संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपलटू साहिब २२७
(३)
कुंडलिया
संत सासना सहत हैं जैसे सहत कपास ॥
जैसे सहत कपास नाय चरखा मैं ओटै ।
रूई धरि जब तुमै हाथ से दोउ निभोटै१ ॥
रोम रोम अलग़ाय पकरि के धुनिया धूनी ।
पिउनो२ नँह३ दै काति सूत ले जुलहा बूनी ॥
धोबी भट्ठी पर धरी कुन्दीगर मुँगरी मारी ।
दरजी टुक टुक४ फारि जोरि के किया तयारी ॥
पर-स्वारथ के कारने दुख सहै पलटूदास ।
संत सासना सहत हैं जैसे सहत कपास ॥
(४)
झूलना
सील सनेह सीतल बचन,
यही संतन की रीति है जी ।
सुनत वात के जुड़ाय जावै,
सब से करते वे प्रीति हैं जी ॥
चितवनि चलनि मुसकानि नवनि,
नहिँ राग द्वेष हार जीत है जी ।
पलटू छिमा संतोष सरल,
तिन कौ गावै स्रुति नीति५ है जी ॥
(५)
झूलना
पूरब पुन्न भये परगट, सतसंगति के बीच परी ।
आनँद भये जब संत मिले, वही सुभ दिन वहि सुभ घरी ॥
(१) नोचै । (२) रुई की मोटी बत्ती जिस से सूत निकालते हैं । (३) नाखून ।
(४) टुकड़े टुकड़े । (५) एक लिपि में "नेत" है ।