संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० शब्द संग्रह
सुख परि सुद्धि गई हरि मोरी, चित्त चेत नहिँ आई ।
अनहित हित करि जानि बिषै महँ, रह्यो ताहि लपटाई ॥२
यहि साँचे महँ पाँचौ नाचैँ, अपनि अपनि प्रभुताई ।
मैं का करौँ मोर बस नाहीं, राखत हैं अरुझाई ॥ ३ ॥
गगन मँदिल चलि थिर ह्रै रहिये, तकि छबि छकि निरथाई।
जगजीवन सखि साईँ समरथ, लेहैँ सबै बनाई ॥ ४ ॥
॥ साध ॥
(१)
जब मन मगन भा मस्तान ।
भयो सीतल महा कोमल, नाहिँ भावै आन ॥ १ ॥
डोरि लागी पोढ़ि गुरु तैँ, जगत तैँ बिलगान ।
अहै मता अगाध तिन का, करै को पहिचान ॥ २ ॥
अहँ ऐसे जगत माँ कोई, कहत आहँ ज्ञान ।
ऐसे निरमल ह्रै रहे हैं, जैसे निरमल भान ॥ ३ ॥
बड़ा बल है ताहि के रे, थमा है असमान ।
जगजिवन गुरु चरन परि कै, निर्गुनं धरि ध्यान ॥ ४ ॥
(२)
गऊ निकसि बन जाहीँ। बाछा उन घर ही माहीँ ॥ १ ॥
तृन चरहिँ चित्त सुत पासा। यहि जुक्ति साध जग बासा॥२
साध तैँ बड़ा न कोई । कहि राम सुनावत सोई ॥ ३ ॥
राम कही हम साधां। रस एक मता ओराधा ॥ ४ ॥
हम साध साध हम माहीं। कोउ दूसर जानै नाहीं ॥५॥
जिन दूसर करि जाना। तेहिँ होइहि नरक निदाना ॥६॥
जगजिवन चरन चित लावै। सो कहि के राम समुझावै ॥७