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संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

? Let's zoom in on जगजीवन ...: Letter 1: चLetter 2:रwithि->रिLetter 3:त! Wait, is that चरित्र? Look at the letters: ज ग ज ी व नspace First letter:चorस? It has a flat top, curve... wait, is it स? Wait, compare with साँईin line 7:सhas a left loop, horizontal connector, right vertical bar. In line 1, the second word: Letter 1: it has a loop on the left? No, it looks likeसा? No, wait! Wait, look at जगजीवन साहिबvsजगजीवन चरित: Wait, what is this book? Is it "जगजीवन चरित"? Wait! Jagjivan Sahib's life story is "जगजीवन चरित्र"? Wait, look at line 26: जगजिवन गुरु चरन सरनंLook at line 8:जगजीवन कै इतनी बिनतीNow look at line 1 header: Letter 1:सorच? Wait, let's look at the second word of line 1: It has: सorच`?
Wait, it has

१३८ शब्द संग्रह
(६)
साईँ मोहिँ भरोस तुम्हारा ।
मोरे बस नहिँ अहै एकौ, तुमहिँ करो निस्तारा ॥ १ ॥
मैं अज्ञान बुद्धि है नाहीं, का करि सकौँ बिचारा ।
जब तुम लेत पढ़ाय सिखावत, तब मैं प्रगट पुकारा ॥२॥
बहुतन भवसागर महँ बूड़त, तेहिँ उबारि कै तारा ।
बहुतन काँ जब कष्ट भयो है, तिन कै कष्ट निवारा ॥३॥
अब तौ चरन कि सरनहिँ आयौँ, गह्यौँ मैं पच्छ तुम्हारा ।
जगजीवन के साईँ समरथ, मोहिँ बल अहै तुम्हारा ॥४॥
(१०)
साहिब अजब कुदरत तोर ।
देखि गति कहि जात नाहीं, केतिक मति है मोर ॥१॥
नचत सब कोउ काछि कछनी, भ्रमत फिर बिन डोर ।
होत औगुन आप तैं, सब देत साहिब खोर१ ॥ २ ॥
कौल करि जग पठै दीन्ह्यो, तौन डाऱ्यो तोर२ ।
करत कपटं संत तेतीँ, कहैँ मोरी मोर ॥ ३ ॥
ऐसी जग की रीति आहै, कहा कहिये टेर ।
जगजिवनदास चरन गुरू के, सुरत करिये पोढ़ ॥ ४ ॥
(११)
चरनन तर दियो माथ, करिये अब मोहिँ सनाथ ।
दास करिकै जानी ॥ १ ॥
बूड़ा सब जगत सार, सूझै नहिँ वार पार ।
देखि नैनन बूझिय हित आनी ॥ २ ॥
सुमति मोहिँ देउ सिखाय, आनि मैं न रहि लुभाय ।
बुद्धिहीन भजनहीन, सुद्धि नाहिं आनी ॥ ३ ॥
(१) दोष । (२) तोड़ ।

सहस फन तैं सेस गावै, संकर तेहिँ ध्यान लावै।
ब्रह्मा वेद परगट कहै बानी ॥ ४ ॥
कहौँ का कहि जात नाहीं, जोती वा सर्ब माहिँ।
जगजीवन दरस चहै, दीजै बरदानी ॥ ५ ॥
(१२)
आरत अरज लेहु सुनि मोरी।
चरनन लागि रहै दृढ़ डोरी ॥ १ ॥
कबहूँ निकट तैं टारहु नाहीं।
राखहु मोहिँ चरन की छाहौँ ॥ २ ॥
दीजै केतिक बास यहँ कीजै।
अघ कर्म मेटि सरन करि लीजै ॥ ३ ॥
दासन दास ह्वै कहौँ पुकारी।
गुन मोहिँ नहिँ तुम लेहु सँवारी ॥ ४ ॥
जगजीवन कौँ आस तुम्हारी।
तुम्हरी छबि मूरति पर वारी ॥ ५ ॥
(१३)
केतिक बूझि, का आरति करऊँ। जैसे रखिहहिँ तैसे रहऊँ॥१
नाहीं कछु बसि आहै मोरी। हाथ तुम्हारे आहै डोरी ॥२
जस चाहौ तस नाच नचावहु। ज्ञान बास करि ध्यान लगावहु॥३
तुमहिँ जपत तुमहीँ बिसरावत। तुमहिँ चिताइ सरन लै आवत ॥४
दूसर कवन एक है सोई। जेहिँ कौँ चाहौ भक्त सो होई ॥५
जगजीवन करि बिनय सुनावै। साहिब समरथ नहिँ बिसरावै ॥६
(१४)
होली
यहि जग होरी, अरी मोहिँ तैं खेलि न जाई।
साईं मोहिँ बिसराय दियो है, तब तैं पर्यौ भुलाई ॥१॥

१४० शब्द संग्रह
सुख परि सुद्धि गई हरि मोरी, चित्त चेत नहिँ आई ।
अनहित हित करि जानि बिषै महँ, रह्यो ताहि लपटाई ॥२
यहि साँचे महँ पाँचौ नाचैँ, अपनि अपनि प्रभुताई ।
मैं का करौँ मोर बस नाहीं, राखत हैं अरुझाई ॥ ३ ॥
गगन मँदिल चलि थिर ह्रै रहिये, तकि छबि छकि निरथाई।
जगजीवन सखि साईँ समरथ, लेहैँ सबै बनाई ॥ ४ ॥
॥ साध ॥
(१)
जब मन मगन भा मस्तान ।
भयो सीतल महा कोमल, नाहिँ भावै आन ॥ १ ॥
डोरि लागी पोढ़ि गुरु तैँ, जगत तैँ बिलगान ।
अहै मता अगाध तिन का, करै को पहिचान ॥ २ ॥
अहँ ऐसे जगत माँ कोई, कहत आहँ ज्ञान ।
ऐसे निरमल ह्रै रहे हैं, जैसे निरमल भान ॥ ३ ॥
बड़ा बल है ताहि के रे, थमा है असमान ।
जगजिवन गुरु चरन परि कै, निर्गुनं धरि ध्यान ॥ ४ ॥
(२)
गऊ निकसि बन जाहीँ। बाछा उन घर ही माहीँ ॥ १ ॥
तृन चरहिँ चित्त सुत पासा। यहि जुक्ति साध जग बासा॥२
साध तैँ बड़ा न कोई । कहि राम सुनावत सोई ॥ ३ ॥
राम कही हम साधां। रस एक मता ओराधा ॥ ४ ॥
हम साध साध हम माहीं। कोउ दूसर जानै नाहीं ॥५॥
जिन दूसर करि जाना। तेहिँ होइहि नरक निदाना ॥६॥
जगजिवन चरन चित लावै। सो कहि के राम समुझावै ॥७

जगजीवन साहब १४१
॥ भेद ॥
(१)
जा के लगी अनहद तान हो, निरवान निरगुन नाम को॥१॥
जिकर करके सिखर हेरे, फिकर रारंकार की ॥२॥
जा के लगी अजपा गगन झलकै, जोति देख निसान की॥३
मधु मुरली मधुर बाजै, बाँए किंगरी सारँगी ॥ ४ ॥
दहिने जो घंटा संख बाजै, गैब धुन झनकार की ॥५॥
अकह की यह कथा न्यारी, सीखा नाहीं आन है ॥ ६॥
जगजिवन प्रानहि सोधि के, मिलि रहे सतनाम है ॥ ७ ॥
(२)
गगरिया मोरी चित सेाँ उतरि न जाय ॥ टेक ॥
इक कर करवा¹ एक कर उवहनि², बतियाँ कहैँ अरथाय॥१॥
सास ननद घर दारुन आहै, ता सेाँ जियरा डेराय ॥२॥
जो चित छूटै गागर फूटै, घर मोरि सासु रिसाय ॥३॥
जगजीवन अस भक्ती मारग, कहत अहँ गोहराय ॥

(chandrabindu)?

  • Wait! Look at कहैँ!
  • In करैँ (Line 2): क, र with two slants and chandrabindu: करैँ.
  • In Line 13: क, ह with two slants and chandrabindu: कहैँ!
  • Wait, is there an aa-matra? Look closely: between ह and प्रगट:
  • Wait, is there an aa-matra? NO! There is no vertical line after ह!
  • Look at कहैँ: क + ह with ai-matra + chandrabindu = कहैँ!
  • Wait, let's look again: is it कहैँ or कहाँ?
  • Wait, look above the ह: there is an ai-matra ै with a dot/crescent: कहैँ.
  • Wait, let's re-read the sentence:
  • "कहैँ प्रगट पुकारि जेहि के, प्रीति अंतर आहिँ ।"
  • "जगजिवन दास रीति अस, तब चरन महँ मिलि जाहिँ ॥ ७"
  • "कहैँ प्रगट पुकारि" = they say / I say openly calling out, whoever has love inside

जगजीवन साहिब १४३
भर्म नहिँ तहँ भयो निर्भय, सत्त रत बैरागि ।
जगजीवन निरबान भे, गुरु दया जागे भागि ॥ ५ ॥
(२)
मन तन खाक करि कै जानु ।
नीच तैँ हूँ नीच, तेहि तैँ नीच आपुहि मानु ॥ १ ॥
त्यागु मैं तैँ दीन हूँ रहु, तजहु गर्व गुमान ।
देतु हैँ उपदेस याहै, निरखु सो निरबान ॥ २ ॥
कर्म धागा लाय बाँधा, हिंदु मूसलमान ।
खैँचि लीन्ह्यो तोरि धागा, बिरल कोइ बिलगान ॥३॥
खाक है सब खाक होइहि, समुझि आपन ज्ञान ।
सबद् सत कहि प्रगट भाखौँ, रहहि नाम निदान ॥ ४ ॥
काल को डर नाहिँ तिन्ह कौँ, चौथ¹ रहि चौगान ।
जगजीवन दास सतगुरु के, चरन रहि लपटान ॥ ५ ॥
(३)
मन मैं जेहिँ लागी जस भाई ।
सो जानै तैसे अपने मन, का सौँ कहै गोहराई ॥ १ ॥
साँची प्रीति की रीति है ऐसी, राखत गुप्त छिपाई ।
झूठे कहुँ सिखि लेत अहहिँ पढ़ि, जहँ तहँ झगरा लाई ॥२
लागे रहत सदा रस पागे, तजे अहहिँ दुचित्ताई ।
ते मस्ताने तिनहीँ जाने, तिनहिँ को देइ जनाई ॥ ३ ॥
राखत सीस चरन तैँ लागा, देखत सीस उठाई ।
जगजीवन सतगुरु की मूरति, सूरति रहे मिलाई ॥ ४ ॥
(४)
जो कोइ घरहिँ बैठा रहै ।
पाँच संगत करि पचीसौ, सबद अनहद लहै ॥ १ ॥
(१) चौथे लोक में।

१४४ शब्द संग्रह
दीन सीतल लीन मारग, सहज बाहनि बहै ।
कुमति कर्म कठोर काठहिँ, नाम पावक दहै ॥ २ ॥
मारि मैं तैं लाय डोरी, पवन थाम्हे रहै ।
चित्त कर तहँ सुमति साधू, सुरति माला गहै ॥ ३ ॥
राति दिन छिन नाहिँ छूटै, भक्त सोई अहै ।
जगजीवन कोइ संत बिरला, सबद की गति कहै ॥ ४ ॥
(५)
सत्त नाम बिना कहौ, कैसे निस्तरिहै ॥ टेक ॥
कठिन अहै माया जार, जा को नहिँ वार पार,
कहौ काह करिहै ॥ १ ॥
हो सचेत चौँकि जागु, ताहि त्यागि भजन लागु,
अंत भरम परिहै ॥ २ ॥
डारहि जमदूत फाँसि, आइहि नहिँ रोइ हाँसि,
कौन धीर धरिहै ॥ ३ ॥
लागहि नहिँ कोइ गोहारि, लेइहि नहिँ कोइ उबारि,
मनहिँ रोइ रहिहै ॥ ४ ॥
भगनी सुत नारि भाइ, मातु पितु सखा सहाइ,
तिनहिँ कहा कहिहै ॥ ५ ॥
काहुक नहिँ कोऊ जगत, मनहिँ अपने जानु गत,
जीवत मरि जाहु दीन अंतर माँ रहिहै ॥ ६॥
सिद्ध साध जोगि जती, जाइहि मरि सब कोई,
रसना सतनाम गहि रहिहै ॥ ७ ॥
जगजीवनदास रहै, बैठे सतगुरु के पास,
चरन सीस धरि रहिहै ॥ ८ ॥

यारी साहिब
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १२० ]
॥ गुरुदेव ॥
झूलना
गुरु के चरन की रज लै के, दोउ नैन के बिच अंजन दीया।
तिमिर मेटि उँजियार हुआ, निरंकार पिया को देखिलिया॥
कोटि सुरज तहँ छिपे घने, तीनि लोक धनी धन पाइ पिया।
सतगुरु ने जो करी किरपा, मरि के यारी जुग जुग जीया ॥
॥ अनहद शब्द ॥
(१)
झिलमिल झिलमिल बरखै नूरा,
नूर जहूर सदा भरपूरा ॥ १ ॥
रुनझुन रुनझुन अनहद बाजै,
भँवर गुँजार गगन चढ़ि गाजै ॥ २ ॥
रिमझिम रिमझिम बरखै मोती,
भयो प्रकास निरंतर जोती ॥ ३ ॥
निरमल निरमल निरमल नामा,
कह यारी तहँ लियो बिस्रामा ॥ ४ ॥
(२)
सुन्न के मुकाम मैं बेचून१ की निसानी है ॥ १ ॥
जिकिर२ रूह सोई अनहद बानी है ॥ २ ॥
अगम को गम्म नाहीं झलक पिसानी३ है ॥ ३ ॥
कहै यारी आपा चीन्हे सोई ब्रह्मज्ञानी है ॥ ४ ॥
(१) मालिक । (२) सुमिरन । (३) पेशानी माथा ।
१६

१४६ शब्द संग्रह
॥ प्रेम ॥
(१)
बिरहिनी मंदिर दियना बार ॥ टेक ॥
बिन बाती बिन तेल जुगति सौँ, बिन दीपक उँजियार ॥१
प्रान पिया मेरे गृह आयो, रचि पचि सेज सँवार ॥ २ ॥
सुखमन सेज परम तत रहिया, पिय निर्गुन निरकार ॥३॥
गावहु री मिलि आनंद मंगल, यारी मिलि के यार ॥४॥
(२)
होली
हौँ तो खेलौँ पिया सँग होरी ॥ १ ॥
दरस परस पतिबरता पिय की, छबि निरखत भइ बौरी ॥२
सोरह कला सँपूरन देखौँ, रबि ससि भे इक ठौरी ॥ ३ ॥
जब तैँ दृष्टि परी अबिनासी, लागो रूप ठगौरी ॥४॥
रसना रटत रहत निस बासर, नैन लगे यहि ठौरी ॥५॥
कह यारी भक्ती करू हरि की, कोई कहै सो कहौ री ॥६॥
॥ भेद ॥
(१)
झूलना
दोउ मूँदि के नैन अंदर देखा, नहिँ चाँद सुरज दिनरातिहैरे ।
रोसन समा बिनुतेल बाती, उस जोति सैँसैलिफानि¹हैरे॥
गोला मारि देखो आदम, कोउ अवर नाहिं सँगसाथिहैरे ।
यारी कहै तहकीक किया, तू मलकउलमौत² की जाति है रे ॥
(२)
झूलना
जमीँ बरखै असमान भींजै, बिन बातिहिँ तेल जलाइये जी।
जहाँ नूर तजल्ली³ बीच है रे, चैरंगी रंग दिखाइये जी ॥
(१) गुन। (२) जमराज । (३) प्रकाश।

यारी साहिब १४७
फूल बिना जदि फल होवै, नहि हीर¹ की लज्जत पाइये जी ।
यारो कहै यहि कौन बूझै, यह का सौं बात जनाइये जी ॥
॥ उपदेश ॥
(१)
कवित्त
गहने के गढ़े तैं कहौं सोनो भी जातु है ।
सोनो बीच गहनो और गहनो बीच सोन है ॥
भीतर भी सोनो और बाहर भी सोन दीसै ।
सोनो तो अचल अंत गहनो को मीच² है ॥
सोन को तो जानि लीजै गहनो बरबाद कीजै ।
यारी एक सोनो ता मैं ऊँच कवन नीच है ॥
(२)
झूलना
बिन बंदगी इस आलम में, खाना तुझे हराम है रे ।
बंदा करै सोइ बंदगी, खिदमत में आठो जाम है रे ॥
यारी मौला बिसारि के, तू क्या लागै बेकाम है रे ।
कुछ जीते बंदगी करले, आखिर को गौर³ मुकाम है रे ॥
॥ मिश्रित ॥
कवित्त
आँधरे को हाथी हरि, हाथ जा को जैसो आयो ।
बूझा जिन जैसो, तिन तैसोई बतायो है ॥ १ ॥
टकटोरी दिन रैन, हिये हू के फूटे नैन ।
आँधरे को आरसी मैं, कहा दरसायो है ॥ २ ॥
मूल की खबरि नाहिं, जा सौं यह भयो मुलुक ।
वा को बिसारि भौंदू, डारै⁴ अरुझायो है ॥ ३ ॥
आपनो सरूप रूप, आपु माहिं देखै नाहिं ।
कहै यारी आँधरे ने, हाथी कैसो पायो है ॥४॥
(१) तत्व, गूदा । (२) मृत्यु । (३) क़वर । (४) शाखा मैं ।

दरिया साहिब (बिहार वाले)
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १२१]
॥ अनहद ॥
होरी सद् संत समाज संतन गाइया ॥ टेक ॥
बाजा उमँग झाल झनकारा, अनहद धुन गहराइया ।
झरि झरि परत सुरंग रंग तहँ, कौतुक नभ मैं छाइया ॥१॥
राग रुबाध अघोर तान तहँ, झिनझिन जंतर लाइया ।
छवो राग छत्तीस रागिनी, गंधर्ब सुर सत्र गाइया ॥२॥
पाँच पचीस भवन मैं नाचहिँ, भर्म अबीर उड़ाइय ।
कह दरिया चित चन्दन चर्चित, सुन्दर सुभग सुहाइया ॥३॥
॥ विरह ॥
अमर पति प्रीतम काहे न आवो ।
तुम सत बर्ग है, ऋतु सुहावन, किमि नहिँ उर गहि लावोँ ॥१
बरषा विबिधि प्रकार पवन अति, गरजि घुमरि गहरावा ।
बुन्द अखंडित मंडित महि पर, छटा चमक चहुँ जावो ॥२
झींगुर झनकि झनकि झनकारहि, बान विरह उर लावो ।
दादुर मोर सोर सघन बन, पिय बिनु कछु न सुहावो ॥३॥
सरिता उमडि घुमडि जल छावो, लघु दीर्घ सत्र बढ़ियावो ।
थाके पंथ पथिक नहिँ आवत, नैनन मैं झरि लावोँ ॥४॥
केहि पूछौं पछितावत दिल मैं, जो पर होइ उड़ि धावौँ ।
जो पिय मिलैं तो मिलौं प्रेम भरि, अमि भाजन भरि लावों १ ॥५॥
है बिस्वास आस दिल मेरे, फिरि दृग दर्शन पावैँ ।
कह दरिया धन भाग सुहागिनि, चरन कँवल लपटावो ॥६॥
(१) अमृत से बरतन को भर लूँ ।

दरिया साहिब (बिहार वाले) १४६
॥ प्रेम ॥
तुम मेरो साँई मैं तेरो दास, चरन कँवल चित मेरो बास ॥१॥
पल पल सुमिराँ नाम सुबास, जीवन जग मैं देखो दास ॥२॥
जल मैं कुमुदिनि चन्द अकास, छाड़ रहा छत्रिपहुपबिलास ॥३
उनमुनि गगन भया परगास, कह दरिया मेटा जम त्रास' ४
॥ विनय ॥
(१)
अब के बार बकस मोरे साहिब ।
तुम लायक सब जोग हे ॥ १ ॥
गुनह१ बकसिहै सब भ्रम नसिहै ।
रखिहै आपन पास हे ॥ २ ॥
अच्छै बिरिछि तरि लै बैठैहै ।
तहवाँ धूप न छाँह हे ॥ ३ ॥
चाँद न सुरज दिवस नहिँ तहवाँ ।
नहिँ निसु होत बिहान हे ॥ ४ ॥
अमृत फल मुख चाखन दैहै ।
सेज सुगन्धि सुहाय हे ॥ ५ ॥
जुग जुग अचल अमर पद दैहै ।
इतनी अरज हमार हे ॥ ६ ॥
भौसागर दुख दारुन मिटि है ।
छुटि जैहै कुल परिवार हे ॥ ७ ॥
कह दरिया यह मंगल मूला ।
अनूप फुलै जहाँ फूल हे ॥ ८ ॥
(२)
मैं जानहुँ तुम दीन-दयाल ।
तुम सुमिरे नहिँ तपत काल ॥ १ ॥
(१) पाप, दोष ।

१५० शब्द संग्रह
ज्यौं जननी प्रतिपाले सूत¹ ।
गर्भ बास जिन दियो अकूत ॥ २ ॥
जठर अगिनि तैं लियो है काढ़ि ।
ऐसी वा की ठवर गाढ़ि ॥ ३ ॥
गाढ़े जो जन सुमिरन कीन्ह ।
परघट जग मैं तेहि गति दीन्ह ॥ ४ ॥
गरबी मारेउ गैब बान ।
संत को राखेउ जीव जान ॥ ५ ॥
जल मैं कुमुदिनि इन्दु² अकास ।
प्रेम सदा गुरु चरन पास ॥ ६ ॥
जैसे पपिहा जल से नेह ।
बुन्द एक बिस्वास तेह ॥ ७ ॥
स्वर्ग पताल मृत मंडल तीनि ।
तुम ऐसे साहिब मैं अधीन ॥ ८ ॥
जानि आयो तुम चरन पास ।
निज मुख बोलेउ कहेउ दास ॥ ९ ॥
सत पुरुष बचन नहिं होहिं आन ।
बलु पूरब से पच्छिम उगहि भान ॥ १० ॥
कह दरिया तुम हमहिँ एक ।
ज्यौं हारिल की लकड़ी टेक³ ॥ ११ ॥
॥ भेद ॥
मानु सबद जो करु बिबेक ।
अगम पुरुष जहँ रूप न रेख ॥ १ ॥
(१) पुत्र । (२) चंद्रमा । (३) हारिल चिड़िया चंगुल में लकड़ी पकड़े बिना
ज़मीन पर नहीं उतरती ।

दरिया साहिब (बिहार वाले) १५१
अठदल कँवल सुरति लौ लाय ।
अजपा जपि के मन समुझाय ॥ २ ॥
भँवरगुफा मैं उलटि जाय ।
जगमग जोति रहे छवि छाय ॥ ३ ॥
बंक नाल गहि खैंचे सूत ।
चमके बिजुली जोती बहुत ॥ ४ ॥
सेत घटा चहुँ ओर घनघोर ।
अजरा जहवाँ होय अँजोर ॥ ५ ॥
अमिय कँवल निज करै बिचार ।
चुवत बुन्द जहँ अमृत धार ॥ ६ ॥
छव चक्र खोजि करै निवास ।
मूल चक्र जहँ जिव को बास ॥ ७ ॥
काया खोजि जोगी भुलान ।
काया बाहर पद निरबान ॥ ८ ॥
सतगुर सबद जो करै खोज ।
कहैं दरिया तब पूरन जोग ॥ ६ ॥
॥ उपदेश ॥
(१)
पेड़ को पकरु तब डारि पालो मिलै ।
डारि गहि पकर नहिं पेड़ याग¹ ॥
देख दिब दृष्टि अस्मान में चन्द्र है ।
चन्द्र की जोति अनगिनित तारा ॥ १ ॥
आदि औ अंत सब मध्य है मूल मैं ।
मूल मैं फूल धौं केति डारा ॥
(१) हे यार पेड़ पकड़ने से डाल पत्ती भी मिल जायगी पर डाल के पकड़ने
से पेड़ नहीं हाथ आवैगा ।

१५२ शब्द संग्रह
नाम निर्गुन निर्लेप निर्मल बरै ।
एक से अनँत सब जगत सारा ॥ २ ॥
पढ़ि बेद कितेब बिस्तार वक्ता कथै ।
हांरि बेचून वह नूर न्यारा ॥
निर्पँच निर्बान निःकर्म निःभर्म वह ।
एक सर्बज्ञ सत नाम प्यारा ॥ ३ ॥
तजु मान मनी करु काम को काबू१ यह ।
खोजु सतगुरु भरपूर सूरा ॥
असमान कै बुन्द गरकाब२ हूआ ।
दरियाव की लहरि कहि बहुरि मूरा३ ॥ ४ ॥
(२)
भीतर मैलि चहल४ कै लागी, ऊपर तन का धोवै है ॥१॥
अविगति मूरति महल के भीतर, वा का पंथ न जोवै है ॥२॥
जुगुति बिना कोइ भेद न पावै, साधुसंगति का गोवै है ॥३
कह दरिया कुटने रे गीदी५, सीस पटकि का रोवै है ॥४॥
॥ मिश्रित ॥
सत सुकृत दूनौँ खंभा हो, सुखमनि लागलि डोरि ।
[L

दरिया साहिब (माड़चार वाले। १५३
कौन झुलावै कौन भूलहिँ हो, कौन बैठालि खाट ।
कौन पुरुष नहिँ झूलहिँ हो, कौन रोकै बाट ॥ ४ ॥
मन रे झुलावै जिव भूलहिँ हो, सक्ति बैठालि खाट ।
सत्त पुरुष नहिँ झूलहिँ हो, कुमति रोकै बाट ॥ ५ ॥
सुर नर मुनि सब झूलहिँ हो, झूलहिँ तीनि देव ।
गनपति फनपति¹ झूलहिँ हो, जोगि जती सुकदेव ॥६॥
जीव जंतु सब झूलहिँ हो, झूलहिँ आदि गनेस ।
कल्प कोटि लै झूलहिँ हो, कोइ कहै न सँदेस ॥ ७ ॥
सत्त सब्द जिन पावल हो, भयो निर्मल दास ।
कहै दरिया दर देखिय हो, जाय पुरुष के पास ॥ ८ ॥
दरिया साहिब (मारवाड़ वाले)
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतवानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १२६]
॥ नाम ॥
नाम बिन भाव करम नहिँ छूटै ॥ टेक ॥
साध संग औ राम भजन बिन, काल निरंतर लूटै ॥ १ ॥
मल सेती जो मल को धोवै, सो मल कैसे छूटै ॥ २ ॥
प्रेम का साबुन नाम का पानी, दुइ मिलि ताँता टूटै ॥ ३ ॥
भेद अभेद भरम का भाँडा, चौड़े परि परि फूटै ॥ ४ ॥
गुरुमुख सबद गहै उर अंतर, सकल भरम से छूटै ॥ ५ ॥
राम का ध्यान धरहु रे प्रानी, अमृत का मैँह बूटै² ॥६॥
जन दरियाव अरप दे आपा, जरा मरन तब टूटै ॥ ७ ॥
(१) शेष नाग । (२) बरसै ।
२०

१५४ शब्द संग्रह
॥ प्रेम ॥
(१)
बाबल१ कैसे बिसरा जाई ।
यदि मैं पति सँग रल खेलूँगी, आपा धरम समाई ॥टेक॥
सतगुर मेरे किरपा कीन्ही, उत्तम बर परनाई२ ।
अब मेरे साईँ को सरम पड़ेगी, लेगा चरन लगाई ॥१॥
थे३ जानराय मैं बाली भोली, थे निर्मल मैं मैली ।
वे बतरायें४ मैं बोल न जानूँ, भेद न सकूँ सहेली ॥ २ ॥
थे ब्रह्म भाव मैं आतम कन्या, समझ न जानूँ बानी ।
दरिया कहै पति पूरा पाया, यह निश्चय करि जानी ॥३॥
(२)
कहा कहूँ मेरे पिउ की बात ।
जो रे कहूँ सोइ अंग सुहात ॥ टेक ॥
जब मैं रही थी कन्या क्वारी ।
तब मेरे करमे हता५ सिर भारी ॥ १ ॥
जब मेरी पिउ से मनसा दौड़ी ।
सतगुर आन सगाई जोड़ी ॥ २ ॥
तब मैं पिउ का मंगल गाया ।
जब मेरा स्वामी ब्याहन आया ॥ ३ ॥
हथलेवा दै बैठी संगा ।
तब मोहिँ लीन्ही बायें अंगा ॥ ४ ॥
जन दरिया कहै मिटि गइ दूती६ ।
आपा अरपि पीव सँग सूती ॥ ५ ॥
(१) बाप । (२) ब्याह कराया । (३) तुम । (४) बात करें । (५) था । (६) द्वैत भाव ।

दरिया साहिब (मारवाड़ वाले)
॥ भेद ॥
पतिव्रता पति मिली है लाग ।
जहँ गगन मँडल में परम भाग ॥ टेक ॥
जहँ जल बिन कँवला बहु अनंत ।
जहँ बपु¹ बिन भौंरा गोह² करंत ॥ १ ॥
अनहद बानी अगम खेल ।
जहँ दीपक जरै बिन बाती तेल ॥ २ ॥
जहँ अनहद सबद है करत घोर ।
बिन मुख बोलै चात्रिक मोर ॥ ३ ॥
बिन रसना गुन उदत³ नार ।
बिन पग पातर निरतकार⁴ ॥ ४ ॥
जहँ जल बिन सरवर भरा पूर ।
जहँ अनँत जोत बिन चंद सूर ॥ ५ ॥
बारह मास जहँ रितु बसंत ।
ध्यान धरैं जहँ अनँत संत ॥ ६ ॥
त्रिकुटी सुखमन चुवत छीर ।
बिन बादल वरखै मुक्ति नीर ॥ ७ ॥
अमृत धारा चलै सीर⁵ ।
कोइ पीवै बिरला संत धीर ॥ ८ ॥
ररंकार धुन अरूप एक ।
सुरत गही उनहीं की टेक ॥ ९ ॥
जन दरिया बैराट चूर ।
जहँ बिरला पहुँचे संत सूर ॥ १० ॥
) शरीर । (२) गुंजार । (३) गाती है। (४) वेश्या नाचती है। (५) ठंडी ।

१५६ शब्द संग्रह
॥ पारख ॥
जा के उर उपजी नहिँ भाई ।
सो क्या जाने पीर पराई ॥ टेक ॥
ब्यावर१ जानै पीर की सार ।
बाँझ नार क्या लखै बिकार ॥ १ ॥
पतिव्रता पति को व्रत जानै ।
बिभचारिनि मिलि कहा बखानै ॥ २ ॥
हीरा पारख जौहरि पावै ।
मूरख निरख के कहा बतावै ॥ ३ ॥
लागा घाव कराहै सोई ।
कौतुकहार२ के दर्द न कोई ॥ ४ ॥
राम नाम मेरा प्रान-अधार ।
सोई राम रस पीवनहार ॥ ५ ॥
जन दरिया जानैगा सोई ।
(जाके) प्रेम की झाल कलेजे पोई ॥ ६ ॥
॥ मिश्रित ॥
संतो कहा गृहस्थ कहा त्यागी ।
जेहि देखूँ तेहि बाहर भीतर, घट घट माया लागी ॥टेक॥
माटी की भीत पवन का थंभा, गुन औगुन से छाया ।
पाँच तत्त आकार मिलाकर, सहजाँ गिरह बनाया ॥१॥
मन भयो पिता मनसा भइ माई, दुख सुख दोनों भाई ।
आसा तृस्ना बहिनैँ मिलकर, गृह की साँज३ बनाई ॥२॥
मोह भयो पुरुष कुबुधि भइ घरनी४, पाँचो लड़का जाया ।
प्रकृति अनंत कुटुंबी मिलकर, कलहल५ बहुत उपाया ॥३॥
(१) लड़कोरी । (२) बनाघट करने वाला, तमाशा देखने वाला । (३) सामान ।
(४) स्त्री । (५) झगड़ा ।