संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ शब्द संग्रह
जेहि बैरिन कर मूल, ताहि हित मान्योँ हो साधो।
पलटुदास गुरु ज्ञान सुनत, अलगान्योँ हो साधो ॥१४॥
(२)
कुंडलिया
खेलु सिताबी फाग तू बीती जात बहार ॥
बीती जात बहार सम्बत लगने पर आया।
लीजै डफ्फ बजाय सुभग मानुष तन पाया ॥
खेलो घूँघट खोलि लाज फागुन मैं नाहीं।
जे कोउ करिहै लाज काज ना सपनेहुँ माँहीं ॥
प्रेम की माट भराय सुरति की करु पिचुकारी।
ज्ञान अबीर बनाय नाम की दीजै गारी ॥
पलटू रहना है नहीं सुपना यह संसार।
खेलु सिताबी फाग तू बीती जात बहार ॥
(३)
कुंडलिया
क्या सोवै तू बावरी चाला जात बसंत ॥
चाला जात बसंत कंत ना घर मैं आये।
धृग जीवन है तोर कंत बिन दिवस गँवाये ॥
गर्ब गुमानी नारि फिरै जोबन की माती।
खसम रहा है रूठि नहीं तू पठवै पाती ॥
लगै न तेरो चित्त कंत को नाहिं मनावै।
का पर करै सिंगार फूल की सेज बिछावै ॥
पलटू ऋतु भरि खेलि ले फिर पछितैहै अंत।
क्या सोवै तू बावरी चाला जात बसंत ॥