्वाला उदर की रहै न मिटै तुरन्त।
सीतल चन्दन चन्द्रमा तैसे सीतल सन्त ॥

पलटू साहिब २२७
(३)
कुंडलिया
संत सासना सहत हैं जैसे सहत कपास ॥
जैसे सहत कपास नाय चरखा मैं ओटै ।
रूई धरि जब तुमै हाथ से दोउ निभोटै१ ॥
रोम रोम अलग़ाय पकरि के धुनिया धूनी ।
पिउनो२ नँह३ दै काति सूत ले जुलहा बूनी ॥
धोबी भट्ठी पर धरी कुन्दीगर मुँगरी मारी ।
दरजी टुक टुक४ फारि जोरि के किया तयारी ॥
पर-स्वारथ के कारने दुख सहै पलटूदास ।
संत सासना सहत हैं जैसे सहत कपास ॥
(४)
झूलना
सील सनेह सीतल बचन,
यही संतन की रीति है जी ।
सुनत वात के जुड़ाय जावै,
सब से करते वे प्रीति हैं जी ॥
चितवनि चलनि मुसकानि नवनि,
नहिँ राग द्वेष हार जीत है जी ।
पलटू छिमा संतोष सरल,
तिन कौ गावै स्रुति नीति५ है जी ॥
(५)
झूलना
पूरब पुन्न भये परगट, सतसंगति के बीच परी ।
आनँद भये जब संत मिले, वही सुभ दिन वहि सुभ घरी ॥
(१) नोचै । (२) रुई की मोटी बत्ती जिस से सूत निकालते हैं । (३) नाखून ।
(४) टुकड़े टुकड़े । (५) एक लिपि में "नेत" है ।

˙२२८ शब्द संग्रह
दरसन करत त्रय ताप मिटे, बिन कौड़ी दाम मैं जाय तरी।
पलटू आवागवन छूटा, जब चरनन की रज सीस धरी ॥
॥ दुष्ट ॥
कुंडलिया
पर दुख कारन दुख सहै सन असंत है एक ॥
सन असंत है एक काट के जल सैं सारै ।
कूँचै खैंचै खाल उपर से मुँगरा मारै ॥
तेकर बटि के भाँजि भाँजि कै बरतै रसरा ।
नर की बाँधै मुसुक बाँधते गउ औ बछरा ॥
अमरजाल फिर होय बझावै जलचर¹ जाई ।
खग मृग जीवा जंतु तेही मैं बहुत बझाई ॥
जिव दे जिव संतावते पलटू उनकी टेक ।
पर दुख कारन दुख सहै सन असंत है एक ॥
॥ ज्ञान ॥
(१)
कुंडलिया
पिय को खोजन मैं चली आपुइ गई हिराय ॥
आपुइ गई हिराय कवन अब कहै सँदेसा ।
जेकर पिय मैं ध्यान भई वह पिय के भेसा ॥
आगि माहिँ जो परै सोऊ अगनी ह्वै जावै ।
भृंगी कीट को भाँटि आपु सम लेइ बनावै ॥
सरिता बहि के गई सिंधु मैं रही समाई ।
सिव सक्ती के मिले नहीं फिर सक्ती आई ॥
पलटू दिवाल कहकहा² मत कोउ झाँकन जाय ।
पिय को खोजन मैं चली आपुइ गई हिराय ॥
(१) जल के जीव। (२) एक दीवार कहानी की जिसका होना चीन देश मैं
मशहूर है जिस पर चढ़ कर दूसरी ओर झाँकने से परिस्तान दीख पड़ता है
और ऐसा हर्ष होता है कि हँसी के मारे देखनेवाला बेइख़्तियार होकर उधर
कूद कर ग़ायब हो जाता है।

पलटू साहिब २२४
(२)
कुंडलिया
टेढ़ सोझ मुँह आपना ऐना टेढ़ा नाहिं ॥
ऐना टेढ़ा नाहिं टेढ़ को टेढ़े सूझै ।
जो कोइ देखे सोझ ताहि को सोझै बूझै ॥
जा को कछु नहिँ भेद भावना अपनी दरसै ।
जा को जैसी प्रीति मूरत सो तैसी परसै ॥
दुर्जन के दुर्बुद्धि पाप से अपने जरते ।
सज्जन के है सुमति सुमति से अपने तरते ॥
पलटू ऐना संत हैं सब देखै तेहि माहिँ ।
टेढ़ सोझ मुँह आपना ऐना टेढ़ा नाहिं ॥
(३)
अरिल
पहिले हो बैराग भक्ति तब कीजिये ।
सतसंगति के जोग ज्ञान तब लीजिये ॥
ऐसे उपजै ज्ञान भक्ति को पाइ कै ।
अरे हाँ पलटू ऊपरै लीजै मारि ठीक ठहराइ कै ॥
(४)
कहिबे से क्या भया भाई, जब ज्ञान आपु से होइ ॥टेक॥
अललपच्छ को चेटुका,१ वा को कौन करै उपदेस ।
उलटि मिलै परिवार मैं, वा से कौन कहै संदेस ॥ १ ॥
ज्योँ सिसु१ होत मराल२ के, वा को कौन सिखावै ज्ञान ।
नीर कँहै अलगाइ कै, वह छीर करतु है पान ॥ २ ॥
सिंह कै बच्चा गिरि पर्यो, वह खेलत तुरत सिकार ।
वा को कौन सिखावई, वो हस्ती डारत मार ॥ ३ ॥
(१) बच्चा। (२) हंस।

२३० शब्द संग्रह
संत को कौन सिखावता, उन्ह अनुभव भा परकास ।
सिखई बुधि केहि काम की, जो हृदय न पलटूदास ॥४॥
॥ सतसंग ॥
(१)
कुंडलिया
पारस के परसंग से लोहा महँग बिकान ॥
लोहा महँग बिकान छुए से कीमत निकरी ।
चंदन के परसंग चँदन भई बन की लकरी ॥
जैसे तिल का तेल फूल सँग महँग बिकाई ।
सतसंगति मैं पड़ा संत भा सदन कसाई ॥
गंग मैं है सुभगंग मिली जो नारा सोती ।
सीप बीच जो पड़ै बूंद सो होवै मोती ॥
पलटू हरि के नाम से गनिका चढ़ी बिमान ।
पारस के परसंग से लोहा महँग बिकान ॥
(२)
रेख़ता
बिना सतसंग ना कथा हरिनाम की,
बिना हरिनाम ना मोह भागै ।
मोह भागे बिना मुक्ति ना मिलैगी,
मुक्ति बिनु नाहिँ अनुराग लागै ॥
बिना अनुराग के भक्ति ना होयगी,
भक्ति बिनु प्रेम उर नाहिँ जागै ।
प्रेम बिनु राम ना राम बिनु संत ना,
पलटू सतसंग बरदान माँगै ॥