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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—१ देवता—अग्नि

द्वितीय मंडल
सूक्त—१ देवता—अग्नि
त्वमग्ने द्युभिस्त्वमाशुशुक्षणिस्त्वमद्भ्यस्त्वमश्मनस्परि.
त्वं वनेभ्यस्त्वमोषधीभ्यस्त्वं नृणां नृपते जायसे शुचिः.. (१)
हे मनुष्यों के पालक एवं पवित्र अग्नि! तुम यज्ञ के दिन जल, पाषाण, वन एवं
ओषधियों से दीप्तिशाली रूप में उत्पन्न हो जाओ. (१)
तवाग्ने होत्रं तव पोत्रमृत्वियं तव नेष्ट्रं त्वमग्निदृतायतः.
तव प्रशास्त्रं त्वमध्वरीयसि ब्रह्मा चासि गृहपतिश्च नो दमे.. (२)
हे अग्नि! यज्ञ के होता, पोता, ऋत्विज् और नेष्टा जो कर्म करते हैं, वह तुम्हारा है. तुम
अग्नीध्र हो. यज्ञ की इच्छा करने पर तुम प्रशास्ता का काम भी करने लगते हो. तुम्हीं अध्वर्यु
एवं ब्रह्मा हो. मेरे इस यज्ञगृह में तुम्हीं गृहपति हो. (२)
त्वमग्न इन्द्रो वृषभः सतामसि त्वं विष्णुरुरुगायो नमस्यः.
त्वं ब्रह्मा रयिविद्ब्रह्मणस्पते त्वं विधर्तः सचसे पुरन्ध्या.. (३)
हे अग्नि! सज्जनों की मनोकामना पूर्ण करने के कारण तुम इंद्र हो. तुम्हीं बहुत से
भक्तों द्वारा स्तुत एवं नमस्कार करने योग्य विष्णु हो. तुम मंत्रों के पालक एवं धनों के ज्ञाता
ब्रह्मा हो. तुम विविध पदार्थों का निर्माण करते एवं सबकी बुद्धियों में निवास करते हो. (३)
त्वमग्ने राजा वरुणो धृतव्रतस्त्वं मित्रो भवसि दस्म ईड्यः.
त्वमर्यमा सत्पतिर्यस्य सम्भुजं त्वमंशो विदथे देव भाजयुः.. (४)
हे अग्नि! तुम व्रतधारी राजा वरुण एवं स्तुतियोग्य शत्रुनाशक मित्र हो. तुम्हीं सज्जनों
के रक्षक एवं व्यापक दान वाले अर्यमा तथा अंश अर्थात् सूर्य हो. तुम सभी का यज्ञ सफल
बनाओ. (४)
त्वमग्ने त्वष्टा विधते सुवीर्यं तव ग्नावो मित्रमहः सजात्यम्.
त्वमाशुहेमा ररिषे स्वश्व्यं त्वं नरां शर्धो असि पुरूवसुः.. (५)
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हे अग्नि! तुम सेवा करने वाले के लिए शक्तिशाली त्वष्टा हो. सब स्तुति वचन तुम्हारे ही
हैं. तुम हितकारक तेज एवं हमारे बंधु हो. तुम शीघ्र प्रेरणा देने वाले एवं शोभन अश्वयुक्त धन
दाता हो. तुम अत्यंत धनवान् हो. तुम मनुष्यों को शक्ति दो. (५)
त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे.
त्वं वातैररुणैर्यासि शङ्‌गयस्त्वं पूषा विधतः पासि नु त्मना.. (६)
हे अग्नि! तुम विस्तृत आकाश में वर्तमान रुद्र हो. तुम्हीं मरुतों के बल एवं अन्न के
स्वामी हो. तुम वायु के समान वेगशाली लाल घोड़ों द्वारा सुखपूर्वक जाते हो. तुम पूषा हो,
इसलिए यज्ञ करने वालों की अपने आप रक्षा करो. (६)
त्वमग्ने द्रविणोदा अरङ्कृते त्वं देवः सविता रत्नधा असि.
त्वं भगो नृपते वस्व ईशिषे त्वं पायुर्र्दमे यस्तेऽविधत्.. (७)
हे अग्नि! तुम पर्याप्त यज्ञकर्म करने वाले यजमान को स्वर्ण देने वाले हो. तुम्हीं रत्न
धारण करने वाले तेजस्वी सविता हो. हे मनुष्यों के पालनकर्त्ता अग्नि! जो तुम्हारी सेवा करते
हैं, उन्हें तुम धन देते हो. यज्ञशाला में जो यजमान तुम्हारी सेवा करता है, उसका तुम पालन
करते हो. (७)
त्वामग्ने दम आ विशपतिं विशस्त्वां राजानं सुविदत्रमृञ्जते.
त्वं विश्वानि स्वनीक पत्यसे त्वं सहस्राणि शता दश प्रति.. (८)
हे अग्नि! तुम यजमानों के पालनकर्त्ता हो. वे तुम्हें अपने घर में प्रकाशमान एवं अनुकूल
चेतना वाला पाकर सुशोभित करते हैं. हे उत्तम सेवा वाले एवं समस्त हव्यों के स्वामी अग्नि!
तुम हजारों, सैकड़ों और दसियों प्रकार के फल लोगों को देते हो. (८)
त्वामग्ने पितरमिष्टिभिर्नरस्त्वां भ्रात्राय शम्या तनूरुचम्.
त्वं पुत्रो भवसि यस्तेऽविधत्त्वं सखा सुशेवः पास्याधृषः.. (९)
हे अग्नि! तुम्हें पिता समझकर लोग यज्ञ द्वारा तृप्त करते हैं. तुम्हारा भ्रातृप्रेम पाने के
लिए लोग यज्ञों द्वारा तुम्हें प्रसन्न करते हैं. जो तुम्हारी सेवा करते हैं, तुम उनके पुत्र, सखा,
कल्याणकर्त्ता एवं शत्रुनाशक बनकर उनकी रक्षा करो. (९)
त्वमग्न ऋभुराके नमस्य१स्त्वं वाजस्य क्षुमतो राय ईशिषे.
त्वं वि भास्यनु दक्षि दावने त्वं विशिक्षुरसि यज्ञमातनिः.. (१०)
हे अग्नि! तुम सम्मुख स्तुति करने योग्य ऋभु हो. तुम सर्वत्र प्रसिद्ध धन एवं अन्न के
स्वामी हो. तुम उज्ज्वल हो एवं अंधकार मिटाने के लिए लकड़ियों को धीरेधीरे जलाते हो.
तुम यज्ञ की विशेष शिक्षा देने वाले एवं फल का विस्तार करने वाले हो. (१०)
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त्वमग्ने अदितिर्देव दाशुषे त्वं होत्रा भारती वर्धसे गिरा.
त्वमिळा शतहिमासि दक्षसे त्वं वृत्रहा वसुपते सरस्वती.. (११)
हे अग्नि देव! तुम हव्यदाता के लिए अदिति हो. तुम होता, भारती एवं स्तुतियों से बढ़ने
वाले हो. भारती एवं स्तुतियों से बढ़ने वाले हो. तुम अपरिमित कालों वाली भूमि एवं धनदान
करने में समर्थ हो. हे धन के पालक तुम ही वृत्रहंता एवं सरस्वती हो. (११)
त्वमग्ने सुभृत उत्तमं वयस्तव स्पार्हं वर्ण आ सन्दृशि श्रियः.
त्वां वाजः प्रतरणो बृहन्नसि त्वं रयिर्बहुलो विश्वतस्पृथुः.. (१२)
हे अग्नि! भली प्रकार पोषित होकर तुम्हीं उत्तम अन्न हो. तुम्हारे मनोहर वर्ण में लक्ष्मी
निवास करती है. तुम अन्न, पाप से रक्षा करने वाले, महान् धनरूप सब वस्तुओं की अधिकता
वाले एवं सब ओर विस्तृत हो. (१२)
त्वामग्न आदित्यास आस्यं१ त्वां जिह्वां शुचयश्चक्रिरे कवे.
त्वां रातिषाचो अध्वरेषु सश्चिरे त्वे देवा हविरदन्त्याहुतम्.. (१३)
हे अग्नि! आदित्यों ने तुम्हें सुख दिया है. हे कवि! पवित्र देवों ने तुम्हारी जीभ बनाई है.
यज्ञ की हवि के कारण एकत्र देव यज्ञ में तुम्हारी प्रतीक्षा करते हैं एवं दिया हुआ हवि तुम्हारे
द्वारा ही भक्षण करते हैं. (१३)
त्वे अग्ने विश्वे अमृतासो अद्रुह आसा देवा हविरदन्त्याहुतम्.
त्वया मर्तासः स्वदन्त आहुतिं त्वं गर्भो वीरुधां जज्ञिषे शुचिः.. (१४)
हे अग्नि! मरणरहित एवं दोषहीन समस्त देव तुम्हारे मुख में डाली गई आहुति के
भक्षण के रूप में ही हवि ग्रहण करते हैं. मनुष्य भी तुम्हारी सहायता से ही अन्न का स्वाद लेते
हैं. तुम लता, वृक्ष आदि में रहते हो एवं पवित्र होकर जन्म लेते हो. (१४)
त्वं तान्र्त्सं च प्रति चासि मज्मनाग्ने सुजात प्र च देव रिच्यसे.
पृक्षो यदत्र महिना वि ते भुवदनु द्यावापृथिवी रोदसी उभे.. (१५)
हे अग्नि! तुम शक्ति द्वारा उन प्रसिद्ध देवों से मिलते एवं अलग हो जाते हो. हे सुंदर
उत्पत्ति वाले अग्नि! तुम बल में सभी देवों से आगे हो जाओ. तुम्हारी ही शक्ति से यज्ञ में
डाला गया अन्न शब्द करते हुए धरती और आकाश में फैल जाता है. (१५)
ये स्तोतृभ्यो गोअग्रामश्वपेशसमग्ने रातिमुपसृजन्ति सूरयः.
अस्माञ्च तांश्च प्र हि नेषि वस्य आ बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (१६)
हे अग्नि! जो लोग बुद्धिमान् स्तोताओं को उत्तम गौ और शक्तिशाली अश्व दान करते हैं,
उन्हें तथा हमें उत्तम स्थान पर ले चलो. हम उत्तम वीरों से युक्त होकर यज्ञ में बहुत से मंत्र
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