संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 148, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंसहस फन तैं सेस गावै, संकर तेहिँ ध्यान लावै।
ब्रह्मा वेद परगट कहै बानी ॥ ४ ॥
कहौँ का कहि जात नाहीं, जोती वा सर्ब माहिँ।
जगजीवन दरस चहै, दीजै बरदानी ॥ ५ ॥
(१२)
आरत अरज लेहु सुनि मोरी।
चरनन लागि रहै दृढ़ डोरी ॥ १ ॥
कबहूँ निकट तैं टारहु नाहीं।
राखहु मोहिँ चरन की छाहौँ ॥ २ ॥
दीजै केतिक बास यहँ कीजै।
अघ कर्म मेटि सरन करि लीजै ॥ ३ ॥
दासन दास ह्वै कहौँ पुकारी।
गुन मोहिँ नहिँ तुम लेहु सँवारी ॥ ४ ॥
जगजीवन कौँ आस तुम्हारी।
तुम्हरी छबि मूरति पर वारी ॥ ५ ॥
(१३)
केतिक बूझि, का आरति करऊँ। जैसे रखिहहिँ तैसे रहऊँ॥१
नाहीं कछु बसि आहै मोरी। हाथ तुम्हारे आहै डोरी ॥२
जस चाहौ तस नाच नचावहु। ज्ञान बास करि ध्यान लगावहु॥३
तुमहिँ जपत तुमहीँ बिसरावत। तुमहिँ चिताइ सरन लै आवत ॥४
दूसर कवन एक है सोई। जेहिँ कौँ चाहौ भक्त सो होई ॥५
जगजीवन करि बिनय सुनावै। साहिब समरथ नहिँ बिसरावै ॥६
(१४)
होली
यहि जग होरी, अरी मोहिँ तैं खेलि न जाई।
साईं मोहिँ बिसराय दियो है, तब तैं पर्यौ भुलाई ॥१॥