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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

२२२ नामदेव की हिन्दी कविता
बिना मढा मृदंग बजता है, बिना सावन के, बिना बादल के वर्षा होती है।
सचमुच नामदेव के अलंकार अनुभूति को रूप देने के लिए हैं—हृदयंगम कराने
के लिए हैं : इनमें कही चमत्कारिता नही है ।
उदाहरण
काल हमारे सुख का कभी भी अंत कर सकता है। मछली पानी में रहती है।
वह समझती है कि वह सुरक्षित और सुखी है, परन्तु अचानक जाल रूपी काल में फँस
जाती है। उसका सुख तिरोहित हो जाता है । इसे 'उदाहरण' से स्पष्ट करते हैं—
जैसे मीनु पानी में रहे
काल जाल को सुधि नही लहै ।
—पञ्जाबातील नामदेव
मधुमक्खी मधु का संचय करती है, क्या वह उसका उपभोग ले पाती है ?
गाय अपने बछड़े के लिए दूध का संचय करती है, पर क्या वह उसके बच्चे को मिल
पाता है ? अहीर गला बाँधकर उसे दुह लेता है :—
जिउ मधुमाखी संचै अपार
मधु लीनो मुखि दीनी छारु ।
गउ बाछरुऊ संचै खीरु
गला बांधि दुहि लैहि अहीरु ।
—पंजाबातील नामदेव ।
इसीलिए नामदेव कहते हैं कि अपने या अपने कुटुम्बियों के लिए धन-संचय
करने में क्यो अपने जीवन को गँवाते हो ? निर्भय होकर भगवान का भजन करो।
मारवाडी को जैसे पानी प्यारा है और ऊँट को जैसे वनस्पति प्रिय है उसी
तरह मुझे मेरा विठ्ठल प्यारा है—
मारवाडि जैसे नीरु बालहा बेलि बालहा करहला ॥
—सं० ना० हि० प०, (२०२)
कितने अनुभूत और सूक्ष्म-भरे उदाहरण हैं ।
उत्प्रेक्षा
नामदेव ने अपने भावो की व्यंजना में सादृश्यमूलक अलंकारों का आश्रय
अधिक लिया है अतः उनकी रचनाओ में उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग नही के बराबर
हुआ है।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २२३
चित्र विधान
जो काम चित्रकार अपनी तूलिका से करता है वह रेखाचित्रकार शब्दों से
करता है। नामदेव ने कुछ घटनाओं (प्रसंगों) तथा व्यक्तियों के कलापूर्ण रेखा-चित्र
अंकित किये हैं।
प्रसंग वर्णन
कृष्ण का मृत्तिका भक्षण :- कुछ गोप बालक यशोदा से कृष्ण के मृत्तिका
भक्षण की बात कहते हैं। इसपर यशोदा उनको डांटती है। श्रीकृष्ण के खुले मुंह में
जब वह ब्रह्मांड का दर्शन करती है तब आश्चर्यचकित हो जाती है। १
इसके अतिरिक्त "तीर्थयात्रा' के दिनों में नामदेव का अपनी भक्ति के जोरपर
सूखे कुएँ में से पानी निकालना, ज्ञानेश्वर की समाधि, नामदेव का भक्ति गर्व परिहार
आदि प्रसंगों का नामदेव ने कलापूर्ण अंकन किया है।
व्यक्ति चित्र
नामदेव द्वारा धनी-मानी, सगे-सम्बन्धी, धर्मभ्रष्ट, ब्राह्मण, ढोंगी साधु, संत
सज्जन आदि के अंकित चित्र बड़े ही मनोज्ञ हैं।
बगला भक्तों की आलोचना करते हुए नामदेव कहते हैं कि 'नारायण से इनका
मन नही लगता। इनसे संयम का पालन नहीं होता। तालाब में प्रवेश कर शरीर को
स्वच्छ करते है पर इनका अंतःकरण अशुद्ध ही रहता है।"२
आडंबर का भंडा फोड़ करते हैं कि 'वह गुणसागर गोपाल छल-कपट से नहीं
मिलता। गोपीचंद का टीका लगाना तथा गले में माला पहनाना दिखावा मात्र है।'
१. मुलें सांगताती। माती खातो गे श्रीपती ॥
लाकूड घेऊनि हातांत। माती खातो का पुसत ॥
भावा भुललासे खरा। कांपतसे थरथरा ॥
मुख दिये उघडोनि। दावी तेव्हा चक्रपाणी ॥
ब्रह्मांडे देखिली। नामा म्हणे वेड़ी झाली ॥
—अभंग ६६।
२. नराइन सू मन न रंजे। संजम चूके अरु ध्रत पडे।
जलहर पैसि पषाले काया। अंतरि मैल न लउ उतरे ॥
—सं० ना० हि० प०, पद १०३।

१२४ नामदेव की हिन्दी कविता
सच्ची भक्ति नही ।'१
मराठी रचनाओं में ऐसे व्यक्तियों के चित्र पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। वेष-
धारी साधु छापा तिलक लगाते हैं और भोले भाले जनों को लूटते हैं।२ वे लोगों से
कहते हैं कि वे हरि के भक्त हैं पर उनका मन घर-गृहस्थी में फँसा रहता है, उससे
विरक्त नही होता ।३
नामदेव द्वारा अंकित मुक्ताबाई का चित्र बहुत सरस बन पड़ा है।४ नामदेव
द्वारा वर्णित प्रसंग तथा उनके बनाये रेखा चित्र उनकी सरल भाषा शैली के प्रमाण हैं।
नामदेव की छंदोरचना
मराठी रचनाओं में प्रयुक्त छंद—प्राचीन मराठी का सारा साहित्य आद्य कवि
मुकुंदराज से लेकर समर्थ रामदास तक पद्यात्मक ही है। 'ओवी' तथा 'अभंग' इन संत
कवियों के प्रिय छंद रहे हैं। लयबद्धता तथा गान सुलभता मराठी के अभंग की विशेप-
ताएँ हैं। इस पर ज्ञानदेव के उत्कृष्ट अभंगों का आदर्श नामदेव के सामने था ही। अत
रचना की सुकरता की दृष्टि से कहिये अथवा अनुकरणशीलता की दृष्टि से कहिये,
नामदेव ने अभंग ही को अपनाया।
अभंग की लंबाई की कोई सीमा नही होती। इसीलिए यह अभंग (अटूट)
कहलाता है। दो से लेकर दो सौ 'चौक' भी एक अभंग में आ सकते हैं। एक अभंग के
चार चरण होते हैं और साढ़े तीन चरणों का एक 'चौक' होता है। इन चरणों में अक्षर
मात्रा और गण का कोई नियम लागू नही होता।
छंद दोष
नामदेव की रचनाओं में यत्र तत्र छंद दोष पाये जाते हैं। वे स्वीकार करते हैं
———
१ कपट मैं न मिलै गोविंद गुन सागर गोपाल ।
गोपी चंदन तिलक बनावै । कठहु लावै माल ॥ टेक ॥
—स० ना० हि० प०, पद १४२ ।
२ टिळे टोपी माला दावी । भोल्या भाविकांसी गोंवी ॥
—अभंग १८३७ ।
३ लोकापुढे सांगे आम्हो हरिभक्त । न होय विरक्त स्थिति ज्याची ।
—सकल संत गाथा, अभंग १८३६ ।
४ लहानशी मुक्ताई जैसी सणकाडी ।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २२५

कि 'मैं बहुतश्रुत तथा ज्ञानशील नही हूँ ।'¹ अभङ्ग की रचना किस प्रकार की जाय यह
भी मैं नही जानता ।'² कारण यह है कि उन्होने छंदशास्त्र का विधिवत् अध्ययन नही
किया था । उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि काव्य के लिए तीव्र अनुभूति और
चिंतन की गहनता अपेक्षित है न कि छंद, अलंकार, शब्द शक्ति और अन्य काव्य गुण ।
हिंदी रचनाओं में प्रयुक्त छंद
नामदेव की हिंदी रचनाओ में कुछ पद हैं और कुछ साखियां ये छोटे-छोटे छंद
हैं । श्री गुरु ग्रन्थ साहब में संगृहीत नामदेव के ६१ पदों के साथ रागों के नाम
दिये गये हैं। पूना विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित 'संत नामदेव की हिंदी पदावली'
में कुछ ही पदों पर रागों के नाम दिये गये हैं, शेष पर नही । इन पदों में गउडी, चैती,
आसा, गूजरी, सोरठि, धनासरी, टोडी, तिलंगु, बिलावलु, रामकली, मारू, भैरउ,
बसंतु, सारंग, मलार, कानडा, प्रभाती आदि राग-रागनियां प्रयुक्त हैं। इस संदर्भ में
डॉ० रामचंद्र मिश्र का मत द्रष्टव्य है ।³
शैली
जैसे भाषा भावो और विचारों का वाहन है वैसे ही शैली का भी ।
क्योकि शैली भाषा के रूप में ही हमारे सम्मुख आती है । शैलीकार का एकमेव लक्ष्य
होता है अपने श्रोता, पाठक या दर्शक को प्रभावित करना । इस उद्दिष्ट की पूर्ति के
लिए शैलीकार का सारा अवधान अपनी शैली के शृंगार पर केन्द्रीभूत होता है ।
नामदेव का काव्य उत्स्फूर्त है, उसमें अनुभूति और अभिव्यक्ति में विलक्षण एक-
रूपता है । उन्होंने अपने एक अभंग⁴ में सांग रूपक के द्वारा पांडुरंग की षोडशोपचार
पूजा का चित्र अंकित किया है । उनकी अनुभूतियां अलंकृत होकर ही अभिव्यक्त होतो
१. नव्हे बहुश्रुत, नव्हे ज्ञानशील । —वही, अभंग ६२४ ।
२. अभंगाची कला नाहो मी नेणत ।
—श्री नामदेव गाथा, अभग, १३८२ ।
३. नामदेव के पदो में गृहीत राग-रागिनियां शास्त्रीय ध्रुपद शैली में गेय रही है
जिनकी दीर्घ परम्परा भारतीय संगीत शास्त्रो में विद्यमान है । इन रागो के अपने
रूप हैं, अपने गान-काल हैं और अपने रस है ।
—हिंदी पद परम्परा और तुलसीदास, पृ० ६५-६६ ।
४. देह देव्हारा पाट हृदय संपुट । मधी कृष्ण मूर्त बसविली ।
प्रेमाचे पाण्यानें प्रक्षालीन तुज । आत्मस्वरूप नि पांडुरंगा ।।
—अभंग, १८०२ ।
१५

२२६ नामदेव की हिन्दी कविता
है। उनकी शैली मानो उनके भावों तथा विचारों की भाषागत अभिव्यक्ति ही है। १
आचार्य कुन्तक ने शैली का सम्बन्ध व्यक्ति के स्वभाव से स्थापित किया है।
वे कहते हैं कि शक्तिमान और शक्ति का भेद नहीं किया जा सकता। व्यक्ति के सुकु-
मार आदि स्वभाव के अनुकूल ही उसकी शैली होती है। २
संत नामदेव एक सरल हृदय के व्यक्ति थे। उनकी भावुकता का परिचय उनकी
रचनाओं में सर्वत्र मिलता है। परमात्मा ही एक मात्र सब कुछ है, वही सब के बाहर
तथा भीतर सब कहीं व्याप्त है और उसी के प्रति एकनिष्ठ होकर रहना चाहिए। इसीको
वे अपना धर्म मानते हैं। इसी प्रकार के भावों से उनका हृदय सदा भरा रहता है और
इसी कारण वे सारे जगत् को एक उदार-चेता प्रेमी की दृष्टि से देखा करते हैं।
नामदेव ने अपना काव्य कलात्मक प्रदर्शन के लिए नहीं लिखा। उनकी रचना
का प्रधान उद्देश्य 'स्वान्तः सुखाय' के साथ ही साथ परोपकार भी था। उसमें लोक-
मंगल पर ही अधिक बल दृग्गोचर होता है। संसार के माया-जाल में फँसे हुए अज्ञ जनों
पर उनको तरस आता था। उनके उद्धार का संकल्प वे इस प्रकार घोषित करते हैं—
'कीर्तन में भक्ति का उपदेश करते हुए आनन्द विभोर होकर मैं नाचूँगा और भक्ति के
ज्ञान का दीप इस प्रकार जलाऊँगा कि पाप रूपी अंधकार नष्ट हो जाये।' ३
'मुझे पते की बात विदित हुई। अब मैं भागवत धर्म का प्रचार करूँगा।' ४
'मैं दुख से भरा हुआ यह संसार सुख-मय करूँगा। मैं संतों के साथ कीर्तन में
अपने उपदेश-परक अभंगों का गान करते समय नाचूँगा।' ५
१. All style is gesture, the gesture of the mind and of the soul.
—Style by Walter Raleigh p. 127.
२. कवि स्वभाव भेद निबंधनत्वेन काव्य प्रस्थानभेद गाहते। वक्रोक्तिजीविति,
प्रथमोन्मेष।
३. नाचूँ कीर्तनाचे रंगीं। ज्ञानदीप लावूँ जगीं।
—सकल संत गाथा, अभंग १३६२।
४. आम्हा सापडले वर्म। करुँ भागवत धर्म।
—सकल संत गाथा, अभंग १४२६।
५. अवघाचि संसार सुखाचा करीन। जरी झाला दुःखाचा दुर्धरु हा।
संत समागमी नाचेन रंगणी। तेणे जाईल निघोनी त्रिविध ताप।
—सकल संत गाथा, अभंग १५०१।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २२७
संसारी जनों को चेतावनी
नामदेव ने अपना काव्य कलात्मक प्रदर्शन के लिए नही लिखा। उनका प्रमुख
उद्देश्य था सामाजिक प्रबोधन अथवा जागरण। लोक मंगल की भावना ही इसकी प्रेरक
रही है।
किसी वस्तु अथवा व्यक्ति से सचेत अथवा सतर्क रहने का आदेश या उपदेश
चेतावनी है। नामदेव के काव्य में ऐसी चेतावनियां प्रचुर मात्रा में मिलती हैं। नामदेव
अपनी अनुभूति के आधार पर कहते हैं—'हे जीव ! तू जाग, तू अपना रास्ता भूल गया
है। हे अज्ञानी ! यह औघट घाट है और तुझे दूर जाना है।'१
'हे मेरे मन ! तू गोविंद के चरणों से लो लगा। हरि को छोड़ अन्यत्र न जा।
बलिराजा के समान श्रेष्ठ राजा भी चार युग तक न जिये। 'मेरा मेरा' कहनेवाले अंत
में संसार को छोड़कर चले गये।'२
'हे नर ! मनुष्य जन्म पाकर भी तू सचेत नही होता। काल का पंजा सदैव
तेरे सिर पर है!'३
'नामस्मरण कर मैं भव सागर पार हुआ। हरिभजन के बिना तू आवागौन के
फेर से मुक्त न होगा।'४
उनकी कथन शैली की विशेषता उनके छल-हीन हृदय, निद्वंद्व जीवन एवं
आध्यात्मिक उल्लास द्वारा अनुप्राणित है और वह बिना सुझाये ही विदित हो जाती है।
ईश्वरोन्मुख होने के लिए नामदेव ने कतिपय प्रेरणाएँ दी हैं जिनके द्वारा कोई भी
व्यक्ति भगवद्भक्त हो सकता है।
१. जागि रे जीव कहा भुलाना। आगे पीछे जाना ही जाना॥
भगत नामदेव चेति अयाना। औघट घाट अरु दूरि पयोना॥
—पद १२२।
२. मन मंझा तू गोविंद चरन चित लाइ रे।
हरि तजि अनत न जाइ रे॥ टेक॥
—१०५।
३. मनिषा जनम आई र्नहि चेता। अंधे पसु गंवांरा।
तेरे सिर काल सदा सर साधै। नामदेव करत पुकारा रे नर॥
—पद ६२।
४. नामदेव उतरयो पार। चेतहु रे चेतनहार।
हरि की भगति बिन। औतरोगे बारंबार॥
—पद ६८।

२३८ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव का नाम महाराष्ट्र के विख्यात 'संत पंचायत' अर्थात् पाँच प्रमुख संतो
के समुदाय में लिया जाता है। उत्तर भारत के सबसे प्रसिद्ध संत कबीर ने उनके प्रति
श्रद्धा के भाव प्रदर्शित करते हुए कहा है—'जिस प्रकार पहले युगों में भक्त उद्धव,
अक्रूर, हनुमान, शुकदेव तथा शंकर हुए थे उसी प्रकार कलि काल में नामदेव तथा
जयदेव का आविर्भाव हुआ था।'१
संत नामदेव में संत ज्ञानेश्वर जैसा काव्यरचना का भाव जागृत नहीं था। वे
विद्वान नहीं थे। उनका साहित्यशास्त्र का अध्ययन भी नहीं था। परन्तु उनका हृदय
स्वाभाविकता से कवि का था। वे अतीव संवेदनक्षम थे। दूसरों के प्रति उनके हृदय में
तड़पन, दया और प्रेम था। अतः उनके अभंगों की आत्मा भावना है न कि कल्पना।
भावोद्भूत काव्य रस प्रधान होता है न कि अलंकृत। 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्' के
अनुसार यह श्रेष्ठ काव्य है। यह पूर्णतया कोमल है। सुकुमारता इसकी प्रकृति है। यह
भक्ति, शांत और करुण रस से ओतप्रोत है। यह उचित शब्दालंकार तथा अर्थालंकार
को धारणा करता है परन्तु कृत्रिम अलंकारों की अपेक्षा स्वाभाविक सुकुमारता तथा
मधुरता की ओर वह अधिक झुका है। संत नामदेव के फुटकर अभङ्ग उनके हृदय में
न समा सकने वाले भक्ति-भाव और प्रेम-रस से लबालब हैं। वे तो भक्ति रस की वर्षा
से सारे महाराष्ट्र को आप्लावित करने को आतुर थे। इसीलिए संत ज्ञानेश्वर ने
कहा था कि 'नामदेव का सरल कथन भी कवित्व है और उसका रस अद्भुत तथा
निरुपम है।'२
अन्य एक स्थान पर वे कहते हैं—'हे नामदेव ! तुम्हारे रस भरे वचन सागर
से भी अथाह हैं। उनके अनुशीलन से नित नया आनंद प्राप्त होता है।'३ इससे अधिक
क्या प्रशंसा हो सकती है ?
पिछली शताब्दी के मार्मिक समीक्षक स्व० प्रो० वा० ब० पटवर्धन ने नामदेव
१. जागे सुक उद्धव अक्रूर हणवंत जागे से लंगूर ।
संकर जागे धरन सेष, कलि जागे नामा जैदेव ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० ३०२ ।
२. परि नामयाचे बोलणें नव्हे हे कवित्व । हा रस अद्भुत निरुपमु ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६२७ ।
३. सिंधूनि सखोल सरस तुझे बोल । आनंदाची डोल नित्य नवी ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ६२५ ।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २१६
की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।१
संत नामदेव का असाधारण कर्तृत्व
संत नामदेव एक महान् भगवद् भक्त हुए। महाराष्ट्र के वारकरी सम्प्रदाय के
वे प्रभावशाली प्रवर्तक थे। इस संप्रदाय के संतों के वे आद्य चरित्रकार हैं। 'नाम वेद'
के प्रमुख प्रचारक हैं। प्रेमाभक्ति के प्रणेता हैं। सांप्रदायिकों के श्रद्धा स्थान हैं।
कीर्तन प्रथा के तो एक प्रकार से वे अध्वर्यु ही हैं।
१३ वीं शताब्दी में उत्तरी भारत पर मुसलमानों का आतंक छाया हुआ था।
ऐसी परिस्थिति में नामदेव ने भागवत धर्म का झंडा उत्तर भारत मे फहराया। वे
निर्गुण मत के प्रथम प्रचारक तथा हिंदी गीत शैली के प्रथम गायक कहे जा सकते हैं।
उन्होंने अपने उपदेशों से कबीर तथा अन्य परवर्ती संतों का मार्ग प्रशस्त किया। इस
संदर्भ में आचार्य विनयमोहन शर्मा२ तथा प० परशुराम चतुर्वेदी३ के मन्तव्य उल्लेखा-
नीय हैं।
१. 'नामदेव की कविता में हमें उस प्रकाश के रोमांच का अनुभव होता है जो समुद्र
या धरती पर कभी नहीं उतरा। उसमें हमे उस स्वप्न के दर्शन होते हैं जो इस
मिट्टी के धरती पर कभी नही झलका, उस प्रेम की प्रतीति होती है जिसने वासना
को कभी उत्तेजित नही किया। उसमे वो करुणा, विश्वास और भक्ति का रोमांच
है तथा मानव आत्मा का परमात्म शक्ति के प्रति आत्मसमर्पण है। उसमें हम
भक्ति अथवा आध्यात्मिक प्रेम का रोमांच, हृदय का हृदय के प्रति संगीतमय
निवेदन और उद्वेलित भावातुर हृदय के उद्गार पाते है।'
—विल्सन फिलालॉजिकल व्याख्यान माला।
२. 'उनमें उत्तरी भारत की संत परम्परा का पूर्व आभास मिलता है। उनके परवर्ती
संतो पर निश्चय ही उनका प्रभाव पड़ा है जिसे उन्होंने सर्व भाव से स्वीकार किया
है। ऐसी दशा में उन्हे उत्तर भारत में निर्गुण भक्ति का प्रवर्तक मानने में हमे
कोई झिझक नहीं होनी चाहिए। संभवतः हिंदी जगत् तक उनके सम्बन्ध मे
पर्याप्त जानकारी न पहुँच सकने के कारण उन्हें वह स्थान नहीं प्राप्त हो सका
जिसके वे अधिकारी हैं।'
—हिंदी को मराठी संतों की देन, पृ० १२६।
३. 'किन्तु इतना हम निःसंकोच भाव के साथ कह सकते हैं कि उत्तरी भारत
के संत भी नामदेव के बहुत ऋणी है और उनके लिए (तथा महाराष्ट्र के संतो
के लिए भी) सन्त नामदेव ने एक पथ प्रदर्शक का काम किया है।'
—उत्तरी भारत की संत परम्परा, पृ० १०७।

२३० नामदेव की हिन्दी कविता
उन दिनो प्रचार के इतने साधन उपलब्ध न होते हुए भी नामदेव ने जो कार्य
किया उसे देखकर हम आश्चर्यचकित होते है। उन्होंने यह सब कुछ भक्ति के प्रचार
के लिए किया, इसमें उनका कोई स्वार्थ नही था। वे परमात्मा से यही प्रार्थना करते
है कि संत सदा सुखी हो, हरि के भक्तों को दीर्घायु प्राप्त हो तथा जिनकी जिह्वा पर
पाडुरंग का नाम है, उनका कल्याण हो।
नामदेव की लोकप्रियता का प्रमाण इसीसे मिलता है कि निम्नलिखित परवर्ती
संत कवियो ने आदर के साथ उनका स्मरण किया है—
(१) गुरु परसादी जैदेव नामा। भगति के प्रेम इन्हहि है जाना।
—कबीर
(२) नामा कबीर सु फोन पे गुन राश बाँका।
भगति समानी सब घरति तजि कुल काना मा॥
—रज्जबजी
(३) जैसे नाम कबीरजो यों साधु कहाया।
आदि अंत सौ आइके राम राम समाया॥
—सुन्दरदास
(४) नामदेव कबीर जुलाहो जन रैदास तिरे।
दादू बेगि बार नहिं लागे, हरि सौं सबै खरे॥
—दादू दयाल
(५) धू प्रहलाद, कबीर, नामदेव पापंड कोई न राख्या।
बैठि इवंत नाव निज सीमा वेद भागोत यूँ भाख्या।
—बषानाजी
(६) नामदेव, कबीर, तिलोचन सधना सैनु तरे।
कहि रविदास सुनहु रे संतों, हरि जीउ ते सबै सरे।
—रैदास
'नामदेव की वाणी यद्यपि सीधी-सादी भाषा में है तथापि वह भक्ति रसमयी
और अन्तर को भेदने वाली है। उसमें हम योग साधना की निर्मलता के साथ-साथ
भक्ति की विह्वलता भी पाते हैं। हिन्दी के संत साहित्य को नामदेव महाराज की भाव
पूर्ण वाणी पर गर्व है।'
—वियोगी हरि, संक्षिप्त सन्त सुधा सार, पृ० २३।
नामदेव की हिन्दी पदावली की भाषा की कुछ विशेषताएँ
भाषा के इतिहास में चौदहवीं शताब्दी में लिखित ब्रजभाषा की किसी अन्य

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २३१
रचना का उल्लेख नही मिलता । यह बात अवश्य है कि इस काल की रचना में ब्रज-
भाषा के अंकुर दिखाई पड़ने लगे थे। यह तथ्य उल्लेखनीय है कि नामदेव ने चौदहवी
शताब्दी के पूर्वार्ध में ही ब्रजभाषा में पदों की रचना की है। नामदेव के पदों में यह
स्पष्ट है कि उनमें मराठी और खड़ी बोली के तत्त्व हैं किन्तु यह बिलकुल स्वाभाविक
है। ब्रजभाषा और खड़ी बोली पास-पास की भाषाएँ थी और इनका विकास भी साथ-
साथ हो रहा था । सामान्य लोग दोनों भाषाओं के मिले जुले रूप का प्रयोग करते थे ।
सन्त नामदेव ने भी उसी में अपने पदों को रचा है। मराठी उनकी मातृभाषा थी,
जिसके कई शब्द और रूप उनके हिंदी पदों में सहज ही आ गये हैं। नामदेव के सम-
कालीन अन्य कवियों की भाषा उतनी विकसित ब्रजभाषा नही है जितनी नामदेव के
पदो की । अन्य रचनाओं में अपभ्रन्श के तत्त्व काफी मात्रा में विद्यमान हैं। अतः नाम-
देव को ब्रजभाषा का प्रथम कवि कहा जा सकता है।
अब हम नामदेव की हिन्दी पदावली की भाषा की निम्नलिखित विशेषताओं
पर विचार करेंगे :—
वाक्य रचना
नामदेव की हिन्दी में अधिकांश संज्ञाएँ वाक्य के अन्य शब्दों से अपना सम्बन्ध
बिना कारक-चिह्नों तथा परसर्गों के दिखाती हैं। जिन संज्ञाओ का कर्म के जैसा प्रयोग
हुआ है वे बिना कारक चिन्हो के प्रयुक्त हुई है—
(१) पाखंड भगति राम नहि रीझे । पद २१—पंक्ति ४ (करण कारक)
(२) दहूँ घोड़ा न चढ़ाइ हो कान्हा । पद ३६—पंक्ति ६ (अधिकरण कारक)
(३) जैसे कनकतुला चित राखिला । पद १६—पंक्ति १ (संबंध, अधिकरण)
(४) पावक दार जतन करि काढ़यो । पद ८२—पंक्ति ४ (अपादान कारक)
यद्यपि कुछ वाक्यो मे कर्म अध्याहृत (Understood) होता है फिर भी
संदर्भ से उसका अर्थ समझ में आ सकता है—
'अब मोरी छूटि परी ।' ८-२
इस वाक्याश में कर्म 'बंधन' अध्याहृत है।
कुछ संज्ञाओ के साथ गलत कारक-चिह्नो का प्रयोग किया गया है। जैसे—
(१) गुरु को सबद वैकुंठ—निसरनी । (२६-३)
सम्बन्ध कारक के कारक चिह्न 'का' के स्थान पर यहाँ संप्रदान कारक के
'को' का प्रयोग किया गया है।
निम्नलिखित उदाहरण में इसके ठीक विपरीत कारक का प्रयोग हुआ है—
(२) भाव भगति नाना विधि कीन्ही, फल का कौन करी । ८-३

  • )
    'प्रवाल' और 'जल' एक दूसरे से दूर रखे गये है । यद्यपि दोनों एक सामासिक
    शब्द हैं—'प्रवाल जल'
    (क) सामासिक पद के शब्द स्थानान्तर कर रखे गये हैं । जैसे 'सलिल मोह'
    (६-२) 'मोह का सलिल' ।

Wait, let's review:
In L8: "बड़ो" or "बडो"?
The book uses "बडो" without nuqta (very typical for older Hindi press, like "बैकुठनाथा", "स्थानो").
In L15: "स्थलों" or "स्थलो"? It is "स्थलो".
In L25: is it (५) or (२)?
Let's look at (५). In print, it really is (५). But as a number, it's obviously item 2. What should I put? I can put (५) or (२). Usually, faithful transcription represents the character on the page, but let's see if (२) is better. Wait, if a human reads it, they might think it's a 5 or a 2. Let's look closely at it: could it be a deformed २? Yes, in some Devanagari fonts, २ looks very similar to ५ if the bottom loop doesn

नामदेव की रचनाओ का साहित्यिक मूल्यांकन २३३
शैली
कुछ स्थलों पर समानार्थी शब्दो की पुनरावृत्ति हुई है—
(अ) 'आन देव फोकट बेकामा' (३०-८)
'फोकट' और 'बेकाम' समानार्थी शब्द है ।
(ब) 'नामा कहे मेरे बंध न भाई ।' (पद ५७-पंक्ति ८)
बंध (बंधु)—भाई, भाई-भाई
(क) घड़ी मूहूरति पल नाही टाई । (३७-३)
घड़ी-क्षण, मुहूर्त-क्षण
(ङ) अमृत सुधानिधि अंत न जाइला । (४५-५)
अमृत, सुधा-निधि-अमृत का खजाना
बल (emphasis) के लिए संबंधित शब्द के साथ 'ही' का प्रयोग किया गया
है। जैसे—
(१) 'आपै पवन आप ही पाणी ।' (११०-४)
(वह स्वयं पवन तथा पानी है ।)
(२) 'घट ही भीतरि न्हाउँगा । (६६-४)
(गुरु ने मेरे शरीर के भीतर मुझे अडसठ तीर्थ दिखाये उन्ही में मैं
नहाऊँगा ।)
कहो-कहीं 'पुनि' का भी प्रयोग मिलता है—
'आपै पुरिष, नारि पुनि आपै ।' (११०-५)
(वह स्वयं पुरुष तथा स्त्री है ।)
नामदेव की हिन्दी के कुछ विशिष्ट प्रयोग
नामदेव की हिन्दी में कुछ प्रयोग ऐसे है जो रूप और अर्थ दोनो में विशिष्ट है ।
कई शब्दो का ऐसे अर्थो में प्रयोग हुआ है जिनमें वे सामान्यतः प्रयुक्त नहीं होते । इसी
प्रकार कुछ प्रयोग व्याकरण और रचना को दृष्टि से विशिष्ट है ।
शब्द संग्रह : संज्ञाएँ
अधिकाई (२-३) विशेषता पयाना (११-१) लक्ष्य
कविलास (६५-१) कैलाश पालिक (१४१-४) पालना
करवा (६३-१) शरीर पूठि (६८-५) पीठ
कापट (५२-५) कपट पैज (१३१-६) दरवाजा
कालकुष्ट (२७-३) कालकूट विष वीठो (३६-१) विट्ठल

२३४ नामदेव की हिन्दी कविता
गोठि (२५-२) मित्रता, (गोष्ठि) भजन (६-२) शरीर
जलहरि (१०३-६) जलघर, तालाब मनिषा (१२-५) मनुष्य
जिरो (१२०-७) घाव मायण (५६-३) दूध
नाठा (१५-३) गांठ डिंभ (४३-६) बालक
रजबत (११-४) राज्य बल रैनी (३६-२) रहनी
साइर (४६-४) सागर
क्रियाएँ
थहता (६३-६) रहते हुए लागो (८८-१) प्राप्त करना
घोषता (६०-३) देखना बूठा (१०१-२) डूबना
यावा (१०१-३) जाना पबनी (१३-३) बिताना
बले (१०७-६) जलना घेने व्यवहार करना
विशेषण
वरतणी आज्ञाकारी सोवनी (१४०-७) स्वर्णिम
एकल (६-२) एक भगरा (२३-४) पागल
कृतम (२०-३) कृत्रिम सरजीव (४७-३) सजीव
पेटाबलू (२४-४) पेटू
क्रिया विशेषण
अनत्र (८६-१) अन्यत्र पिछोकडि (४७-४) पीछे
परहा (१२७-५) दूर
विशिष्ट व्याकरणिक रूपों का प्रयोग
नामदेव की हिंदी में कुछ विशिष्ट व्याकरणिक रूपों का प्रयोग भी मिलता है।
कई हिंदी मूल शब्दों में मराठी का प्रत्यय जोड़ा गया है।
मराठी का 'ला' प्रत्यय भूतकालीन क्रिया का प्रत्यय है। किन्तु नामदेव की हिंदी
में इसे 'ले' बनाकर जोड़ा गया है। उदाहरणार्थ—
अनिले (१६-२) लाना भराइले (६१-२) भरना
गूँथिले (६१-६) गूँथना लागिले (५६-२) अनुभव करना
जोइले (६१-८) तैयार करना मेलिहै (५६-४) रखना
मूँदिले (६७-५) मूँदना चोधिले (६७-५) देखना

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २३५
कुछ स्थानो पर तो भूतकाल को प्रकट करने के लिए हिंदी और मराठी दोनों
प्रत्यय एक साथ लगाये गये हैं। जैसे—
आईला (३१-१) (आई + ला) आया या आयी
कटीला (४७-२) (काटी + ला) काटा या काटी
समाईला (३१-५) (समाई + ला) समाया या समायी
लाईला (२३-१) (लाई + ला) लाया या लायी
पाईला (३१-१) (पाई + ला) पाया या पायी
मराठी का 'ला' प्रत्यय जो भूतकाल का प्रत्यय है नामदेव की हिंदी में भविष्यत्
काल के लिए प्रयुक्त होता है। जैसे—
(१) जा दिन भगता आईला । (३१-१) आईला—आयेगा ।
(२) परहरि धंधाकार सबेला ।
चेरी चिंता राम करेला ॥ (३३-२) करेला—करेगा ।
विशिष्ट पद रचना
नामदेव की हिंदी में कुछ विशिष्ट पद-रचनाएँ (word formations) मिलती
है। जैसे—
(अ) अनंत अमर फल देली । (६७-८)
हिंदी की 'देना' क्रिया का रूप दिया है। मराठी की 'देणे' क्रिया का भूतकाल
का रूप 'दिला' है परन्तु नामदेव 'देली' का प्रयोग करते है जो न हिंदी का है न
मराठी का ।
(आ) 'करीया' (५४-४) करना
'कथिया' (७६-१) कहना
उधरीया (५४-४) उद्धार करना
प्राचीन हिंदी पद्य में भूतकाल का प्रत्यय 'आ' अथवा 'या' पाया जाता है परंतु
यहाँ 'इया' का प्रयोग हुआ है ।
संयुक्त क्रिया का प्रयोग
नामदेव की भाषा में संयुक्त क्रियाओं का प्रयोग बहुत अधिक संख्या में हुआ
है। इनमें मुख्य क्रिया पूर्वकालिक क्रिया के रूप में या कृदन्त के रूप में है। जिन
संयुक्त क्रियाओं में पूर्व कालिक क्रिया मुख्य क्रिया या क्रियार्थक संज्ञा है इसमें पूर्वकालिक
क्रिया में कोई परिवर्तन नही होता। वचन, लिंग और काल का निर्देश गौण क्रिया द्वारा
होता है—

२३६ नामदेव की हिन्दी कविता
(१) पूर्वकालिक क्रिया मुख्य क्रिया है—
फिरि आवै, समझि परी, करि आई
उतरि गेला, मिलि रहिया, करि जानौ ।
(२) कियार्थक संज्ञा मुख्य क्रिया है—
खान लागो, सोवन लागा, सारन लागो । ऐस रूप केवल 'लगना' गौण क्रिया
के साथ ही मिलते हैं ।
(३) कृदन्तीय रूप मुख्य क्रिया है
घूमत आया, आवता देखी, सरज्यो जाई, लहरश जाई ।
नामदेव की हिंदी पर अन्य भाषाओं का प्रभाव
नामदेव की हिंदी अन्य भाषाओं जैसे मराठी, गुजराती, पंजाबी, अरबी तथा
फारसी से प्रभावित है । यह उनकी घुमक्कड़ी वृत्ति का ही परिणाम है ।
मराठी उनकी मातृभाषा होने के कारण उसका प्रभाव उपरिलिखित अन्य
भाषाओं की अपेक्षा अधिक है । नामदेव की शब्द-संपत्ति तथा रचना विधान मराठी से
प्रभावित है ।
सबध कारक के कारक-चिन्हों तथा सर्वनामों के प्रयोग में गुजराती का प्रभाव
देखा जा सकता है ।
पंजाबी के प्रभाव के केवल दो ही उदाहरण मिलते हैं ।
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नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २६७
अधिकरण कारक
अंतरि (१०२-३)—हृदय में
घरि (२६०-८)—घर में
जलि (१०१-२) जल मे
मुषि (६२-२)—मुख मे
हाथि (५७-४) हाथ में
(ब) भूतकालीन क्रियाओ पर मराठी का अधिक प्रभाव दिखाई देता है। मराठी
का भूतकालीन क्रिया का 'ला' प्रत्यय हिंदी की क्रिया को जोड़ दिया गया है—
अघाइला (४५-६) अघाना—तृप्त होना
आईला (३१-१) आना
उगिला (४६-६) उगना
गाइला (४५-१) गाना
घालिला (१६-६) जाना
छूटिला (५६-३) छूट जाना
जागीला (३१-२) जगाना
पोढिला (१६-८) लेटना
(क) पुरुष वाचक सर्वनामो पर भी मराठी का प्रभाव है। कुछ उदाहरण—
हमचो (६१-२) हमारी
तुमचो (६०-५) तुम्हारी
मुझा (५६-१०) मेरा
तुझा (५६-१०) तेरा
शब्द संपत्ति
नामदेव के हिंदी पदो में मराठी के शब्द पर्याप्त मात्रा मे पाये जाते हैं। कभी
अपने मूल रूप में तो कभी अपभ्रष्ट रूप मे। नामदेव की हिंदी पदावली में प्रयुक्त कुछ
मराठी शब्द यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं—
(१) बिरदु (१५५-१) ( <ब्रीद)
(२) मसीत (२०८-६) ( <म. मशीद, अ. मसजिद)
(३) जादवराइआ (२१६-३) (<यादवराय)
(४) कापरु (२१७-७) (<कापड) (कपडा)
(५) सगलकी (२२२-५) (<सगळ्यांची) (सबकी)

२३८ नामदेव की हिन्दी कविता
(६) सबदु (१६२-२) (<शब्द)
(७) सरब (१६२-२) (<सर्व)
(८) विखु (२१७-५) (<विष)
(६) छीपा (१५१-५) (<शिंपी (दर्जी) )
(१०) जनु (२००-६) (<जणु (मानो, गोया)
(११) मंजारी (४३-४) (<मांजर-बिल्ली)
(१२) आंब (६२-२) (<आंबा, आम आम्र)
(१३) कातो (१८-२) (<कात्री = कैंची)
(१४) गोवलि (१२०-३) (<गवली = ग्वाला)
(१५) ढाका (७२-२) (<डंका = डंका)
(१६) डाग (८१-४) (डहा = डंडा)
(१७) तंदुल (६१-१२) (<तांदुल = चावल)
(१८) पोते (८१-६) (<पोता-बोरा a sack)

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २३१
कूडै (२६-१) (कूडा=खोटा)
मोठा (४६-१) (मोठा=बड़ा)
शंभर (६४-५) (शंभर=सौ)
इकवीस (१२१-४) (एकवीस = इक्कीस)
क्रिया विशेषण
घाई (२२५-३) (घाई = जल्दबाजी)
कृदंत
ऊभी उभो (१०१-४) (उभी उभो=खड़े-खड़े)
गुजराती
नामदेव की हिंदी पर गुजराती का प्रभाव अपेक्षाकृत कम है। नीचे कुछ उदा-
हरण दिये जाते हैं—
गुजराती के संबंध कारक के कारक-चिन्ह
अंधियारानौ (११२-६) अँधेरे का
नामदेवनौ (१६६-७) नामदेव का
नामदेव ना स्वामी (५१-१०) नामदेव का स्वामी
पदनौ (११२-८) इस पद का
क्रियाएँ
जोइये (११२-६) (देखना द्वि० पु०)
जोवौ (१३६-५) (देखना द्वि० पु०)
सर्वनाम
जेन्है (१३६-२) जिसका
तेन्है (११२-८) उनका
म्हारौ (१३५-५) मेरी
परसर्ग
थाइं (१३६-५) से
नैहरौ (१३६-५) गुजराती का पुराना रूप

२४० नामदेव की हिन्दी कविता
पंजाबी
पंजाबी के केवल ये दो उदाहरण हैं—
मिलसी (१०१-१) 'मिलना' का भविष्यत् काल का रूप
मुनै (१०१ १) मुझे
अरबी और फारसी का प्रभाव
नामदेव की हिंदी में निम्नलिखित अरबी के शब्द मिलते हैं—
कलमा (६४-६) कलमा = प्रार्थना
अलह (६४-१०) अल्हा-परमात्मा
रोजा (६४-६) रोजा = व्रत, उपवास
कूं त मसाहति (२-८) तर्क वितर्क
फारसी के शब्द
आलम (१३१-३) विश्व
दुनी (१३१-३) दुनिया
अवदालव (६४-१) साधु, फकीर जैसा
इजार (६४-५) रस्सी, डोरी, नाड़ा
गुजार (६४-६) गुजारना = बीताना
ताज कुलह (६४-२) मुकुट और टोपी
निवाजी (६४-६) नमाज
पोस (६४-३) पोश = आवरण
मसीती (६४-६) मसजिद
मुलाना (६४-६) उपाध्याय
सहर (६४-८) शहर
सहनक (६०-४) थाली, प्लेट
बाँग (६४-६) बुलावा
खसम (७६-२) खसम = पति
साहिब (४१-१०) स्वामी
स्याही (७७-१) स्याही—
रूप रचना
रूप रचना की दृष्टि से नामदेव की हिंदी ब्रजभाषा के रूपों से बहुत साम्य
रखती है। सभी नव्य भारतीय आर्य भाषाओं की तरह इसमे भी दो वचन हैं। यद्यपि

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २४१
अधिकतर संज्ञाओ का रूप दोनों वचनों में एक ही है किंतु तिर्यक् रूपों में बहुवचन का
निर्देश स्पष्ट रूप से प्राप्त होता है । जैसे—
वन्दहि, आंखिन, स्रवनहि आदि ।
करण कारक के रूपों में भी इसी प्रकार का संकेत है । जैसे—
भुवंगहि, भँवरहि, नैनौ, लोगनि, संवनि आदि ।
कुछ स्थानों पर बहुवचन प्रकट करने के लिए अनेकता सूचक शब्दो का प्रयोग
है । यथा—
अन्धा लोग, योगी जन आदि ।
अ, उ, ऊ, ओ ओर औ से अंत होने वाली संज्ञाएँ प्रायः पुल्लिंग हे तथा आ,
इ, ई से अन्त होने वाली संज्ञाएँ स्त्रीलिंग । इसमें कुछ अपवाद भी है ।
पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनाने के लिए इ या ई प्रत्यय जोड़े गये हैं । जैसे—
बेटा—पु० बेटी—स्त्री०
देव—पु० देवी—स्त्री०
भृङ्ग—पु० भृङ्गी—स्त्री०
कही-कही 'नी' प्रत्यय भी मिलता है—
जैसे नट—पु० नटनी—स्त्री०
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