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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—९४ देवता—इंद्र व अग्नि

एता अग्न आशुषाणास इष्टीर्युवोः सचाभ्यश्याम वाजान्.
मेन्द्रो नो विष्णुर्मरुतः परि ख्यन्युयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (८)
हे अग्नि! शीघ्रतापूर्वक इस यज्ञ का सहारा लेते हुए हम एक साथ तुम्हारे द्वारा दिया
हुआ अन्न प्राप्त करें. इंद्र, विष्णु एवं मरुद्गण हमें त्यागकर दूसरे को न देखें. हे देवो! तुम
कल्याणसाधनों द्वारा सदा हमारी रक्षा करो. (८)
सूक्त—९४ देवता—इंद्र व अग्नि
इयं वामस्य मन्मन इन्द्राग्नी पूर्व्यस्तुतिः. अभ्राद्वृष्टिरिवाजनि.. (१)
हे इंद्र एवं अग्नि! इस स्तोता से यह उत्तम स्तुति उसी प्रकार उत्पन्न हुई है, जिस प्रकार
बादल से वर्षा होती है. (१)
शृणुतं जरितुर्हवमिन्द्राग्नी वनतं गिरः. ईशाना पिप्यतं धियः.. (२)
हे इंद्र एवं अग्नि! तुम स्तोता की पुकार सुनो और उसकी स्तुति स्वीकार करो. तुम
सबके स्वामी हो, इसलिए यज्ञकर्म को पूरा करो. (२)
मा पापत्वाय नो नरेन्द्राग्नी माभिशस्तये. मा नो रीरधतं निदे.. (३)
हे नेता इंद्र एवं अग्नि! हमें हीनभाव, पराजय एवं निंदा के वश में मत करना. (३)
इन्द्रे अग्ना नमो बृहत्सुवृक्तिमेरयामहे. धिया धेना अवस्यवः.. (४)
हम अपनी रक्षा की अभिलाषा से विस्तृत हव्यरूप अन्न, शोभनस्तुति एवं यज्ञकर्म-
सहित-स्तुतिवचन इंद्र एवं अग्नि के पास भेजते हैं. (४)
ता हि शश्वन्त ईळत इत्था विप्रास ऊतये. सबाधो वाजसातये.. (५)
बुद्धिमान् लोग अपनी रक्षा के लिए इंद्र व अग्नि दोनों की इस प्रकार स्तुति करते हैं.
समान कष्ट भोगने वाले लोग अन्न पाने के लिए स्तुति करते हैं. (५)
ता वां गीर्भिर्विपन्यवः प्रयस्वन्तो हवामहे. मेधसाता सनिष्यवः.. (६)
स्तुति करने के इच्छुक हव्य अन्न से युक्त एवं धन की अभिलाषा वाले हम यज्ञ का फल
पाने के लिए स्तुति द्वारा उन दोनों को बुलाते हैं. (६)
इन्द्राग्नी अवसा गतमस्मभ्यं चर्षणीसहा. मा नो दुःशंस ईशत.. (७)
हे शत्रुओं को हराने वाले इंद्र एवं अग्नि! तुम अन्न लेकर हमारे पास आओ. बुरे वचन

बोलने वाला हमारा स्वामी न बने. (७)
मा कस्य नो अररुषो धूर्तिः प्रणङ्‌मर्त्यस्य. इन्द्राग्नी शर्म यच्छतम्.. (८)
हे इंद्र एवं अग्नि! हमें किसी भी मनुष्य द्वारा हिंसा प्राप्त न हो. हमें तुम सुख दो. (८)
गोमद्धिरण्‍यवद्वसु यद्दामश्वावदीमहे. इन्द्राग्नी तद्द्वनेमहि.. (९)
हे इंद्र एवं अग्नि! हम तुमसे जिन गायों, स्वर्ण एवं अश्वों से युक्त धन को मांगते हैं,
उसका हम उपभोग करें. (९)
यत्सोम आ सुते नर इन्द्राग्नी अजोहवुः. सप्तीवन्ता सपर्यवः.. (१०)
सोमरस निचुड़ जाने पर यज्ञकर्म के नेता जनसेवा की अभिलाषा से उत्तम घोड़ों वाले
इंद्र एवं अग्नि को बार-बार बुलाते हैं. (१०)
उक्थेभिर्वृत्रहन्तमा या मन्दाना चिदा गिरा. आङ्गूषैराविवासतः.. (११)
हम उक्थों, स्तुतियों एवं स्तोत्रों द्वारा शत्रुनाशकों में श्रेष्ठ एवं अतिशय प्रसन्न इंद्र एवं
अग्नि की सेवा करते हैं. (११)
ताविद्दुःशंसं मर्त्यं दुर्विद्वांसं रक्षस्विनम्.
आभोगं हन्मना हतमुदधिं हन्मना हतम्.. (१२)
हे इंद्र एवं अग्नि! तुम दुष्टविचारों एवं बुरे ज्ञान वाले, शक्तिशाली एवं हमारी संपत्ति का
अपहरण करने वाले मनुष्य को आयुध द्वारा इस प्रकार नष्ट करो जैसे घड़ा फोड़ा जाता है.
(१२)
सूक्त—९५ देवता—सरस्वती
प्र क्षोदसा धायसा सस्र एषा सरस्वती धरुणमायसी पूः.
प्रबाबधाना रथ्येव याति विश्वा अपो महिना सिन्धुरन्याः.. (१)
यह सरस्वती नदी लोहे के द्वारा बनी नगरी के समान सबको धारण करती हुई
प्राणघातक जल के साथ बहती है. जिस प्रकार सारथि सबको पीछे छोड़कर आगे निकल
जाता है, उसी प्रकार यह अपनी महिमा द्वारा सब जलपूर्ण नदियों को बाधा देकर आगे बढ़ती
है. (१)
एकाचेतत्सरस्वती नदीनां शुचिर्यती गिरिभ्य आ समुद्रात्.
रायश्चेतन्ती भुवनस्य भूरेर्घृतं पयो दुदुहे नाहुषाय.. (२)
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सभी नदियों में पवित्र एवं पर्वत से निकलकर सागर तक जाने वाली सरस्वती नदी ने ही
केवल राजा नहुष की प्रार्थना को समझा. सरस्वती ने नहुष को सारे संसार का पर्याप्त धन
प्रदान करके दूध का दोहन किया था. (२)
स वावृधे नर्यो योषणासु वृषा शिशुर्वृषभो यज्ञियासु.
स वाजिनं मघवद्भ्यो दधाति वि सातये तन्वं मामृजीत.. (३)
मानवों का हित एवं वर्षा करने वाले सरस्वन् नामक वायु यज्ञ के योग्य स्त्री अर्थात्
जरासमूह के बीच वृद्धि को प्राप्त हुए. वे हव्य धारण करने वाले यजमानों को शक्तिशाली
संतान देते हैं एवं उनके कल्याण के लिए शरीर का संस्कार करते हैं. (३)
उत स्या नः सरस्वती जुषाणोप श्रवत् सुभगा यज्ञे अस्मिन्.
मितज्ञुभिर्नमस्यैरियाना राया युजा चिदुत्तरा सखिभ्यः.. (४)
शोभनधन वाली सरस्वती प्रसन्न होकर इस यज्ञ में हमारी स्तुति सुनें. घुटने टेककर
समीप जाने वाले देवों से युक्त सरस्वती धन से नित्य संपन्न होकर अपने मित्रों के लिए क्रमशः
दया वाली बनें. (४)
इमा जुह्वाना युष्मदा नमोभिः प्रति स्तोमं सरस्वति जुषस्व.
तव शर्मन्प्रियतमे दधाना उपस्थेयाम शरणं न वृक्षम्.. (५)
हे सरस्वती! इस यज्ञ का हवन करते हुए हम लोग स्तुतियों द्वारा तुमसे धन प्राप्त करेंगे.
तुम हमारी स्तुति स्वीकार करो. हम तुम्हारे सर्वाधिक प्रिय घर में रहते हुए तुम्हारे साथ इस
प्रकार मिलेंगे, जिस प्रकार पक्षी अपने आश्रयस्थल वृक्ष से मिलते हैं. (५)
अयमु ते सरस्वति वसिष्ठो द्वारावृतस्य सुभगे व्यावः.
वर्ध शुभ्रे स्तुवते रासि वाजान् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
हे शोभनधन वाली सरस्वती! यह वसिष्ठ तुम्हारे लिए यज्ञ के द्वार खोलता है. हे
उज्ज्वल वर्ण वाली सरस्वती देवी! तुम वृद्धि प्राप्त करो एवं स्तोता को अन्न दो. हे देवो! तुम
कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो. (६)
सूक्त—९६ देवता—सरस्वती व सरस्वन्
बृहदु गायिषे वचोऽसुर्या नदीनाम्.
सरस्वतीमिन्महया सुवृक्तिभिः स्तोमैर्वसिष्ठ रोदसी.. (१)
हे वसिष्ठ! तुम नदियों में सर्वाधिक शक्तिशालिनी सरस्वती के लिए स्तोत्र का गान करो
एवं द्यावा-पृथिवी में स्थित सरस्वती की पूजा दोषहीन स्तोत्रों द्वारा करो. (१)
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उभे यत्ते महिना शुभ्रे अन्धसी अधिक्षियन्ति पूरवः.
सा नो बोध्यवित्री मरुत्सखा चोद राधो मघोनाम्.. (२)
हे उज्ज्वल वर्ण वाली सरस्वती! तुम्हारी महिमा से मनुष्य दिव्य एवं पार्थिव दोनों प्रकार
का अन्न प्राप्त करता है. तुम रक्षा वाली बनकर हमें जानो एवं मरुतों की सखी के रूप में
हव्यदाताओं को धन प्रदान करो. (२)
भद्रमिद्भद्रा कृणवत्सरस्वत्यकवारी चेतति वाजिनीवती.
गृणाना जमदग्निवत्स्तुवाना च वसिष्ठवत्.. (३)
कल्याण करने वाली सरस्वती हमारा कल्याण ही करें. शोभन गति वाली एवं
अन्नस्वामिनी सरस्वती हम में बुद्धि उत्पन्न करें. मैं जमदग्नि के समान तुम्हारी स्तुति कर रहा
हूं. तुम वसिष्ठ अर्थात् मेरे उपर्युक्त स्तोत्र पाओ. (३)
जनीयन्तो न्वग्रवः पुत्रीयन्तः सुदानवः. सरस्वन्तं हवामहे.. (४)
पत्नी एवं पुत्र की कामना करने वाले एवं शोभन दानयुक्त हम स्तोता नामक देव की
स्तुति करते हैं. (४)
ये ते सरस्व ऊर्मयो मधुमन्तो घृतश्चुतः. तेभिर्नोऽविता भव.. (५)
हे सरस्वन् देव! तुम्हारा जो जलसमूह रसयुक्त एवं वर्षा करने वाला है, उसीसे हमारी
रक्षा करो. (५)
पीपिवांसं सरस्वतः स्तनं यो विश्वदर्शतः. भक्षीमहि प्रजामिषम्.. (६)
हम सबके दर्शनीय एवं बुद्धिशाली सरस्वन् देव के जलधारक स्तोत्र को पाकर बुद्धि
एवं अन्न प्राप्त करें. (६)
सूक्त—९७ देवता—इंद्र आदि
यज्ञे दिवो नृषदने पृथिव्या नरो यत्र देवयवो मदन्ति.
इन्द्राय यत्र सवनानि सुन्वे गमन्मदाय प्रथमं वयश्च.. (१)
जिस यज्ञ में देवों की कामना करने वाले ऋत्विज् प्रसन्न होते हैं, जिस यज्ञ में धरती के
नेता इंद्र के निमित्त हर बार सोमरस निचोड़ते हैं, इंद्र प्रसन्नता पाने के लिए उसी यज्ञ में स्वर्ग
से सर्वप्रथम आवें एवं उनके घोड़े भी आवें. (१)
आ दैव्या वृणीमहेऽवांसि बृहस्पतिर्नो मह आ सखायः.
यथा भवेम मीळहुषे अनागा यो नो दाता परावतः पितेव.. (२)
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हे मित्रो! हम अभिलाषापूरक बृहस्पति के प्रति इस प्रकार पापरहित बनें कि वे उसी
प्रकार धन लाकर दें, जिस प्रकार पिता दूर देश से धन लाकर पुत्र को सौंपता है. (२)
तमु ज्येष्ठं नमसा हविर्भिः सुशेवं ब्रह्मणस्पतिं गृणीषे.
इन्द्रं श्लोको महि दैव्यः सिषक्तु यो ब्रह्मणो देवकृतस्य राजा.. (३)
मैं अतिशय प्रसिद्ध एवं शोभन मुख वाले बृहस्पति की स्तुति नमस्कारों एवं हव्य अन्नों
द्वारा करता हूं. देवों के योग्य हमारा मंत्र इंद्र की सेवा करे. इंद्र देवों द्वारा निर्मित स्तोत्रों के
स्वामी हैं. (३)
स आ नो योनिं सदतु प्रेष्ठो बृहस्पतिर्विश्ववारो यो अस्ति.
कामो रायः सुवीर्यस्य तं दातपर्षन्नो अति सश्चतो अरिष्टान्.. (४)
वे बृहस्पति हमारे यज्ञस्थान पर बैठें जो सबके द्वारा वरण करने योग्य हैं. वे हमारी धन
एवं उत्तमबल से संबंधित अभिलाषा को पूरा करें. हम उपद्रवग्रस्तों को वे हिंसा से बचाकर
शत्रुओं के पास पहुंचावें. (४)
तमा नो अर्कममृताय जुष्टमिमे धासुरमृतासः पुराजाः.
शुचिक्रन्दं यजतं पस्त्यानां बृहस्पतिमनर्वाणं हुवेम.. (५)
सर्वप्रथम उत्पन्न हुए मरणरहित देवगण हमें पूजा का साधनरूप अन्न अधिक मात्रा में
दें. पवित्र स्तुतियों वाले, गृहस्थों द्वारा यजनीय एवं पराभवरहित बृहस्पति को हम बुलाते हैं.
(५)
तं शग्मासो अरुषासो अश्वा बृहस्पतिं सहवाहो वहन्ति.
सहश्चिद्यस्य नीलवत्सधस्थं नभो न रूपमरुषं वसानाः.. (६)
सुखकर, तेजस्वी, मिलकर वहन करने वाले एवं सूर्य के समान प्रकाशयुक्त घोड़े प्रसिद्ध
बृहस्पति को वहन करें. उनके पास शक्ति एवं निवास करने योग्य घर है. (६)
स हि शुचिः शतपत्रः स शुन्ध्युर्हिरण्यवाशीरिषिरः स्वर्षाः.
बृहस्पतिः स स्वावेश ऋष्वः पुरू सखिभ्य आसुतिं करिष्ठः.. (७)
बृहस्पति पवित्र एवं विविध वाहनों वाले हैं. वे सबके शोधक हैं. वे हितकर एवं रमणीय
वाणी बोलते हैं. वे गमनशील, स्वर्ग का भोग करने वाले, शोभन निवास वाले एवं दर्शनीय हैं.
वे अपने स्तोताओं को श्रेष्ठ अन्न देते हैं. (७)
देवी देवस्य रोदसी जनित्री बृहस्पतिं वावृधतुर्महित्वा.
दक्षाय्याय दक्षता सखायः करद् ब्रह्मणे सुतरा सुगाधा.. (८)
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बृहस्पति देव को उत्पन्न करने वाली द्यावा-पृथिवीरूप देवी अपनी महिमा से उन्हें
बढ़ावें. हे मित्रो! तुम भी बढ़ाने योग्य बृहस्पति को बढ़ाओ. उन्होंने अन्नवृद्धि के लिए सुख से
तरण करने योग्य एवं स्नानक्षम जलों को बनाया है. (८)
इयं वां ब्रह्मणस्पते सुवृक्तिर्ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे अकारि.
अविष्टं धियो जिगृतं पुरन्धीर्जस्तमर्यो वनुषामरातीः.. (९)
हे ब्रह्मणस्पति! मैंने यह शोभन वचनरूपी स्तुति तुम्हारे एवं वज्रधारी इंद्र के लिए
बनाई है. तुम हमारे यज्ञों की रक्षा करो, अनेक स्तुतियां सुनो एवं हम भक्तों पर आक्रमण
करने वाली शत्रुसेना का नाश करो. (९)
बृहस्पते युवमिन्द्रश्च वस्वो दिव्यस्येशाथे उत पार्थिवस्य.
धत्तं रयिं स्तुवते कीरये चिद्ध्यं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१०)
हे बृहस्पति! तुम एवं इंद्र दोनों प्रकार के पार्थिव एवं दिव्य धन के स्वामी हो. इसलिए
तुम स्तुतिकर्त्ता को धन देते हो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो.
(१०)
सूक्त—९८ देवता—इंद्र व बृहस्पति
अध्वर्यवोऽरुणं दुग्धमंशुं जुहोतन वृषभाय क्षितीनाम्.
गौराद्भेदीयाँ अवपानमिन्द्रो विश्वाहेद्याति सुतसोममिच्छन्.. (१)
हे अध्वर्यु लोगो! मानवों में श्रेष्ठ इंद्र के लिए रुचिकर एवं निचोड़े हुए सोमरस को भेंट
करो. गौरमृग दूरस्थित जल को जानकर जिस तेजी से आता है, इंद्र पीने योग्य सोम का ज्ञान
होने पर सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को खोजते हुए उससे भी तेजी से आते हैं. (१)
यद्दधिषे प्रदिवि चार्वन्नं दिवेदिवे पीतिमदस्य वक्षि.
उत हृदोत मनसा जुषाण उशन्निन्द्र प्रस्थितान् पाहि सोमान्.. (२)
हे इंद्र! बीते हुए दिनों में जिस शोभन अन्नरूप सोम को तुम धारण करते थे, अब भी
प्रतिदिन उसी सोम को पीने की अभिलाषा करो. हे इंद्र! तुम हृदय एवं मन से हमारे कल्याण
की कामना करते हुए सम्मुख रखे सोम को पिओ. (२)
जज्ञानः सोमं सहसे पपाथ प्र ते माता महिमानमुवाच.
एन्द्र पप्राथोर्व१न्तरिक्षं युधा देवेभ्यो वरिवश्चकर्थ.. (३)
हे इंद्र! तुमने जन्म लेते ही बलप्राप्ति के लिए सोमरस पिया था. माता अदिति ने तुम्हारी
महिमा का वर्णन किया. तुमने विस्तृत आकाश को अपने तेज से भर दिया था. तुमने युद्ध
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द्वारा देवों के लिए धन प्राप्त किया. (३)
यद्योधया महतो मन्यमानान्त्साक्षाम तान् बाहुभिः शाशदानान्.
यद्वा नृभिर्वृत इन्द्राभियुध्यास्तं त्वयाजिं सौश्रवसं जयेम.. (४)
हे इंद्र! अपने आपको बड़ा मानने वाले योद्धाओं के साथ तुम जब हमारा युद्ध
कराओगे, तब उन हिंसक शत्रुओं को हम हाथों से ही हरा देंगे. हे इंद्र! यदि मरुतों को साथ
लेकर तुम स्वयं युद्ध करोगे, तो हम तुम्हारी सहायता से उस शोभन अन्नप्राप्ति वाले युद्ध में
विजय पाएंगे. (४)
प्रेन्द्रस्य वोचं प्रथमा कृतानि प्र नूतना मघवा या चकार.
यदेददेवींरसहिष्ट माया अथाभवत्केवलः सोमो अस्य.. (५)
मैं इंद्र के प्राचीन कार्यों का वर्णन करता हूं. इंद्र ने जो नए कार्य किए हैं, मैं उन्हें भी
कहता हूं. इंद्र ने असुरों की मायाओं को पराजित किया है, इसलिए सोमरस केवल इंद्र के
लिए ही है. (५)
तवेदं विश्वमभितः पशव्यं१ यत्पश्यसि चक्षसा सूर्यस्य.
गवामसि गोपतिरेक इन्द्र भक्षीमहि ते प्रयतस्य वस्वः.. (६)
हे इंद्र! प्राणियों के लिए हितकारक विश्व चारों ओर स्थित है. उसे तुम सूर्य के प्रकाश
की सहायता से देखते हो. यह विश्व तुम्हारा ही है. एकमात्र तुम्हीं गायों के स्वामी हो. हम
तुम्हारे द्वारा दिया हुआ धन भोगते हैं. (६)
बृहस्पते युवमिन्द्रश्च वस्वो दिव्यस्येशाथे उत पार्थिवस्य.
धत्तं रयिं स्तुवते कीरये चिद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७)
हे बृहस्पति! तुम एवं इंद्र दोनों प्रकार के पार्थिव एवं दिव्य धन के स्वामी हो. इसलिए
तुम स्तुतिकर्त्ता को धन देते हो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो.
(७)
सूक्त—९९ देवता—इंद्र व विष्णु
परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति.
उभे ते विद्म रजसी पृथिव्या विष्णो देव त्वं परमस्य वित्से.. (१)
हे विष्णु! शब्द, स्पर्श आदि पंचतन्मात्राओं से अतीत तुम्हारा शरीर जब वामन अवतार
के समय बढ़ता है, तब तुम्हारी महिमा कोई नहीं जान सकता. हम तुम्हारे दो लोकों अर्थात्
धरती एवं अंतरिक्ष को जानते हैं, पर परम लोक को तुम ही जानते हो. (१)
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न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप.
उदस्तभ्ना नाकमृष्वं बृहन्तं दाधर्थ प्राचीं ककुभं पृथिव्याः.. (२)
हे विष्णुदेव! धरती पर जन्म प्राप्त एवं भविष्य में उत्पन्न होने वालों में कोई भी तुम्हारी
महिमा का अंत नहीं पा सकता. तुमने दर्शनीय एवं विशाल स्वर्गलोक ऊपर धारण किया है.
तुमने पृथ्वी की पूर्व दिशा को भी धारण किया है. (२)
इरावती धेनुमती हि भूतं सूयवसिनी मनुषे दशस्या.
व्यस्तभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः.. (३)
हे द्यावा-पृथिवी! तुम स्तोता मनुष्य को दान करने की अभिलाषा से अन्न, धेनु एवं
शोभन जौ से युक्त हुई हो. हे विष्णु! तुमने द्यावा-पृथिवी को अनेक प्रकार से धारण किया है.
तुमने पृथ्वी को सर्वत्र स्थित पर्वतों की सहायता से धारण किया है. (३)
उरुं यज्ञाय चक्रथुरु लोकं जनयन्ता सूर्यमुषासमग्निम्.
दासस्य चिद्वृषशिप्रस्य माया जघ्नथुर्नरा पृतनाज्येषु.. (४)
हे इंद्र एवं विष्णु! तुम दोनों ने सूर्य, उषा एवं अग्नि को उत्पन्न करके यजमान के लिए
विस्तृत स्वर्गलोक को बनाया है. हे नेताओ! तुमने वृषशिप्र नामक दास की मायाओं को युद्धों
में समाप्त कर दिया था. (४)
इन्द्राविष्णू दृंहिताः शम्बरस्य नव पुरो नवतिं च श्रथिष्टम्.
शतं वर्चिनः सहस्रं च साकं हथो अप्रत्यसुरस्य वीरान्.. (५)
हे इंद्र एवं विष्णु! तुमने शंबर असुर की सुदृढ़ निन्यानवे नगरियों को समाप्त किया था.
तुमने वर्चि नामक असुर के सैकड़ों और हजारों वीरों को नष्ट किया. (५)
इयं मनीषा बृहती बृहन्तोऋक्रमा तवसा वर्धयन्ती.
ररे वां स्तोमं विदथेषु विष्णो पिन्वतमिषो वृजनेष्विन्द्र.. (६)
हमारी यह विशाल स्तुति महान्, विक्रमशाली एवं शक्तिशाली इंद्र व विष्णु को बढ़ाएगी.
हे इंद्र एवं विष्णु! हमने यज्ञ में तुम्हारी स्तुति की है. युद्ध में तुम हमारा अन्न बढ़ाना. (६)
वषट् ते विष्णोवास आ कृणोमि तन्मे जुषस्व शिपिविष्ट हव्यम्.
वर्धन्तु त्वा सुष्टुतयो गिरो मे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७)
हे विष्णु! मैं यज्ञ में तुम्हारे लिए अपने मुख से वषट् शब्द बोलता हूं. हे तेजस्वी विष्णु!
तुम हमारे हव्य को स्वीकार करो. हमारी शोभनस्तुति के वाक्य तुम्हारी वृद्धि करें. हे देवो! तुम
कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो. (७)
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