ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—३७ देवता—विश्वेदेव
हे मरुतो! हमारी ये स्तुतियां तुम्हारे सामने जावें. ये हमारे रक्षक एवं गर्भपालक विष्णु
के पास जावें. वे स्तोता को संतान एवं अन्न दें. तुम अपने कल्याणसाधनों से हमारी सदा रक्षा
करो. (९)
सूक्त—३७ देवता—विश्वेदेव
आ वो वाहिष्ठो वहतु स्तवध्यै रथो वाजा ऋभुक्षणो अमृक्तः.
अभि त्रिपृष्ठैः सवनेषु सोमैर्मदे सुशिप्रा महभिः पृणध्वम्.. (१)
हे विस्तीर्ण तेज के आधाररूप ऋभुआे! ढोने में अधिक समर्थ, प्रशंसा के योग्य एवं
अबाधित रथ तुम्हें वहन करे. हे सुंदर ठोड़ी वाले ऋभुआे! तुम हमारे यज्ञ में आनंद के लिए
दूध, दही एवं सत्तू से मिला महान् सोम पीकर अपना पेट भरो. (१)
यूयं ह रत्नं मघवत्सु धत्थ स्वर्द्दश ऋभुक्षणो अमृक्तम्.
सं यज्ञेषु स्वधावन्तः पिबध्वं वि नो राधांसि मतिभिर्द्यध्वम्.. (२)
हे स्वर्गदर्शी ऋभुआे! हम हव्यरूप अन्न वालों को नाशरहित रत्न दो. इसके पश्चात् तुम
शक्तिशाली बनकर सोमपान करो. तुम अपनी कृपा से हमें धन दो. (२)
उवोचिथ हि मघवन्देष्वां महो अर्भस्य वसुनो विभागे.
उभा ते पूर्णा वसुना गभस्ती न सूनृता नि यमते वसव्या.. (३)
हे धनवान् इंद्र! तुम महान् एवं अल्प धन के विभाग के समय धन का सेवन करते हो.
तुम्हारे दोनों हाथ धन से पूर्ण हैं. तुम्हारी वाणी भुजाओं को नहीं रोकती. (३)
त्वमिन्द्र स्वयशा ऋभुक्षा वाजो न साधुरस्तमेष्युक्वा.
वयं नु ते दाश्वांसः स्याम ब्रह्म कृण्वन्तो हरिवो वसिष्ठाः.. (४)
हे असाधारण यशस्वी, ऋभुओं के स्वामी एवं यज्ञसाधक इंद्र! तुम अन्न के समान स्तोता
के घर जाओ. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! हम वसिष्ठपुत्र तुम्हें हव्य देते हुए तुम्हारी
स्तुति करें. (४)
सनितासि प्रवतो दाशुषे चिद्याभिर्विवेषो हर्यश्व धीभिः.
ववन्मा नु ते युज्याभिरूती कदा न इन्द्र राय आ दशस्येः.. (५)
हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी एवं हमारी स्तुतियों से व्याप्त इंद्र! तुम हव्यदाता यजमान
को पर्याप्त धन देते हो. हे इंद्र! तुम हमें धन कब दोगे? आज हम तुम्हारे योग्य रक्षण से युक्त
हों. (५)
वासयसीव वेधसस्त्वं नः कदा न इन्द्र वचसो बुबोधः.
अस्तं तात्या धिया रयिं सुवीरं पृक्षो नो अर्वा न्युहीत् वाजी.. (६)
हे इंद्र! तुम हमारी स्तुतियों को कब समझोगे? हम स्तोताओं को तुम इसी समय अपने
स्थान में आश्रय दो. तुम्हारा शक्तिशाली घोड़ा हमारी स्तुति के कारण संतानसहित अन्न हमारे
घर लावे. (६)
अभि यं देवी निर्ऋतिश्चिदीशे नक्षन्त इन्द्रं शरदः सुपृक्षः.
उप त्रिबन्धुर्जरदष्टिमेत्यस्ववेशं यं कृणवन्त मर्ताः.. (७)
देवी निर्ऋति स्वामी बनाने के लिए इंद्र को व्याप्त करती है. शोभन अन्न वाले वर्ष इंद्र
को व्याप्त करते हैं. मरणशील स्तोता इंद्र को अपने घर में बैठाता है. तीनों लोकों को धारण
करने वाले इंद्र अन्न को पचाने वाला बल देते हैं. (७)
आ नो राधांसि सवितः स्तवध्या आ रायो यन्तु पर्वतस्य रातौ.
सदा नो दिव्यः पायुः सिषक्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (८)
हे सविता! स्तुतियोग्य धन तुम्हारे पास से हमारे समीप आवे. मेघ द्वारा धन देने पर धन
हमें प्राप्त हो. दिव्य एवं रक्षक इंद्र हमारी सदा रक्षा करें. तुम कल्याणसाधनों द्वारा सदा हमारी
रक्षा करो. (८)
सूक्त—३८ देवता—सविता
उदु ष्य देवः सविता ययाम हिरण्ययीममतिं यामशिश्रेत्.
नूनं भगो हव्यो मानुषेभिर्वि यो रत्ना पुरूवसुर्दधाति.. (१)
सविता जिस स्वर्णमय रूप का आश्रय लेते हैं, उसीको उत्पन्न करते हैं। सूर्य निश्चय ही
मनुष्यों द्वारा स्तुतियोग्य हैं. विविध संपत्तियों वाले सविता स्तोताओं को रमणीय धन देते हैं.
(१)
उदु तिष्ठ सवितः श्रुध्य१स्य हिरण्यपाणे प्रभृतावृतस्य.
व्यु१र्वी पृथ्वीममतिं सृजान आ नृभ्यो मर्तभोजनं सुवानः.. (२)
हे सविता! तुम उदय करो. हे सोने के हाथों वाले सविता! तुम हमारी अभिलाषा पूर्ण
करने के लिए हमारा स्तोत्र सुनो. तुम विस्तृत एवं असीमित प्रभा उत्पन्न करते हो एवं
स्तोताओं को मानवभोग योग्य धन देते हो. (२)
अपि ष्टुतः सविता देवो अस्तु यमा चिद्विश्वे वसवो गृणन्ति.
स नः स्तोमान्नमस्य१श्नो धाद्विश्वेभिः पातु पायुभिर्नि सूरीन्.. (३)
हम सविता देव की स्तुति करें. सब देव जिनकी स्तुति करते हैं, वे ही नमस्कारयोग्य
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सविता हमारे स्तोत्रों एवं अन्नों को धारण करें तथा समस्त रक्षासाधनों द्वारा स्तोताओं की रक्षा
करें. (३)
अभि यं देव्यदितिर्गृणाति सवं देवस्य सवितुर्जषाणा.
अभि सम्राजो वरुणो गृणन्त्यभि मित्रासो अर्यमा सजोषाः.. (४)
सविता देव की आज्ञा का पालन करती हुई अदिति देवी उनकी स्तुति करती हैं. भली
प्रकार सुशोभित वरुण आदि उनकी स्तुति करते हैं. मित्र एवं अर्यमा समान प्रेम द्वारा उनकी
स्तुति करते हैं. (४)
अभि ये मिथो वनुषः सपन्ते रातिं दिवो रातिषाचः पृथिव्याः.
अहिर्बुध्न्य उत नः शृणोतु वरूत्र्येकधेनुभिर्नि पातु.. (५)
दान करने वाले एवं सेवानिपुण यजमान परस्पर संगत होकर स्वर्ग एवं धरती के मित्र
सविता की सेवा करते हैं. अहिर्बुध्न्य हमारा स्तोत्र सुनें. सरस्वती प्रमुख धेनुओं द्वारा हमारा
भली-भांति पालन करें. (५)
अनु तन्नो जास्पतिर्मंसीष्ट रत्नं देवस्य सवितुरियानः.
भगमुग्रोऽवसे जोहवीति भगमनुग्रो अध याति रत्नम्.. (६)
प्रजापालक सविता देव हमारी याचना सुनकर अपना प्रसिद्ध धन हमें दें. उग्र स्तोता
हमारी रक्षा के लिए भग नामक देव को बार-बार बुलाता है. असमर्थ स्तोता भग से रत्न
मांगता है. (६)
शं नो भवन्तु वाजिनो हवेषु देवताता मितद्रवः स्वर्काः.
जम्भयन्तोऽहिं वृकं रक्षांसि सनेम्यस्मद्युयवन्नमीवाः.. (७)
यज्ञ के स्तोत्रों के समय सीमित गति एवं शोभन अन्न वाले वाजी नामक देव हमें सुख
देने वाले हों. वे हननकर्त्ता एवं चोर राक्षसों को नष्ट करते हुए पुराने रोगों को हमसे पृथक् करें.
(७)
वाजेवाजेऽवत वाजिनो नो धनेषु विप्रा अमृता ऋतज्ञाः.
अस्य मध्वः पिबत मादयध्वं तृप्ता यात पथिभिर्देवयानैः.. (८)
हे बुद्धिमान्, मरणरहित एवं सत्य को जानने वाले वाजी नामक देवो! तुम धन के कारण
होने वाले प्रत्येक युद्ध में हमारी रक्षा करो. तुम इस सोम को पीकर प्रमुदित बनो एवं देवयान
मार्गों द्वारा जाओ. (८)
सूक्त—३९ देवता—विश्वेदेव
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ऊर्ध्वो अग्निः सुमतिं वस्वो अश्रेत्प्रतीची जूर्णिर्देवतातिमेति.
भेजाते अद्री रथ्येव पन्थामृतं होता न इषितो यजाति.. (१)
ऊपर की ओर गति करने वाले अग्नि मुझ स्तोता की शोभनस्तुति को सुनें. सब लोगों
को बूढ़ा बनाने वाली एवं पूर्व की ओर मुंह करने वाली उषा यज्ञ में जाती है. श्रद्धायुक्त
यजमान एवं उसकी पत्नी रथस्वामियों के समान यज्ञमार्ग पर आते हैं. हमारे द्वारा भेजा हुआ
स्तोता यज्ञ करता है. (१)
प्र वावृजे सुप्रया बर्हिरेषामा विशपतीव बीरिट इयाते.
विशामक्तोरुषसः पूर्वहूतौ वायुः पूषा स्वस्तये नियुत्वान्.. (२)
इन यजमानों का शोभन अन्न से युक्त कुश प्राप्त होता है. इस समय हमारी प्रजाओं के
पालक एवं घोड़ियों के स्वामी वायु एवं पूषा प्रजाओं के कल्याण के लिए रात्रिसंबंधी उषा की
पहली पुकार सुनकर अंतरिक्ष में आते हैं. (२)
जम्या अत्र वसवो रन्त देवा उरावन्तरिक्षे मर्जयन्त शुभ्राः.
अर्वाक् पथ उरुज्रयः कृणुध्वं श्रोता दूतस्य जग्मुषो नो अस्य.. (३)
वसुगण इस यज्ञ में धरती पर रमण करें. विस्तृत अंतरिक्ष में स्थित एवं दीप्तिशाली
मरुतों की सेवा होती है. हे तेज चलने वाले वसुओ एवं मरुतो! तुम अपना मार्ग हमारे सामने
करो. अपने समीप गए हुए हमारे इस दूत की पुकार सुनो. (३)
ते हि यज्ञेषु यज्ञियास ऊमाः सधस्थं विश्वे अभि सन्ति देवाः.
ताँ अध्वर उशतो यक्ष्यग्ने श्रुष्टी भगं नासत्या पुरन्धिम्.. (४)
वे प्रसिद्ध, यज्ञपात्र एवं रक्षक विश्वेदेव यज्ञों में एक साथ ही आते हैं. हे अग्नि! हमारे
यज्ञ में हमारी अभिलाषा करने वाले देवों का यज्ञ करो तथा भग, अश्विनीकुमारों एवं इंद्र का
शीघ्र यजन करो. (४)
आग्ने गिरो दिव आ पृथिव्या मित्रं वह वरुणमिन्द्रमग्निम्.
आर्यमणमदितिं विष्णुमेषां सरस्वती मरुतो मादयन्ताम्.. (५)
हे अग्नि! तुम स्तुतियोग्य मित्र, वरुण, इंद्र, अग्नि, अर्यमा, अदिति एवं विष्णु को स्वर्ग
एवं धरती से हमारे यज्ञ में बुलाओ. सरस्वती एवं मरुद्गण हम यजमानों से प्रसन्न हों. (५)
ररे हव्यं मतिभिर्यज्ञियानां नक्षत्कामं मर्त्यानामसिन्वन्.
धाता रयिमविदस्यं सदासां सक्षीमहि युज्येभिर्नु देवैः.. (६)
हम यज्ञपात्र देवों के लिए अपनी स्तुतियों के साथ हव्य देते हैं. अग्नि हमारी कामनाओं
का विरोध न करते हुए हमारे यज्ञ में फैलें. हे देवो! तुम उपेक्षा न करने एवं सदा उपभोग करने
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योग्य धन हमें दो. हम आज अपने सहायक देवों से मिलेंगे. (६)
नू रोदसी अभिष्टुते वसिष्ठैर्ऋतावानो वरुणो मित्रो अग्निः.
यच्छन्तु चन्द्रा उपमं नो अर्कं यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७)
वसिष्ठगोत्रीय ऋषियों ने आज धरती एवं आकाश की भलीप्रकार स्तुति की है. उन्होंने
यज्ञ वाले वरुण, मित्र एवं अग्नि की भी स्तुति की है. प्रमुदित करने वाले देव हमें प्रजा के
योग्य एवं सबसे अच्छा अन्न दें एवं कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करें. (७)
सूक्त—४० देवता—विश्वेदेव
ओ श्रुष्टिर्विदथ्या३ समेतु प्रति स्तोमं दधीमहि तुराणाम्.
यदद्य देवः सविता सुवाति स्यामास्य रत्निनो विभागे.. (१)
हे देवो! तुम्हारे मन द्वारा संपादित होने वाला सुख हमें प्राप्त हो. हम तेज चलने वाले
देवों के लिए स्तोत्र बनाते हैं. रत्नों के स्वामी सविता आज जो धन हमारे पास भेजेंगे, हम
उसी धन के भागी होंगे. (१)
मित्रस्तन्नो वरुणो रोदसी च द्युभक्तमिन्द्रो अर्यमा ददातु.
दिदेष्टु देव्यदिति रेक्णो वायुश्च यन्नियुवैते भगश्च.. (२)
मित्र एवं वरुण, द्यावा-पृथिवी, इंद्र एवं अर्यमा हमें वही स्तोताओं द्वारा प्रशंसित धन दें.
अदिति देवी हमें धन दें. वायु एवं भग हमारे लिए उसी धन की योजना करें. (२)
सेदुग्रो अस्तु मरुतः स शुष्मी यं मर्त्यं पृषदश्वा अवाथ.
उतेमग्निः सरस्वती जुनन्ति न तस्य रायः पर्येतास्ति.. (३)
हे हरिणरूप वाहनसाधनों वाले मरुतो! तुम जिस मनुष्य की रक्षा करते हो, वह उग्र एवं
बलवान् हो. अग्नि, सरस्वती आदि देवगण जिस यजमान को यज्ञ की प्रेरणा देते हैं, उसके
धन का कोई बाधक नहीं है. (३)
अयं हि नेता वरुण ऋतस्य मित्रो राजानो अर्यमापो धुः.
सुहवा देव्यदितिरनर्वा ते नो अंहो अति पर्षन्नरिष्टान्.. (४)
यज्ञ को प्राप्त करने वाले ये शक्तिशाली वरुण, मित्र एवं अर्यमा देव हमारे यज्ञकर्म को
धारण करते हैं. किसी के द्वारा न रुक सकने वाली अदिति देवी हमारी पुकार सुने. ये देव हमें
बाधा पहुंचाए बिना हमारे पापों को नष्ट करें. (४)
अस्य देवस्य मीळुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः.
विदे हि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत्.. (५)
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अन्य देव यज्ञ में हव्यों द्वारा प्राप्त करने योग्य एवं अभिलाषापूरक विष्णु के अंशरूप हैं.
रुद्र हमें अपना सुख एवं महत्त्व देते हैं. हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारे हव्य वाले घर में आओ.
(५)
मात्र पूषन्नघृण इरस्यो वरूत्री यद्रातिषाचश्च रासन्.
मयोभुवो नो अर्वन्तो नि पान्तु वृष्टिं परिज्मा वातो ददातु.. (६)
हे दीप्तिशाली पूषा! सबकी वरणीय सरस्वती एवं दानकुशल देवपत्नियां इस यज्ञ में हमें
जो धन दें, उसका विघात मत करना. सुख देने वाले एवं गतिशील देव हमारी रक्षा करें एवं
सब ओर जाने वाले वायु हमें वर्षारूपी जल दें. (६)
नू रोदसी अभिष्टुते वसिष्ठैर्ऋतावानो वरुणो मित्रो अग्निः.
यच्छन्तु चन्द्रा उपमं नो अर्कं यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७)
वसिष्ठगोत्रीय ऋषियों ने आज धरती एवं आकाश की भली प्रकार स्तुति की है. उन्होंने
यज्ञ वाले वरुण, मित्र एवं अग्नि की भी स्तुति की है. प्रमुदित करने वाले देव हमें पूजा के
योग्य एवं सबसे अच्छा अन्न दें एवं कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करें. (७)
सूक्त—४१ देवता—इंद्रादि
प्रातरग्निं प्रातरिन्द्रं हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना.
प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातः सोममुत रुद्रं हुवेम.. (१)
हम स्तोता अग्नि, इंद्र, मित्र, वरुण एवं अश्विनीकुमारों को प्रातःकाल बुलाते हैं. हम
प्रातःकाल भग, पूषा, ब्रह्मणस्पति, सोम एवं रुद्र का आह्वान करते हैं. (१)
प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्ता.
आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह.. (२)
जो विश्व के धारक, जयशील, उग्र एवं अदितिपुत्र हैं, हम प्रातःकाल उन्हीं भगदेव को
बुलाते हैं. दरिद्र स्तोता एवं धनसंपन्न राजा दोनों ही भगदेव की स्तुति करते हुए कहते हैं
—“हमें भोग के योग्य धन दो.” (२)
भग प्रणेतर्भग सत्यराधो भगेमां धियमुदवा ददन्नः.
भग प्र णो जनय गोभिरश्वैर्भग प्र नृभिर्नृवन्तः स्याम.. (३)
हे भग! तुम उत्तम नेता एवं सत्यधन हो. हमें अभिलषित धन देकर हमारी स्तुति सफल
करो. हे भग! हमें गायों एवं घोड़ों द्वारा उन्नत बनाओ. हे भग! हम पुत्रादि द्वारा मनुष्यों वाले
हों. (३)
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उतेदानीं भगवन्तः स्यामोत प्रपित्व उत मध्ये अह्नाम्.
उतोदिता मघवन्सूर्यस्य वयं देवानां सुमतौ स्याम.. (४)
हे भगदेव! हम इस समय एवं दिन का मध्य प्राप्त होने पर धनी बनें. हे धनस्वामी भग!
हम सूर्योदय के समय देवों की कृपा प्राप्त करें. (४)
भग एव भगवाँ अस्तु देवास्तेन वयं भगवन्तः स्याम.
तं त्वा भग सर्व इज्जोहवीति स नो भग पुरएता भवेह.. (५)
हे देवो! भग ही धनवान् हों. उसी धन से हम भी धनवान् हों. हे भग! सब लोग तुम्हें
बार-बार बुलाते हैं. इस यज्ञ में तुम हमारे अनुगामी बनो. (५)
समध्वरायोपसो नमन्त दधिक्रावेव शुचये पदाय.
अर्वाचीनं वसुविदं भगं नो रथमिवाश्वा वाजिन आ वहन्तु.. (६)
घोड़ा जिस प्रकार चलने योग्य मार्ग पर जाता है, उसी प्रकार उषा देवी हमारे यज्ञ में
आवें. तेज चलने वाले घोड़े जैसे रथ को लाते हैं, उसी प्रकार उषा भग को हमारे सामने लावें.
(६)
अश्वावतीर्गोमतीर्न उषासो वीरवतीः सदमुच्छन्तु भद्राः.
घृतं दुहाना विश्वतः प्रपीता यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७)
भद्रा, अश्वों, गायों एवं पुत्रादि जन से युक्त जल बरसाती हुई तथा सभी गुणों वाली उषा
हमारा रात का अंधकार मिटावें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (७)
सूक्त—४२ देवता—विश्वेदेव
प्र ब्रह्माणो अङ्गिरसो नक्षन्त प्र क्रन्दनुर्नभन्यस्य वेतु.
प्र धेनव उदप्रुतो नवन्त युज्यतामद्री अध्वरस्य पेशः.. (१)
अंगिरा नाम के ऋषि सब जगह व्याप्त हों. पर्जन्य हमारे स्तोत्र की विशेषरूप से
अभिलाषा करें. नदियां जल सींचती हुई प्रवाहित हों. यजमान एवं उसकी पत्नी यज्ञ का रूप
बनावें. (१)
सुगस्ते अग्ने सनवित्तो अध्वा युक्ष्वा सुते हरितो रोहितश्च.
ये वा सद्मन्नरुषा वीरवाहो हुवे देवानां जनिमानि सत्त:.. (२)
हे अग्नि! चिरकाल से प्राप्त तुम्हारा मार्ग सुगम हो. तुम्हारे काले और लाल रंग के जो
घोड़े तुम्हें यज्ञशाला में ले जाते हुए शोभा पाते हैं, उन्हें तुम रथ में जोड़ो. मैं यज्ञशाला में बैठा
हुआ देवों को बुलाता हूं. (२)
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समु वो यज्ञं महयन्नमोभिः प्र होता मन्द्रो रिरिच उपाके.
यजस्व सु पूर्वणीक देवाना यज्ञियामरमतिं ववृत्याः.. (३)
हे देवो! नमस्कार करते हुए ये स्तोता तुम्हारे यज्ञ की भली प्रकार पूजा करते हैं. हमारे
पास बैठा हुआ एवं स्तुतिशील होता दूसरे होताओं से श्रेष्ठ है. हे यजमान! तुम देवों का यज्ञ
करो. हे अधिक तेज वाले अग्नि! तुम यज्ञयोग्य भूमि को परिवर्तित करो. (३)
यदा वीरस्य रेवतो दुरोणे स्योनशीरतिथिराचिकेतत्.
सुप्रीतो अग्निः सुधितो दम आ स विशे दाति वार्यमियत्यै.. (४)
सबके अतिथि अग्नि जब वीर एवं धनी यजमान को घर में सुखपूर्वक सोए हुए जान
पड़ते हैं तथा यज्ञशाला में भली प्रकार रखे हुए अग्नि प्रसन्न होते हैं, उस समय वे अपने
समीप वाले लोगों को धन देते हैं. (४)
इमं नो अग्ने अध्वरं जुषस्व मरुत्स्विन्द्रे यशसं कृधी नः.
आ नक्ता बर्हिः सदतामुषासोशान्ता मित्रावरुणा यजेह.. (५)
हे अग्नि! हमारे इस यज्ञ को स्वीकार करो. हमें इंद्र एवं मरुद्गण के सामने यशस्वी
बनाओ, रात में एवं उषाकाल में कुशों पर बैठो तथा यज्ञ के अभिलाषी मित्र व वरुण की इस
यज्ञ में पूजा करो. (५)
एवाग्निं सहस्यं वसिष्ठो रायस्कामो विश्वप्स्न्यस्य स्तौत्.
इषं रयिं पप्रथद्वाजमस्मे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
धन की अभिलाषा वाले वसिष्ठ ने इसी प्रकार शक्तिपुत्र अग्नि की स्तुति धनलाभ के
लिए की थी. अग्नि हमारे अन्न, धन और बल की वृद्धि करें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा
हमारी रक्षा करो. (६)
सूक्त—४३ देवता—विश्वेदेव
प्र वो यज्ञेषु देवयन्तो अर्चन्द्यावा नमोभिः पृथिवी इषध्यै.
येषां ब्रह्माण्यसमानि विप्रा विष्वग्वियन्ति वनिनो न शाखाः.. (१)
हे देवो! जिन मेधावियों के स्तोत्र वृक्ष की शाखाओं के समान सब ओर विशेष रूप से
जाते हैं, वे ही देवाभिलाषी स्तोता यज्ञों में अपनी स्तुतियों द्वारा सभी देवों की अर्चना करते हैं.
वे ही देवों को प्राप्त करने के लिए द्यावा-पृथिवी की अर्चना करते हैं. (१)
प्र यज्ञ एतु हेत्वो न सप्तिरुद्यच्छध्वं समनसो घृताचीः.
स्तृणीत बर्हिरध्वराय साधूर्ध्वा शोचींषि देवयून्यस्थुः.. (२)
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हमारा यज्ञ शीघ्रगामी अश्व के समान देवों के पास जावे. हे ऋत्विजो! तुम एकमत
होकर स्रुच को उठाओ एवं यज्ञ के निमित्त कुशों को भली-भांति बिछाओ. हे अग्नि! तुम्हारी
देवाभिलाषिणी लपटें ऊपर की ओर उठें. (२)
आ पुत्रासो न मातरं विभृत्राः सानौ देवासो बर्हिषः सदन्तु.
आ विश्वाची विदथ्यामनक्त्वग्ने मा नो देवतात म्ध्रस्कः.. (३)
विशेष रूप से पालनीय पुत्र जिस प्रकार माता की गोद में बैठता है, उसी प्रकार देवगण
कुश बिछी हुई वेदी के ऊंचे स्थान पर बैठें. हे अग्नि! जुहू तुम्हारी यज्ञ के योग्य ज्वाला को
भली प्रकार सींचे. तुम युद्ध में हमारे शत्रुओं की सहायता मत करना. (३)
ते सीषपन्त जोषमा यजत्रा ऋतस्य धाराः सुदुघा दुहानाः.
ज्येष्ठं वो अद्य मह आ वसूनामा गन्तन समनसो यति ष.. (४)
यज्ञ के पात्र इंद्रादि देव जल की सुख से दुहने योग्य धाराओं को बरसाते हुए हमारी सेवा
को पर्याप्त रूप में स्वीकार करें. हे देवो! आज तुम सब धनों में पूज्य अपना धन लाओ तथा
स्वयं भी समान रूप से प्रसन्न होकर आओ. (४)
एवा नो अग्ने विश्वा दशस्य त्वया वयं सहसावन्नासक्राः.
राया युजा सधमादो अरिष्टा यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५)
हे अग्नि! तुम इसी प्रकार हमें प्रजाओं के मध्य धन दो. हे शक्तिशाली अग्नि! हम तुम्हारे
द्वारा त्यागे न जावें तथा नित्ययुक्त धन के साथ प्रसन्न एवं अपराजित हों. हे देवो! तुम
कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (५)
सूक्त—४४ देवता—दधिक्रा
दधिक्रां वः प्रथममश्विनोषसमग्निं समिद्धं भगमूतये हुवे.
इन्द्रं विष्णुं पूषणं ब्रह्मणस्पतिमादित्यान्द्यावापृथिवी अपः स्वः.. (१)
हे स्तोताओ! तुम्हारी रक्षा के लिए सबसे पहले मैं दधिक्रा देव को बुलाता हूं. इसके बाद
अश्विनीकुमारों, उषा, प्रज्वलित अग्नि और भग नामक देव को बुलाता हूं. मैं इंद्र, विष्णु, पूषा,
ब्रह्मणस्पति, आदित्यों, द्यावा-पृथिवी, जलों एवं सूर्य को बुलाता हूं. (१)
दधिक्रामु नमसा बोधयन्त उदीराणा यज्ञमुपप्रयन्तः.
इळां देवीं बर्हिषि सादयन्तोऽश्विना विप्रा सुहवा हुवेम.. (२)
हम स्तोत्रों द्वारा दधिक्रा देव को जगाते एवं प्रेरित करते हुए यज्ञ के समीप जाते हैं,
कुशों पर इडा देवी को स्थापित करते हैं एवं शोभन आह्वान वाले उन मेधावी अश्विनीकुमारों
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को बुलाते हैं. (२)
दधिक्रावाणं बुबुधानो अग्निमुप ब्रुव उषसं सूर्यं गाम्.
ब्रध्नं मँश्चतोर्वरुणस्य बभ्रुं ते विश्वास्मद् दुरिता यावयन्तु.. (३)
दधिक्रा देव को जगाता हुआ मैं अग्नि, उषा, सूर्य एवं भूमि की स्तुति करता हूं. मैं
अभिमानियों को नष्ट करने वाले वरुण के महान् एवं पीले रंग के घोड़े की स्तुति करता हूं. वे
हमसे सभी पाप दूर करें. (३)
दधिक्रावा प्रथमो वाज्यर्वाग्रे रथानां भवति प्रजानन्.
संविदान उषसा सूर्येणादित्येभिर्वसुभिरङ्गिरोभिः.. (४)
सभी अश्वों में प्रमुख, शीघ्रगामी एवं गतिशील दधिक्रा जानने योग्य बातों को भली
प्रकार जानकर उषा, सूर्य, आदित्यों, वसुओं और अंगिराओं के साथ सहमत होकर बैठते हैं.
(४)
आ नो दधिक्राः पथ्यामनक्त्वृतस्य पन्थामन्वेतवा उ.
शृणोतु नो दैव्यं शर्धो अग्निः शृण्वन्तु विश्वे महिषा अमूराः.. (५)
दधिक्रा देव यज्ञमार्ग पर अनुगमन करने के इच्छुक हम लोगों के मार्ग को सींचें. अग्नि
हमारे दैवी बल एवं स्तोत्र को सुनें. मूढ़तारहित एवं महान् विश्वेदेव मेरी स्तुति सुनें. (५)
सूक्त—४५ देवता—सविता
आ देवो यातु सविता सुरत्नोऽन्तरिक्षप्रा वहमानो अश्वैः.
हस्ते दधानो नर्या पुरूणि निवेशयञ्च प्रसुवञ्च भूम.. (१)
शोभनरत्नों से युक्त, अपने तेज से अंतरिक्ष को पूर्ण करने वाले एवं अपने घोड़ों द्वारा
ढोए जाते हुए सविता देव अनेक मानवहितकारी धनों को हाथ में धारण करते हैं. वे प्राणियों
को स्थापित करते हैं एवं कर्म में लगाते हैं. वे यहां आवें. (१)
उदस्य बाहू शिथिरा बृहन्ता हिरण्यया दिवो अन्ताँ अनष्टाम्.
नूनं सो अस्य महिमा पनिष्ट सूरश्चिदस्मा अनु दादपस्याम्.. (२)
दान के निमित्त फैलाई हुई, विशाल एवं सोने की भुजाओं को सविता देव अंतरिक्ष में
व्याप्त करें. हम सविता की उसी महिमा की आज प्रशंसा कर रहे हैं. सूर्य भी सविता को कर्म
की इच्छा दें. (२)
स घा नो देवः सविता सहावा साविषद्ध्वसुपतिर्वसूनि.
विश्रयमाणो अमतिमुरूचीं मर्तभोजनमध रासते नः.. (३)
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तेजस्वी व धनों के पालक सविता देव हमारे लिए सब ओर से धनों को प्रेरित करते हैं.
वे विस्तीर्ण गति वाले रूप को धारण करते हुए इस समय हमें मानवों के भोग में आने वाला
धन दें. (३)
इमा गिरः सवितारं सुजिह्वं पूर्णगभस्तिमूळते सुपाणिम्.
चित्रं वयो बृहदस्मे दधातु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (४)
ये वाणियां शोभनजिह्वा वाले, संपूर्ण धनयुक्त एवं शोभनपाणि वाले सविता की स्तुति
करती हैं. वे हमें विचित्र एवं महान् धन दें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा
पालन करो. (४)
सूक्त—४६ देवता—रुद्र
इमा रुद्राय स्थिरधन्वने गिरः क्षिप्रेषवे देवाय स्वधान्वे.
अषाळहाय सहमानाय वेधसे तिग्मायुधाय भरता शृणोतु नः.. (१)
हे स्तोताओ! तुम दृढ़ धनुष वाले, शीघ्रगामी बाणों वाले, अन्नयुक्त अपराजित, सबको
जीतने वाले, बनाने वाले तथा तीक्ष्ण आयुधों के स्वामी रुद्र की स्तुति करो. वे हमारी स्तुति
सुनें. (१)
स हि क्षयेण क्षम्यस्य जन्मनः साम्राज्येन दिव्यस्य चेतति.
अवन्नवन्तीरुप नो दुरश्चरानमीवो रुद्र जासु नो भव.. (२)
रुद्र को स्वर्ग एवं पृथ्वी पर रहने वाले ऐश्वर्य द्वारा जाना जा सकता है. हे रुद्र! हमारी
प्रजाएं तुम्हारी स्तुतियां करती हैं. तुम उनकी रक्षा करते हुए हमारे घर आओ एवं उसे रोगहीन
बनाओ. (२)
या ते दिद्युदवसृष्टा दिवस्परि क्षमया चरिति परि सा वृणक्तु नः.
सहस्त्रं ते स्वपिवात भेषजा मा नस्तोकेषु तनयेषु रीरिषः.. (३)
हे रुद्र! अंतरिक्ष से छोड़ी गई बिजली जो धरती पर घूमती है, वह हमें त्याग दे. हे
स्वपिवात रुद्र! तुम्हारी हजारों ओषधियां हमें मिलें. तुम हमारे पुत्र-पौत्रों की हत्या मत करना.
(३)
मा नो वधी रुद्र मा परा दा मा ते भूम प्रसितौ हीळितस्य.
आ नो भज बर्हिषि जीवशंसे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (४)
हे रुद्र! तुम हमें मत मारना एवं हमारा त्याग मत करना. हम तुम्हारे क्रोध के बंधन में न
रहें. तुम प्राणियों द्वारा प्रशंसित यज्ञ का हमें भागी बनाओ. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा
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