संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें˙२२८ शब्द संग्रह
दरसन करत त्रय ताप मिटे, बिन कौड़ी दाम मैं जाय तरी।
पलटू आवागवन छूटा, जब चरनन की रज सीस धरी ॥
॥ दुष्ट ॥
कुंडलिया
पर दुख कारन दुख सहै सन असंत है एक ॥
सन असंत है एक काट के जल सैं सारै ।
कूँचै खैंचै खाल उपर से मुँगरा मारै ॥
तेकर बटि के भाँजि भाँजि कै बरतै रसरा ।
नर की बाँधै मुसुक बाँधते गउ औ बछरा ॥
अमरजाल फिर होय बझावै जलचर¹ जाई ।
खग मृग जीवा जंतु तेही मैं बहुत बझाई ॥
जिव दे जिव संतावते पलटू उनकी टेक ।
पर दुख कारन दुख सहै सन असंत है एक ॥
॥ ज्ञान ॥
(१)
कुंडलिया
पिय को खोजन मैं चली आपुइ गई हिराय ॥
आपुइ गई हिराय कवन अब कहै सँदेसा ।
जेकर पिय मैं ध्यान भई वह पिय के भेसा ॥
आगि माहिँ जो परै सोऊ अगनी ह्वै जावै ।
भृंगी कीट को भाँटि आपु सम लेइ बनावै ॥
सरिता बहि के गई सिंधु मैं रही समाई ।
सिव सक्ती के मिले नहीं फिर सक्ती आई ॥
पलटू दिवाल कहकहा² मत कोउ झाँकन जाय ।
पिय को खोजन मैं चली आपुइ गई हिराय ॥
(१) जल के जीव। (२) एक दीवार कहानी की जिसका होना चीन देश मैं
मशहूर है जिस पर चढ़ कर दूसरी ओर झाँकने से परिस्तान दीख पड़ता है
और ऐसा हर्ष होता है कि हँसी के मारे देखनेवाला बेइख़्तियार होकर उधर
कूद कर ग़ायब हो जाता है।