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संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 267 में से

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जगजीवन साहिब १४३
भर्म नहिँ तहँ भयो निर्भय, सत्त रत बैरागि ।
जगजीवन निरबान भे, गुरु दया जागे भागि ॥ ५ ॥
(२)
मन तन खाक करि कै जानु ।
नीच तैँ हूँ नीच, तेहि तैँ नीच आपुहि मानु ॥ १ ॥
त्यागु मैं तैँ दीन हूँ रहु, तजहु गर्व गुमान ।
देतु हैँ उपदेस याहै, निरखु सो निरबान ॥ २ ॥
कर्म धागा लाय बाँधा, हिंदु मूसलमान ।
खैँचि लीन्ह्यो तोरि धागा, बिरल कोइ बिलगान ॥३॥
खाक है सब खाक होइहि, समुझि आपन ज्ञान ।
सबद् सत कहि प्रगट भाखौँ, रहहि नाम निदान ॥ ४ ॥
काल को डर नाहिँ तिन्ह कौँ, चौथ¹ रहि चौगान ।
जगजीवन दास सतगुरु के, चरन रहि लपटान ॥ ५ ॥
(३)
मन मैं जेहिँ लागी जस भाई ।
सो जानै तैसे अपने मन, का सौँ कहै गोहराई ॥ १ ॥
साँची प्रीति की रीति है ऐसी, राखत गुप्त छिपाई ।
झूठे कहुँ सिखि लेत अहहिँ पढ़ि, जहँ तहँ झगरा लाई ॥२
लागे रहत सदा रस पागे, तजे अहहिँ दुचित्ताई ।
ते मस्ताने तिनहीँ जाने, तिनहिँ को देइ जनाई ॥ ३ ॥
राखत सीस चरन तैँ लागा, देखत सीस उठाई ।
जगजीवन सतगुरु की मूरति, सूरति रहे मिलाई ॥ ४ ॥
(४)
जो कोइ घरहिँ बैठा रहै ।
पाँच संगत करि पचीसौ, सबद अनहद लहै ॥ १ ॥
(१) चौथे लोक में।

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