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संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 267 में से

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पृष्ठ 226

शब्द कबीर २१७
निर्गुन से जिब आये, सगुन समाने हो साधो।
भूलि गये हरि नाम, माया लिपटाने हो साधो ॥२॥
जैसे तुरकी घोड़ खैँचि, लट बागा हो साधो।
ऊँच सीस भये नीच, चुगन लागे कागा हो साधो ॥३॥
आठ काठ के पिंजरा, दस दरवाजा हो साधो।
छनिक निकसा प्रान, कौन दिसि भागा हो साधो ॥४॥
रोवन घर की नारि, केस लट खोले हो साधो।
आज मंदिर भयो सून, कहाँ गये राजा हो साधो ॥५॥
आलहि¹ बाँस कटाइनि, डँड़िया फँदाइनि हो साधो।
पाँच पचीस घराती, लेइ सब धाये हो साधो ॥६॥
तीरे दिहिन उतारि, सकल नहवावैँ हो साधो।
करि लोरहो सिंगार, सकल जुरि आये हो साधो ॥७॥
आलहि चंदन कटाइनि, घेरि घर छाइनि हो साधो।
लोग कुटुम परिवार, दिहिनि पहुढ़ाई² हो साधो ॥८॥
लाइ दिहिनि मुख आग, काठ करि झारा हो साधो।
पुत्र लिये कर बाँस सीस गहि मारा हो साधो ॥६॥
चहुँ दिसि पवन झकोरै, तरवर डोलै हो साधो।
सूझत वार न पार, कौन दिसि जाना हो साधो ॥१०॥
इहवाँ नहिँ कोइ आपन, जे से मैं बोलौं हो साधो।
जस पुरइनि³ कर पात, अकेला मैं डोलाँ हो साधो ॥११॥
बिष बोयाँ संसार अमृत, कस पावौँ हो साधो।
पूरब जनम करि पाप, दोस केहि लावौँ हो साधो ॥१२॥
भौसागर की नदिया, पार कस जावौँ हो साधो।
गुरु बैठे मुख मोड़ि, मैं केहि गोहरावौँ हो साधो ॥१३॥
(१) जल्दी। (२) लेटाया। (३) कोई।