संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 153, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें१४४ शब्द संग्रह
दीन सीतल लीन मारग, सहज बाहनि बहै ।
कुमति कर्म कठोर काठहिँ, नाम पावक दहै ॥ २ ॥
मारि मैं तैं लाय डोरी, पवन थाम्हे रहै ।
चित्त कर तहँ सुमति साधू, सुरति माला गहै ॥ ३ ॥
राति दिन छिन नाहिँ छूटै, भक्त सोई अहै ।
जगजीवन कोइ संत बिरला, सबद की गति कहै ॥ ४ ॥
(५)
सत्त नाम बिना कहौ, कैसे निस्तरिहै ॥ टेक ॥
कठिन अहै माया जार, जा को नहिँ वार पार,
कहौ काह करिहै ॥ १ ॥
हो सचेत चौँकि जागु, ताहि त्यागि भजन लागु,
अंत भरम परिहै ॥ २ ॥
डारहि जमदूत फाँसि, आइहि नहिँ रोइ हाँसि,
कौन धीर धरिहै ॥ ३ ॥
लागहि नहिँ कोइ गोहारि, लेइहि नहिँ कोइ उबारि,
मनहिँ रोइ रहिहै ॥ ४ ॥
भगनी सुत नारि भाइ, मातु पितु सखा सहाइ,
तिनहिँ कहा कहिहै ॥ ५ ॥
काहुक नहिँ कोऊ जगत, मनहिँ अपने जानु गत,
जीवत मरि जाहु दीन अंतर माँ रहिहै ॥ ६॥
सिद्ध साध जोगि जती, जाइहि मरि सब कोई,
रसना सतनाम गहि रहिहै ॥ ७ ॥
जगजीवनदास रहै, बैठे सतगुरु के पास,
चरन सीस धरि रहिहै ॥ ८ ॥