ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—६३ देवता—अश्विनीकुमार
हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने उत्तम, मध्यम एवं अधम घोड़ों की सहायता से हमारे
सामने आओ. तुम सुरक्षित एवं गायों से भरी गोशाला का द्वार खोलो और मुझ स्तुतिकर्त्ता को
भली-भांति का धन दो. (११)
सूक्त—६३ देवता—अश्विनीकुमार
क्व१त्या वल्गू पुरुहूताद्य दूतो न स्तोमोऽविद्वन्नमस्वान्.
आ यो अर्वाङ् नासत्या ववर्त्त प्रैषा ह्यसथो अस्य मन्मन्.. (१)
सुंदर एवं बहुतों द्वारा बुलाए गए अश्विनीकुमार जहां कहीं रहते हैं, वहीं हव्यसहित
स्तोत्र उन्हें दूत के समान प्राप्त हों. इसी स्तोत्र ने अश्विनीकुमारों को मेरी ओर अभिमुख किया
था. हे अश्विनीकुमारो! तुम स्तोता की स्तुतियों पर परम प्रसन्न होते हो. (१)
अरं मे गन्तं हवनायास्मै गृणाना यथा पिबाथो अन्धः.
परि ह त्यद्धर्त्तिर्याथो रिषो न यत्परो नान्तरस्तुतुर्यात्.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! मेरे बुलाने पर तुम भली प्रकार आओ एवं मेरी स्तुति सुनकर सोमरस
पिओ. शत्रु से हमारे घर की इस प्रकार रक्षा करो कि कोई भी उसे हानि न पहुंचावे (२)
अकारि वामन्धसो वरीमन्न्स्तारि बर्हिः सुप्रायणतमम्.
उत्तानहस्तो युवयुर्ववन्दा वां नक्षन्तो अद्रय आज्जन्.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे कारण सोमरस निचोड़ा गया है, मुलायम कुश बिछाए गए हैं,
तुम्हारी कामना करता हुआ स्तोता हाथ जोड़कर स्तुति करता है एवं तुम्हें व्याप्त करते हुए
पत्थर सोमरस निकाल रहे हैं. (३)
ऊर्ध्वो वामग्निरध्वरेष्वस्थात्प्र रातिरेति जूर्णिनी घृताची.
प्र होता गूर्तमना उराणोऽयुक्त यो नास्त्या हवीमन्.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! हव्य एवं घृत के स्वामी अग्नि तुम्हारे यज्ञ में ऊंचे उठते हैं. जो स्तोता
तुम्हारा स्तोत्र बोलता है, वही स्तोता अनेक यज्ञकर्त्ता एवं उत्साही होता है. (४)
अधि श्रिये दुहिता सूर्यस्य रथं तस्थौ पुरुभुजा शतोतिम्.
प्र मायाभिर्मायिना भूतमत्र नरा नृतू जनिमन्त्यज्ञियानाम्.. (५)
हे बहुतों के रक्षक अश्विनीकुमारो! सूर्यपुत्री तुम्हारे शतरक्षक रथ में आश्रय लेने के लिए
बैठी थी. तुम यज्ञपात्र, देवों की इसी जन्म की बुद्धि से बुद्धिमान् नेता और नृत्य करने वाले
बनो. (५)
युवं श्रीभिर्दर्शताभिराभिः शुभे पुष्टिमूहथुः सूर्यायाः.
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प्र वां वयो वपुषेऽनु पप्तन्नक्षद्वाणी सुष्टुता धिष्ण्या वाम्.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! तुम इस दर्शनीय कांति के द्वारा अपनी पत्नी सूर्या की शोभा के लिए
पुष्टि प्राप्त करो. तुम्हारे घोड़े शोभा पाने के लिए दौड़ें. हे भली प्रकार स्तुत देवो! शोभन
स्तुतियां तुम्हें प्राप्त हों. (६)
आ वां वयोऽश्वासो वहिष्ठा अभि प्रयो नास्त्या वहन्तु.
प्र वां रथो मनोजवा असर्जीषः पृक्ष इषिधो अनु पूर्वीः.. (७)
हे अश्विनीकुमारो! तेज चलने वाले व बोझा ढोने में कुशल घोड़े तुम्हें सोमरूपी अन्न के
समीप ले जावें. तुम्हारा मन के समान तेज चलने वाला रथ अपनाने-योग्य, चाहने-योग्य एवं
अधिक मात्रा वाले सोमरूपी अन्न के हेतु छोड़ा गया है. (७)
पुरु हि वां पुरुभुजा देषणं धेनुं नइषं पिन्वतमसक्राम्.
स्तुतश्च वां माध्वी सुष्टुतिश्च रसाश्च ये वामनु रातिमग्नम्.. (८)
हे बहुतों का पालन करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम्हारा धन बहुत है. हमें दूसरों के पास
न जाने वाली तथा प्रसन्न करने वाली गाय एवं अन्न दो. हे प्रमुदित होने वाले अश्विनीकुमारो!
स्तोता, स्तुतियां एवं तुम्हारे दान के उद्देश्य से तैयार किया जाने वाला सोमरस तुम्हारे लिए है.
(८)
उत म ऋज्रे पुरयस्य रघ्वी सुमीळ्हे शतं पेरुके च पक्वा.
शाण्डो दाद्धिरिणिनः स्मद्दिष्टीन् दश वशासो अभिषाच ऋष्वान्.. (९)
पुण्य की सी सीधी और तेज चलने वाली दो घोड़ियां, सुमीढ़व की सौ गाएं और पेरुक
के पके हुए अन्न मेरे पास हैं. शांड नामक राजा ने अश्विनीकुमारों के स्तोताओं को सोने का
बना रथ, सुंदर दस घोड़े और शत्रुओं को हराने वाले घोड़े दिए थे. (९)
सं वां शता नासत्या सहस्राश्वानां पुरुपन्था गिरे दात्.
भरद्वाजाय वीर नू गिरे दाद्धता रक्षांसि पुरुदंससा स्युः.. (१०)
हे अश्विनीकुमारो! पुरुपंथा नामक राजा ने तुम्हारे स्तोताओं को सैकड़ों और हजारों
घोड़े दिए थे. हे वीरो! तुम्हारे स्तोता मुझ भरद्वाज को यह दक्षिणा दें. हे अनेक कर्म करने
वाले देवो! तुम्हारी कृपा से राक्षस नष्ट हों. (१०)
आ वां सुम्ने वरिमन्त्सूरिभिः ष्याम्.. (११)
हे अश्विनीकुमारो! मै विद्वानों के साथ तुम्हारा दिया हुआ सुखद धन प्राप्त करूं. (११)
सूक्त—६४ देवता—उषा
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उदु श्रिय उषसो रोचमाना अस्थुरपां नोर्मयो रुशन्तः.
कृणोति विश्वा सुपथा सुगान्यभूदु वस्वी दक्षिणा मघोनी.. (१)
चमकती हुई व शुक्लवर्ण वाली उषाएं शोभा के लिए पानी की लहरों के समान उठती
हैं. धन की स्वामिनी, प्रशंसा योग्य एवं समृद्ध करने वाली उषा सभी स्थानों को सुंदरमार्ग
वाला एवं सुगम बनाती है. (१)
भद्रा ददृक्ष उर्विया वि भास्युत्ते शोचिर्भानवो द्यामपप्तन्.
आविर्वक्षः कृणुषे शुम्भमानोषो देवि रोचमाना महोभिः.. (२)
हे देवी उषा! तुम कल्याणी जान पड़ती हो एवं विस्तीर्ण होकर शोभा पा रही हो.
तुम्हारी चमकीली किरणें आकाश से गिर रही हैं. तुम महान् तेजों से सुशोभित एवं दीप्त
होकर अपना रूप प्रकट करती हो. (२)
वहन्ति सीमरुणासो रुशन्तो गावः सुभगामुर्विया प्रथानाम्.
अपेजते शूरो अस्तेव शत्रून् बाधते तमो अजिरो न वोळ्हा.. (३)
लाल रंग की एवं चमकीली किरणें सुभगा, विस्तृत एवं उत्तम उषा को वहन करती हैं.
जिस प्रकार अस्त्र फेंकने वाला शूर शत्रुओं को दूर भगाता है, उसी प्रकार उषा अंधकार को
भगाती है तथा शीघ्रगामी सेनापति के समान अंधेरे को रोकती है. (३)
सुगोत ते सुपथा पर्वतेष्ववाते अपस्तरसि स्वभानो.
सा न आ वह पृथुयामन्पृष्वे रयिं दिवो दुहितरिषयध्यै.. (४)
हे उषा देवी! पहाड़ एवं बिना हवा वाले स्थान तुम्हारे लिए सुगम एवं सरल मार्ग वाले
हों. हे स्वयंप्रकाश वाली उषा! तुम अंतरिक्ष को पार करती हो. विशाल रथवाली, दर्शनीय एवं
स्वर्ग की पुत्री उषा हमें अभिलाषा करने योग्य धन दें. (४)
सा वह योक्षभिरवातोपो वरं वहसि जोषमनु.
त्वं दिवो दुहितर्या ह देवी पूर्वहूतौ मंहना दर्शता भूः.. (५)
हे उषा! तुम बिना विराम लिए घोड़ों की सहायता से स्तोताओं के लिए प्रेमपूर्वक धन
ढोती हो. हे स्वर्गपुत्री उषा देवी! तुम प्रथम आह्वान में पूजा के योग्य एवं दर्शनीय बनो. (५)
उत्ते वयश्चिद्वसतेरपप्तन्नरश्च ये पितुभाजो व्युष्टौ.
अमा सते वहसि भूरि वाममुषो देवि दाशुषे मर्त्याय.. (६)
हे उषा देवी! तुम्हारे प्रकट होने पर चिड़ियां अपने घोंसलों से उड़ती हैं एवं अन्न पैदा
करने वाले मनुष्य अपने घरों से निकलते हैं. तुम अपने समीपवर्ती एवं हव्यदाता मनुष्य को
बहुत धन देती हो. (६)
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सूक्त—६५ देवता—उषा
एषा स्या नो दुहिता दिवोजाः क्षितीरुच्छन्ती मानुषीरजीगः.
या भानुना रुशता राम्यास्वज्ञाायि तिरस्तमसश्चिद्दक्तून्.. (१)
स्वर्ग से उत्पन्न, अतएव स्वर्ग की पुत्री उषा हमारे कल्याण के लिए अंधकार मिटाती हुई
मानवी प्रजाओं को प्रकाशित करती है. यह चमकीली किरणों के द्वारा रात्रि के अंत में
तेजस्वी तारों एवं अंधकार को तिरस्कृत करती हुई दिखाई देती है. (१)
वि तद्ययुररुणयुग्भिरश्वैश्चित्रं भान्त्युषसश्चन्द्ररथाः.
अग्रं यज्ञस्य बृहतो नयन्तीर्वि ता बाधन्ते तम ऊर्म्यायाः.. (२)
चमकीले रथ वाली उषाएं प्रातःकाल विशालयज्ञ का प्रथम भाग पूरा करती हुई, लाल
रंग वाले घोड़ों की सहायता से विस्तृत गमन करती हैं, विचित्र रूप से शोभा पाती हैं तथा रात
के अंधेरे को समाप्त करती हैं. (२)
श्रवो वाजमिषमूर्जं वहन्तीर्नि दाशुष उषसो मर्त्याय.
मघोनीर्वीरवत्पत्यमाना अवो धात विधते रत्नमद्य.. (३)
हे उषाओ! तुम हव्य देने वाले मनुष्य को कीर्ति, बल, अन्न और रस धारण कराती हुई
धन स्वामिनी एवं गतिशील बनती हो. आज मुझ सेवक को पुत्र-पौत्र युक्त अन्न एवं रत्न दो.
(३)
इदा हि वो विधते रत्नमस्तीदा वीराय दाशुष उषासः.
इदा विप्राय जरते यदुक्था नि ष्म मावते वहथा पुरा चित्.. (४)
हे उषाओ! तुम्हारे पास अपने सेवक को इसी समय देने के लिए धन है एवं वीर
हव्यदाताओं को इसी समय देने के लिए धन है. बुद्धिमान् स्तोता को इसी समय देने के लिए
तुम्हारे पास धन है. मुझ जैसे उक्थ मंत्र जानने वाले के लिए तुम पहले के समान धन दो. (४)
इदा हि त उषो अद्रिसानो गोत्रा गवामङ्गिरसो गृणन्ति.
व्य१र्केण बिभिदुर्ब्रह्मणा च सत्या नृणामभवद्देवहूतिः.. (५)
हे पर्वत की चोटियों का आदर करने वाली उषा! अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने तुम्हारी कृपा
से गायों का समूह तुरंत प्राप्त किया एवं आदरणीय स्तोत्र द्वारा अंधकारों का विनाश किया.
नेतारूप अंगिरागोत्रीय ऋषियों की देवविषयक स्तुति सत्य हुई थी. (५)
उच्छा दिवो दुहितः प्रत्नवन्नो भरद्वाजवद्विधते मघोनि.
सुवीरं रयिं गृणते रिरीह्युरुगायमध्धि धेहि श्रवो नः.. (६)
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