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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—२१            देवता—इंद्र

सूक्त—२१            देवता—इंद्र
असावि देवं गोऋजीकमन्धो न्यस्मिन्निन्द्रो जनुषेमुवोच.
बोधामसि त्वा हर्यश्व यज्ञैर्बोधा नः स्तोममन्धसो मदेषु.. (१)
दिव्य एवं गव्यमिश्रित सोमरस निचोड़ा गया है. ये इंद्र इस सोमरूपी अन्न में स्वभाव से
सम्मिलित रहते हैं. हे हरि नामक घोड़ों वाले इंद्र! हम यज्ञों के द्वारा तुम्हें हमारी बात बताते
हैं। तुम सोम के नशे में हमारी बात समझो. (१)
प्र यन्ति यज्ञं विपयन्ति बर्हिः सोममादो विदथे दुध्रवाचः.
न्यु भ्रियन्ते यशसो गृभादा दूरउपब्दो वृषणो नृषाचः.. (२)
यजमान यज्ञ में जाते हैं और कुश बिछाते हैं. यज्ञ में सोमलता कूटने के पत्थर भयानक
शब्द करते हैं. यशस्वी, दूर तक शब्द करने वाले, ऋत्विजों को मिलाने वाले एवं
अभिलाषापूरक पत्थर पत्थरों से बने घर से लिए जाते हैं. (२)
त्वमिन्द्र स्रवितवा अपस्कः परिष्ठिता अहिना शूर पूर्वीः.
त्वद्वावक्रे रथ्यो३ न धेना रेजन्ते विश्वा कृत्रिमाणि भीषा.. (३)
हे शूर इंद्र! तुमने वृत्र द्वारा रोके हुए जलों को प्रवाहित किया था. तुम्हारे कारण ही
नदियां रथस्वामियों के समान निकलती हैं. सारा संसार तुम्हारे भय से कांपता है. (३)
भीमो विवेषायुधेभिरेषामपांसि विश्वा नर्याणि विद्वान्.
इन्द्रः पुरो जर्हषाणो वि दूधोद्वि वज्रहस्तो महिना जघान.. (४)
इंद्र ने मानवहितकारी एवं सब कामों को जानने वाले आयुधों द्वारा भयंकर बनकर
असुरों को घेरा था एवं उनके नगरों को कंपित बनाया था. महान् एवं हाथ में वज्र धारण करने
वाले इंद्र ने असुरों को मारा था. (४)
न यातव इन्द्र जूजुवुर्नो न वन्दना शविष्ठ वेद्याभिः.
स शर्धदर्यो विषुणस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवा अपि गुर्ऋतं नः.. (५)
हे इंद्र! राक्षस हमारी हिंसा न करें. हे अतिशय बली इंद्र! वे राक्षस हमें प्रजाहीन न
बनावें. स्वामी इंद्र कुटिल व्यक्ति के मारने में उत्साह दिखाते हैं. ब्रह्मचर्यहीन लोग हमारे यज्ञ में
बाधा न बनें. (५)
अभि क्रत्वेन्द्र भूरध ज्मन्न ते विव्यङ्न्महिमानं रजांसि.
स्वेना हि वृत्रं शवसा जघन्थ न शत्रुरन्तं विविदद्युधा ते.. (६)
हे इंद्र! तुम कर्म द्वारा धरती पर वर्तमान प्राणियों को पराजित करते हो. सब लोक

मिलकर भी तुम्हारी महिमा से नहीं बढ़ सकते. तुमने अपनी शक्ति से वृत्र को मारा था. युद्ध
के द्वारा शत्रु तुम्हारा अंत नहीं पाते. (६)
देवाश्चित्ते असुर्याय पूर्वेऽनु क्षत्राय ममिरे सहांसि.
इन्द्रो मघानि दयते विषह्येन्द्रं वाजस्य जोहुवन्त सातौ.. (७)
हे इंद्र! प्राचीन देवों और राक्षसों ने शक्तिप्रयोग एवं हिंसा करने में स्वयं को तुमसे हीन
माना था. इंद्र शत्रुओं को हराकर उनका धन अपने भक्तों को देते हैं. स्तोता अन्न पाने के लिए
इंद्र की स्तुति करते हैं. (७)
कीरिश्चिद्धि त्वामवसे जुहावेशानमिन्द्र सौभगस्य भूरे:.
अवो बभूथ शतमूते अस्मे अभिक्षत्तूस्तवावतो वरूता.. (८)
हे स्वामी इंद्र! स्तोता तुम्हें अपनी रक्षा के लिए बुलाता है. हे बहुतों की रक्षा करने वाले
इंद्र! तुम हमारे विपुल धन के रक्षक बने थे. तुम्हारे समान शक्तिशाली यदि कोई हमारा हिंसक
हो तो उसे रोको. (८)
सखायस्त इन्द्र विश्वह स्याम नमोवृधासो महिना तरुत्र.
वन्वन्तु स्मा तेऽवसा समीकेऽभीतिमर्यो वणुषां शवांसि.. (९)
हे इंद्र! हम स्तुति द्वारा तुम्हें बढ़ाते हुए सदा तुम्हारे मित्र रहें. हे महत्त्व द्वारा सबकी रक्षा
करने वाले इंद्र! तुम्हारी रक्षा के सहारे श्रेष्ठ होता युद्ध में अभय होकर हिंसकों की शक्ति नष्ट
करें. (९)
स न इन्द्र त्वयताया इषे धास्तमना च ये मघवानो जुनन्ति.
वस्वी षु ते जरित्रे अस्तु शक्तिर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१०)
हे इंद्र! अपने दिए हुए अन्न का उपभोग करने के लिए हमारी रक्षा करो. जो लोग अपने
आप तुम्हें हव्य देते हैं, उनकी भी रक्षा करो. तुम्हारे स्तोता मुझ में तुम्हारी प्रशंसनीय स्तुतियां
करने की शक्ति हो. तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (१०)
सूक्त—२२ देवता—इंद्र
पिबा सोममिन्द्र मन्दतु त्वा यं ते सुषाव हर्यश्वाद्रिः.
सोतुर्बाहुभ्यां सुयतो नार्वा.. (१)
हे इंद्र! तुम सोमरस पिओ. सोम तुम्हें प्रसन्न करे. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी! जैसे
लगाम द्वारा घोड़ा वश में किया जाता है, उसी प्रकार सोमरस निचोड़ने वाले के दोनों हाथों
द्वारा पकड़े गए पत्थरों ने तुम्हारे लिए सोम तैयार किया है. (१)
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यस्ते मदो युज्यश्चारुरस्ति येन वृत्राणि हर्यश्व हंसि.
स त्वामिन्द्र प्रभूवसो ममत्तु.. (२)
हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी एवं अधिक धन वाले इंद्र! जो सोम तुम्हारे अनुकूल भली
प्रकार निचोड़ा गया एवं नशीला है एवं जिसे पीकर तुम राक्षसों को मारते हो, वह सोमरस
तुम्हें प्रसन्न बनावे. (२)
बोधा सु मे मघवन्वाचमेमां यां ते वसिष्ठो अर्चति प्रशस्तिम्.
इमा ब्रह्म सधमादे जुषस्व.. (३)
हे धनस्वामी इंद्र! मैं वसिष्ठ तुम्हारी प्रशंसा के रूप में जो बातें कहता हूं, उन्हें भली
प्रकार समझो एवं यज्ञ में उन्हें स्वीकार करो. (३)
श्रुधी हवं विपिपानस्याद्रेर्बोधा विप्रस्यार्चतो मनीषाम्.
कृष्वा दुवांस्यन्तमा सचेमा.. (४)
हे इंद्र! मुझ सोमपानकर्त्ता के पत्थर की पुकार सुनो एवं स्तुति करने वाले विद्वान् की
स्तुति समझो. तुम मेरे सहायक बनकर मेरी इन सेवाओं को समझो. (४)
न ते गिरो अपि मृष्ये तुरस्य न सुष्टुतिमसुर्यस्य विद्वान्.
सदा ते नाम स्वयशो विवक्मि.. (५)
हे शत्रुहिंसक इंद्र! तुम्हारी शक्ति को जानने वाला मैं तुम्हारी स्तुतियों को नहीं त्याग
सकता. मैं तुम्हारा असाधारण यशवाला नाम सदा बोलूंगा. (५)
भूरि हि ते सवना मानुषेषु भूरि मनीषी हवते त्वामित्.
मारे अस्मन्मघवञ्ज्योक्कः.. (६)
हे इंद्र! मनुष्यों में तुम्हारे बहुत से सवन हैं. स्तोता तुम्हें ही अधिक बुलाता है. चिरकाल
तक अपने को हमसे अलग मत रखना. (६)
तुभ्येदिमा सवना शूर विश्वा तुभ्यं ब्रह्माणि वर्धना कृणोमि.
त्वं नृभिर्हव्यो विश्वधासि.. (७)
हे शूर इंद्र! ये सब सवन तुम्हारे हेतु ही हैं. ये उन्नतिकारक स्तोत्र मैं तुम्हारे निमित्त ही
बोलता हूं. तुम अनेक प्रकार से मानवों द्वारा बुलाने योग्य हो. (७)
नू चिन्नु ते मन्यमानस्य दस्मोदश्रुवन्ति महिमानमुग्र.
न वीर्यमिन्द्र ते न राधः.. (८)
हे दर्शनीय इंद्र! तुम्हारी स्तुतियां सुनकर तुम्हारी महिमा कौन नहीं जानेगा? हे उग्र इंद्र!
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