ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—१४८ देवता—इंद्र
सूक्त—१४८ देवता—इंद्र
सुष्वाणास इन्द्र स्तुमसि त्वा ससवांसश्च तुविनृम्ण वाजम्.
आ नो भर सुवितं यस्य चाकन्त्मना तना सनुयाम त्वोताः.. (१)
हे अधिक धन वाले इंद्र! हम सोमरस निचोड़कर तुम्हारी स्तुति करते हैं और तुम्हारे लिए
अन्न एकत्र करते हैं. तुम अपनी मनचाही संपत्ति हमें दो. तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर हम स्वयं
ही धन प्राप्त करें. (१)
ऋष्वस्त्वमिन्द्र शूर जातो दासीर्विशः सूर्येण सह्याः.
गुहा हितं गुह्यं गूळहमप्सु बिभ्रमसि प्रस्रवणे न सोमम्.. (२)
हे शूर एवं दर्शनीय इंद्र! तुम जन्म लेते ही सूर्य की सहायता से दास जाति के लोगों को
हराते हो. तुम गुहा में छिपे एवं जल में डूबे हुए को भी हरा देते हो. वर्षा होने पर हम सोमरस
प्रस्तुत करेंगे. (२)
अर्यो वा गिरो अभ्यर्च विद्वानृषीणां विप्रः सुमतिं चकानः.
ते स्याम ये रणयन्त सोमैरेनोत तुभ्यं रथोळह भक्षैः.. (३)
हे मेधावी ऋषियों की स्तुति की अभिलाषा करने वाले विद्वान् एवं स्वामी इंद्र! तुम
स्तोताओं की प्रार्थना पूरी करो. हम सोम के द्वारा तुम्हें सदा प्रसन्न करने वाले बनें. हे रथ पर
बैठे हुए इंद्र! यह सारा भोज्य पदार्थ तुम्हें अर्पित है. (३)
इमा ब्रह्मेन्द्र तुभ्यं शंसि दा नृभ्यो नृणां शूर शवः.
तेभिर्भव सक्रतुर्येषु चाकन्नुत त्रायस्व गृणत उत स्तीन्.. (४)
हे इंद्र! ये प्रधान स्तुतियां तुम्हारे लिए कही गई हैं. हे वीर इंद्र! श्रेष्ठ मानवों के लिए अन्न
दो. जो तुम्हें चाहते हैं, उन में तुम शोभन यज्ञ वाले बनो. जो तुम्हारा स्तोत्र करने के लिए
एकत्र हैं, उनकी रक्षा करो. (४)
श्रुधी हवमिन्द्र शूर पृथ्या उत स्तवसे वेनस्यार्कैः.
आ यस्ते योनिं घृतवन्तमस्वारूर्मिर्न निम्नैर्द्रवयन्त वक्वाः.. (५)
हे शूर इंद्र! तुम मुझ पृथु ऋषि का आह्वान सुनो. मुझ वेनपुत्र के मंत्र तुम्हारी स्तुति
करते हैं. मैंने घृतयुक्त यज्ञशाला में आकर तुम्हारी स्तुति की है. स्तोता नीचे गिरने वाली घी की
धाराओं के समान ही दौड़ रहे हैं. (५)
सूक्त—१४९ देवता—सविता
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सविता यन्त्रैः पृथिवीमरम्णादस्कम्भने सविता द्यामदृंहत्.
अश्वमिवाधुक्षद्धुनिमन्तरिक्षमतूर्ते बद्धं सविता समुद्रम्.. (१)
सविता ने अनेक मंत्रों की सहायता से धरती को स्थिर किया है एवं बिना किसी सहारे
के द्युलोक को दृढ़ता से बांध दिया है. आकाश में सागर के समान स्थित बादल घोड़े के
समान शरीर कंपित करते हैं. बादल उपद्रवरहित स्थान में बंधा है. उसीसे सविता जल
निकालते हैं. (१)
यत्रा समुद्रः स्कभितो व्यौनदपां नपात्सविता तस्य वेद.
अतो भूरत्त आ उत्थितं रजोऽतो द्यावापृथिवी अप्रथेताम्.. (२)
अंतरिक्ष में वायु के पाशों से बंधा हुआ मेघ धरती को गीला करता है. जल के पुत्र
सविता उस स्थान को जानते हैं. सविता से ही धरती व आकाश उत्पन्न हुए हैं एवं द्यावा-
पृथिवी ने विस्तार पाया है. (२)
पश्चेदमन्यदभवद्यजत्रममर्त्यस्य भुवनस्य भूना.
सुपर्णो अङ्ग सवितुर्गुरुत्मान्पूर्वो जातः स उ अस्यानु धर्म.. (३)
जिन देवों का यज्ञ मरणरहित एवं स्वर्ग में उत्पन्न सोम द्वारा पूरा होता है, वे सविता के
बाद में जन्मे हैं. शोभन पंखों वाले गरुड़ सविता से पहले जन्मे हैं. इसी कारण गरुड़ सविता
को धारण करके वर्तमान हैं. (३)
गावइव ग्रामं यूयुधिरिवाश्वान्वाश्रेव वत्सं सुमना दुहाना.
पतिरिव जायामभि नो न्येतु धर्ता दिवः सविता विश्ववारः.. (४)
सबके वरणीय एवं द्युलोक को धारण करने वाले सविता हमारी ओर उसी प्रकार
उत्सुकता से आते हैं, जिस प्रकार गाएं गांव की ओर आती हैं. योद्धा घोड़े की ओर जाते हैं.
ब्याई हुई गाय बछड़े की ओर जाती है एवं पति पत्नी की ओर जाता है. (४)
हिरण्यस्तूपः सवितर्यथा त्वाङ्गिरसो जुह्वे वाजे अस्मिन्.
एवा त्वार्चन्नवसे वन्दमानः सोमस्येवांशं प्रति जागराहम्.. (५)
हे सविता! मेरे पिता एवं अंगिरा के पुत्र हिरण्यस्तूप ऋषि तुम्हें यज्ञ में जिस प्रकार
बुलाते थे एवं जिस प्रकार यजमान सोमलता की रक्षा के निमित्त सतर्क रहता है. मैं भी रक्षा
के निमित्त तुम्हारी वंदना करता हुआ तुम्हारी सेवा के लिए उसी प्रकार सावधान हूं. (५)
सूक्त—१५० देवता—अग्नि
समिद्धश्चित्समिध्यसे देवेभ्यो हव्यवाहन.
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आदित्यै रुद्रैर्वसुभिर्न आ गहि मृळीकाय न आ गहि.. (१)
हे देवों के लिए हव्य वहन करने वाले तथा प्रज्वलित अग्नि! तुम्हें दीप्त किया गया है.
तुम आदित्यों, वसुओं और रुद्रों के साथ सुख देने के लिए इस यज्ञ में पधारो. (१)
इमं यज्ञमिदं वचो जुजुषाण उपागहि.
मर्तासस्त्वा समिधान हवामहे मृळीकाय हवामहे.. (२)
हे अग्नि! यह यज्ञ एवं ये स्तुतियां तुम्हारी हैं. तुम सेवित होते हुए पास आओ. हे अग्नि!
हम मनुष्य तुम्हें सुख के लिए बुलाते हैं. (२)
त्वामु जातवेदसं विश्ववारं गृणे धिया.
अग्ने देवाँ आ वह नः प्रियव्रतान्मृळीकाय प्रियव्रतान्.. (३)
हे जातवेद एवं सबके द्वारा वरण करने योग्य अग्नि! मैं स्तुतियों द्वारा तुम्हारी प्रशंसा
करता हूं. हे अग्नि! प्रियव्रत वाले अग्नि को हमारे सुख के लिए लेकर यहां आओ. (३)
अग्निर्देवो देवानाम्भवत्पुरोहितोऽग्निं मनुष्या३ऋषयः समीधिरे.
अग्निं महो धनसातावहं हुवे मृळीकं धनसातये.. (४)
अग्नि देव देवों के पुरोहित बने. मनुष्यों और ऋषियों ने अग्नि को प्रज्वलित किया था.
मैं धन पाने के लिए महान् अग्नि को बुलाता हूं. वे मुझे सुखी करें. (४)
अग्निरत्रिं भरद्वाजं गविष्ठिरं प्रावन्नः कण्वं त्रसदस्युमाहवे.
अग्निं वसिष्ठो हवते पुरोहितो मृळीकाय पुरोहितः.. (५)
अग्नि ने युद्ध में अत्रि, भरद्वाज, गविष्ठिर, कण्व और त्रसदस्यु की रक्षा की है. पुरोहित
वसिष्ठ अग्नि को सुख के लिए बुलाते हैं. (५)
सूक्त—१५१ देवता—श्रद्धा
श्रद्धयाग्निः समिध्यते श्रद्धया हूयते हविः.
श्रद्धां भगस्य मूर्धनि वचसा वेदयामसि.. (१)
श्रद्धा के द्वारा अग्नि प्रज्वलित होते हैं एवं हवि अग्नि में डाला जाता है. श्रद्धा धन के
शीश पर स्थित है, यह बात मैं स्तोत्र द्वारा जानता हूं. (१)
प्रियं श्रद्धे ददतः प्रियं श्रद्धे दिदासतः.
प्रियं भोजेषु यज्वस्विदं म उदितं कृधि.. (२)
श्रद्धा के द्वारा अग्नि प्रज्वलित होते हैं एवं हवि अग्नि में डाला जाता है. तुम मुझे
अभीष्ट फल दो. तुम मेरे भोगार्थियों एवं यज्ञकर्त्ताओं को मनचाहा फल दो. (२)
यथा देवा असुरेषु श्रद्धामग्रेषु चक्रिरे. एवं भोजेषु यज्वस्वस्माकमुदितं कृधि.. (३)
हे श्रद्धा! देवों ने असुरों के विषय में हत्या का निश्चय किया. तुम मेरे भक्तों और
यज्ञकर्त्ताओं को मनचाहा फल दो. (३)
श्रद्धां देवा यजमाना वायुगोपा उपासते.
श्रद्धां हृदय्य१याकृत्या श्रद्धया विन्दते वसु.. (४)
वायु द्वारा सुरक्षित देव एवं यजमान श्रद्धा की उपासना करते हैं. लोग मन के संकल्प के
कारण श्रद्धा की सेवा करते हैं एवं श्रद्धा के कारण धन पाते हैं. (४)
श्रद्धां प्रातर्हवामहे श्रद्धां मध्यंदिनं परि.
श्रद्धां सूर्यस्य निम्नुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह नः.. (५)
हम प्रातःकाल, दोपहर के समय एवं सूर्य के अस्त होने पर श्रद्धा को बुलाते हैं. हे
श्रद्धा! हमें इस संसार में श्रद्धायुक्त बनाओ. (५)
सूक्त—१५२ देवता—इंद्र
शास इत्था महाँ अस्यमित्रखादो अद्भुत:.
न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदा चन.. (१)
मैं सदा इस प्रकार इंद्र की स्तुति करता हूं— हे इंद्र! तुम महान् शत्रुक्षक एवं अद्भुत
हो. तुम्हारा सखा न कभी मरता है और न हारता है. (१)
स्वस्तिदा विशस्पतिर्वृत्रहा विमृधो वशी.
वृषेन्द्रः पुर एतु नः सोमपा अभयङ्करः.. (२)
कल्याणदाता, प्रजाओं के स्वामी, वृत्रनाशक, युद्ध करने वाले, शत्रु को वश में करने
वाले, अभिलाषापूरक, सोमरस पीने वाले एवं अभयकर्त्ता इंद्र हमारे सामने आवें. (२)
वि रक्षो वि मृधो जहि वि वृत्रस्य हनू रुज.
वि मन्युमिन्द्र वृत्रहन्नमित्रस्याभिदासतः.. (३)
हे वृत्रनाशक इंद्र! तुम राक्षस और शत्रुओं का नाश करो. तुम वृत्र के जबड़ों को तोड़ दो
तथा हमसे द्वेष करने वाले अप्रिय शत्रु का क्रोध समाप्त करो. (३)
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वि न इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः.
यो अस्माँ अभिदासत्यधरं गमया तमः.. (४)
हे इंद्र! हमारे शत्रुओं को मारो तथा हमसे लड़ने के इच्छुक लोगों को बलहीन बनाओ.
जो हमें चारों ओर से हानि पहुंचाता है, उसे निकृष्ट अंधकार में डाल दो. (४)
अपेन्द्र द्विषतो मनोऽप जिज्यासतो वधम्.
वि मन्योः शर्म यच्छ वरीयो यवया वधम्.. (५)
हे इंद्र! शत्रु का मनोबल तोड़ दो. जो हमें जर्जर करना चाहता है, उस पर आयुध
चलाओ. हमें शत्रु के क्रोध से बचाकर सुख दो एवं शत्रु के आयुध को हमसे अलग करो. (५)
सूक्त—१५३ देवता—इंद्र
ईङ्खयन्तीरपस्युव इन्द्रं जातमुपासते. भेजानासः सुवीर्यम्.. (१)
अपना कर्म करने की इच्छुक एवं स्तुति के साथ इंद्र के पास पहुंचने वाली इंद्र की
माताएं उत्पन्न हुए इंद्र की सेवा करती हैं एवं इंद्र से शोभन धन प्राप्त करती हैं. (१)
त्वमिन्द्र बलादधि सहसो जात ओजसः. त्वं वृषन्वृषेदास.. (२)
हे इंद्र! तुम बल, वीर्य और ओज के साथ उत्पन्न हुए हो. हे वर्षा करने वाले इंद्र! तुम
हमारी अभिलाषा पूर्ण करो. (२)
त्वमिन्द्रासि वृत्रहा व्य१न्तरिक्षमतिरः. उद् द्यामस्तभ्ना ओजसा.. (३)
हे इंद्र! तुम वृत्रनाशक हो एवं तुमने आकाश को विस्तृत किया है. तुमने अपनी शक्ति से
स्वर्ग को ऊपर टिकाया है. (३)
त्वमिन्द्र सजोषसमर्कं बिभर्षि बाह्वोः. वज्रं शिशान ओजसा.. (४)
हे इंद्र! तुम अपने साथी सूर्य को दोनों हाथों से धारण करते हो एवं बलपूर्वक वज्र की
धार तेज करते हो. (४)
त्वमिन्द्राभिभूरसि विश्वा जातान्योजसा. स विश्वा भुव आभवः.. (५)
हे इंद्र! तुम सभी प्राणियों को अपने तेज से हराते हो एवं सभी स्थानों पर तुम्हारा
अधिकार है. (५)
सूक्त—१५४ देवता—मृत व्यक्ति
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सोम एकेभ्यः पवते घृतमेक उपासते.
येभ्यो मधु प्रधावति ताँश्चिद्देवापि गच्छतात्.. (१)
कुछ पितरों के लिए सोमरस निचोड़ा जाता है और कुछ घी का सेवन करते हैं. हे प्रेत!
तुम उन पितरों के पास जाओ, जिनके लिए मधु बहता है. (१)
तपसा ये अनाधृष्यास्तपसा ये स्वर्ययुः.
तपो ये चक्रिरे महस्ताँश्चिद्देवापि गच्छतात्.. (२)
हे प्रेत! तुम उन पितरों के समीप जाओ, जो तपस्या करके अपराजेय बने, जो तपस्या
से स्वर्ग गए एवं जिन्होंने महान् तप किया. (२)
ये युध्यन्ते प्रधनेषु शूरासो ये तनूत्यजः.
ये वा सहस्रदक्षिणास्ताँश्चिद्देवापि गच्छतात्.. (३)
हे प्रेत! तुम उन पितरों के समीप जाओ जो युद्धक्षेत्र में युद्ध करते हैं, जिन शूरों ने शरीर
का मोह छोड़ दिया था अथवा जिन्होंने हजारों मुद्राएं दक्षिणा में दीं. (३)
ये चित्पूर्व ऋतसाप ऋतावान ऋतावृधः.
पितॄन्तपस्वतो यम ताँश्चिद्देवापि गच्छतात्.. (४)
हे यम! यह प्रेत उन्हीं पितरों के पास जाए जो उत्तम कर्म करके पुण्य वाले बने, जिन्होंने
यज्ञ को बढ़ाया एवं जिन्होंने तपस्या की. (४)
सहस्रणीथाः कवयो ये गोपायन्ति सूर्यम्.
ऋषीन् तपस्वतो यम तपोजाँ अपि गच्छतात्.. (५)
हे यम! यह प्रेत उन्हीं तपस्या करने वाले एवं देवों से उत्पन्न ऋषियों के समीप जावे जो
हजारों प्रकार के उत्तम कर्म कर चुके हैं, बुद्धिमान् बने हैं एवं जो सूर्य की रक्षा करते हैं. (५)
सूक्त—१५५ देवता—दरिद्रतानाश
अरायि काणे विकटे गिरिं गच्छ सदान्वे.
शिरिम्बिठस्य सत्वभिस्तेभिष्ट्वा चातयामसि.. (१)
हे दानविरोधिनी, बुरा शब्द करने वाली, विकृत गमन वाली व सदा क्रोध करने वाली
दरिद्रता! तुम पर्वत पर जाओ. मैं शिरिंबिष्ठ अपने उपायों से तुम्हें दूर भेजता हूं. (१)
चत्तो इतश्चत्तामुतः सर्वा भ्रूणान्यारुषी.
अराय्यं ब्रह्मणस्पते तीक्ष्णशृङ्गोदृषन्निहि.. (२)
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जो दरिद्रता वृक्ष, लता, मानव आदि को नष्ट करने वाली है, उसे मैं इस लोक और
परलोक से दूर करता हूं. हे तीक्ष्ण तेज वाले ब्रह्मणस्पति! इस दान विरोधिनी दरिद्रता को यहां
से दूर करो. (२)
अदो यद्दारु प्लवते सिन्धोः पारे अपूरुषम्.
तदा रभस्व दुर्हणो तेन गच्छ परस्तरम्.. (३)
सागर के किनारे पर जो लड़की तैर रही है, उसका कोई स्वामी नहीं है. हे दुःख से नष्ट
करने योग्य दरिद्रता! तुम इस पर बैठकर दूसरी पार चली जाओ. (३)
यद्ध प्राचीरजगन्तोरो मण्डूरधाणिकी:.
हता इन्द्रस्य शत्रवः सर्वे बुद्बुदयाशवः.. (४)
हे मंडूक के समान बुरा शब्द करने वाली एवं हिंसा करने वाली दरिद्रताओ! जब तुम
तेज चाल से चली जाती हो, तब इंद्र के सब शत्रु नष्ट होकर बुलबुले के समान सो जाते हैं.
(४)
परीमे गामनेषत पर्यग्निमदृषत. देवेष्वक्रत श्रवः क इमाँ आ दधर्षति.. (५)
इन देवों ने पणियों द्वारा चुराई गई गायों को छुड़ाया है, अग्नि को अनेक स्थानों में
स्थापित किया है एवं देवों को अन्न दिया है. इन पर कौन आक्रमण कर सकता है? (५)
सूक्त—१५६ देवता—अग्नि
अग्निं हिन्वन्तु नो धियः सप्तिमाशुमिवाजिषु. तेन जेष्म धनंधनम्.. (१)
जिस प्रकार युद्धों में घोड़ों को दौड़ाया जाता है, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां अग्नि को
प्रेरित करें. अग्नि की कृपा से हम सब धनों को जीतें. (१)
यया गा आक्रामहे सेनयाग्ने तवोत्या. तां नो हिन्व मघत्तये.. (२)
हे अग्नि! तुम्हारे द्वारा रक्षित जिस सेना की सहायता से हमने गाएं प्राप्त कीं, हमें
धनप्राप्ति के लिए वे ही रक्षासाधन दो. (२)
आग्ने स्थूरं रयिं भर पृथुं गोमन्तमश्विनम्. अङ्धि खं वर्तया पणिम्.. (३)
हे अग्नि! हमें गायों और अश्वों के साथ बहुत सा धन दो. तुम जल से आकाश को सींचो
और व्यापारी को व्यापार में लगाओ. (३)
अग्ने नक्षत्रमजरमा सूर्य रोहयो दिवि. दधज्ज्योतिर्जनेभ्यः.. (४)
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