संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 147, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें१३८ शब्द संग्रह
(६)
साईँ मोहिँ भरोस तुम्हारा ।
मोरे बस नहिँ अहै एकौ, तुमहिँ करो निस्तारा ॥ १ ॥
मैं अज्ञान बुद्धि है नाहीं, का करि सकौँ बिचारा ।
जब तुम लेत पढ़ाय सिखावत, तब मैं प्रगट पुकारा ॥२॥
बहुतन भवसागर महँ बूड़त, तेहिँ उबारि कै तारा ।
बहुतन काँ जब कष्ट भयो है, तिन कै कष्ट निवारा ॥३॥
अब तौ चरन कि सरनहिँ आयौँ, गह्यौँ मैं पच्छ तुम्हारा ।
जगजीवन के साईँ समरथ, मोहिँ बल अहै तुम्हारा ॥४॥
(१०)
साहिब अजब कुदरत तोर ।
देखि गति कहि जात नाहीं, केतिक मति है मोर ॥१॥
नचत सब कोउ काछि कछनी, भ्रमत फिर बिन डोर ।
होत औगुन आप तैं, सब देत साहिब खोर१ ॥ २ ॥
कौल करि जग पठै दीन्ह्यो, तौन डाऱ्यो तोर२ ।
करत कपटं संत तेतीँ, कहैँ मोरी मोर ॥ ३ ॥
ऐसी जग की रीति आहै, कहा कहिये टेर ।
जगजिवनदास चरन गुरू के, सुरत करिये पोढ़ ॥ ४ ॥
(११)
चरनन तर दियो माथ, करिये अब मोहिँ सनाथ ।
दास करिकै जानी ॥ १ ॥
बूड़ा सब जगत सार, सूझै नहिँ वार पार ।
देखि नैनन बूझिय हित आनी ॥ २ ॥
सुमति मोहिँ देउ सिखाय, आनि मैं न रहि लुभाय ।
बुद्धिहीन भजनहीन, सुद्धि नाहिं आनी ॥ ३ ॥
(१) दोष । (२) तोड़ ।