ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—१२४ देवता—अग्नि
द्रप्सः समुद्रमभि यज्जिगाति पश्यन्गृध्रस्य चक्षसा विधर्मन्.
भानुः शुक्रेण शोचिषा चकानस्तृतीये चक्रे रजसि प्रियाणि.. (८)
जलयुक्त वेन अपना कर्म पूरा करते समय गृद्ध पक्षी के समान दूर तक देखते हुए
अंतरिक्ष की ओर जाते हैं. वे उज्ज्वल दीप्ति से प्रकाशित होकर तृतीय लोक अर्थात् आकाश
में सबके प्रिय जल का निर्माण करते हैं. (८)
सूक्त—१२४ देवता—अग्नि
इमं नो अग्न उप यज्ञमेहि पञ्चयामं त्रिवृतं सप्ततन्तुम्.
असो हव्यवाळुत नः पुरोगा ज्योगेव दीर्घं तम आशयिष्ठाः.. (१)
हे अग्नि! तुम हमारे पांच नियामकों वाले, तीन प्रकार से अनुष्ठित एवं तीन होताओं
वाले यज्ञ में आओ. तुम हमारे हव्यवाहक बनो, हमारे पुरोगामी बनो एवं हमें छोड़कर अधिक
समय तक गुफा के अंधेरे में सोओ. (१)
अदेवाद्देवः प्रचता गुहा यन्प्रपश्यमानो अमृतत्वमेमि.
शिवं यत्सन्तमशिवो जहामि स्वात्सख्यादरणीं नाभिमेमि.. (२)
अग्नि ने कहा—
मैं देवों की प्रार्थना से गुहा में वर्तमान दीप्तिहीन दशा से दीप्ति को प्राप्त करके सबको
देखता हुआ अमरता प्राप्त करता हूं. भली प्रकार पूर्ण हुए यज्ञ को मैं प्रकाशित होकर छोड़ता
हूं एवं अपने चिरसखा व उत्पत्तिस्थान अरणि में चला जाता हूं. (२)
पश्यन्नन्यस्या अतिथिं वयाया ऋतस्य धाम वि मिमे पुरूणि.
शंसामि पित्रे असुराय शेवमयज्ञियाद्यज्ञियं भागमेमि.. (३)
मैं आकाश में गमन वाले सूर्य को देखता हुआ ऋतुओं के अनुरूप अनेक प्रकार के यज्ञों
का अनुष्ठान करता हूं. मैं शक्तिशाली पितरों के सुख के लिए होता बनकर मंत्र बोलता हूं तथा
यज्ञ के अनुपयुक्त स्थान से उपयुक्त स्थान में जाता हूं. (३)
बह्वीः समा अकरमन्तरस्मिन्निन्द्रं वृणानः पितरं जहामि.
अग्निः सोमो वरुणस्ते च्यवन्ते पर्यावर्द्र्राष्ट्रं तदवाम्यायन्.. (४)
मैंने इस यज्ञस्थान में अनेक वर्ष बिताए हैं. मैं यहां इंद्र का वरण करता हुआ अपने पिता
अरणि को छोड़ता हूं. मेरे छिप जाने पर अग्नि, सोम एवं वरुण का पतन होता है तथा राष्ट्र में
अव्यवस्था फैल जाती है. तब मैं आकर असुरों से रक्षा करता हूं. (४)
निर्माया उ त्ये असुरा अभूवन्त्वं च मा वरुण कामयासे.
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ऋतेन राजन्ननृतं विविञ्चन्मम राष्ट्रस्याधिपत्यमेहि.. (५)
मेरे आते ही राक्षस शक्तिहीन हो गए. हे वरुण! तुम भी मेरी अभिलाषा करते हो. हे
राजन्! तुम सत्य से मिथ्या को अलग करते हुए मेरे राष्ट्र के अधिपति बनो. (५)
इदं स्वरिदमीदास वाममयं प्रकाश उर्व१न्तरिक्षम्.
हनाव वृत्रं निरेहि सोम हविष्त्वा सन्तं हविषा यजाम.. (६)
हे सोम! देखो, यह स्वर्ग है. यह अत्यंत सुंदर था. यह प्रकाश एवं विस्तृत आकाश है. हे
सोम! तुम आओ, जिससे हम वृत्र का वध कर सकें. तुम हवन के योग्य द्रव्य हो. हम अन्य
होमसंबंधी द्रव्यों के साथ तुम्हारा यज्ञ करें. (६)
कविः कवित्वा दिवि रूपमासजदप्रभूती वरुणो निरपः सृजत्.
क्षेमं कृण्वाना जनयो न सिन्धवस्ता अस्य वर्णं शुचयो भरिभ्रति.. (७)
क्रांतदर्शी मित्र ने अपने कवित्व से स्वर्ग में अपना तेज स्थिर किया है. वरुण ने बिना
प्रयास के ही जल को बादलों से निकाला. जगत् का कल्याण करने वाली नदियां वरुण की
पत्नी के समान दीप्तिशालिनी बनकर वरुण के उज्ज्वल रूप को धारण करती हैं. (७)
ता अस्य ज्येष्ठमिन्द्रियं सचन्ते ता ईमा क्षेति स्वधया मदन्ती.
ता ईं विशो न राजानं वृणाना बीभत्सुवो अप वृत्रादतिष्ठन्.. (८)
जल वरुण के अत्यंत विशाल तेज को धारण करते हैं एवं अन्न पाकर प्रसन्न होते हैं.
वरुण पत्नी के समान उन जलों के पास आते हैं. जिस प्रकार प्रजा राजा के पास जाती है,
उसी प्रकार जल भयभीत होकर वृत्र के पास से वरुण के पास जाकर ठहरते हैं. (८)
बीभत्सूनां सयुजं हंसमाहुरपां दिव्यानां सख्ये चरन्तम्.
अनुष्टुभमनु चर्चूर्यमाणमिन्द्रं नि चिक्युः कवयो मनीषा.. (९)
उन भयभीत एवं दिव्य जलों का साथी बनकर मित्रता का आचरण करने वाला हंस
कहलाता है. स्तुतियोग्य एवं बार-बार जल के पीछे जाने वाले इंद्र की प्रशंसा विद्वान् मंत्रों
द्वारा करते हैं. (९)
सूक्त—१२५ देवता—परमात्मा
अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः.
अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा.. (१)
वाणी देवी कहती है—
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मैं रुद्रों, वसुओं, आदित्यों एवं सभी देवों के साथ विचरण करती हूं. मैं मित्र, वरुण, इंद्र,
अग्नि एवं अश्विनीकुमारों को धारण करती हूं. (१)
अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्.
अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये३यजमानाय सुन्वते.. (२)
मैं पत्थर से पीसे जाने वाले सोम, त्वष्टा, पूषा एवं भग को धारण करती हूं. मैं हव्य
धारण करने वाले, देवों को शोभन हवि देने वाले एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को धन
देती हूं. (२)
अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्.
तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम्.. (३)
मैं राष्ट्र की स्वामिनी, धन देने वाली, ज्ञान वाली एवं यज्ञोपयोगी वस्तुओं में सर्वोत्तम हूं.
देवों ने मुझे अनेक स्थानों में धारण किया है. मेरा आधार विशाल है. मैं अनेक प्राणियों में
आविष्ट हूं. (३)
मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम्.
अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि.. (४)
मेरी सहायता से ही प्राणी अन्न खाते हैं, देखते हैं, सांस लेते हैं एवं कही हुई बात सुनते
हैं. मुझे न मानने वाले क्षीण हो जाते हैं. हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें श्रद्धा करने योग्य बात बताती
हूं. (४)
अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः.
यं कामये तंतमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्.. (५)
जो व्यक्ति देवों एवं मानवों द्वारा सेवित है, उसे मैं ही उपदेश देती हूं. मैं जिसे चाहती हूं,
उसे शक्तिशाली, स्तोता, ऋषि एवं बुद्धिमान् बना देती हूं. (५)
अहं रुद्राय धनुरा तनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ.
अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश.. (६)
मैं ब्रह्मद्वेषी त्रिपुर राक्षस को मारने के लिए ही रुद्र के धनुष का विस्तार करती हूं. मैं ही
लोगों के कल्याण के लिए युद्ध करती हूं एवं द्यावा-पृथिवी में व्याप्त हूं. (६)
अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्व१न्तः समुद्रे.
ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वोतामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि.. (७)
मैं द्यौ को उत्पन्न करती हूं. आकाश परमात्मा का मस्तक है. मेरा स्थान सागर के जल
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में है. वहीं से मैं सारे संसार में विस्तृत होती हूं एवं अपने विशाल शरीर से इस द्युलोक का
स्पर्श करती हूं. (७)
अहमेव वात इव प्र वाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा.
परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना सं बभूव.. (८)
मैं ही सब भुवनों का निर्माण करती हुई वायु के समान चलती हूं. मेरी महिमाएं ऐसी हैं
कि धरती और द्युलोक से भी बड़ी हूं. (८)
सूक्त—१२६ देवता—विश्वेदेव
न तमंहो न दुरितं देवासो अष्ट मर्त्यम्.
सजोषसो यमर्यमा मित्रो नयन्ति वरुणो अति द्विषः.. (१)
हे देवो! उस पुरुष को कोई भी अमंगल एवं पाप प्राप्त नहीं करता, जिसे अर्यमा, मित्र
एवं वरुण मिलकर शत्रु के हाथ से बचाते हैं. (१)
तद्वि वयं वृणीमहे वरुण मित्रार्यमन्.
येना निरंहसो यूयं पाथ नेथा च मर्त्यमति द्विषः.. (२)
हे वरुण, मित्र एवं अर्यमा! हम तुमसे उसी रक्षा को मांगते हैं, जिससे तुम मानवों को
निष्पाप करते हो एवं शत्रुओं से बचाते हो. (२)
ते नूनं नोऽयमूतये वरुणो मित्रो अर्यमा.
नयिष्ठा उ नो नेषणि पर्षिष्ठा उ नः पर्षण्यति द्विषः.. (३)
वरुण, मित्र एवं अर्यमा निश्चय ही हमारी रक्षा करेंगे. तुम हमें आगे ले चलो, पापों से पार
करो तथा शत्रु से बचाओ. (३)
यूयं विश्वं परि पाथ वरुणो मित्रो अर्यमा.
युष्माकं शर्मणि प्रिये स्याम सुप्रणीतयोऽति द्विषः.. (४)
हे वरुण, मित्र एवं अर्यमा! तुम संसार की रक्षा करते हो. हे शोभन-नेतृत्व वाले देवो!
हम तुम्हारे द्वारा दिया हुआ अनुकूल सुख भोगें एवं शत्रुओं से बचें. (४)
आदित्यासो अति सिधो वरुणो मित्रो अर्यमा.
उग्रं मरुद्धी रुद्रं हुवेमेन्द्रमग्निं स्वस्तयेऽति द्विषः.. (५)
आदित्य, वरुण, मित्र और अर्यमा हमें शत्रु से बचावें. हम शत्रु से बचने एवं कल्याण
पाने के लिए उग्र रुद्र, मरुद्गण, इंद्र एवं अग्नि को बुलाते हैं. (५)
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नेतार ऊ षु णस्तिरो वरुणो मित्रो अर्यमा.
अति विश्वानि दुरिता राजानश्चर्षणीनामति द्विषः.. (६)
वरुण, मित्र और अर्यमा कुशल नेता हैं. ये हमें पाप से दूर ले जावें. प्रजाओं के स्वामी
उक्त देव हमें सभी पापों एवं शत्रुओं से बचावें. (६)
शुनमस्मभ्यमूतये वरुणो मित्रो अर्यमा.
शर्म यच्छन्तु सप्रथ आदित्यासो यदीमहे अति द्विषः.. (७)
वरुण, मित्र और अर्यमा रक्षा के साथ ही हमें सुख दें. आदित्यगण हमें विस्तृत सुख दें
एवं शत्रुओं से बचावें. (७)
यथा ह त्यद्वसवो गौर्यं चित्पदि षिताममुञ्चता यजत्राः.
एवो ष्व१स्मन्मुञ्चता व्यंहः प्र तार्यग्ने प्रतरं न आयुः.. (८)
यज्ञ करते हुए वसुओं ने पैरों से बंधी हुई गाय को छुड़ा दिया था. हे अग्नि! हमें उसी
प्रकार पाप से छुड़ाओ एवं उत्तम तथा विशाल आयु दो. (८)
सूक्त—१२७ देवता—रात्रि
रात्री व्यख्यदायती पुरुत्रा देव्य१ क्षभिः. विश्वा अधि श्रियोऽधित.. (१)
रात्रि देवी आती हुई चारों ओर विस्तृत हुईं एवं उन्होंने नक्षत्रों द्वारा संपूर्ण शोभा प्राप्त
की. (१)
ओर्वप्रा अमर्त्या निवतो देव्य१ द्वतः. ज्योतिषा बाधते तमः.. (२)
मरणरहित व दिव्य रात्रि ने विस्तृत आकाश को व्याप्त किया तथा नीचे एवं ऊंचे रहने
वाले पदार्थों को ढक लिया. रात्रि तारों के प्रकाश से अंधकार को बाधा पहुंचाती है. (२)
निरु स्वसारमस्कृतोषसं देव्यायती. अपेदु हासते तमः.. (३)
रात्रि देवी ने आकर उषा को अपनी बहिन के रूप में स्वीकार किया तथा अंधकार को
हानि पहुंचाई. (३)
सा नो अद्य यस्या वयं नि ते यामन्नविक्षमहि. वृक्षो न वसतिं वयः.. (४)
हमारे लिए वह रात्रि कल्याणकारिणी बने, जिसके आने पर हम पेड़ पर रहने वाले
पक्षियों के समान सो जाते हैं. (४)
नि ग्रामासो अविक्षत नि पद्वन्तो नि पक्षिणः. नि श्येनासश्चिदर्थिनः.. (५)
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सारा गांव शांत है. पैरों से चलने वाले पक्षी एवं गतिशील बाज पक्षी सब सो रहे हैं. (५)
यावया वृक्यं१वृकं यवय स्तेनमूर्म्ये. अथा नः सुतरा भव.. (६)
हे रात्रि! तुम भेड़िए, भेड़िए की पत्नी एवं चोर को हमसे दूर करो. तुम हमारे लिए
विशेष रीति से सुखकारी बनो. (६)
उप मा पेपिशत्तमः कृष्णं व्यक्तमस्थित. उष ऋणेव यातय.. (७)
सब वस्तुओं को ढकने वाला काला आकार विशेष रूप से मेरे पास तक आ गया है. हे
उषा! इस अंधकार को ऋण के समान हटाओ. (७)
उप ते गा इवाकरं वृणीष्व दुहितर्दिवः. रात्रि स्तोमं न जिग्युषे.. (८)
हे रात्रि! तुम आकाश की कन्या हो. मुझ शत्रुजयी का यह स्तोत्र तुम स्वीकार करो. मैं
गाय के समान तुम्हें यह स्तोत्र भेंट कर रहा हूं. (८)
सूक्त—१२८ देवता—विश्वेदेव
ममाग्ने वर्चो विहवेष्वस्तु वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम.
मह्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रस्त्वयाध्यक्षेण पृतना जयेम.. (१)
हे अग्नि! संग्रामों में मेरा तेज उचित हो. हम तुम्हें प्रज्वलित करके अपने शरीर को पुष्ट
करें. चारों दिशाएं मेरे लिए झुकें. तुम्हें अध्यक्ष बनाकर हम शत्रु सेनाओं को जीतें. (१)
मम देवा विहवे सन्तु सर्व इन्द्रवन्तो मरुतो विष्णुरग्निः.
ममान्तरिक्षमुरुलोकमस्तु मह्यं वातः पवतां कामे अस्मिन्.. (२)
इंद्र सहित सब देव, मरुत्, विष्णु और अग्नि युद्ध में मेरा साथ दें. अंतरिक्ष के समान
विस्तृत लोक मेरा हो तथा वायु मेरी अभिलाषा के अनुसार चलकर मुझे पवित्र करें. (२)
मयि देवा द्रविणमा यजन्तां मय्याशीरस्तु मयि देवहूतिः.
दैव्या होतारो वनुषन्त पूर्वेऽरिष्टाः स्याम तन्वा सुवीराः.. (३)
देवगण मुझ स्तोता को धन दें. मैं यज्ञफल प्राप्त करूं एवं देवों को बुलाऊं. प्राचीन काल
में देवों के लिए हवन करने वाले मेरे अनुकूल हों. मैं शरीर से निरोग एवं शोभन संतान वाला
बनूं. (३)
मह्यं यजन्तु मम यानि हव्याकूतिः सत्या मनसो मे अस्तु.
एनो मा नि गां कतमच्चनाहं विश्वे देवासो अधि वोचता नः.. (४)
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मेरे ऋत्विज् मेरे हव्य आदि का यजन मेरे कल्याण के लिए करें. मेरा मनोरथ पूर्ण हो. मैं
किसी भी पाप को न करूं. सभी देव मुझे आशीर्वाद दें. (४)
देवीः षळुर्वीरुरु नः कृणोत विश्वे देवास इह वीरयध्वम्.
मा हास्महि प्रजया मा तनूभिर्मा रधाम द्विषते सोम राजन्.. (५)
छः विशाल देवियां मेरी उन्नति करें. हे सब देवो! मेरे यज्ञ में वीरता का कार्य करो. मैं
शरीर और प्रजा संबंधी कोई हानि न उठाऊं. हे राजा सोम! हम शत्रु के सामने न हारें. (५)
अग्ने मन्युं प्रतिनुदन्परेषामदब्धो गोपाः परि पाहि नस्त्वम्.
प्रत्यञ्चो यन्तु निगुतः पुनस्तेऽमैषां चित्तं प्रबुधां वि नेशत्.. (६)
हे अग्नि! तुम शत्रुओं का क्रोध व्यर्थ करके अपराजेय बनकर हमारी रक्षा करो. शत्रु
अपने उद्देश्य में असफल होकर लौटे. यदि शत्रुओं के पास बुद्धि हो तो नष्ट हो जाए. (६)
धाता धातॄणां भुवनस्य यस्पतिर्देवं त्रातारमभिमातिषाहम्.
इमं यज्ञमश्विनोभा बृहस्पतिर्देवाः पान्तु यजमानं न्यर्थात्.. (७)
मैं सृष्टिकर्त्ताओं के स्रष्टा, सकल भुवन के रक्षक, दिव्य, सब भयों से छुड़ाने वाले एवं
शत्रुपराभवकारी सविता की स्तुति करता हूं. अश्विनीकुमार एवं बृहस्पति! इस यज्ञ तथा
यजमान की पाप से रक्षा करें. (७)
उरुव्यचा नो महिषः शर्म यंसदस्मिन्हवे पुरुहूतः पुरुक्षुः.
स नः प्रजायै हर्यश्व मृळयेन्द्र मा नो रीरिषो मा परा दाः.. (८)
परम विस्तृत, पूज्य, बहुतों द्वारा बुलाए गए व अनेक निवासस्थानों वाले इंद्र इस यज्ञ में
हमें कल्याण दें. हे हरि नामक अश्वों वाले इंद्र! तुम हमारी संतान को सुखी करो, हमारी हिंसा
मत करो और हमें मत त्यागो. (८)
ये नः सपत्ना अप ते भवन्त्विन्द्राग्निभ्यामव बाधामहे तान्.
वसवो रुद्रा आदित्या उपरिस्पृशं मोग्रं चेत्तारमधिराजमक्रन्.. (९)
जो हमारे शत्रु हैं, वे दूर चले जावें. हम इंद्र और अग्नि की सहायता से उन्हें बाधा
पहुंचावें. वसु, रुद्र और आदित्य मुझे सर्वश्रेष्ठ उन्नत शक्ति वाला चेतनायुक्त सर्वज्ञ एवं सबका
स्वामी बनावें. (९)
सूक्त—१२९ देवता—परमात्मा
नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्.
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम्.. (१)
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प्रलय की दशा में न असत् था और न सत् था. उस समय न लोक थे और न अंतरिक्ष
था. न कोई आवरण था और न ढकने योग्य पदार्थ था. कहीं भी न कोई प्राणी था और न
कोई सुख पहुंचाने वाला भोग था. उस समय गहन गंभीर जल भी नहीं था. (१)
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः.
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास.. (२)
उस समय न मृत्यु थी और न अमृत था. न रात्रि थी और न दिन का ज्ञान था. उस समय
एकमात्र ब्रह्मा ही स्वधा के साथ प्राणयुक्त था. उससे बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं था. (२)
तम आसीत्तमसा गूळहमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्.
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम्.. (३)
प्रलय दशा में सब कुछ अंधकार से घिरा हुआ था एवं सब ओर अंधकार था. यह सारा
दृश्यमान जगत् जल के रूप में अज्ञात था. सारा विश्व तुच्छ अंधकार से ढका था. महान् तप
से कारणकार्यरूप विभाग से रहित ब्रह्म उत्पन्न हुआ. (३)
कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्.
सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा.. (४)
परमेश्वर के मन में सबसे पहले सृष्टिरचना की इच्छा उत्पन्न हुई. वही सबसे पहले मन में
सृष्टि का बीज बनी. विद्वानों ने बुद्धि से हृदय में विचार किया एवं असत् में सत् के कारण को
खोजा. (४)
तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासी३दुपरि स्विदासी३त्.
रेतोधा आसन्महिमान आसन्त्स्वधा अवस्तात्प्रयतिः परस्तात्.. (५)
आकाश आदि की सृष्टि करने वाले परमात्मा के तेज की किरणें क्या तिरछी थीं, नीचे
की ओर थीं अथवा ऊपर की ओर थीं? बीजरूप कर्म को धारण करने वाले जीव थे एवं
महान् आकाश आदि भोग्य थे. उस समय अन्न निकृष्ट एवं भोक्ता उत्कृष्ट था. (५)
को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः.
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनैनाथा को वेद यत आबभूव.. (६)
कौन संपूर्ण रूप से जानता है और कौन इस सृष्टि के विषय में कह सकता है? यह सृष्टि
किन-किन कारणों से उत्पन्न हुई है? देवगण भूतसृष्टि के बाद उत्पन्न हुए हैं. यह विश्व जिससे
उत्पन्न हुआ है, उसे कौन जानता है? (६)
इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न.
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद.. (७)
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