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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

स गृणानो अद्भिर्देववानिति सुबन्धुर्नमसा सूक्तैः.

स गृणानो अद्भिर्देववानिति सुबन्धुर्नमसा सूक्तैः.
वर्धदुक्थैर्वचोभि॒रा हि नूनं व्यध्वैति पयस उस्रियायाः.. (२६)
देवों के परम बंधु वरुण नमस्कार और शोभन स्तुतियों से प्रशंसित होकर बढ़ें. दुधारू
गाय के दूध की धारा उनके यज्ञ के लिए बहे. (२६)
त ऊ षु णो महो यजत्रा भूत देवास ऊतये सजोषाः.
ये वाजाँ अनयता वियन्तो ये स्था निचेतारो अमूराः.. (२७)
हे यज्ञ के अधिकारी देवो! तुम हमारी महती रक्षा के लिए संगत बनो. हे अंगिरागोत्रीय
ऋषियो! यज्ञ के लिए विविध प्रकार से प्रयत्न करते हुए तुम मेरे लिए अन्न लाओ. तुम इस
समय मोहरहित होकर गाय प्राप्त करो. (२७)
सूक्त—६२ देवता—विश्वेदेव
ये यज्ञेन दक्षिणाया समक्ता इन्द्रस्य सख्यममृतत्वमानश.
तेभ्यो भद्रमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः.. (१)
हे अंगिरागोत्रीय ऋषियो! तुम लोग यज्ञ संबंधी द्रव्यों एवं दक्षिणा के द्वारा सामूहिक
रूप से इंद्र की मित्रता एवं अमरता प्राप्त कर चुके हो. तुम्हारा कल्याण हो. हे शोभन मेधा
वाले अंगिराओ! तुम मुझ मनुपुत्र को इस समय स्वीकार करो. मैं भली प्रकार तुम्हारा यज्ञ
करूंगा. (१)
य उदाजन्पितरो गोमयं वस्वृतेनाभिन्दन्परिवत्सरे वलम्.
दीर्घायुत्वमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः.. (२)
हे पितृतुल्य अंगिराओ! तुम हमारे पिता के समान हो. तुम पणियों द्वारा चुराई गई गायों
को पर्वत से निकाल लाए थे. तुमने एक वर्ष तक यज्ञ करके बल नामक असुर को नष्ट किया.
तुम्हें दीर्घायु प्राप्त हो. हे अंगिराओ! तुम मुझ मनुपुत्र को इस समय स्वीकार करो. मैं भली
प्रकार तुम्हारा यज्ञ करूंगा. (२)
य ऋतेन सूर्यमारोहयन् दिव्यप्रथयन्पृथिवीं मातरं वि.
सुप्रजास्त्वमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः.. (३)
हे अंगिराओ! तुम लोगों ने यज्ञ के द्वारा सूर्य को स्वर्गलोक में स्थापित किया एवं सबकी
माता पृथ्वी को प्रसिद्ध किया. तुम्हें शोभन प्रजा प्राप्त हो. हे अंगिराओ! तुम मुझ मनुपुत्र को
इस समय स्वीकार करो. मैं भली प्रकार तुम्हारा यज्ञ करूंगा. (३)
अयं नाभा वदति वल्गु वो गृहे देवपुत्रा ऋषयस्तच्छृणोतन.
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सुब्रह्मण्यमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः.. (४)
हे देवपुत्र अंगिरा ऋषियो! यह नाभानेदिष्ट तुम्हारे यज्ञगृह के कल्याणकारी वचन
बोलता है. तुम उसे सुनो. तुम्हें शोभन-ब्रह्मतेज प्राप्त हो. हे अंगिराओ! तुम मुझ मनुपुत्र को
इस समय स्वीकार करो. मैं भली प्रकार तुम्हारा यज्ञ करूंगा. (४)
विरूपास इदृषयस्त इदगम्भीरवेपसः. ते अङ्गिरसः सूनवस्ते अग्नेः परि जज्ञिरे.. (५)
ऋषिगण नानारूप वाले हैं एवं अंगिरा गंभीर कर्म वाले हैं. अग्नि के पुत्र के अंगिरा सभी
ओर उत्पन्न हुए हैं. (५)
ये अग्नेः परि जज्ञिरे विरूपासो दिवस्परि.
नवग्वो नु दशग्वो अङ्गिरस्तमः सचा देवेषु मंहते.. (६)
विविधरूप वाले जो अंगिरा द्युलोक से अग्नि के चारों ओर उत्पन्न हुए हैं, उन्होंने नौ
अथवा दस मास तक यज्ञ करके गाय रूप धन प्राप्त किया है. अंगिराओं में सर्वश्रेष्ठ अग्नि
देवों के साथ हमें धन देते हैं. (६)
इन्द्रेण युजा निः सृजन्त वाघतो व्रजं गोमन्तमश्विनम्.
सहस्रं मे ददतो अष्टकर्ण्य१ः श्रवो देवेष्वक्रत.. (७)
यज्ञकर्म करने वाले अंगिराओं ने इंद्र के साथ मिलकर गायों और अश्वों से युक्त
पशुशाला का उद्धार किया. अंगिराओं में सर्वश्रेष्ठ अग्नि देवों के साथ हमें धन देते हैं. (७)
प्र नूनं जायतामयं मनुस्तोक्मेव रोहतु. यः सहस्रं शताश्वं सद्यो दानाय मंहते.. (८)
वे सावर्णि मनु जल से भीगे बीज के समान शीघ्र बढ़ें. वे हजारों घोड़ों से युक्त सैकड़ों
गौएं तुरंत देने के लिए तैयार हैं. (८)
न तमश्नोति कश्चन दिव इव सान्वारभम्.
सावर्ण्यस्य दक्षिणा वि सिन्धुरिव पप्रथे.. (९)
मनु जब दानकर्म आरंभ करते हैं तो कोई भी उनकी समानता नहीं करता. वे सोने के
पर्वत के समान स्थित हैं. सावर्णि मनु की दक्षिणा नदी के समान सब जगह बढ़ती है. (९)
उत दासा परिविषे स्मद्दिष्ट्ी गोपरीणसा. यदुस्तुर्वश्च मामहे.. (१०)
कल्याण करने वाले, गायों से युक्त एवं दास के समान यदु और तुर्वसु नामक राजा मनु
के भोजन के लिए पशु देते हैं. (१०)
सहस्रदा ग्रामणीर्मा रिषन्मनुः सूर्येणास्य यतमानैतु दक्षिणा.
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