ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—१८६ देवता—विश्वेदेव
सूक्त—१८६ देवता—विश्वेदेव
आ न इळाभिर्विदथे सुशस्ति विश्वानरः सविता देव एतु.
अपि यथा युवानो मत्सथा नो विश्वं जगदभिपित्वे मनीषा.. (१)
अग्नि और सविता देव हमारी स्तुतियों को सुनकर धरती के देवों के साथ हमारे यज्ञ में
पधारें. हे नित्य-युवाओ! तुम जिस प्रकार सारे संसार की रक्षा करते हो, उसी प्रकार हमारे
यज्ञ में अपनी इच्छा से आकर हमारी रक्षा करो. (१)
आ नो विश्व आस्क्रा गमन्तु देवा मित्रो अर्यमा वरुणः सजोषाः.
भुवन्यथा नो विश्वे वृधासः करन्त्सुषाहा विथुरं न शवः.. (२)
शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले मित्र, वरुण और अर्यमादेव समान प्रसन्नता द्वारा हमारे
यज्ञ में पधारें. सब देव हमारी वृद्धि करें, शत्रुओं को हरावें एवं हमें अन्न का स्वामी बनावें. (२)
प्रेष्ठं वो अतिथिं गृणीषेऽग्निं शस्तिभिस्तुर्वणिः सजोषाः.
असद्यथा नो वरुणः सुकीर्तिरिषश्च पर्षदरिगूर्तः सूरिः.. (३)
हे देवो! मैं शीघ्रता करता हुआ एवं तुम्हारे साथ प्रसन्न होकर मंत्रों द्वारा तुम्हारे उत्तम
अतिथि अग्नि की स्तुति करता हूं. शोभन कीर्ति संपन्न वरुण देव हमारे बनकर शत्रुओं के प्रति
इनकार करें एवं हमारे लिए अन्नदाता बनें. (३)
उप व एषे नमसा जिगीषोषासानक्ता सुदुघेव धेनुः.
समाने अहन्विमिमानो अर्कं विषुरूपे पयसि सस्मिन्नूधन्.. (४)
हे देवो! जिस प्रकार दुधारू गाय सवेरे और शाम दूध काढ़ने के स्थान में जाती है, उसी
प्रकार हम पापों को जीतने की इच्छा से स्तुतिवचन के साथ प्रातःसायं तुम्हारे सामने
उपस्थित होते हैं. हम गाय के थनों से उत्पन्न घी, दूध आदि पदार्थों को मिलाकर प्रतिदिन
लाते हैं. (४)
उत नोऽहिर्बुध्न्यो३ मयस्कः शिशुं न पिप्युषीव वेति सिन्धुः.
येन नपातमपां जुनाम मनोजुवो वृषणो यं वहन्ति.. (५)
अहिर्बुध्न हमें सुख दें. गाय जिस प्रकार बछड़े को तृप्त करती हुई आती है, उसी प्रकार
सिंधु नदी हमें तृप्त करती हुई आवे. हम स्तुति करते हुए जल के नाती अग्नि से मिलें. मन के
समान तेज चलने वाले बादल उन्हें ले जाते हैं. (५)
उत न ईं त्वष्टा गन्त्वच्छा स्मत्सूरिभिरभिपित्वे सजोषाः.
आ वृत्रहेन्द्रश्चर्षणिप्रास्तुविष्टमो नरां न इह गम्याः.. (६)
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त्वष्टा देव हमारे सामने आवें और यज्ञ के कारण स्तोता और ऋत्विजों के प्रति प्रसन्न हों.
वृत्रनाशक, यजमानों की इच्छा पूर्ण करने वाले एवं महान् इंद्र हमारे इस यज्ञ में आवें. (६)
उत न ईं मतयोऽश्वयोगाः शिशुं न गावस्तरुणं रिहन्ति.
तमीं गिरो जनयो न पत्नीः सुरभिष्टमं नरां नसन्त.. (७)
जिस प्रकार गाएं बछड़ों को चाटती हैं, उसी प्रकार घोड़ों के समान वेगशाली हमारी
बुद्धियां नित्ययुवा इंद्र को घेरती हैं. स्त्रियां जिस प्रकार पति को पाकर संतान उत्पन्न करती हैं,
उसी प्रकार हमारी स्तुतियां इंद्र के पास पहुंचकर फलों को जन्म दें. (७)
उत न ईं मरुतो वृद्धसेनाः स्मद्रोदसी समनसः सदन्तु.
पृषदश्वासोऽवनयो न रथा रिशादसो मित्रयुजो न देवाः.. (८)
परम शक्तिशाली, हमारे समान ही प्रीतियुक्त, पृषत नामक घोड़ों वाले, नम्र एवं
शत्रुनाशक मरुद्गण धरती और आकाश से हमारे पास इस प्रकार आवें, जिस प्रकार मित्रता
करने वाले एक-दूसरे के समीप जाते हैं. (८)
प्र नु यदेषां महिना चिकित्रे प्र युञ्जते प्रयुजस्ते सुवृक्ति.
अध यदेषां सुदिने न शरुर्विश्वम्प्रैरिणं पृषायन्त सेनाः.. (९)
मरुद्गण स्तुति का प्रयोग जानते हैं, इसलिए उनकी महिमा से सभी परिचित हैं. जिस
प्रकार सुदिन में आकाश में प्रकाश फैल जाता है, उसी प्रकार मरुतों की वर्षा करने वाली
सेना सारी ऊसर धरती को उपजाऊ बना देती है. (९)
प्रो अश्विनाववसे कृणुध्वं प्र पूषणं स्वतवसो हि सन्ति.
अद्वेषो विष्णुर्वात ऋभुक्षा अच्छा सुम्नाय ववृतीय देवान्.. (१०)
हे ऋत्विजो! हमारी रक्षा के लिए अश्विनीकुमारों एवं पूषा के अतिरिक्त स्वाधीन शक्ति
वाले तथा द्वेषरहित विष्णु, वायु और इंद्र की भी स्तुति करो. मैं सुख प्राप्ति के लिए सब देवों
के सामने स्तुति करूंगा. (१०)
इयं सा वो अस्मे दीधितिर्यजत्रा अपिप्राणी च सदनी च भूयाः.
नि या देवेषु यतते वसूयुर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुभ्.. (११)
हे यज्ञयोग्य देवो! तुम्हारी प्रसिद्ध ज्योति हमें प्राण और शरण देने वाली बने. तुम्हारी
हव्य अन्न सहित स्तुति देवों को प्राप्त हो, जिससे हम अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें.
(११)
सूक्त—१८७ देवता—पितृ
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पितुं नु स्तोषं महो धर्माणं तविषीम्. यस्य त्रितो व्योजसा वृत्रं विपर्वमर्दयत्.. (१)
मैं सबके धारणकर्त्ता एवं बलरूप पालक अन्न की शीघ्र स्तुति करता हूं. अन्न की शक्ति
से इंद्र ने वृत्र असुर के टुकड़े कर दिए थे. (१)
स्वादो पितो मधो पितो वयं त्वा ववृमहे. अस्माकमविता भव.. (२)
हे स्वादिष्ट एवं मधुर पितः! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमारे रक्षक बनो. (२)
उप नः पितवा चर शिवः शिवाभिरूतिभिः.
मयोभुरद्विषेण्यः सखा सुशेवो अद्वयाः.. (३)
हे मंगलरूप पितः! कल्याणकारी रक्षा साधनों के साथ हमारे पास आओ और हमें सुख
दो. तुम हमारे लिए प्रिय रस वाले मित्र एवं अनोखे सुखदाता बनो. (३)
तव त्ये पितो रसा रजांस्यनु विष्ठिताः. दिवि वाताइव श्रिताः.. (४)
हे पितः अर्थात् अन्न! जिस प्रकार आकाश में हवा व्याप्त है, उसी प्रकार तुम्हारा रस
सारे संसार में फैला हुआ है. (४)
तव त्ये पितो ददतस्तव स्वादिष्ठ ते पितो.
प्र स्वाद्मानो रसानां तुविग्रीवाइवेरते.. (५)
हे परम स्वादिष्ट पितः! तुम्हारी प्रार्थना करने वाले मनुष्य तुम्हारा भोग करते हैं. तुम्हारी
कृपा से ही वे तुम्हारा दान करते हैं. तुम्हारे रस का भोग करने वाले मनुष्य गरदन ऊंची करके
चलते हैं. (५)
त्वे पितो महानां देवानां मनो हितम्.
अकारि चारु केतुना तवाहिमवसावधीत्.. (६)
हे पितः! महान् देवों का मन तुम्हीं में लगा हुआ है. इंद्र ने तुम्हारी रक्षा एवं बुद्धि का
सहारा लेकर ही वृत्र का वध किया था. (६)
यददो पितो अजगन्विवस्व पर्वतानाम्.
अत्रा चिन्नो मधो पितोऽरं भक्षाय गम्याः.. (७)
हे मधुर पितः! जब बादल प्रसिद्ध जल बरसाने को लावें, उस समय तुम पर्याप्त भोजन
के रूप में हमारे समीप आना. (७)
यदपामोषधीनां परिंशमारिशामहे. वातापे पीव इद्भव.. (८)
हे शरीर! हम जौ आदि वनस्पतियों को पर्याप्त मात्रा में खाते हैं, इसलिए तुम मोटे बनो.
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(८)
यत्ते सोम गवाशिरो यवाशिरो भजामहे. वातापे पीव इद्भव.. (९)
हे सोमरूप अन्न! हम तुम्हारे यव एवं गोदुग्ध से बने पदार्थों को भक्षण करते हैं. हे
शरीर! तुम मोटे बनो. (९)
करम्भ ओषधे भव पीवो वृक्क उदारथिः. वातापे पीव इद्भव.. (१०)
हे सत्तू के बने हुए गोले! तुम मोटापा लाने वाले एवं रोगनाशक बनो. हे शरीर! तुम मोटे
बनो. (१०)
तं त्वा वयं पितो वचोभिर्गावो न हव्या सुषूदिम.
देवेभ्यस्त्वा सधमादमस्मभ्यं त्वा सधमादम्.. (११)
हे पितः! गायों से जिस प्रकार हव्यरूप दूध ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार हम स्तुतियां
बोलकर तुमसे रस ग्रहण करते हैं. तुम समस्त देवों के साथ-साथ हमें भी आनंद देते हो.
(११)
सूक्त—१८८ देवता—आप्रिय (अग्नि)
समिद्धो अद्य राजसि देवो देवैः सहस्रजित्. दूतो हव्या कवीर्वह.. (१)
हे अग्नि! तुम ऋत्विजों द्वारा भली प्रकार उदीप्त होकर सुशोभित हो. हे सहस्रजित्!
तुम कवि और दूत हो तुम हमारे हव्य को ले आओ. (१)
तनूनपादृतं यते मध्वा यज्ञः समज्यते. दधत्सहस्रिणीरिषः.. (२)
हे पूज्य तनूनपात् अग्नि! हजारों प्रकार के अन्न धारण करते हुए यजमान के कल्याण
के लिए मधुर आज्य द्रव्यों से मिलते हैं. (२)
आजुह्वानो न ईड्यो देवाँ आ वक्षि यज्ञियान्. अग्ने सहस्रसा असि.. (३)
हे ईड्य अग्नि! हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम यज्ञ के योग्य देवों को यहां लाओ. तुम हजारों
प्रकार का अन्न देते हो. (३)
प्राचीनं बर्हिरोजसा सहस्रवीरमस्तृणन्. यत्रादित्या विराजथ.. (४)
हजारों वीरों वाले एवं पूर्व की ओर मुंह किए हुए अग्निरूपी कुश पर आदित्य बैठते हैं.
ऋत्विज् उसे मंत्रों द्वारा फैलाते हैं. (४)
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विराट् सम्राड्विभ्वीः पृथ्वीर्बह्वीश्च भूयसीश्च याः. दुरो घृतान्यक्षरन्.. (५)
यज्ञशाला में विराट्, सम्राट्, विप्र, प्रभु, बहु और भूयान् अग्नि घृतरूप जल गिराते हैं.
(५)
सुरुक्मे हि सुपेशसाधि श्रिया विराजतः. उषासावेह सीदताम्.. (६)
सुंदर आभरण वाले एवं शोभनरूपसंपन्न अग्निरूपी रात और दिन अत्यंत शोभित होते
हुए यहां बैठें. (६)
प्रथमा हि सुवाचसा होतारा दैव्या कवी. यज्ञं नो यक्षतामिमम्.. (७)
अग्नि देव अति श्रेष्ठ और प्रिय वचन होता एवं दिव्य कवि इन दो रूपों में हमारे यज्ञ में
उपस्थित हों. (७)
भारतीळे सरस्वति या वः सर्वा उपब्रुवे. ता नश्चोदयत श्रिये.. (८)
हे भारती, सरस्वती और इला! तुम सब अग्नि के रूप हो. मैं तुम्हारा आह्वान करता हूं.
तुम मुझे संपत्तिशाली बनने की प्रेरणा दो. (८)
त्वष्टा रूपाणि हि प्रभुः पशून्विश्वान्समानजे. तेषां नः स्फातिमा यज.. (९)
त्वष्टा रूपनिर्माण में समर्थ हैं. वे समस्त पशुओं को रूप देते हैं. वे हमारे पशुओं की
वृद्धि करें. (९)
उप त्मन्या वनस्पते पाथो देवेभ्यः सृज. अग्निहव्यानि सिष्वदत्. (१०)
हे वनस्पति! तुम अपने आप देवों के लिए पशुरूप अन्न उत्पन्न करो. इस प्रकार अग्नि
सभी हव्यों को स्वादिष्ट बनावेंगे. (१०)
पुरोगा अग्निर्देवानां गायत्रेण समज्यते. स्वाहाकृतीषु रोचते.. (११)
देवों के अग्रगामी अग्नि गायत्री छंद द्वारा जाने जाते हैं. स्वाहा शब्द बोलने पर वे जल
उठते हैं. (११)
सूक्त—१८९ देवता—अग्नि
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्.
युयोध्य१ स्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम.. (१)
हे द्योतमान अग्नि! तुम सभी प्रकार के ज्ञानों को जानते हो, इसलिए हमें धन की ओर
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ले जाने वाले उत्तम मार्ग पर ले जाओ. कुटिलता उत्पन्न करने वाला पाप हमसे दूर करो. हम
तुम्हें बार-बार नमस्कार कहते हैं. (१)
अग्ने त्वं पारया नव्यो अस्मान्त्स्वस्तिभिरति दुर्गाणि विश्वा.
पूश्च पृथ्वी बहुला न उर्वी भवा तोकाय तनयाय शं यो:.. (२)
हे अति नवीन अग्नि! तुम अतिपूजित यज्ञादि साधनों का सहारा लेकर हमें दुर्गम पापों
के पार पहुंचाओ. हमारी नगरी और धरती अत्यंत विस्तृत हो. हमारी संतान को तुम सुख दो.
(२)
अग्ने त्वमस्मद्युयोध्यमीवा अनग्नित्रा अभ्यमन्त कृष्टी:.
पुनरस्मभ्यं सुविताय देव क्षां विश्वेभिरमृतेभिर्यजत्र.. (३)
हे अग्नि! तुम समस्त रोगों के साथ-साथ अग्निहोत्र न करने वाले लोगों को भी हमसे दूर
कर दो. हे प्रकाशमान एवं यज्ञ के योग्य अग्नि! तुम अन्य समस्त देवों के साथ आकर हमें यज्ञ
में उत्तम फल दो. (३)
पाहि नो अग्ने पायुभिरजस्रैरुत प्रिये सदन आ शुशुक्वान्.
मा ते भयं जरितारं यविष्ठ नूनं विदन्मापरं सहस्व:.. (४)
हे अग्नि! सदैव आश्रय देकर हमारा पालन करो एवं अपने प्रिय यज्ञस्थल में सब ओर से
प्रकाशित बनो. हे अतिशय एवं शक्तिशाली अग्नि! तुम्हारे स्तोता मुझको आज या इसके बाद
कभी भी भय न लगे. (४)
मा नो अग्नेऽव सृजो अघायाविष्यवे रिपवे दुच्छुनायै.
मा दत्वते दशत मादते नो मा रीषते सहसावन्परा दा:.. (५)
हे अग्नि! हमें हिंसक, भूखे और दुःखदाता शत्रु के अधीन मत होने दो. हमें दांत वाले
कटखने सर्पादि, बिना दांत के, सींग वाले पशुओं एवं हिंसक राक्षसों को भी मत सौंपो. (५)
वि घ त्वावां ऋतजात यंसद्गृणानो अग्ने तन्वे३ वरूथम्.
विश्वाद्विरिक्षोरुत वा निनित्सोरभिहुतामसि हि देव विष्पट्.. (६)
हे यज्ञ से उत्पन्न एवं वरणीय अग्नि देव! जो लोग शरीर की पुष्टि के लिए तुम्हारी स्तुति
करते हैं, उन्हें तुम हिंसक, चोर आदि एवं निंदक लोगों से बचाते हो. तुम अपने सामने कुटिल
आचरण करने वाले के बाधक बनो. (६)
त्वं ताँ मन उभायान्वि विद्वांन्वेषि प्रपित्वे मनुषो यजत्र.
अभिपित्वे मनवे शास्यो भूर्म्मर्मृजेन्य उशिग्निभर्नाक:.. (७)
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हे यज्ञ के योग्य अग्नि! तुम यज्ञ करने वाले एवं न करने वाले दोनों को जानते हुए
यज्ञकर्त्ताओं की ही कामना करो. हे आक्रमणकारी अग्नि! यज्ञ की अभिलाषा करने वाले
यजमान को जिस प्रकार ऋत्विज् शिक्षा देते हैं, उसी प्रकार तुम यजमान की शिक्षा के पात्र
बनो. (७)
अवोचाम निवचनान्यस्मिन्मानस्य सूनुः सहसाने अग्नौ.
वयं सहस्रमृषिभिः सनेम विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (८)
मंत्रों के पुत्र और शत्रुओं के नाशक अग्नि को लक्ष्य करके ये सब स्तोत्र बनाए गए हैं.
हम इंद्रियों से परे रहने वाले अर्थ के प्रकाशक इन मंत्रों से हजारों प्रकार के धन के अतिरिक्त
अन्न, बल और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (८)
सूक्त—१९० देवता—बृहस्पति
अनर्वाणं वृषभं मन्द्रजिह्वं बृहस्पतिं वर्धया नव्यमर्कैः.
गाथान्यः सुरुचो यस्य देवा आशृण्वन्ति नवमानस्य मर्ताः.. (१)
हे होता! न त्यागने वाले, फलदायक, मधुरभाषी एवं स्तुति के योग्य बृहस्पति को मंत्रों
द्वारा बढ़ाओ. शोभन दीप्ति एवं स्तुति किए जाते हुए बृहस्पति को गाथा नामक मंत्रों का पाठ
करने वाले मनुष्य और देव स्तुतियां सुनाते हैं. (१)
तमृत्विया उप वाचः सचन्ते सर्गो न यो देवयतामसर्जि.
बृहस्पतिः सह्यञ्जो वरांसि विभ्वाभवत्सम्ऋते मातरिश्वा.. (२)
वर्षा ऋतु संबंधी स्तुतियां जल की सृष्टि करने वाले एवं देवभक्त यजमानों को फल देने
वाले बृहस्पति के समीप जाती हैं. वे आकाश रूपी व्यापी मातरिश्वा के समान सभी उत्तम
फलों को उत्पन्न करके यज्ञ के निमित्त प्रकट करते हैं. (२)
उपस्तुतिं नमस उद्यतिं च श्लोकं यंसत्सवितैव प्र बाहू.
अस्य क्रत्वाहन्यो३ यो अस्ति मृगो न भीमो अरक्षसस्तुविष्मान्.. (३)
जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों से प्रकाश देता है, उसी प्रकार बृहस्पति यजमानों के
समीप जाकर उनकी स्तुतियां, अन्नदान एवं स्तुतिमंत्रों को स्वीकार करते हैं. विरोधहीन इन
बृहस्पति की शक्ति से दिन के सूर्य, भयानक सिंह आदि के समान शक्तिशाली बनकर घूमते
हैं. (३)
अस्य श्लोको दिवीयते पृथिव्यामत्यो न यंसद्यक्षभृद्विचेताः.
मृगाणां न हेतयो यन्ति चेमा बृहस्पतेरहिमायाँ अभि द्यून्.. (४)
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बृहस्पति की कीर्ति धरती और आकाश में फैली है. वे आदित्य के समान हव्य धारण
करते हुए प्राणियों में बुद्धि संचार के साथ-साथ उन्हें फल भी देते हैं. बृहस्पति के आयुध
मायावियों की ओर शिकारी लोगों के आयुधों के समान तेजी से चलते हैं. (४)
ये त्वा देवोस्रिकं मन्यमानाः पापा भद्रमुपजीवन्ति पज्राः.
न दूह्ये३ अनु ददासि वामं बृहस्पते चयस इत्पियारुम्.. (५)
हे बृहस्पतिदेव! तुम कल्याणकारक हो. जो पापी लोग तुम्हें बूढ़ा बैल समझकर तुम्हारे
समीप जाते हैं, उन्हें मनचाहा उत्तम धन मत देना. तुम सोमयाग करने वाले पर अवश्य कृपा
करना. (५)
सुप्रैतुः सूयवसो न पन्था दुर्नियन्तुः परिप्रीतो न मित्रः.
अनर्वाणो अभि ये चक्षते नोऽपीवृता अपोर्णुवन्तो अस्थुः.. (६)
हे बृहस्पति! तुम शोभन मार्ग वाले एवं उत्तम धन से युक्त यजमान के लिए मार्ग के
समान सरल एवं दुष्टों के नियंत्रण करने वाले राजा के प्रसन्न मित्र बनो. जो विरोधी हमारी
निंदा करते हैं और सुरक्षित रहते हैं, उन्हें रक्षाहीन करो. (६)
सं यं स्तुभोऽवनयो न यन्ति समुद्रं न स्रवतो रोधचक्राः.
स विद्वाँ उभयं चष्टे अन्तर्बृहस्पतिस्तर आपश्च गृध्रः.. (७)
जिस प्रकार सभी मनुष्य राजाओं एवं किनारों को तोड़ने वाली नदियां सागर के पास
जाती हैं, उसी प्रकार स्तुतियां बृहस्पति को प्राप्त होती हैं. वे सब जानते हैं और आकाशचारी
पक्षी के रूप में जल और तट दोनों को देखते हैं तथा वर्षा करने के इच्छुक होकर दोनों को
उत्पन्न करते हैं. (७)
एवा महस्तुविजातस्तुविष्मान्बृहस्पतिर्वृषभो धायि देवः.
स नः स्तुतो वीरवद्धात्तु गोमद्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (८)
महान्, बहुतों के उपकार के लिए उत्तम, बलवान्, जलवर्षक एवं दीप्तिमान् बृहस्पति
की स्तुति इसी रूप में की जाती है. वे हमारी स्तुति सुनकर हमें विविध फल दें और हम अन्न,
बल तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें. (८)
सूक्त—१९१ देवता—जल आदि
कङ्कतो न कङ्कतोऽथो सतीनकङ्कतः. द्वाविति प्लुषी इति न्य१दृष्टा अलिप्सत..
(१)
अल्पविष, महाविष, जलचारी अरूपविष, दो प्रकार के जलचर एवं थलचर प्राणी,
दाहक एवं अदृश्य प्राणी मुझे घेरे हैं. (१)
अदृष्टान्हन्त्यायत्यथो हन्ति परायती. अथो अबघ्नती हन्त्यथो पिनष्टि पिंषती.. (२)
विषधर जीवों से काटे हुए के पास आकर ओषधि विष का प्रभाव नष्ट करती है एवं दूर
जाती हुई भी नष्ट करती है. उसे जब उखाड़ते हैं एवं पीसते हैं, तब भी वह विष का प्रभाव
नष्ट करती है. (२)
शरासः कुशरासो दर्भासः सैर्या उत.
मौञ्जा अदृष्टा बैरिणाः सर्वे साकं न्यलिप्तत.. (३)
शर, कुश, दर्भ, सैर्य, मुंज एवं वीरण नामक घासों में छिपे हुए विषधर मुझसे एक साथ
लिपट जाते हैं. (३)
नि गावो गोष्ठे असदन्नि मृगासो अविक्षत.
नि केतवो जनानां न्य१दृष्टा अलिप्तत.. (४)
जब गाएं गोशाला में बैठती हैं, हरिण निवासस्थान में बैठते हैं एवं मनुष्य निद्रा के कारण
ज्ञानशून्य होते हैं, उस समय अदृष्ट विषधर आकर मुझसे लिपट जाते हैं. (४)
एत उ त्ये प्रत्यदृश्रन्प्रदोषं तस्करा इव. अदृष्टा विश्वदृष्टाः प्रतिबुद्धा अभूतन.. (५)
वे चोरों के समान रात में देखे जाते हैं. वे किसी को दिखाई नहीं देते, पर सारे संसार को
देखते रहते हैं. सब लोग उनसे सावधान रहें. (५)
द्यौर्वः पिता पृथिवी माता सोमो भ्रातादितिः स्वसा.
अदृष्टा विश्वदृष्टास्तिष्ठतेलयता सु कम्.. (६)
हे सर्पो! आकाश तुम्हारा पिता, धरती माता, सोम भ्राता और अदिति तुम्हारी बहिन है.
तुम्हें कोई नहीं देख पाता, पर तुम सबको देखते हो. तुम अपने स्थान में रहो एवं सुखपूर्वक
गमन करो. (६)
ये अंस्या ये अङ्ग्याः सूचीका ये प्रकङ्कताः.
अदृष्टाः किं चनेह वः सर्वे साकं नि जस्यत.. (७)
जो जंतु स्कंध वाले, अंग वाले, सूची वाले एवं अत्यंत विषधारी हैं, ऐसे अदृष्ट विषधरों
का यहां कोई काम नहीं है. तुम सब यहां से एक साथ चले जाओ. (७)
उत्पुरस्तात्सूर्य एति विश्वदृष्टो अदृष्टहा.
अदृष्टान्सर्वाञ्जम्भयन्त्सर्वाश्च यातुधान्यः.. (८)
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सारे संसार को देखने वाले एवं अदृष्ट विषधरों को नष्ट करने वाले सूर्य पूर्व दिशा में
निकलते हैं. वे सभी अदृष्ट विषधारियों एवं राक्षसों को भयभीत करके भगा देते हैं. (८)
उदपप्तदसौ सूर्यः पुरु विश्वानि जूर्वन्. आदित्यः पर्वतेभ्यो विश्वदृष्टो अदृष्टहा.. (९)
सारे संसार को देखने वाले एवं अदृष्ट विषधारियों को नष्ट करने वाले सूर्य विषैले जंतुओं
को अत्यंत दुर्बल बनाते हुए उदयगिरि से निकलते हैं. (९)
सूर्ये विषमा सजामि दृति सुरावतो गृहे.
सो चिन्नु न मराति नो वयं मरामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार.. (१०)
सुरा बनाने वाला जिस प्रकार चमड़े के पात्र में शराब डालता है, उसी प्रकार मैं विष सूर्य
मंडल की ओर फेंकता हूं. जिस प्रकार सूर्य नहीं मरते, उसी प्रकार हम भी न मरें. घोड़ों द्वारा
लाए गए सूर्य दूरवर्ती विष को नष्ट कर देते हैं. हे विष! सूर्य की मधुविद्या तुम्हें अमृत बना देती
है. (१०)
इयत्तिका शकुन्तिका सका जघास ते विषम्.
सो चिन्नु न मराति नो वयं मरामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार.. (११)
छोटी सी चिड़िया ने तुम्हारा विष खा लिया और नहीं मरी. उसी प्रकार हम भी नहीं
मरेंगे. हे विष! घोड़ों द्वारा गमन करने वाले सूर्य दूर से ही विष को नष्ट कर देते हैं. उनकी
मधुविद्या तुम्हें अमृत बना देती है. (११)
त्रिः सप्त विष्पुलिङ्गका विषस्य पुष्यमक्षन्.
ताश्चिन्नु न मरन्ति नो वयं मरामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार.. (१२)
अग्नि की सातों जिह्वाओं में सफेद, लाल और काले इस प्रकार मिलकर इक्कीस वर्ण
पक्षी के रूप में विष का नाश करते हैं. जब वे नहीं मरते तो हम भी नहीं मरेंगे. अपने घोड़ों
द्वारा गमनशील सूर्य दूर रखे विष का नाश करते हैं. हे विष! सूर्य की मधुविद्या तुझे अमृत
बना देती है. (१२)
नवानां नवतीनां विषस्य रोपुषीणाम्.
सर्वासामग्रभं नामारे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार.. (१३)
निन्यानवे नदियां विष नष्ट करने वाली हैं. मैं सबका नाम पुकारता हूं. घोड़ों द्वारा चलने
वाले सूर्य दूर रखे विष को भी नष्ट कर देते हैं. हे विष! मधु-विद्या तुझे अमृत बना देगी. (१३)
त्रिः सप्त मयूर्यः सप्त स्वसारो अग्रुवः.
तास्ते विषं वि जभ्रिर उदकं कुम्भिनीरिव.. (१४)
हे शरीर! जिस प्रकार नारियां घड़ों में जल भरकर ले जाती हैं, उसी प्रकार इक्कीस
मयूरियां एवं सात नदियां तुम्हारा विष दूर करें. (१४)
इयत्तकः कुषुम्भकस्तकं भिनद्म्यश्मना.
ततो विषं प्र वावृते पराचीरनु संवतः.. (१५)
हे शरीर! छोटा सा नकुल यदि तुम्हारा विष समाप्त नहीं करेगा तो मैं उसे पत्थर से मार
डालूंगा. इस प्रकार विष मेरे शरीर से निकलकर दूर दिशाओं में चला जाए. (१५)
कुषुम्भकस्तदब्रवीद्गिरेः प्रवर्तमानकः.
वृश्चिकस्यारसं विषम़रसं वृश्चिक ते विषम्.. (१६)
पर्वत से आने वाले नकुल ने कहा—“बिच्छू का विष बेकार है.” हे बिच्छू! तुम्हारा विष
प्रभावहीन है. (१६)